मात-पिता को नहीं भुलाना
-विश्व वरिष्ठता दिवस
- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
स्नेह-सलिल की बहती धारा, आशीषों की छाया है।।
मात-पिता को नहीं भुलाना, जिनसे यह तन पाया है।
अपने सब सुख भूल त्याग कर, संतानों को वे पालें।
नहीं जरावस्था में उनकी, जिम्मेदारी को टालें।
सेवा कर लें मात-पिता की,पावन अवसर आया है।।
मात-पिता को नहीं भुलाना, जिनसे यह तन पाया है।
थाम उँगलियाँ चलना सीखा, पाई ममता लोरी में।
हर चाहत को पंख लगाए, अनुशासन की डोरी में।
शिक्षा के दृढ़ आधारों ने, जीवन सफल बनाया है।।
मात-पिता को नहीं भुलाना, जिनसे यह तन पाया है।
कहाँ जोड़ते धन सुख-साधन, सारी आय लुटाते हैं।
अभिभावक बच्चों की माँगें, पूरी करते जाते हैं।
उनकी छोटी जरूरतों को, सुत ने क्यों ठुकराया है ?
मात-पिता को नहीं भुलाना, जिनसे यह तन पाया है।
बच्चों के बचपन की यादें, लातीं मुख पर मुस्कानें।
नहीं अकेलापन वे झेलें, मिले वक्त की सौगातें।
थाम काँपते हाथों को लो, अनुभव सार समाया है।।
मात-पिता को नहीं भुलाना, जिनसे यह तन पाया है।।










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