बच्चों के शरीर में कैल्शियम क्यों बढ़ जाता है?
एक कहावत है कि जब किसी भी चीज की अधिकता हो जाए, तो वह फायदे की जगह नुकसान पहुंचाने लगती है। कैल्शियम के साथ भी कुछ ऐसा ही है। हम बचपन से दादी-नानी से सुनते आए हैं कि दूध पिओ, पनीर खाओ। इससे शरीर को कैल्शियम मिलेगा और हड्डियां मजबूत होंगी। एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। खासकर बच्चों के शरीर के लिए। सही समय पर इसकी पहचान न हो, तो यह गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। ब्लड में कैल्शियम की अधिकता को मेडिकल भाषा में हाइपरकैल्सीमिया (Hypercalcemia) कहा जाता है।
कैल्शियम लेवल को कंट्रोल करते हैं ये दो हार्मोन
हमारा शरीर कई चीजों को कंट्रोल करता है जिसमें से एक है ब्लड में कैल्शियम लेवल को बनाए रखना। दो ऐसे हार्मोन हैं जो ब्लड और हड्डियों में कैल्शियम लेवल को कंट्रोल करने का काम करते हैं। पहला है पैराथायराइड हार्मोन (Parathyroid Hormone) और दूसरा है कैल्सीटोनिन (Calcitonin Hormone)। हालांकि, हाइपरकैल्सीमिया जैसी मेडिकल कंडीशन की वजह से ब्लड में कैल्शियम का लेवल ज्यादा हो जाता है। सामान्य व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लेवल को एब्जॉर्ब कराने में विटामिन डी भी अहम भूमिका निभाता है।
बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने के क्या कारण हो सकते हैं?
-गंभीर डिहाइड्रेशन।
-विटामिन डी की अधिक मात्रा। ऐसा बच्चों में विटामिन डी सप्लीमेंट का अधिक सेवन करने की वजह से भी होता है।
-पैराथायराइड हार्मोन का ज्यादा बनना।
-दुर्लभ जेनेटिक रोग।
-लंबे समय तक खाई जाने वाली कुछ दवाएं।
-किडनी डिजीज या अन्य गंभीर बीमारी।
-साल 2025 में Endokrynologia Polska (Polish Journal Of Endocrinology) में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने के पीछे कई फैक्टर्स हो सकते हैं जैसे उम्र, पैराथायराइड हार्मोन, विटामिन डी का लेवल, आनुवंशिक कारक वगैरह।
किन बच्चों को हाइपरकैल्सीमिया का खतरा ज्यादा होता है?
-पैराथायराइड ग्रंथि की बीमारी वाले बच्चे
-किडनी की समस्या से जूझ रहे बच्चे
-लंबे समय तक दवाएं लेने वाले बच्चे
-जरूरत से ज्यादा विटामिन डी या कैल्शियम सप्लीमेंट लेने वाले बच्चे
-जेनेटिक कंडीशन से पीड़ित बच्चे
बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने पर कौन से लक्षण नजर आते हैं?
हाइपरकैल्सीमिया के लक्षण, बच्चों की उम्र और कैल्शियम की मात्रा पर निर्भर करते हैं। जरूरी नहीं है कि शुरू में कोई लक्षण नजर आए, लेकिन जैसे-जैसे कैल्शियम का लेवल ज्यादा होगा ये लक्षण नजर आ सकते हैं-
-थकान और कमजोरी होना।
-बच्चे का सुस्त हो जाना।
-भूख न लगना।
-कब्ज की शिकायत होना।
-उल्टी होना या जी मिचलाना।
-हड्डियों में दर्द और मांसपेशियों में कमजोरी होना।
-पेट दर्द होना।
-ज्यादा सोना।
साल 2010 में Current Opinion In Pediatrics में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, गंभीर हाइपरकैल्सीमिया होने पर बच्चे की किडनी को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, कब्ज, उल्टी, दस्त जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
बच्चों के शरीर में कैल्शियम का नॉर्मल लेवल क्या है?
बच्चों और शिशुओं के शरीर में कैल्शियम का नॉर्मल लेवल 8.5 से 10.5 mg/dL के बीच हो सकता है।
अगर शरीर में कैल्शियम का लेवल 10.5 mg/dL से ज्यादा है, तो यह हाइपरकैल्सीमिया का संकेत हो सकता है।
बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया किस उम्र में होता है?
किसी भी उम्र के बच्चे को हाइपरकैल्सीमिया हो सकता है। नवजात शिशुओं, 1 साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों और किशोरों में भी यह कंडीशन दिख सकती है।

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