जादुई आवाज की मलिका आशा नहीं रहीं...
-लता मंगेशकर के प्रशंसक संगीतकारों को आशा ने कभी निराश नहीं किया
-आलेख- प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)
जादुई आवाज की मलिका आशा भोसले का निधन संगीत की दुनिया में एक और खालीपन छोड़ गया है। 92 साल की उम्र में भी वे बड़ी जिंदादिल और चंचल थीं। यह खूबी उनकी गायिकी में भी झलकती थी। लता मंगेशकर की बहन होना और फिर उनकी छाया से अलग होकर विविधता भरा मुकाम हासिल करना, किसी भी नई गायिका के लिए नामुमकिन था लेकिन आशा भोसले ने इसे चुनौती माना और सफलता के उच्च शिखर तक पहुंची।
आशा को बरसों-बरस लता की छोटी बहन के तौर पर जाना जाता रहा। जाहिर है एक गायिका के रूप में उन्हें अपनी मौलिक पहचान बनाने में बड़ी दिक्कतें आईं। 1940 के दशक में जब आशा ने पाश्र्व गायन की दहलीज पर कदम रखा, तब लता मंगेश्कर अपनी पहचान बना चुकी थीं। उस वक्त संगीतकार नौशाद की तूती बोलती थी। नौशाद के गाने की शुरुआत लता से ही होती थी। आशा भोसले उस वक्त की चर्चित गायिका शमशाद बेगम और गीता दत्त से बहुत प्रभावित हुर्इं । नौशाद ने आशा को मौका यही सोचकर दिया कि वह भी लता की तरह गाने में असर पैदा कर पाएंगी, लेकिन आशा ने लता दीदी की नकल करने की बजाय अपनी पहचान को महत्व दिया। बाद में आशा नौशाद की मुख्य गायिका बन गई और उनके संगीत निर्देशन में उन्होंने अनगिनत हिट गाने गाये। नौशाद ने आशा की आवाज में पहला गाना तब रिकॉर्ड करवाया, जब उन्हें आशा पर भरोसा नहीं था। वहीं लता के लिए समर्पित संगीतकार सज्जाद और सी. रामचंद्र ने भी जब आशा को मौका दिया तो उन्हें निराश नहीं होना पड़ा। सज्जाद तो लता के बिना ‘रुखसाना’ फिल्म बनाना ही नहीं चाहते थे। पर बाद में इस फिल्म के गानों को उन्होंने आशा से गवाया और फिर खुद सज्जाद सभी से आशा की तारीफ करने लगे। इस फिल्म में आशा-किशोर का युगल गीत ‘यह चार दिन बहार के’ उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ।
संगीतकार अनिल विश्वास के आशा के लिए शब्द थे- ‘आशा की आवाज देह के साथ उपस्थित होती है तो लता की आवाज आत्मा के साथ’ । संगीतकार अनिल विश्वास तो अपने रिकॉर्डिंग रूम में लता के अलावा किसी को देखना नहीं चाहते थे, लेकिन वे भी आशा के मुरीद हो गए। इस बारे में आशा ने कहा था-‘अनिल दा के साथ काम करते समय उन्हें बड़ा डर लग रहा था। उन्हें भी दिल की गहराइयों में डूबकर आत्मा से सुर निकालना पड़ा।’ संगीतकार सी. रामचंद्र लता के प्रशंसक होने के साथ-साथ उनके काफी करीबी थे। आशा ने कभी सोचा ही नहीं था कि उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा। सी. रामचंद्र ने जब आशा के सामने ‘सोजा रे चंदा सोजा’ (फिल्म-आशा) का शास्त्रीय गीत गाने की पेशकश की तो वे आश्चर्य में पड़ गईं। इस गाने से आशा को एक नया मुकाम हासिल हुआ।
संगीतकार रोशन के लिए भी लता ही पसंदीदा गायिका बनी रहीं। हालांकि उस वक्त तक आशा के कई एकल और युगल गीत हिट हो चुके थे। कहा जाता है कि उस दौर में रोशन गायिका राजकुमारी या गीता दत्त से भी गाना गवाने के बारे में सोच सकते थे, पर आशा के बारे में नहीं। उन्हें इस बात का भी अंदाज नहीं था कि ‘दिल ही तो है’ का यमन राग में लयबद्घ हिट कव्वाली ‘निगाहें मिलाने को जी चाहता है’ आशा इतनी बखूबी गाएंगी। बाद में रोशन ने आशा की काबिलियत को पहचाना और उन्हें कई मौके दिए। ‘ताजमहल’ की कव्वाली ‘चांदी का बदन सोने की नजर’ आज भी भुलाएं नहीं भूलती।
