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- हमारे घरों में अक्सर आपने बुजुर्गों को ये कहते सुना होगा कि थाली में कभी तीन रोटियां नहीं परोसनी चाहिए. मां अगर अपने बच्चों को थाली में तीन (3 Rotis In Thali) रोटियां लेते देख ले तो तुरंत हाथ झटक देती हैं और कहती हैं कि तीन नहीं लेते दो या चार ले लो. सिर्फ रोटियां ही नहीं बल्कि परांठे (Parathe Banane Ki Recipe), पूड़ी या चीला जैसी कोई भी चीज हो. उसे तीन की संख्या में एक साथ परोसने से मना किया जाता है. ये देखने वाले के मन में ये सवाल जरूर उठता होगा कि ऐसा क्यों. क्या ये कोई पुरानी रवायत है या फिर इसके पीछे कोई लॉजिक है.ज्योतिष और धार्मिक मान्यता क्या कहती है?अंक ज्योतिष के हिसाब से तीन का अंक धार्मिक कार्यों के लिहाज से अच्छा नहीं माना जाता. माना जाता है कि तीन का संबंध कुछ नकारात्मक ऊर्जा से होता है, इसलिए पूजा-पाठ या रोजमर्रा की जिंदगी में इससे दूरी बनाना ही ठीक होता है.एक और बड़ी मान्यता ये है कि जब किसी मृतक के नाम से भोजन की थाली लगाई जाती है. तो उसमें तीन रोटियां रखी जाती हैं. इसी वजह से लोग मानते हैं कि किसी जिंदा इंसान की थाली में तीन रोटियां परोसना अशुभ होता है. शायद इसीलिए बहुत से परिवारों में भले ही आप दो या चार रोटियां खा लें. लेकिन तीन कभी नहीं दी जातीं.सेहत से जुड़ा पहलूकुछ लोगों का ये भी मानना है कि तीन रोटियां एक साथ खाना सेहत के लिए ठीक नहीं होता. हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बैलेंस्ड डाइट के हिसाब से एक इंसान के लिए दो रोटियां, एक कटोरी दाल, थोड़े चावल और सब्जी काफी होती है. इससे न सिर्फ पेट भरता है बल्कि शरीर का वजन भी कंट्रोल में रहता है. ऐसे में तीन रोटियों को छोड़ना एक हेल्दी आदत भी मानी जा सकती है.और भी हैं खाने से जुड़ी मान्यताएंभारतीय संस्कृति में खाने-पीने को लेकर कई मान्यताएं हैं. जैसे रात को दही नहीं खाना चाहिए, खाना बनाते वक्त चुटकी से नमक डालना चाहिए या खाने के बाद मीठा जरूर खाना चाहिए. ये सारी बातें हमने अपने बड़ों से सीखी हैं और अक्सर बिना सवाल किए मानते आ रहे हैं.क्या इन बातों में सच्चाई है?अब ये सोचने वाली बात है कि क्या इन सभी मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार है? सच तो ये है कि थाली में तीन रोटियां नहीं परोसना जैसी बातों का कोई ठोस वैज्ञानिक कारण नहीं है. इन्हें फॉलो सिर्फ इसलिए किया जाता है क्योंकि ये एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन में चली आ रही हैं. और, निभाई भी जा रही हैं. इसलिए भी लोग एक साथ तीन रोटी सर्व करने से या खाने से बचते हैं.
- भाद्रपदके शुक्लपक्ष की चतुर्थी को व्रत करने वाला शिवलोक को प्राप्त करता है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का पूजन करके मनुष्य सभी मनोकामनाओं को प्राप्त कर लेता है। चतुर्थी तिथि तीन प्रकार की होती है-शिवा, शान्ता और सुखा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का नाम शिवा है। इस साल गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जा रही है। इस दिन जो स्नान, दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता है, वह गणपति के प्रसाद से सौ गुना हो जाता है। इस दिन पूजा करते समय आगच्छोल्काय कहकर गणेशजी का आवाहन करें । इस प्रकार गन्धादि उपचारों एवं लड्डुओं से गणपति का पूजन करें। तदनन्तर निम्नलिखित गणेश गायत्री मंत्र का जप करें।ॐ महोलकाय विद्दाहे वक्रतुण्डायधीमहि।तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥गणेश गायत्री मंत्र का जप करें। इस मंत्र का अर्थ है कि हम उस विशाल शरीर वाले भगवान गणेश का ध्यान करते हैं, जिनकी सूंड वक्र या मुड़ी हुई है, और वह दंतधारी हमें बुद्धि से प्रकाशित करते हैं। कहते हैं कि गणेश जी के इस मंत्र से पूजा करने से भगवान गणेश की सभी पर कृुा रहती है।गणेश चतुर्थी पर किस चीज का दान करना चाहिएपुराणों में लिखा है किइस दिन जो दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता है, वह गणपति के कई सौ गुना हो जाता है। इस चतुर्थी को गुड़, लवण ओर घी का दान करना चाहिए। यह शुभकर माना गया है और गुड़ के मालपूआ से ब्राह्यणों को भोजन कराना चाहिए । पति की कामना करने वाली कन्या विशेष रूप से इस चतुर्थी का व्रत करें और गणेशजी की पूजा करें।गणेश चतुर्थी मुहूर्तब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 28 मिनट से 05 बजकर 12 मिनट तकविजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 31 मिनट से 03 बजकर 22 मिनट तकगोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 48 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तकइस दिन निशिता मुहूर्त रात 12 बजे 12 बजकर 45 मिनट तक
- गणेश जी की मूर्ति को गलत दिशा में रखना पूजा के फल को कम करता है। वास्तु के अनुसार, मूर्ति को उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में रखें। दक्षिण दिशा में मूर्ति रखने से बचें, क्योंकि यह अशुभ माना जाता है। सही दिशा से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।टूटी या खंडित मूर्ति की पूजा ना करेंगणेश चतुर्थी पर टूटी या खंडित मूर्ति की पूजा करना अशुभ माना जाता है। ऐसी मूर्ति नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है। हमेशा सही आकार और सुंदर मूर्ति चुनें। पूजा से पहले मूर्ति की जांच करें और सुनिश्चित करें कि वह पूरी तरह ठीक हो।चंद्र दर्शन से बचेंगणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखना वर्जित है, क्योंकि इससे मिथ्या दोष लगता है। पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रमा ने गणेश जी का मजाक उड़ाया था, जिसके कारण यह नियम बना। यदि गलती से चंद्रमा दिख जाए, तो 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जप करें।गलत प्रसाद का भोगगणेश जी को तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली या लहसुन-प्याज युक्त भोजन का भोग ना लगाएं। गणपति को मोदक, लड्डू और फल प्रिय हैं। तुलसी पत्र का उपयोग भी न करें, क्योंकि यह गणेश जी को नहीं चढ़ाया जाता। सात्विक भोग से पूजा का फल बढ़ता है।साफ-सफाई नजरअंदाज ना करेंगणेश चतुर्थी पर पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। गंदा या अव्यवस्थित पूजा स्थान नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। मूर्ति स्थापना से पहले स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। फूल, दीपक और धूपबत्ती सही ढंग से सजाएं ताकि पूजा का प्रभाव बढ़े।शयनकक्ष में मूर्ति ना रखेंगणेश जी की मूर्ति को शयनकक्ष में रखना वास्तु दोष उत्पन्न करता है। इससे मानसिक तनाव और अशांति हो सकती है। मूर्ति को पूजा घर, ड्रॉइंग रूम या मुख्य द्वार के पास स्थापित करें। यह स्थान सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है और पूजा का शुभ फल देता है। शयनकक्ष में पूजा सामग्री रखने से बचें।गलत समय पर पूजा ना करेंगणेश चतुर्थी पर पूजा और मूर्ति स्थापना शुभ मुहूर्त में करें। सुबह का समय या पंचांग के अनुसार निर्धारित समय सबसे उत्तम है। रात में मूर्ति स्थापना या पूजा करने से बचें, क्योंकि यह अशुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त में पूजा करने से गणपति की कृपा और कार्यों में सफलता मिलती है।सम्मान के साथ करें विसर्जनगणेश चतुर्थी के बाद मूर्ति का विसर्जन सम्मानपूर्वक करें। मूर्ति को गंदे पानी या कूड़ेदान में न फेंकें। इसे नदी या समुद्र में प्रवाहित करें या मंदिर में सौंप दें। विसर्जन के समय 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जप करें। सम्मानजनक विसर्जन से पूजा का पूरा फल मिलता है।
- हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का त्योहार का बड़ा महत्व है। यह पर्व विघ्नहर्ता भगवान गणेश के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। किसी भी धार्मिक या शुभ कार्य में सबसे पहले गणपति जी की पूजा करने का विधान है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं और श्रद्धा भाव के साथ दस दिनों तक धूमधाम से उत्सव मनाते हैं। यदि आप पहली बार घर में गणेश जी की स्थापना करने जा रहे हैं, इसके लिए तो कुछ आवश्यक नियमों के बारे में जानना जरूरी है।गणेश चतुर्थी 2025 की तिथिदृक पंचांग के अनुसार इस वर्ष भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट से आरंभ होगी और 27 अगस्त को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त को मनाया जाएगा और इसी दिन गणपति की स्थापना की जाएगी।गणेश जी की प्रतिमाघर में गणेश भगवान की स्थापना के लिए हमेशा ऐसी मूर्ति चुनें, जिसमें भगवान गणेश की सूंड बाईं ओर झुकी हो। इसे अत्यंत शुभ माना गया है।गणपति जी की बैठी हुई प्रतिमा को घर लाना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इससे सुख और समृद्धि का वास होता है।मूर्ति का चेहरा प्रसन्न और हंसमुख होना चाहिए। साथ ही यह भी देखें कि उनके एक हाथ में आशीर्वाद की मुद्रा हो और दूसरे हाथ में मोदक होना चाहिए।गणपति स्थापना की विधिगणपति स्थापना के लिए प्रतिमा को हमेशा ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में ही रखें। ध्यान रहे उनका मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।मूर्ति को चौकी पर रखने से पहले चौकी को अच्छी तरह से साफ करें और गंगाजल से पवित्र करें।प्रतिमा के पास रिद्धि-सिद्धि का स्थान अवश्य दें। अगर मूर्तियां उपलब्ध न हों, तो उनकी जगह आप सुपारी रख सकते हैं।गणेश जी की दाईं ओर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। इसके बाद फूल और अक्षत हाथ में लेकर गणपति बप्पा का ध्यान करें।
- हिंदू धर्म में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि अत्यंत शुभ मानी गई है। इस दिन अनंत चतुर्दशी का त्योहार मनाया जाता है। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन भगवान विष्णु और शेषनाग जी की विधिवत पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन पूजा के बाद अनंत रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इस दिन को गणेश विसर्जन के नाम से भी जाना जाता है। जानें इस बार अनंत चतुर्दशी कब है, पूजन मुहूर्त व महत्व।अनंत चतुर्दशी कब है 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 06 सितंबर को सुबह 03 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ होगी और 07 सितंबर को सुबह 01 बजकर 41 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि में अनंत चतुर्दशी 06 सितंबर को मनाई जाएगी।अनंत चतुर्दशी पूजा मुहूर्त 2025: अनंत चतुर्दशी पूजा मुहूर्त सुबह 06 बजकर 02 मिनट से 07 सितंबर को देर रात 01 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। पूजन की कुल अवधि 19 घंटे 39 मिनट की है।अनंत चतुर्दशी पर बन रहे ये पूजन मुहू्र्त---ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:30 बजे से सुबह 05:16 बजे तक।अभिजित मुहूर्त- सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:44 बजे तक।विजय मुहूर्त- दोपहर 02:25 बजे से दोपहर 03:15 बजे तक।गोधूलि मुहूर्त- शाम 06:37 बजे से शाम 07:00 बजे तक।अमृत काल- दोपहर 12:50 बजे से दोपहर 02:23 बजे तक।रवि योग- सुबह 06:02 बजे से रात 10:55 बजे तक।इस दिन अनंत सूत्र बांधने की है परंपरा: अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, माता यमुना व शेषनाग जी की पूजा की जाती है। इस दिन अनंत सूत्र बांधने की भी परंपरा है। मान्यता है कि अनंत सूत्र में भगवान विष्णु का वास होता है। पूजा के बाद इसे बांह में बांधा जाता है। अनंत सूत्र में 14 गांठें होनी चाहिए। इन गांठों को 14 लोकों से जोड़कर देखा जाता है।
- भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन बुद्धि, समृद्धि व सौभाग्य के देवता गणपति बप्पा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करते हैं। गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। भगवान गणेश की कृपा या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लोग इस दिन कई तरह के उपाय करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुछ उपायों को करने से गणपति बप्पा की कृपा से जीवन में धन-संपदा आती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। जानें गणेश चतुर्थी के दिन क्या करें उपाय।1. भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय माने गए हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।2. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है।3. भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से मनवांछित फल मिलता है और धन-धान्य बढ़ता है।4. अगर संभव हो सके हो तो, गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्यों की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं।5. भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
- हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज कहा जाता है. इस साल हरतालिका तीज का व्रत 27 अगस्त को रखा जाएगा. तीज हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है और यह मुख्य रूप से उत्तर भारत में लोकप्रिय है. तीज के शुभ अवसर पर महिलाएं व्रत रखती हैं, माता पार्वती और भगवान शिव की संयुक्त पूजा करती हैं. अपने पति की समृद्धि और दीर्घायु के लिए भगवान से आशीर्वाद मांगती हैं.लेकिन क्या आप जानते हैं कि सालभर में कुल कितनी तीज मनाई जाती हैं और शास्त्रों में इनका क्या महत्व है. हिंदू कैलेंडर में अलग-अलग समय पर आने वाली तीन तीजों का वर्णन मिलता है- हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज. इन आज आपको तीज के त्योहारों के बारे में विस्तार से बताते हैं.हरियाली तीज--हरियाली तीज सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आती है. इस त्योहार सावन के महीने की हरियाली मौसम के कारण इसका नाम हरियाली तीज कहलाता है. इस तीज का व्रत नवविवाहित महिलाओं के लिए होता है. इसे शिव-पार्वती के मिलन का प्रतीक माना जाता है. पौराणिक कथा के मुताबिक, इस दिन माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या पूरी की थी.