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धमधा के गोपाल तालाब में काष्ठस्तंभ पुनर्स्थापित करने से किसका भला होगा?
-तालाब संरक्षण से प्रकृति को समझने का मिला अवसर
आलेख- धर्मधाम गौरवगाथा समिति, धमधा जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ 
धमधा में 126 तालाब थे। हमने गोपाल तालाब में काम शुरू किया तो सबके मन में एक ही सवाल था कि यही तालाब ही क्यों। यह तालाब तो साल में 8 महीने सूखा रहता है। बहुत अच्छे से पानी भी नहीं भरता। इस गोपाल तालाब का कोई उपयोग भी नहीं है। इसमें बड़े-बड़े पत्थर हैं, जिसके कारण न तो आदमी घुसता है और न मवेशी। इसके पार में भी पेड़-पौधे नहीं हैं। केवल मुरम ही मुरम है, जहां कोई पौधा उगता भी नहीं है। फिर गोपाल तालाब में क्या किया जा रहा है, क्या यहां कोई कब्जा जमाना उद्देश्य है।
 हमने लोगों के सवालों पर विचार किया तो इन सबके उत्तर हमें अपने आप मिलने लगे।
यदि गोपाल तालाब की तरह हर तालाब पर ध्यान देना छोड़ दिया गया तो धीरे-धीरे सभी 126 तालाब खत्म हो जाएंगे।
(1) 1823 में बना था गोपाल तालाब -
वैसे इस तालाब में काष्ठस्तंभ मिलना बहुत महत्व रखता है। हमने काष्टस्तंभ को फिर से स्थापित करने के लिए उसे निकाला तो उसमें 1823 का चाँदी का सिक्का मिला, जो इस तालाब की ऐतिहासिकता को दर्शाता है। इससे यह फायदा हुआ कि हमारे तालाबों की क्या परंपरा थी, किस काल में ये बने हमें इसकी जानकारी हुई। सबसे बड़ी बात धमधा में जोड़ी में तालाब और भी हैं, लेकिन केवल गोपाल-गोपालिन तालाब ही जिसमें दोनों तालाब में स्तंभ गड़ाए गए थे। इसे लोगों के ध्यान में नहीं लाया जाता तो संभवत: यह बात लोग बिसरा देते।
(2) तालाब के मुकुट की तरह होते हैं स्तंभ- 
हमने गोपाल तालाब को फिर से तालाब जैसा सम्मान दिलाने का प्रयास किया है। इसके लिए प्राचीन संस्कार के अनुसार काष्ठस्तंभ की स्थापना की है, जो किसी तालाब का शिखर या मुकुट की तरह होता है। इस तालाब में पानी कम भरता है क्योंकि इसके लिए पानी के आने का रास्ता कम हो गया है। इसके लिए सड़क के दूसरी ओर से पानी लाने के लिए पार को जेसीबी से खुदाई की गई है। गोपालिन तालाब से गोपाल तालाब को जोडऩे भी पार को फोड़ा गया है। ताकि दोनों में पानी का आदान-प्रदान हो सके। अभी इसमें चार-पाँच महीने पानी भरा रहता है हमारा प्रयास है कि इसमें सालभर पानी भरा रहे। वह भी प्राकृतिक बारिश के पानी से। हम ट्यूबवेल से तालाब भरने के पक्षधर नहीं हैं।
(3) जीव-जन्तु और पक्षियों का आश्रय स्थल होते हैं तालाब-
 एक तालाब कई जीवों का घर होता है। इसमें सांप, मेढ़क, केकड़ा, मछली के साथ छोटे-छोटे जीव पलते हैं। इसके ऊपर चिडिय़ा विचरण करती हैं। ये एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व के साथ निर्वाह करते हैं। पानी कम होने से तालाब में जीव-जन्तुओं की संख्या कम है। इसके लिए हमने तालाब में मछली भी लाकर छोड़ी है। ताकि सभी आहार प्रणाली के माध्यम से एक-दूसरे से विकसित होते रहे।
(4) कर्क रेखा में होने के कारण जल्दी सूखते हैं तालाब-
 तालाब जल्दी सूखने के तीन कारण हैं, पहला पानी कम भरना, दूसरा सूर्य के प्रकाश से वाष्पीकरण और तीसरा मुरम जमीन होने के कारण जल्दी सोखना। पहले कारण के समाधान के लिए हमने पानी के आवक का स्त्रोत बढ़ा दिया है। चूंकि छत्तीसगढ़ पृथ्वी के बीच स्थित है। यहां से कर्क रेखा गुजरती है। इसलिए यहां का वातावरण उष्ण कटीबंधीय है। सूरज की रोशन यहां सबसे ज्यादा समय तक पड़ती है, लिहाजा तालाबों का पानी अधिक वाष्पीकृत होता है। इसके समाधान के लिए हमने गोपाल तालाब में कमल का रोपण किया है। इसके पत्ते पानी के ऊपर फैल जाते हैं, जिससे वाष्पीकरण कम होता है। तीसरी समस्या मुरम जमीन होने के कारण पानी के जल्दी सूखने की है, इस समस्या से कमल की जड़ें कुछ निजात दिला सकती है। दलदल में जड़ें घुसने से पानी का रिसाव कुछ कम होगा।