मदन मोहन एक ऐसे संगीतकार थे जो लता के पर्याय माने जाते रहे। सच कहें तो अगर उनके संगीत में लता की आवाज निकाल दी जाए तो कुछ भी नहीं बचेगा। मदन मोहन के संगीत में आशा ने वही गाने गवाये जिन्हें लता ने गाने से मना कर दिया। लता और आशा की आवाज का फर्क उन्होंने फिल्म ‘अदालत’ की इस गाने में बखूबी बताया- ‘जा जा रे जा साजना, काहे सपनों में आये जाके देस पराए...’ नरगिस के लिए लता की गंभीर और दर्दभरी आवाज का इस्तेमाल और चुलबुली सह नायिका के लिए आशा की आवाज। ‘अश्कों से तेरी हमने तस्वीर बनाई है’ गीत के लिए मदन मोहन ने आशा की काफी तारीफ की।
1984 में फिल्म उत्सव में भी इसी तरह का प्रयोग लक्ष्मीकांत - प्यारे लाल ने किया। फिल्म का एक हिट गीत -मन क्यों बहका री बहका, में उन्होंने लता-आशा की जोड़ी बनाई। दोनों बहनों की अलग गायकी के अंदाज ने इस गाने को यादगार बना दिया।
संगीतकार शंकर जयकिशन की सफलता में लता का बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने आशा की आवाज या तो बच्चों के लिए इस्तेमाल की या तेज गति से गानों के लिए जैसे- ‘श्री 420’ का ‘मुड़-मुड़ के न देख’ गीता जब शंकर-जयकिशन ने ‘करोड़पति’ का ‘हाय! सावन बन गए नैन’ गीत आशा को गाने दिया तो इसके पीछे उनकी लता से चल रही अनबन ही मुख्य वजह थी। यह गीत आशा के कालजयी गीतों में से एक माना जाता है। लता से उखड़ी यह संगीतकार जोड़ी फिर आशा के साथ ही बंधकर रह गई।
संगीतकार सलिल चौधरी का संगीत आशा को बेहद पसंद था पर अन्य संगीतकारों की तरह सलिल चौधरी के लिए आशा दूसरी पसंद रहीं। संगीतकार खय्याम की हस्ती लता से ही थी, लेकिन आशा ने भी उन्हें हिट गाने दिए। लता के प्रशंसक खय्याम ने जब फिल्म उमराव जान के संगीत की कमान संभाली तो सभी ने सोचा कि लता ही उनकी मुख्य गायिका होंगी, लेकिन खय्याम ने आशा का चुनाव करके सबको हैरत में डाल दिया। इस फिल्म की गजलों में एक नई आशा लोगों के सामने आई। खय्याम ने आखिर आशा में कैसे यह चमत्कार पैदा किया, यह सभी के लिए एक बड़ा आश्चर्य था। इस फिल्म के लिए आशा ने राष्टï्रीय पुरस्कार जीता।
गुलजार की फिल्म ‘इज्जत’ में आशा की कलात्मक गायिकी लोगों के सामने आई। ‘मेरा कुछ सामान’ गीत आशा ने इतनी खूबसूरती से गाया कि यह आशा का भी पसंदीदा बना गया। इस गाने की मुरकियां सुनते ही बनती हैं। इस फिल्म के लिए भी आशा ने राष्टï्रीय पुरस्कार जीता। आशा भोंसले का जिक्र संगीतकार ओ.पी. नैयर के बिना अधूरा है। नैयर के संगीत में आशा ने एक से बढक़र एक गाने दिये। लता से खटपट ओ. पी. नैयर को आशा के इतना करीब ले आई कि वे आशा के बिना अपने संगीत की कल्पना भी नहीं करते थे।
पॉप की दुनिया में आर.डी. बर्मन ने आशा की आवाज का अच्छा इस्तेमाल किया, लेकिन उन्होंने ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे गाने भी गवाकर आशा की काबिलीयत की सही परख भी की। आशा पंचम दा की जीवन संगिनी भी बनी और पंचम दा के संगीत को आशा ने जो सुर दिए, वह शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। पंचम के साथ शादी उन्हें उनके पिता और संगीतकार एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन से जरूर दूर ले गईं। एस.डी. बर्मन का साथ आशा ने वर्ष1957 के बाद हमेशा दिया। बर्मन दा वर्ष 1963 में बिमल राय की फिल्म बंदिनी के लिए लता को वापस बुलाने वाले थे, लेकिन उन्होंने अपना विचार बदला और आशा पर अपनी सारी आशाएं लगा दीं। ‘अब के बरस भेज भइयां को बाबुल’ गाने में आशा ने अपनी सारी प्रतिभा उड़ेल दी। ‘ज्वैलथीफ’ के गीत ‘रात अकेली है’ के लिए दादा आशा की तारीफ करते नहीं थकते थे।

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