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इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप में ऐसा दिखता है कोरोना वायरस
 शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप की मदद से कोरोना वायरस की अद्भुत तस्वीरें ली हैं। कोविड-19 महामारी को फैलाने वाले एसआरएस-सीओवी-2  के हर कण का व्यास करीब 80 नैनोमीटर होता है। हर कण में वायरस के जेनेटिक कोड यानी आरएनए की एक गेंद होती है।  उसकी रक्षा करता है एक स्पाइक प्रोटीन यानी बाहर की तरफ निकले हुए मुकुट जैसे उभार जिनकी वजह से वायरस को यह नाम मिला।  यह कोरोना वायरस परिवार का एक हिस्सा है, जिसके और भी सदस्य हैं।   इसके कण छोटी छोटी बूंदों और ऐरोसोल के जरिए तब फैलते हैं जब कोई सांस लेता है या खांसता है या बात करता है।  यह संक्रमित सतहों के जरिए भी फैलता है।   
यह वायरस स्पाइक प्रोटीनों का इस्तेमाल कर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद प्रोटीन से जुड़ जाता है।  इससे कुछ रासायनिक बदलाव होते हैं जिनकी बदौलत वायरस का आरएनए   कोशिकाओं में घुस जाता है।  वहां वो कोशिकाओं से आरएनए की प्रतियां बनवाता है।  एक कोशिका वायरस के हजारों नए कण  बना सकती है, जो फिर दूसरी स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं।  बुरी तरह से संक्रमित एक कोशिका नीले रंग में दिखाई देती है।  उसे संक्रमित करने वाले वायरस के कण लाल रंग में हैं।  यह वायरस फ्लू या जुकाम करने वाले वायरसों से ज्यादा अलग नहीं है, लेकिन 2019 से पहले इसका कभी किसी से पाला ही नहीं पड़ा था।  इसी वजह से किसी में भी इसके खिलाफ इम्युनिटी नहीं थी।  
वर्ष 2002 में चीन में इंसानों के बीच इस सदी का पहला कोरोना वायरस हमला सामने आया।  यह एसआरएस-सीओवी था जिससे एसएआरएस नाम की बीमारी आई।  यह बीमारी करीब 30 देशों में फैल गई लेकिन यह उतनी घातक नहीं निकली।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जुलाई 2003 में ही इस पर नियंत्रण कर लिए जाने की घोषणा कर दी थी।  र्वष 2012 में खोज हुई एमईआरएस-सीओवी की जिसे एक नई फ्लू जैसी बीमारी को जन्म दिया।  मध्य पूर्व में पहली बार सामने आने वाले इस बीमारी का नाम एमईआरएस रखा गया।  यह कोविड-19 से कम संक्रामक होती है।  संक्रमण अमूमन एक ही परिवार के सदस्यों में या अस्पतालों के अंदर फैलता है।   नीले रंग में टी-कोशिकाएं जो हमारे इम्यून सिस्टम का हिस्सा होती हैं और वायरस इसी सिस्टम पर हमला करता है।  एसआरएस-सीओवी-2 की ही तरह यह भी आरएनए आधारित वायरस है। 

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