हरियाली तीज की पूजन विधिहरियाली तीज के दिन शादीशुदा महिलाएं हरे कपड़े, चूड़ियां और मेहंदी लगाती हैं. साथ ही, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं. भगवान को उनकी प्रिय चीजें अर्पित करती हैं. इसके अलावा, इस तीज पर झूला झुलाने की परंपरा होती है. इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और रात को कथा सुनकर व्रत का पारण करती हैं.कजरी तीज---कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को आती है. इसे कजली तीज भी कहते हैं और कुछ क्षेत्रों में इसे सातुड़ी तीज भी कहा जाता है. कजरी तीज का त्योहार मुख्य रूप से राजस्थान में मनाया जाता है. इस दिन राजस्थान के बूंदी शहर में माता पार्वती की विशाल शोभयात्रा का आयोजन भी किया जाता है. यह पर्व मुख्य रूप से चंद्रमा, भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना की जाती है.कजरी तीज की पूजन विधिकजरी तीज पर भी महिलाएं सुबह स्नानादि के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं. पूरे दिन व्रत के नियमों का पालन करती हैं. फिर संध्याकाल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं. इसके बाद रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती हैं. इस दिन विशेष रूप से कजरी गीत भी गाएं जाते है. कुछ जगहों पर इस दिन नीम की पूजा करने की भी परंपरा है.हरतालिका तीजहरतालिका तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है. इसे सबसे बड़ी और कठिन तीज माना जाता है. हरतालिका तीज के दिन महिलाएं बड़ी श्रद्धा से देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करते हैं और मनोवांछित फल के लिए प्रार्थना करते हैं. यह व्रत बहुत कठोर माना जाता है, क्योंकि इसे निर्जला रखा जाता है.हरतालिका तीज पूजन विधिइस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और पति की लंबी उम्र व सुख-संपन्नता के लिए प्रार्थना करती हैं. साथ ही, महिलाएं इस दिन 16 श्रृंगार करती हैं. लाल या हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं. माता पार्वती और भगवान शिव की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा करती हैं. फिर पूरे दिन भजन-कीर्तन और कथा सुनाई जाती है.
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पंडित प्रकाश उपाध्याय
हरतालिका तीज पर कुंआरी कन्याएँ और सुहागिन स्त्रियां माँ गौरी व भगवान शंकर की पूजा एवं व्रत करती हैं। यह त्यौहार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया यानी कल मनाया जाएगा। हरतालिका तीज का शाब्दिक अर्थ क्रमश: हरत अर्थात अपहरण, आलिका का अर्थ स्त्रीमित्र (सहेली) तथा तीज-तृतीया तिथि से लिया गया है। हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, देवी पार्वतीजी की उनकी सहेलियां अपहरण कर उन्हें घने जंगल में ले गई थीं। जिससे कि पार्वतीजी के पिता उनका विवाह, उनकी ही इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न कर दें।
हरतालिका तीज व्रत विधि एवं नियम
हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओं को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें:उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये। इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं। उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमें सर्वप्रथम गणेश जी की पुन: शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। प्रात: अंतिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोड़ा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।
भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए:
ॐ उमायै नम:
ॐ पार्वत्यै नम:
ॐ जगद्धात्र्यै नम:
ॐ जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ॐ शांतिरूपिण्यै नम:
ॐ शिवायै नम:
भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए:
ॐ हराय नम:
ॐ महेश्वराय नम:
ॐ शम्भवे नम:
ॐ शूलपाणये नम:
ॐ पिनाकवृषे नम:
ॐ शिवाय नम:
ॐ पशुपतये नम:
ॐ महादेवाय नम:
हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री
-फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।
-गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।
-केले का पत्ता।
- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।
-बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।
-जनेऊ, नाडा, वस्त्र,।
-माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।
- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।
- पंचामृत: घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।
- गणेश चतुर्थी का पर्व बेहद शुभ और मंगलकारी माना जाता है। यह भगवान गणेश को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन (Ganesh Chaturthi 2025) लोग भगवान गणेश की पूजा करने से सुख और शांति की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जीवन में शुभता का आगमन होता है। ऐसे में सुबह उठें और स्नान करें। फिर बप्पा के सामने घी का दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें। इसके बाद गणेश चालीसा का पाठ करें। अंत में आरती करें। ऐसा करने से सभी कामों में सफलता मिलती है।गणेश चालीसा॥दोहा॥जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥॥चौपाई॥जय जय जय गणपति गणराजू।मंगल भरण करण शुभः काजू॥जै गजबदन सदन सुखदाता।विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना।तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥राजत मणि मुक्तन उर माला।स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥सुन्दर पीताम्बर तन साजित।चरण पादुका मुनि मन राजित॥धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।गौरी लालन विश्व-विख्याता॥ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।मुषक वाहन सोहत द्वारे॥कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।अति शुची पावन मंगलकारी॥एक समय गिरिराज कुमारी।पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥अतिथि जानी के गौरी सुखारी।बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।बिना गर्भ धारण यहि काला॥गणनायक गुण ज्ञान निधाना।पूजित प्रथम रूप भगवाना॥अस कही अन्तर्धान रूप हवै।पालना पर बालक स्वरूप हवै॥बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥लखि अति आनन्द मंगल साजा।देखन भी आये शनि राजा॥निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।बालक, देखन चाहत नाहीं॥गिरिजा कछु मन भेद बढायो।उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥कहत लगे शनि, मन सकुचाई।का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।शनि सों बालक देखन कहयऊ॥पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥हाहाकार मच्यौ कैलाशा।शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।काटी चक्र सो गज सिर लाये॥बालक के धड़ ऊपर धारयो।प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥चले षडानन, भरमि भुलाई।रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।शेष सहसमुख सके न गाई॥मैं मतिहीन मलीन दुखारी।करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥अब प्रभु दया दीना पर कीजै।अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥॥दोहा॥श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥
- भारत में सबसे धूमधाम से मनाए जाने वाले पर्वों में से एक है गणेश उत्सव। यह पर्व भक्ति, उल्लास और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह भगवान शिव के पुत्र गणेश जी को समर्पित है जो कि 10 दिन तक गणेश उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाते हैं, और इसी दिन से गणेश उत्सव की शुरुआत होतीहै। वहीं 10 दिन बार अनंत चतुर्दशी तक बप्पा का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश उत्सव सिर्फ 10 दिनों का ही क्यों होता है? आइए जानें इसके पीछे की मान्यता और इस वर्ष की तिथि।गणेश चतुर्थी 2025 कब है?हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2025 में गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन गणपति बप्पा का आगमन होगा और 10 दिन तक घर-घर, पंडालों और मंदिरों में उनकी भव्य पूजा-अर्चना होगी। यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन आजकल पूरे भारत में इसका महत्व बढ़ता जा रहा है।गणेश चतुर्थी क्यों मनाते हैं?मान्यता है कि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का जन्म हुआ था। इस कारण इस दिन को गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।क्यों होता है गणेश उत्सव 10 दिनों का?शास्त्रीय मान्यता – गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक कुल 10 दिन का समय भगवान गणेश को समर्पित होता है।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की परंपरा – स्वतंत्रता आंदोलन के समय तिलक ने लोगों को एकजुट करने के लिए सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत की, जिसे 10 दिनों तक मनाने का चलन शुरू हुआ।धार्मिक कारण – मान्यता है कि 10 दिनों तक गणपति जी अपने भक्तों के बीच विराजमान होकर उनकी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं और फिर अनंत चतुर्दशी पर वापस कैलाश लौट जाते हैं।सांस्कृतिक पहलू – यह पर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र बनता है, इसलिए इसे लंबे समय तक मनाया जाता है।
- भगवान गणेश का पावन पर्व गणेश चतुर्थी को पूरे भारत में बहुत धूम धाम से मनाया जाता है. लेकिन भारत में कई ऐसी जगहें भी हैं, जहां इस पर्व की रौनक कुछ खास दिखाई देती है. आज हम आपको भारत की उन 5 जगहों के बारे में बता रहें हैं, जहां गणेश चतुर्थी को बहुत धूम मचा से मनाया जाता है.गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे भारत में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस त्यौहार को बहुत शानदार तरीके से लोग सेलिब्रेट करते हैं. वहीं अपने घर पर लोग भगवान गणेश की मूर्ति को भी लाते हैं और उनकी पूजा करते हैं. भारत में कुछ जगहें ऐसी हैं, जहां गणेश चतुर्थी की रौनक देखने लायक होती है. इन जगहों पर गणेशोत्सव का माहौल इतना भव्य और शानदार होता है कि देश-विदेश से लोग इसे देखने आते हैं. हम आपको कुछ ऐसी जगहों के बारे में बता रहें हैं.मुंबईमहाराष्ट्र में स्थित मुंबई में गणेश चतुर्थी को बहुत धूम धाम से मनाया जाता है. हर साल मुंबई में इस त्योहार की एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है. मुंबई में सबसे ज्यादा मशहूर लालबागचा राजा की मूर्ति को देखने के लिए लाखों लोग आते हैं. यह गणेश जी एक बहुत बड़ी मूर्ति है. मुंबई में गणेश चतुर्थी के दौरान हर गली, हर नुक्कड़ पर पंडाल सजाए जाते हैं. विसर्जन के दिन, गणपति की मूर्तियों को समुद्र में विसर्जित किया जाता है, और इस दौरान पूरा शहर उमड़ पड़ता है.पुणेमहाराष्ट्र में स्थित पुणे में भी गणेश चतुर्थी का त्योहार बहुत ही भव्य तरीके से मनाया जाता है. पुणे में सबसे ज्यादा फेमस हैं दगडूशेठ हलवाई गणपति का एक पुराना मंदिर है और यहां गणपति की मूर्ति सोने और चांदी से बनी हुई है. पुणे में गणेशोत्सव के दौरान कई सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रतियोगिताएं भी होती हैं.हैदराबादहैदराबाद में भी गणेश चतुर्थी का त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. यहां खैरताबाद गणपति की मूर्ति बहुत फेमस है. यह मूर्ति हर साल नए डिजाइन में बनाई जाती है. इसके साथ ही यहां के लोग अपने घरों में भी गणेश जी को स्थापित करते हैं. विसर्जन के दिन इस मूर्ति को हुसैन सागर झील में विसर्जित किया जाता है.चेन्नईचेन्नई में भी गणेश चतुर्थी का त्योहार बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है. यहां गणेश चतुर्थी के दौरान, लोग अपने घरों और मंदिरों को फूलों और लाइट्स से सजाते हैं. चेन्नई में गणपति की मूर्तियों को मिट्टी और गोबर से बनाया जाता है. भगवान गणेश को लोग अपने घरों में भी स्थापित करते हैं और पूजा पाठ करते हैं.गोवागोवा सिर्फ अपने बीचेस और पार्टियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने गणेश चतुर्थी के लिए भी जाना जाता है. गोवा में गणेशोत्सव बहुत ही पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है. यहां लोग अपने घरों में गणपति की मूर्तियां स्थापित करते हैं और उनकी पूजा करते हैं. गोवा में गणेश चतुर्थी के समय लोग नृत्य और संगीत का भी आयोजन करते हैं.
- सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का खास महत्व माना गया है. इस दिन लोग गंगा समेत अन्य पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान करते हैं. अमावस्या का दिन पितरों को भी समर्पित होता है. इस तिथि पर पितरों का तर्पण और पिंडदान करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है. अगर अमावस्या शनिवार के दिन पड़े तो इसे शनि अमावस्या कहा जाता है.कब है शनि अमावस्या 2025?भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि 22 अगस्त को सुबह 11.55 बजे से लेकर 23 अगस्त को सुबह 11.35 बजे तक रहती है. उदया तिथि के अनुसार, मुख्य पर्व 23 अगस्त दिन शनिवार को मनाया जाएगा. अमावस्या जब शनिवार को आती है तो इसे शनि अमावस्या कहा जाता है. धार्मिक दृष्टि के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र में भी इस दिन का खास महत्व है. इस दिन शनि ग्रह से जुड़े उपाय करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के कारण मिलने वाले अशुभ प्रभावों से राहत मिल सकती है.शनि अमावस्या पर किए जाने वाले उपायशनि देव को तेल अर्पण करेंशनि अमावस्या के दिन शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाएं. यदि मूर्ति रूप में शनि देव की पूजा हो रही है, तो केवल उनके पैर के अंगूठे पर तेल अर्पित करें और अगर शनिदेव शिला रूप में विराजमान हैं, तो पूरी शिला पर तेल चढ़ाया जा सकता है.पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाएंशनि अमावस्या के दिन सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि जीवन में सुख-संपत्ति का वास होता है.दान-पुण्य करेंइस दिन शनि से संबंधित वस्तुएं जैसे सरसों का तेल, काले तिल, उड़द की दाल और लोहे की वस्तुएं दान करें. साथ ही, गरीबों को भोजन कराएं और उन्हें कपड़े, जूते, छाता, धन आदि का दान करें.हनुमान जी की उपासना करेंशनि के कष्टों से मुक्ति पाने का सबसे श्रेष्ठ उपाय है बजरंगबली की आराधना करना. मान्यता है कि हनुमान भक्तों को शनि देव कभी कष्ट नहीं देते.
