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 आईपीएस अधिकारी ने नाबालिग लड़कियों के लापता होने के मामलों और एजेंसियों की भूमिका पर किताब लिखी

 नयी दिल्ली,। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी सिमाला प्रसाद ने अपनी नई किताब "शी गोज मिसिंग" में हर साल हजारों नाबालिग लड़कियों के गुम होने की जांच की है, साथ ही कानून प्रवर्तन और समाज के "ध्यान नहीं देने, सवाल नहीं करने या कार्रवाई नहीं करने" पर भी बात की है। पुस्तक के प्रकाशक ओम बुक्स इंटरनेशनल ने एक बयान में कहा कि अभी जबलपुर में रेलवे की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात प्रसाद  की नई किताब उन सामाजिक-मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और व्यवस्थागत वजहों की जांच करती हैं जो छोटी लड़कियों को उनके घरों से निकालकर गुमनामी में धकेल देती हैं। उन्होंने कहा, "परंपरागत अपराध कथाओं के उलट, 'शी गोज मिसिंग' लापता लड़कियों को आंकड़ों या कभी-कभी होने वाली घटनाओं तक सीमित नहीं करती... यह घर से भाग जाने, बगावत करने या 'बुरे फैसलों' जैसी जानी-पहचानी वजहों को चुनौती देती है, और यह दिखाती है कि कैसे भावनात्मक अनदेखी, लैंगिक आधार पर स्थितियों का आकलन, डर, जबरदस्ती और संस्थागत उदासीनता मिलकर छोटी जिंदगियों को खत्म कर देती हैं।"

सच्ची घटनाओं पर आधारित इस किताब का मकसद यह दिखाना है कि कैसे गुमशुदा होना शायद ही कभी अचानक होता है, बल्कि "बार-बार चुप्पी साधने, चेतावनियों को नजरअंदाज करने और सामान्य बन गए अन्याय का नतीजा होता है।" प्रसाद किताब में लिखती हैं, "मुझे उम्मीद है कि यह किताब कार्रवाई करने के लिए आह्वान करेगी, और हमें सिर्फ आंकड़ों से आगे बढ़कर इन युवाओं की जिंदगी और भविष्य को देखने के लिए कहेगी। लड़कियों के लापता होने के कारणों को बताकर और उनके पुनर्वास के रास्ते खोजकर, मेरा मकसद पाठकों को इन मुद्दों को संवेदनशीलता और करुणा के साथ देखने के लिए जानकारी और समझ प्रदान करना है।" पुलिस सेवा में अपने पेशेवर अनुभव के आधार पर, प्रसाद एक आलोचनात्मक पक्ष भी पेश करती हैं, जिसमें यह बताया गया है कि कैसे कानून प्रवर्तन और प्रशासनिक तंत्र "अक्सर सही से प्रतिक्रिया नहीं देते"। प्रसाद एक गांव में एक महिला की हत्या की तुलना में एक लापता लड़की के मामले से निपटने के तरीके का उदाहरण देती हैं, जहां वह अपने करियर की शुरुआत में तैनात थीं। हत्या की घटना पर तो पुलिस बल और स्थानीय प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पूरा ध्यान गया, लेकिन 15 साल की लड़की के गायब होने के मामले को सुबह की 'ब्रीफिंग' में एक वाक्य में समेट दिया गया। वह किताब में लिखती हैं, "मैं हैरान थी: मामला जघन्य था, फिर भी इसे इस तरह नहीं देखा गया। हम इसकी गंभीरता नहीं समझ सके। और 'हम' से मेरा मतलब है प्रत्येक पक्ष से है जिसमें मैं भी शामिल हूं तथा पुलिस और पूरा समाज भी है।" 

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