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 आदिवासी रानी दुर्गावती के जीवन से हमें सीख लेनी चाहिए कि राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि है: भागवत

 सतना (मप्र)  ।   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को आदिवासी रानी दुर्गावती की वीरता का महिमामंडन करते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्र की रक्षा एवं सम्मान को सर्वोपरि रखा और कितने ही बार विदेशी आक्रांताओं को नाकों चने चबा दिए। उन्होंने कहा,‘‘ हमें रानी दुर्गावती के जीवन से सीख लेनी चाहिए और व्यक्तिगत छोटे स्वार्थों के लिए देश को आहत करने के बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए।'' भागवत ने सतना जिले के जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र मझगवां स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के महर्षि वाल्मीकि परिसर में वीरांगना रानी दुर्गावती की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा, ‘‘रानी दुर्गावती का शौर्य एवं पराक्रम प्रसिद्ध है। कितने ही बार विदेशी आक्रांताओं को उन्होंने नाकों चने चबा दिए। घर के अंदर भेदिया नहीं होता तो वह कभी हारती नहीं। उनका स्मरण करते समय हम सबको यह सबक सीखनी चाहिए कि अपने छोटे स्वार्थों के कारण देश हित को धक्का लगाने की प्रवृत्ति हम लोगों में कभी न पनपे। इसकी हमको चिंता करनी पड़ेगी।'' भागवत ने आगे कहा, ‘‘रानी दुर्गावती कभी भी दूसरों की वीरता के कारण नहीं हारी। उनके साथ विश्वासघात हुआ। किसके द्वारा हुआ? अपने लोगों द्वारा ही हुआ।'' उन्होंने कहा कि जो लोग 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे, उन्होंने रानी दुर्गावती के साहस और सर्वोच्च बलिदान से प्रेरणा ली। रानी दुर्गावती 1550 से 1564 तक तत्कालीन गोंडवाना साम्राज्य की शासक रही। उन्हें मुगलों के खिलाफ अपने राज्य की रक्षा करने के लिए याद किया जाता है। अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए उन्हें युद्ध के मैदान में मुगलों से लड़ते हुए चोटें आईं। उसे युद्ध के मैदान को छोड़ने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और एक खंजर निकाला और 24 जून, 1564 को मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में खुद को मार डाला। रानी दुर्गावती के जीवन प्रसंगों से जुड़ी अनेक हृदयस्पर्शी बातों को उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वीरांगना रानी दुर्गावती के विषय में उनकी शौर्य गाथा और उनके पराक्रम से सभी परिचित हैं। दीनदयाल शोध संस्थान के इस परिसर में उनकी प्रतिमा लगाने से उनकी छवि जनमानस में निरंतर उभरती रहेगी और लोग उनकी सद्प्रेरणा से सदैव प्रेरित होते रहेंगे। उन्होंने रानी दुर्गावती के कौशल को बताते हुए कहा कि वह प्रजाप्रिय एवं प्रजा की हितैषी तथा न्याय पालक थीं। उन्होंने अपनी प्रजा के कल्याण एवं प्रजा के हित में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। इस अवसर पर भागवत ने महर्षि वाल्मीकि परिसर में जनजातीय गौरव एवं पोषक अनाजों पर लगाई गई आकर्षक प्रदर्शनी को भी देखा।  
 

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