- देशभर में गणेश महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. खासकर महाराष्ट्र और गुजरात में इस त्योहार की रौनक देखने लायक होती है. इस पर्व पर भक्त रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान गणेश की पूजा करते हैं. घरों, मंदिरों और पंडालों में 10 दिनों तक गणपति की स्थापना कर श्रद्धा-भाव से पूजा-अर्चना की जाती है. इस दौरान चारों ओर “गणपति बप्पा मोरिया” की गूंज सुनाई देती है.गणेश चतुर्थी 2025 की तिथिहिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त दोपहर 01 बजकर 54 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 27 अगस्त दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर होगा. ऐसे में इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त 2025, बुधवार को मनाया जाएगा और इसी दिन गणेश स्थापना की जाएगी. गणेश उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी पर होता है, जो इस साल 6 सितंबर को पड़ रही है. 10 दिन पूजन के बाद भक्त गणपति से अगले वर्ष जल्दी आने की प्रार्थना करते हुए प्रतिमा का विसर्जन करते हैं.गणेश स्थापना का शुभ मुहूर्तगणेश जी की स्थापना के लिए मध्याह्न काल सबसे उत्तम माना गया है, क्योंकि मान्यता है कि इसी समय गणपति का जन्म हुआ था. 27 अगस्त 2025 को मध्याह्न काल में गणेश पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 40 मिनट तक रहेगा.गणेश चतुर्थी 2025 के शुभ योगइस बार गणेश चतुर्थी का दिन बेहद खास है. इस साल गणेश चतुर्थी की शुरुआत बुधवार से हो रही है, जिससे बहुत शुभ माना जा रहा है. साथ ही 27 अगस्त को गणेश चतुर्थी पर चार शुभ योग का निर्माण हो रहा है- शुभ योग, शुक्ल योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग रहेगा. इसके अलावा हस्त नक्षत्र और चित्रा नक्षत्र भी रहेगा.गणेश स्थापना विधिसबसे पहले एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं. हाथ में जल, चावल और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें. इसे बाद'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करते हुए गणेश जी का स्मरण करें. मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं. गणेश जी को मोदक, लड्डू, दूर्वा घास, लाल फूल और सिंदूर अर्पित करें. अंत में पूरे परिवार के साथ आरती करें और भक्तिभाव से पूजन संपन्न करें.
- देवगुरु बृहस्पति इस समय अपने नक्षत्र पुनर्वसु नक्षत्र के गोचर में हैं। गुरु के नक्षत्र परिवर्तन के चार चरण होते हैं। 19 सितंबर 2025 को गुरु पुनर्वसु नक्षत्र के तीसरे चरण में प्रवेश करेंगे और इस चरण में 17 अक्टूबर तक रहेंगे। गुरु के स्व नक्षत्र पुनर्वसु के तीसरे चरण में गोचर करने का कुछ राशियों को सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। ज्योतिष शास्त्र में गुरु को शुभ ग्रह माना गया है। गुरु के प्रभाव से कुछ भाग्यशाली राशियों को नक्षत्र पद परिवर्तन की अवधि में जीवन में अच्छे फल मिलेंगे। जानें गुरु नक्षत्र पद गोचर से किन राशियों को होगा लाभ।1. मेष राशि- मेष राशि वालों को इस समय आर्थिक लाभ हो सकता है। घरेलू परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है। करियर में तरक्की मिल सकती है। नौकरी के नए प्रस्ताव सामने आ सकते हैं। परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। अटके हुए धन की वापसी संभव है।2. कर्क राशि- कर्क राशि वालों के लिए गुरु का नक्षत्र पद गोचर लाभकारी रहने वाला है। इस समय आपको आकस्मिक धन लाभ हो सकता है। व्यापारियों को नई डील से मुनाफा हो सकता है। घरेलू सुख बढ़-चढ़कर रहेगा। करियर में नई सफलता प्राप्त कर सकते हैं।3. कन्या राशि- कन्या राशि वालों के लिए गुरु का नक्षत्र पद परिवर्तन अनुकूल रहने वाला है। इस समय आप परिवार की समस्याओं से बाहर निकलने में सफल रहेंगे। विद्यार्थियों के लिए यह समय अच्छा रहने वाला है। व्यावसायिक सफलता मिलने के पूर्ण योग हैं। रिश्तों में अपनापन बना रहेगा। धन की स्थिति पहले से बेहतर होगी।4. कुंभ राशि- कुंभ राशि वालों को धन लाभ के संकेत हैं। नौकरी पेशा में तरक्की मिल सकती है। रोजी-रोजगार में तलाश करने वालों को शुभ समाचार की प्राप्ति हो सकती है। परिवारिक समस्याएं खत्म होंगी। सेहत अच्छी रहेगी। जीवनसाथी के साथ अच्छा समय बिताने का मौका मिलेगा। आर्थिक स्थिरता मिल सकती है।5. मीन राशि- मीन राशि वालों के लिए गुरु का नक्षत्र पद गोचर अच्छा रहने वाला है। इस समय आपको करियर में आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। कार्यस्थल पर किसी बड़ी प्लानिंग का हिस्सा बन सकते हैं। वैवाहिक जीवन शांति पूर्ण रहेगा। नौकरी पेशा करने वालों को नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। आर्थिक रूप से लाभ के अवसर सामने आएंगे।
- श्री कृष्ण जन्माष्टमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण की लीलाओं की याद दिलाने वाला पावन दिन है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, झांकियां सजाते हैं और रात 12 बजे बाल कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन सच्चे मन से व्रत करता है और भगवान को उनकी प्रिय वस्तुओं का दान करता है, उसके जीवन से दुख-दरिद्रता दूर हो जाती है और सौभाग्य आता है।जन्माष्टमी पर दान क्यों होता है खास?धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी का दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन है, जो अंधकार से प्रकाश और अधर्म से धर्म की जीत का प्रतीक है। इस दिन किया गया दान बहुत फलदायी होता है और जीवन से दुख, दरिद्रता दूर करता है। भगवान कृष्ण को प्रिय चीजों जैसे माखन, मिश्री, फल, वस्त्र और अनाज का दान करने से उसका फल कई गुना बढ़ जाता है।यह दान न केवल घर में सुख-समृद्धि लाता है, बल्कि मन में शांति, प्रेम और भक्ति की भावना भी जगाता है। जन्माष्टमी पर दान करने से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। यह दान हमारे जीवन में भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद लेकर आता है। इसलिए इस पावन दिन दान करना बेहद शुभ माना जाता है।अनाज का दानजन्माष्टमी जैसे पावन अवसर पर अनाज का दान करना अत्यंत शुभ और पुण्यकारी माना जाता है। अनाज जीवन का मूल आधार है और यह हर परिवार की जरूरत होती है। जरूरतमंदों को अनाज दान करने से न केवल उनकी भूख मिटती है, बल्कि उनके जीवन में स्थिरता और सुरक्षा का संचार होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अनाज दान करने से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और घर-परिवार में समृद्धि आती है।