(5) मुरम में नहीं उग पाते पौधे-
 हम तालाब के चारों ओर घना वृक्षारोपण करना चाहते हैं, क्योंकि पेड़-पौधों की जड़ें भूमि जल स्तर को बनाए रखती हैं। गोपाल तालाब धमधा के सबसे ऊंची भूमि पर होने के कारण जल स्तर जल्दी घट जाता है। पेड़-पौधों की संख्या बढ़ाकर इसे कुछ हद तक रोका जा सकता है।
 पेड़-पौधे लगाने के लिए गोपाल तालाब में सबसे बड़ी समस्या यहां की मुरम वाली जमीन है, क्योंकि मुरम वाली जमीन पर कोई पौधा जल्दी उगता नहीं है। जो पौधे उगते हैं, उसे मवेशी चर देते हैं। कुछ बच जाते हैं, उसे लोग खेतों में घेरा करने या फिर जलाने के लिए काट देते हैं। 
(6) छिंद के पांच हजार बीज लगाए गोपाल तालाब के पार में- 
गोपाल तालाब की इस समस्या के लिए हमने यहां का वैज्ञानिक अध्ययन किया, जिसमें हमें नई बात पता लगी। यहां छिंद के पेड़ काफी हैं, वे सुरक्षित भी हैं और उन्हें मवेशी नहीं खाते, न ही लोग काटते हैं।  छिंद के पौधों आसानी से उग जाते हैं। इसलिए हमने गोपाल तालाब के पार में लगभग पाँच हजार छिंद की अच्छी किस्म के बीजों का रोपण किया है।
(7) छिंद के सहारे उगते हैं नीम और बरगद- 
 छिंद लगाने का दूसरा बड़ा फायदा यह होगा कि छिंद घना होता है। इसमें पक्षी बैठकर बीट करते हैं, जिसमें कई बड़े पौधों के बीज होते हैं। गोपाल तालाब में वर्तमान में हर छिंद के पास घनी झाडिय़ा उगी हुई हैं। उन झाडिय़ों के भीतर नीम, सीताफल, गस्ती, पीपल, परसा सहित कई पेड़ उग चुके हैं। उनकी ऊँचाई भी 10-12 फीट तक हो चुकी है। झाडिय़ों के बीच होने के कारण यह मवेशियों की पहुंच से बच जाता है और लोग भी नहीं काट पाते हैं। यदि हमारे छिड़के हुए छिंद के बीज उगते हैं तो इसी तरह से बड़े पेड़ इनके सहारे उगेंगे। 
(8) पाताल से पानी खींच लेती हैं छिंद की जड़ें- 
छिंद की जड़ें बहुत गहरी होती है, जो भू-गर्भ से पानी खींचते हैं, इसलिए छिंद के पेड़ के आसपास मिट्टी में नमी रहती है, जिससे दूसरे पौधों को नमी मिल जाती है। हमने छिंद और झडिय़ों के बीच में कुछ पौधे लगा रहे हैं ताकि यहां बड़े पेड़ उग सके और उन्हें मवेशी नुकसान न पहुंचाएं।वरना मुरम जमीन में पेड़ उगाना मुश्किल है।
(9) प्रकृति और जीव जगत के संबंध को पहचानने का मिला अवसर -
गोपाल तालाब में काष्ठस्तंभ की स्थापना से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। प्रकृति में कैसी व्यवस्था है, पेड़ एक-दूसरे को उगने में कैसे सहायता करते हैं। वे पक्षियों के रहने के लिए छाया देते हैं। पक्षी पेड़ों के वंश बढ़ाने का काम बीजों को उगाकर करते हैं। ये सभी चीजें मनुष्य को आपस में मिलजुलकर रहना सीखाते हैं। एक-दूसरे की सहायता करते हुए सुखपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। गोपाल तालाब का यह काम जीवन और प्रकृति को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण काम रहा।
(10) धमधा की पहचान हैं तालाब-
 भविष्य में इसी तरह हम तालाबों का सरंक्षण करने का प्रयास करेंगे क्योंकि ये धमधा की पहचान ही नहीं, जीवन का साधन है।
  गोपाल तालाब पर आधारित स्मारिका का विमोचन 20 जून 2021 को दोपहर 3 बजे होगा। इसमें पधारकर अपनी भागीदारी दें।

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