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 ईश्वरीय आस्था का नाम ही आशा है!!
आलेख- अतुल कुमार 'श्रीधर'  
 संसार में बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं जिनमें अगाध आत्मविश्वास है। यह आत्मविश्वास उनका स्वयं का बल नहीं होता, अपितु वे किसी शक्ति से जोड़कर अपने विश्वास को बड़े ऊंचे स्तर तक ले जाते हैं। यह भी देखने में आता है कि एक बड़ा वर्ग अपने मन में, कर्म में, जीवन में निरन्तर किसी पीड़ा, किसी अभाव और किसी निराशा को महसूस करता रहता है। इन दोनों प्रकार के जो व्यक्ति हैं, उनकी मानसिकताओं और स्थितियों में एक शक्ति के योग और अयोग की ही बात है।
 यह शक्ति है आस्था की शक्ति! आस्था जिसे श्रद्धा भी कह सकते हैं। और यह आस्था किस पर हो, यह भी एक आवश्यक और विचारणीय बात है। व्यक्ति की स्वयं की क्षमता कितनी है? यदि आंका जाय तो यकीनन कुछ भी नहीं। व्यक्ति तो इतना असहाय है कि यदि बचपन में माता दूध न पिलावे तो उसका पोषण ही न हो। बचपन से आगे जीवन के हर पड़ाव में बारम्बार व्यक्ति दूसरों पर ही निर्भर रहकर क्रमश: आगे बढ़ता है और अपनी सफलतायें अर्जित करता है। तो यह तो निश्चित बात है कि किसी में स्वयं का अहं भाव तो होना ही नहीं चाहिये, उसे विनीत होना चाहिये क्योंकि वह समस्त जगत का उपकार ग्रहण कर रहा है, चाहे वह इसे जाने अथवा ना जाने। मनुष्य स्वभाव से कृतज्ञ बनकर रहे।
 इसके आगे एक बात और विचारणीय है कि दूसरे भी किसी सीमा तक ही किसी की मदद कर सकते हैं। संसार में जब तक स्वार्थ सधता है, बस स्वार्थ की इसी सीमा के अनुसार ही व्यवहार होता है। जिसका स्वार्थ न हो, अथवा उससे बिगाड़ की आशंका हो, तो कितने ही करीबी संबंधों में भी हाथ खींच लिये जाते हैं। तो सबकी अपनी-अपनी सीमायें हैं। यह निश्चित है कि मनुष्य यदि यह सोचे कि उसका निर्वाह स्वयं पर अथवा संसार पर ही विश्वास करके हो सकता है, निराशाजनक ही होगा। संसार के साजो-सामान, पद-प्रतिष्ठा, शोहरत भी किसी को आत्मसुख प्रदान नहीं कर सकते हैं। इसलिये मनुष्य को अपने विश्वास को इससे आगे और कहीं ऊँचे स्तर तक ले जाना होगा। 
 यह ऊँचे स्तर का विश्वास एकमात्र भगवान पर ही स्थाई रह सकता है। क्यों? क्योंकि उसे किसी से कोई स्वार्थ नहीं है और सबसे बड़ी बात यह कि वह सबका परमपिता और माता है। वह समस्त आस्थाओं का, विश्वास का आधार है। वह सबकी आत्मा में नित्य विराजमान, चराचर जीव का जीवनदाता, प्रेरक और नित्य संगी है। मुसीबत की बात बस यही है कि हम उसकी मौजूदगी को अपने जीवन में महसूस नहीं कर पाते। जबकि वह हमारे चारों ओर है, अस्तित्व ही उन्हीं से है। वह प्रेम का, करुणा का, कृपा का, दयालुता का और अनंतानंत गुणों की खान हैं, बल्कि वह तो स्वयं ही प्रेम हैं, कृपा हैं, करुणा हैं, दया हैं। उसकी जो भी परिस्थितियां दी हमें दी हुई हैं, वह वस्तुत: हमारे ही कर्मों का परिणाम है। उस पर विश्वास करने से विकट परिस्थितियाँ भी बिना कष्ट के स्वीकार्य हो जाती हैं और नवीन उत्साह के साथ उसके सुधार की ओर गति होती है। ऐसा न हो तो विकट परिस्थितियां घातक भी हो जाती हैं। ईश्वर पर विश्वास करने का यह अर्थ भी है हम उसके विधान पर विश्वास करते हैं।
 मनुष्य को उन्हीं का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। उन्हीं की प्रेरणा का अनुभव करते रहना चाहिये। उनकी प्रेरणा निरन्तर हमारी आत्मा में गूँजती रहती है, बस संसार और हमारी अस्थिरता का शोर इतना अधिक हो जाता है कि वह आवाज सुनाई ही नहीं पड़ती और अगर सुनाई पड़े भी तो दूसरी ओर का विश्वास इतना प्रबल बन पड़ा है हमारा कि हम उस आवाज की ओर से कान बन्द कर लेते हैं। फलत: जीवन का उत्थान हो ही नहीं पाता, और किसी भंवर में गोते खाने के समान ही ऊंच-नीच के हिचकोले खाता रहता है। क्या मनुष्य इसी तरह दया का पात्र बनने को आया है? नहीं, वह तो परमपिता भगवान का सनातन पुत्र है और जीवन की सर्वोच्चता को पाना उसका अधिकार है।
 तो इस अधिकार के लिये उसे विश्वास को ऊंचा उठाना होगा। जब यह विश्वास, जिसे आस्था, श्रद्धा, अनुराग आदि नामों से पुकार सकते हैं; आ जाय तो जीवन में निराशा की काली छाया भला टिक सकती है? अरे, ईश्वरीय आस्था तो वह सूर्य है, कि जिसकी रोशनी में किसी अंधकार का टिक पाना तो असम्भव है। यह अंधकार है निराशा, दु:ख, अभाव, अज्ञान, अशान्ति आदि। श्री रवींद्रनाथ टैगोर जी ने कहा है,

 '..आस्था वो पक्षी है जो भोर के अँधेरे में भी उजाले को महसूस करती है।'
 
जीवन को ईश्वर में आस्था से जोड़कर जगत में व्यवहार करें, जो कुछ हमारे पास है, जगत को उसी का स्वरुप मानकर उससे जगत-देवता की सेवा हो, सबके भले की कामना हो। अपना और दूसरों का जीवन इस प्रकार से आशा और सम्पन्नता से भर जायेगा।
 
अरे मनुज! दृष्टि उठा,
जरा दूर देख, जरा दूर देख
वह जो कोई बड़ी दूर खड़ा है,
उसे पास ला, उसे पास ला।
नाहक ही वह दूर हटा,
जब जीवन अगनित से सटा।
अगनित से अब एक चुन,
उस एक बिना तो सब है शून।
 
 वस्तुत: जीवन में ईश्वरीय आस्था को लाना ही आशा और सुख को लाना है। क्योंकि आशा और सुख, ये दोनों उसी ईश्वर के ही नाम हैं। ईश्वर केवल ईश्वर नहीं है, वह अनन्त गुण भी है।
  

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