माखन और मिश्री का दानभगवान कृष्ण को माखन और मिश्री बेहद प्रिय हैं। माखन, जो गाय के दूध से बनता है, उनकी बाल लीलाओं का प्रमुख हिस्सा रहा है। जन्माष्टमी के दिन माखन और मिश्री दान करना भगवान को खुश करने का खास तरीका है। इसे दान करने से हमारे जीवन में मिठास और खुशी आती है, साथ ही मनोकामनाएं पूरी होने की भी कामना होती है। यह दान हमारे रिश्तों और परिवार में प्रेम और सौहार्द बढ़ाता है।फल या मिठाई का दानजन्माष्टमी के पावन दिन गरीबों और जरूरतमंदों को फल या मिठाई दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दान हमारे घर में बरकत और समृद्धि लेकर आता है। साथ ही, फल और मिठाई का दान बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी खुशी का कारण बनता है, जिससे उनकी खुशहाली बनी रहती है।मोर पंख का दानमोरपंख भगवान कृष्ण के मुकुट की शोभा बढ़ाने वाला प्रतीक है। मोरपंख का दान करने से नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से सुरक्षा मिलती है। इसे मंदिरों या ब्राह्मणों को देने से घर में सकारात्मकता बनी रहती है और वातावरण स्वच्छ होता है। मोरपंख का दान आध्यात्मिक शुद्धता और मानसिक शांति का भी संकेत माना जाता है।वस्त्र और चरण पादुका का दाननए वस्त्र और चरण पादुका (चप्पल या जूते) दान करना भी बहुत पुण्य का काम है। विशेष रूप से बच्चों को वस्त्र या चरण पादुका भेंट करने से उनके जीवन में शुभता आती है। यह दान दाता के जीवन में सुख-शांति और आर्थिक समृद्धि का मार्ग खोलता है। वस्त्र दान करने से गरिमा और सम्मान की वृद्धि होती है, जबकि चरण पादुका का दान भगवान के चरणों की सेवा के समान माना जाता है।
- वैदिक पंचांग के अनुसार ग्रह त्योहार और पर्व पर अपनी चाल में बदलाव करते हैं, जिसका प्रभाव मानव जीवन के साथ देश- दुनिया पर पड़ता है। आपको बता दें कि इस साल जन्माष्टमी का पर्व 16 अगस्त को मनाया जाएगा। वहीं इस दिन शनि और राहु- केतु वक्री अवस्था में रहेंगे। आपको बता दें कि 30 साल बाद शनि और राहु- केतु जन्माष्टमी पर उल्टी चाल में संचऱण करेंगे। ऐसे में कुछ राशियों का भाग्य चमक सकता है। साथ ही इस समय आपको आकस्मिक धनलाभ और भाग्योदय के योग बन रहे हैं। वहीं देश- विदेश की यात्रा कर सकते हैं। वहीं फंसा हुआ धन मिल सकता है। आइए जानते हैं ये लकी राशियां कौन सी हैं…वृष राशिआप लोगों के लिए शनि और राहु- केतु का दुर्लभ संयोग लाभकारी साबित हो सकता है। इस समय आपको समय- समय पर आकस्मिक धनलाभ हो सकता है। साथ ही इस दौरान आपको किस्मत का साथ मिलेगा। वहीं आपके रुके हुए कार्य पूरे होंगे। साथ ही पिता या गुरु से सहायता मिल सकती है और प्रेम व वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। वहीं इस दौरान आपकी सोची हुई योजनाएं सफल होंगी।सिंह राशिशनि और राहु-केतु का वक्री होना सकारात्मक सिद्ध हो सकता है। इस दौरान नौकरीपेशा लोगों को कार्यस्थल पर जूनियर और सीनियर का साथ मिलेगा। साथ ही विद्यार्थियों के लिए यह समय पढ़ाई में सफलता और नए कौशल सीखने के लिए अनुकूल रहेगा। लव लाइफ में रोमांस का नया रंग चढ़ेगा। वहीं इस समय बेरोजगार लोगों नौकरी मिल सकती है। आर्थिक रूप से यह समय रचनात्मक या टेक्नोलॉजी से जुड़े क्षेत्रों में निवेश के लिए अच्छा है।तुला राशिआप लोगों के लिए शनि और राहु- केतु का वक्री होना लाभप्रद साबित हो सकता है। इस अवधि में आप कोई वाहन या प्रापर्टी खरीद सकते हैं। साथ ही बिजनेसमैन के प्रोफेशन रिश्ते मजबूत होंगे, जिसका सकारात्मक प्रभाव बिजनेस के काम पर भी पड़ेगा। इसके अलावा नए व्यावसायिक समझौते भी आपके हित में रहेंगे। नौकरी कर रहे जातकों को किसी प्रभावशाली व्यक्ति का साथ मिलेगा। वहीं इस समय आफकी सोची हुई योजनाएं सफल होंगी। साथ ही आप धन की सेविंग करने में सफल रहेंगे।
- जन्माष्टमी पर अलग ही रौनक होती है। नंद के लाल श्री कृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारी शुरू हो चुकी है। मंदिर और गृहस्थ वाली पूजा दो दिन होगी। 15 को मंदिर में पूजा होगी तो वहीं 16 तारीख को घरों में नंद लाला का जन्मदिन मनाया जाएगा। सुंदर झांकियों के साथ-साथ लोग भगवान कृष्ण के लिए दूध, दही, मक्खन और मेवे से बने हुए भोग को तैयार करते हैं। वहीं व्रत को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल होते हैं कि रखा जाए या ना रखा जाए। रखा जाए तो फिर कैसे रखा जाए? बता दें कि वृंदावन के महान संत प्रेमानंद महाराज ने अब जन्माष्टमी के व्रत का सही नियम बताया है। उनका कहना है कि अगर सही तरीके से जन्माष्टमी का व्रत ना रखी जाए तो इसका पूरा फल नहीं मिलता है।जन्माष्टमी की पूजा और व्रत का सही नियमप्रेमानंद महाराज के अनुसार जन्माष्टमी वाले दिन नए वस्त्र और आभूषणों से श्री कृष्ण का श्रृंगार करना चाहिए। इसी के साथ श्रीकृष्ण के 108 नाम का जाप करना चाहिए। साथ ही इस दिन कृष्ण लीला की कथाएं सुननी चाहिए और घर में ही रहकर श्रद्धापूर्वक कीर्तन करना चाहिए। उन्होंने आगे बताया कि जन्माष्टमी वाले दिन ब्रह्मचर्य का पालने करने के साथ-साथ तामसिक खाने (नॉनवेज और प्याज-लहसुन) से दूर रहना है। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद ही भोग के प्रसाद के साथ ही अपना व्रत खोल लेना चाहिए।जन्माष्टमी पर मंदिर जाना है या नहीं?प्रेमानंद महाराज ने इस सवाल का भी जवाब दिया है। उनके अनुसार जन्माष्टमी वाले दिन कृष्ण मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन करने से लाभ मिलता है। जन्माष्टमी पर विधि-विधान से की गई पूजा से खूब लाभ मिलते हैं। इसके अलावा प्रेमानंद महाराज ने ये भी कहा कि भगवान कृष्ण को जन्माष्टमी पर चावल से बने मालपुए और घर में बने मक्खन का भोग जरूर लगाना चाहिए क्योंकि उन्हें ये काफी पसंद है।100 एकादशी व्रत के बराबर जन्माष्टमी का व्रत?हिंदू धर्म के शास्त्रों में ये बात लिखी है कि एकादशी का व्रत का बहुत महत्व होता है। मान्यता है कि इस व्रत से पापों से मुक्ति मिलती है। वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि जन्माष्टमी का व्रत 100 एकादशी व्रत के बराबर होता है। इस दिन व्रत रखने से 100 पापों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत को रखने से इंसान के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।
- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त को मनाई जाएगी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है।धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में पूर्ण निपुण थे, चाहे वह संगीत हो, नृत्य, या अन्य विद्या। आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने इन सभी कलाओं का ज्ञान केवल 64 दिनों में प्राप्त कर लिया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रीकृष्ण ने अपनी शिक्षा उज्जैन स्थित गुरु संदीपनि के आश्रम में प्राप्त की। उनके साथ भाई बलराम और सखा सुदामा भी वहां विद्या अध्ययन के लिए उपस्थित थे। माना जाता है कि यह स्थान विश्व का सबसे प्राचीन गुरुकुल माना जाता है। गुरु संदीपनि के मार्गदर्शन में श्रीकृष्ण ने कम समय में ही 64 कलाओं का गहन ज्ञान अर्जित कर लिया, जो आज भी अद्वितीय माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि यह 64 कलाएं कौन सी हैं...क्या हैं वो 64 कलाएंश्रीमदभागवतपुराण के दशम स्कन्द के 45 वें अध्याय के अनुसार श्री कृष्ण निम्न 64 कलाओं में पारंगत थे-1- नृत्य – नाचना2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना3- गायन विद्या – गायकी।4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय5- इंद्रजाल- जादूगरी6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना7- सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या10- बच्चों के खेल11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या12- मन्त्रविद्या13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना14- रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना15- कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना16- सांकेतिक भाषा बनाना17- जल को बांधना।18- बेल-बूटे बनाना19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)20- फूलों की सेज बनाना।21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।22- वृक्षों की चिकित्सा23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति24- उच्चाटन की विधि25- घर आदि बनाने की कारीगरी26- गलीचे, दरी आदि बनाना27- बढ़ई की कारीगरी28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।30- हाथ की फूर्ती के काम31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना33- द्यू्त क्रीड़ा34- समस्त छन्दों का ज्ञान35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण37- कपड़े और गहने बनाना38- हार-माला आदि बनाना39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।41- कठपुतली बनाना, नाचना42- प्रतिमा आदि बनाना43- पहेलियां बूझना44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी करना।45 – बालों की सफाई का कौशल46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना47- कई देशों की भाषा का ज्ञान48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा50 – सोना-चांदी आदि बना लेना51 – मणियों के रंग को पहचानना52- खानों की पहचान53- चित्रकारी54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना55- शय्या-रचना56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।57- कूटनीति#शास्त्र_संस्कृति_प्रवाह||58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई59- नई-नई बातें निकालना60- समस्यापूर्ति करना61- समस्त कोशों का ज्ञान62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।63-छल से काम निकालना64- शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।
- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार हर वर्ष भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र होता है क्योंकि मान्यता है कि इस दिन की पूजा और भक्ति से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर की जाने वाली पूजा में कुछ खास नियम और विधियां होती हैं, जिनका पालन करने से पूजा का प्रभाव बढ़ जाता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।इस दिन व्रत रखना, भगवान की प्रतिमा या चित्र की आराधना करना, और श्रद्धा से भजन-कीर्तन करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। साथ ही पूजा के दौरान शुद्धता और सादगी का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जन्माष्टमी के ये नियम न केवल पूजा को सफल बनाते हैं, बल्कि मन और आत्मा को शुद्ध कर अगले साल तक सुख-समृद्धि का आशीर्वाद भी देते हैं। ऐसे में इन नियमों का सही तरीके से पालन करना हर भक्त के लिए जरूरी है।बालगोपाल पर न चढ़ाएं मुरझाए हुए फूलश्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान बालगोपाल की पूजा करते समय ध्यान रखें कि आप कभी भी मुरझाए हुए, सूखे या बासी फूल चढ़ाएं नहीं। फूल भगवान् की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और ताजगी उनके प्रति श्रद्धा को दर्शाती है। यदि आप मुरझाए फूल चढ़ाते हैं, तो यह अपमान समझा जाता है और भगवान को यह पसंद नहीं आता। इसके अतिरिक्त, अगस्त के फूल, जिन्हें सेसबानिया ग्रैंडिफ्लोरा कहते हैं, भगवान कृष्ण को विशेष रूप से अप्रिय हैं। इसलिए, इन फूलों का उपयोग जन्माष्टमी की पूजा में बिल्कुल न करें।गाय को न सताएंभगवान श्रीकृष्ण का गायों से बहुत गहरा प्रेम और लगाव है। वे स्वयं एक ग्वाल (गाय चराने वाले) थे और गायों को अपना माता-पिता समान मानते थे। जन्माष्टमी के दिन गोवंश की सेवा करना, उनका सम्मान करना और कभी भी उनका अपमान या सत्कार न करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि इस दिन गायों को सताया या परेशान किया गया, तो पूजा और व्रत का फल अधूरा रह सकता है। इसके अलावा, ऐसी क्रिया से भगवान कृष्ण नाराज हो सकते हैं, जिससे भक्त को उनकी कृपा प्राप्त नहीं होती। इसलिए जन्माष्टमी के दिन गोवंश की रक्षा और सेवा करें।तुलसी की पत्तियां न तोड़ेंतुलसी का पौधा भगवान् विष्णु और उनके अवतार कृष्ण की अति प्रिय वनस्पति है। इसलिए जन्माष्टमी के दिन तुलसी के पौधे की पत्तियां तोड़ना वर्जित होता है। पूजा में तुलसी की पत्तियां इस्तेमाल करने के लिए उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर साफ-सुथरा और ताजा रख लेना चाहिए। तुलसी के प्रति सम्मान भाव रखने से भगवान की प्रसन्नता होती है और पूजा का फल बढ़ता है।पीले वस्त्र पहनेंबालगोपाल को पीले रंग के वस्त्र पहनाना शुभ माना जाता है क्योंकि पीला रंग आनंद, उल्लास और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इसी कारण जन्माष्टमी के दिन स्वयं और पूरे परिवार के सदस्य पीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके विपरीत, काले रंग के वस्त्र पहनना इस दिन अशुभ माना जाता है और इससे पूजा की सफलता पर असर पड़ सकता है। इस प्रकार पीले वस्त्र पहनकर आप पूजा में एकाग्रता और भक्तिभाव बढ़ा सकते हैं।चावल, प्याज, लहसुन आदि न खाएंजन्माष्टमी के दिन व्रत रखने वाले भक्तों को चावल, प्याज, लहसुन और अन्य तीखे तथा भारी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शरीर और मन दोनों को शुद्ध रखना आवश्यक है। अधिक से अधिक ताजे फल, हल्का भोजन और जल का सेवन करें। साथ ही अपने मन को भी बुरे विचारों से दूर रखें, क्योंकि शुद्ध मन से की गई पूजा में भगवान की कृपा अधिक होती है।बुजुर्गों का सम्मान करेंघर के बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना सभी पर्वों में अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जन्माष्टमी के दिन यह और भी ज़्यादा आवश्यक हो जाता है। यदि इस दिन किसी भी तरह से बड़े-बुजुर्गों का अपमान होता है तो व्रत का फल अधूरा रह जाता है और बालगोपाल की कृपा नहीं मिलती। इसलिए प्रयास करें कि पूजा का नेतृत्व घर के बड़े सदस्य ही करें और परिवार के सभी सदस्य उनका सम्मान करें। इससे घर में सुख-शांति और भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है।
