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तृणमूल कांग्रेस में फूट: निष्कासित नेता रिताब्रता 58 बागी विधायकों के समर्थन से नेता प्रतिपक्ष बने

कोलकाता. तृणमूल कांग्रेस को बुधवार को अपने 28 साल के इतिहास में पहली फूट का सामना करना पड़ा, और पार्टी के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुनकर विधायक दल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके साथ ही उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता भी प्राप्त कर ली, जिससे ममता बनर्जी की पार्टी अपने गठन के बाद से अब तक के सबसे गंभीर आंतरिक संकट में घिर गई है। कुछ ही घंटों के भीतर, घबराए हुए तृणमूल नेतृत्व ने पूरे पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी समितियों और अग्रिम मोर्चों को भंग कर दिया। यह कदम तेजी से बढ़ते सत्ता संघर्ष के बीच राजनीतिक नियंत्रण वापस पाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के दो महीने के भीतर ही हुई इस नाटकीय बगावत ने संगठन और इसके निर्वाचित विधायकों के बीच एक गहरी दरार को उजागर कर दिया है। इसने नेतृत्व, उत्तराधिकार और उस पार्टी की भविष्य की दिशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका एक दशक से अधिक समय से बंगाल की राजनीति पर दबदबा रहा है। रिताब्रता और उनके साथी एवं निष्कासित विधायक संदीपन साहा के नेतृत्व वाले विद्रोही खेमे ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे। यह संख्या दल-बदल रोधी कानून के तहत एक अलग गुट के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत की सीमा को आसानी से पार कर लेती है। विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद रिताब्रता ने पत्रकारों से कहा, ''विधानसभा अध्यक्ष ने हमारे दावे को स्वीकार कर लिया है।'' संख्याबल के माध्यम से अपनी वैधता का दावा करते हुए, उन्होंने जोर देकर कहा कि अब विद्रोही गुट ही विधानसभा में असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, ''तृणमूल विधायक दल 58 विधायकों की एक टीम है, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीता है। विधानसभा में असली तृणमूल हम ही हैं।'' विधानसभा अध्यक्ष की स्वीकृति ने प्रभावी रूप से उस पार्टी में पहली संगठनात्मक दरार को औपचारिक रूप दे दिया, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होने के बाद की थी। बागी खेमे ने एक नयी नेतृत्व संरचना प्रस्तुत की, जिसमें रिताब्रता को नेता प्रतिपक्ष और अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक नामित किया गया। वरिष्ठ विधायकों और पार्टी के पुराने सदस्यों जावेद अहमद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और शिउली साहा को उपनेता नियुक्त किया गया। तृणमूल कांग्रेस के तमाम दिग्गज विधायक भी इस विद्रोह में शामिल हो गए हैं, जिनमें समर मुखोपाध्याय, अरूप राय, रथीन घोष, जावेद खान और प्रसून बनर्जी जैसे नाम शामिल हैं। हालाँकि, गौर करने वाली बात यह है कि बागियों ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दी। विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए अपने पत्र में, उन्होंने ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में मान्यता देना जारी रखा, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे विधायक दल के कामकाज में उनके भतीजे तथा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के अधिकार को अब और स्वीकार नहीं करेंगे। बागी खेमे से जुड़े एक नेता ने कहा, ''हम ममता बनर्जी को अपना नेता स्वीकार करते हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को स्वीकार नहीं करते।'' रिताब्रता ने पूर्व मुख्यमंत्री से विधायक दल का मार्गदर्शन करने की अपील भी की।
 उन्होंने कहा, ''हम ममता बनर्जी से अनुरोध करेंगे कि वह विधायक दल के मुख्य सलाहकार की भूमिका निभाएं।'' हालाँकि, ममता बनर्जी खेमे ने बागियों के कदम की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि विधानसभा अध्यक्ष को दी गई जानकारी पार्टी के आधिकारिक लेटरहेड के बजाय सादा कागज पर जमा की गई। पार्टी का रुख है कि विधानसभा को इस तरह के किसी भी निर्णय की जानकारी देने का अधिकार केवल पार्टी अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के पास ही है। रिताब्रता ने जोर देकर कहा कि हर कदम संसदीय परंपराओं और विधायी नियमों के अनुरूप उठाया गया है।
 विद्रोह के तात्कालिक कारणों के तार चुनाव बाद नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर पैदा हुए विवाद से जुड़े हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब विधानसभा अध्यक्ष को वरिष्ठ तृणमूल विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को मान्यता देने के लिए भेजे गए एक प्रस्ताव में कथित तौर पर कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए। इन आरोपों के कारण इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई और सीआईडी जांच शुरू कर दी गई। खतरे की गंभीरता को भांपते हुए, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने संगठनात्मक मोर्चे पर तेजी से कदम उठाए और सभी संगठनात्मक इकाइयों के पुनर्गठन से पहले उनकी संरचना और कामकाज की व्यापक समीक्षा करने की घोषणा की। पार्टी ने एक बयान में कहा, ''गहन विचार-विमर्श के बाद, यह निर्णय लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियों के साथ-साथ इसके सभी अग्रिम संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया जाए।'' महत्वपूर्ण बात यह है कि रिताब्रता तृणमूल कांग्रेस के श्रमिक संघ के प्रदेश अध्यक्ष थे, जबकि अभिषेक बनर्जी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इस कदम को इस स्वीकारोक्ति के रूप में देखा कि यह संकट सामान्य गुटबाजी से कहीं आगे निकल गया है और अब पार्टी पर नियंत्रण के संघर्ष के रूप में बदल चुका है। कई लोगों के लिए, ये घटनाएँ महाराष्ट्र के घटनाक्रम की स्पष्ट याद दिलाती हैं।
 
जिस तरह 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को दो फाड़ किया था और 2023 में अजित पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का विभाजन हुआ था, बंगाल की यह बगावत भी मूल संगठन पर नियंत्रण के बजाय विधायक दल के भीतर संख्या बल के इर्द-गिर्द बुनी गई है।
 

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