पहली बार कब हुआ इंसुलिन का इस्तेमाल?
भले ही आज डायबिटीज के मरीजों के लिए इंसुलिन किसी जीवन रक्षक से कम नहीं है, लेकिन जब इंसुलिन नहीं थी तो लोगों की स्थिति कैसी थी। सालों पहले टाइप-1 डायबिटीज को मौत से जोड़कर देखा जाता था। जिस किसी व्यक्ति को टाइप-1 डायबिटीज हो जाती थी, उनका जीवित बचना मुश्किल या नामुमकिन सा हो जाता था। ऐसे में इंसुलिन की खोज टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। वर्तमान में टाइप-1 डायबिटीज के मरीज सिर्फ एक इंसुलिन की मदद से नॉर्मल लाइफ जी पा रहे हैं।
कब हुई इंसुलिन की खोज
Food and Drug Administration के अनुसार, कनाडा के टोरंटो विश्वविद्यालय में डॉ. फ्रेडरिक बैंटिंग और चार्ल्स बेस्ट ने मई 1921 में इंसुलिन पर अपना एक्सपेरिमेंट शुरू किया था और इसके कुछ महीनों बाद इंसुलिन को सफलता के साथ अलग कर लिया गया था। इसके बाद जनवरी 1922 में पहली बार इंसुलिन का इस्तेमाल किसी इंसान के ऊपर सफलतापूर्वक किया गया था।
इंसुलिन की खोज से बहुत पहले, यह अनुमान लगाया गया था कि अग्न्याशय एक ऐसा पदार्थ बनाता है, जो कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करता है। कई सालों तक, ब्लड शुगर लेवल को कम करने के लिए अग्न्याशय के अर्क तैयार करने की कोशिश गंदगी और जहरीले तत्वों के कारण फेल हो गई।
कुत्ते के पैंक्रियास के अर्क से हुआ था इंसुलिन का ट्रायल
साल 2012 में Journal of Community Hospital Internal Medicine Perspectives के अनुसार, कई बार अग्न्याशय के अर्क को तैयार करने में असफलता मिलने पर आर्थोपेडिक सर्जन फ्रेडरिक बैंटिंग को कुत्तों की अग्न्याशय नली को बांधकर अग्न्याशय के आइलेट अर्क को अलग करने का आइडिया आया। टोरंटो विश्वविद्यालय में फिजियोलॉजी के प्रोफेसर और विभाग प्रमुख जॉन मैकलियोड ने भी बैंटिंग की मदद की और उन्हें रिसर्च के लिए दस कुत्ते, एक स्टूडेंट रिसर्च असिस्टेंट चार्ल्स बेस्ट को सौंपा। यह प्रयोग 17 मई 1921 को शुरू किया गया था। सितंबर तक वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया कि जिन कुत्तों का अग्न्याशय (पैंक्रियास) निकाल दिया गया था, उन्हें डायबिटीज हो जाती है और अग्न्याशय से निकाले गए रस आइलेटिन का इंजेक्शन लगाने से ब्लड शुगर लेवल कम हो जाता है। 1921 के अंत में, बायोकेमिस्ट जे.बी. कॉलिप इस टीम में शामिल हुए और उन्होंने अर्क को इंसानों के इस्तेमाल के लिए साफ और शुद्ध करने में मदद की।
14 साल के लड़के पर हुआ इंसुलिन का पहला इंसानी ट्रायल
11 जनवरी 1922 को, बैंटिंग और बेस्ट ने 14 साल के एक लड़के को पैंक्रियास से निकाले गए अर्क का पहला इंजेक्शन दिया गया, लेकिन इससे उसे फोड़ा हो गया, कीटोसिस पर कोई असर नहीं पड़ा और ब्लड शुगर में बहुत थोड़ी सी कमी देखी गई। इसके बाद 1922 में ही कॉलिप ने इस अर्क को और ज्यादा साफ किया, जिसके बाद के इंजेक्शनों के बहुत ही अच्छे नतीजे रहे।टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित मरीज को इंसुलिन का यह इंजेक्शन लगाने के बाद ब्लड शुगर और यूरिन में शुगर का लेवल कम हो गया और खतरनाक कीटोन भी गायब हो गए। इसके बाद डॉक्टर रोसेनफेल्ड ने 6 अन्य मरीजों पर इसका टेस्ट किया और अच्छे रिजल्ट देखे।
ह्यूमुलिन ब्रांड नाम से हुई सिंथेटिक ह्यूमन इंसुलिन की शुरुआत
American Diabetes Association के अनुसार, डायबिटीज के इलाज के लिए कई सालों तक गाय और सुअर के इंसुलिन का इस्तेमाल किया जाता था, जिसने लाखों लोगों की जान बचाई। हालांकि, यह पूरी तरह से सही नहीं था, क्योंकि इससे कई मरीजों को एलर्जी की समस्या का सामना करना पड़ता था।1978 में पहली बार जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से E. coli बैक्टीरिया का इस्तेमाल करते हुए लैब में सिंथेटिक ह्यूमन इंसुलिन तैयार किया गया। इसके बाद, 1982 में एली लिली कंपनी ने ह्यूमुलिन ब्रांड नाम से दुनिया का पहला व्यावसायिक रूप से मौजूद सिंथेटिक ह्यूमन इंसुलिन बाजार में बेचना शुरू किया।
निष्कर्ष
इंसुलिन की खोज मेडिकल की दुनिया की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। जानवरों के अर्क से शुरू हुआ यह सफर वर्तमान में जेनेटिक इंजीनियरिंग तक पहुंचा है, जिसने दुनिया भर के करोड़ों डायबिटीज मरीजों की जान बचाई है। इतने सालों की रिसर्च, डॉक्टरों और साइंटिस्टों की मेहनत के कारण डायबिटीज के मरीज अपनी जरूरतों और लाइफस्टाइल के हिसाब से कई तरह के फॉर्मूले और इंसुलिन लेने के तरीकों में से कोई भी चुन सकते हैं।


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