- 16 अगस्त को जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया जाएगा। कहते हैं इस शुभ दिन पर जो कोई भगवान कृष्ण के इन 5 शक्तिशाली मंत्रों का जाप करता है उसके जीवन के समस्त दुखों का नाश हो जाता है। इन मंत्रों को जपने के लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय सबसे शुभ माना गया है। 16 अगस्त को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:24 से 05:07 बजे तक रहेगा। चलिए जानते हैं ये कौन से मंत्र हैं।'ॐ कृष्णाय नमः' कहते हैं इस मंत्र के जाप से सभी तरह की आंतरिक चिंताओं से छुटकारा मिल जाता है। इस मंत्र का अर्थ है हे श्री कृष्ण, मेरा नमन स्वीकार करो।'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे||' इस मंत्र का अर्थ है- श्री कृष्ण और भगवान राम को प्रणाम। वे दो शरीर हैं लेकिन श्री हरि विष्णु के अवतार होने के कारण दोनों एक ही हैं। यह मंत्र आपकी आत्मा और भगवान कृष्ण के बीच एक संबंध स्थापित करने में मदद करता है। इस मंत्र के जाप से मानसिक शांति मिलती है।'ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।' ये कृष्ण गायत्री मंत्र है। कहते हैं इसके जाप से भगवान कृष्ण की कृपा शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है। ये मंत्र सारे दुखों का नाश कर देता है।'ॐ श्री कृष्णः शरणं ममः' भक्त इस मंत्र के जरिए भगवान श्री कृष्ण का आह्वान करते हैं। यह मंत्र शांति प्रदान करता है और दुखों को दूर करता है। साथ ही कार्यों में सफलता दिलाता है।“हे कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि यादवनन्दन । आपद्भिः परिभूतां मां त्रायस्वाशु जनार्दन” कहते हैं इस मंत्र का जाप करने से बड़ी से बड़ी परेशानी का अंत हो जाता है।
- भगवान कृष्ण को कोई नंदलाला कहकर पुकारता है, तो कोई कृष्ण कन्हैया के नाम से याद करता है। किसी के लिए वे लड्डू गोपाल हैं, कुछ लोग उन्हें मुरारी कह कर पुकारते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्येक नाम में शुभता समाई हुई है और ये सभी नाम भक्तों के हृदय को अत्यंत प्रिय हैं। मान्यता है कि जन्माष्टमी के अवसर पर यदि भक्त पूरे श्रद्धा भाव से भगवान के 108 नामों का जाप करते हैं, तो श्रीकृष्ण शीघ्र प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यहां से आप लड्डू गोपाल के 108 पवित्र नाम देख सकते हैं।भगवान श्रीकृष्ण के 108 नाम1. कृष्ण2. कमलनाथ3. वासुदेव4. सनातन5. वसुदेवात्मज6. पुण्य7. लीलामानुष विग्रह8. श्रीवत्स कौस्तुभधराय9. यशोदावत्सल10. हरि11. चतुर्भुजात्त चक्रासिगदा12. सङ्खाम्बुजा युदायुजाय13. देवाकीनन्दन14. श्रीशाय15. नन्दगोप प्रियात्मज16. यमुनावेगा संहार17. बलभद्र प्रियनुज18. पूतना जीवित हर19. शकटासुर भञ्जन20. नन्दव्रज जनानन्दिन21. सच्चिदानन्दविग्रह22. नवनीत विलिप्ताङ्ग23. नवनीतनटन24. मुचुकुन्द प्रसादक25. षोडशस्त्री सहस्रेश26. त्रिभङ्गी27. मधुराकृत28. शुकवागमृताब्दीन्दवे29. गोविन्द30. योगीपति31. वत्सवाटि चराय32. अनन्त33. धेनुकासुरभञ्जनाय34. तृणी-कृत-तृणावर्ताय35. यमलार्जुन भञ्जन36. उत्तलोत्तालभेत्रे37. तमाल श्यामल कृता38. गोप गोपीश्वर39. योगी40. कोटिसूर्य समप्रभा41. इलापति42. परंज्योतिष43. यादवेंद्र44. यदूद्वहाय45. वनमालिने46. पीतवससे47. पारिजातापहारकाय48. गोवर्थनाचलोद्धर्त्रे49. गोपाल50. सर्वपालकाय51. अजाय52. निरञ्जन53. कामजनक54. कञ्जलोचनाय55. मधुघ्ने56. मथुरानाथ57. द्वारकानायक58. बलि59. बृन्दावनान्त सञ्चारिणे60. तुलसीदाम भूषनाय61. स्यमन्तकमणेर्हर्त्रे62. नरनारयणात्मकाय63. कुब्जा कृष्णाम्बरधराय64. मायिने65. परमपुरुष66. मुष्टिकासुर चाणूर मल्लयुद्ध विशारदाय67. संसारवैरी68. कंसारिर69. मुरारी70. नाराकान्तक71. अनादि ब्रह्मचारिक72. कृष्णाव्यसन कर्शक73. शिशुपालशिरश्छेत्त74. दुर्यॊधनकुलान्तकृत75. विदुराक्रूर वरद76. विश्वरूपप्रदर्शक77. सत्यवाचॆ78. सत्य सङ्कल्प79. सत्यभामारता80. जयी81. सुभद्रा पूर्वज82. विष्णु83. भीष्ममुक्ति प्रदायक84. जगद्गुरू85. जगन्नाथ86. वॆणुनाद विशारद87. वृषभासुर विध्वंसि88. बाणासुर करान्तकृत89. युधिष्ठिर प्रतिष्ठात्रे90. बर्हिबर्हावतंसक91. पार्थसारथी92. अव्यक्त93. गीतामृत महोदधी94. कालीयफणिमाणिक्य रञ्जित श्रीपदाम्बुज95. दामोदर96. यज्ञभोक्त97. दानवेन्द्र विनाशक98. नारायण99. परब्रह्म100. पन्नगाशन वाहन101. जलक्रीडा समासक्त गोपीवस्त्रापहाराक102. पुण्य श्लॊक103. तीर्थकरा104. वेदवेद्या105. दयानिधि106. सर्वभूतात्मका107. सर्वग्रहरुपी108. परात्पराय
- हिंदू धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025 का बहुत बड़ा महत्व माना गया है। इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त को मनाई जा रही है। बता दें, श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में मध्य रात्रि में होने की वजह से कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा भी रात 12 बजे की जाती है। इस दिन श्रीकृष्ण भक्त पूजा और व्रत रखकर अपने आराध्य को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन एक और चीज बेहद खास होती है और वो है आधी रात को खीरा काटना। क्या आप जानते हैं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आधी रात को डंठल वाला खीरा क्यों काटा जाता है? , कृष्ण जन्म का खीरे से क्या है सम्बन्ध और खीरे से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कैसे करवाया जाता है? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के रहस्य।जन्माष्टमी पर खीरे का क्या है महत्व?जन्माष्टमी की पूजा में खीरे का बहुत खास महत्व माना गया है। जन्माष्टमी की पूजा खीरा काटे बिना पूरी नहीं मानी जाती है। लेकिन क्या आप इसके पीछे का रहस्य जानते हैं? अगर नहीं तो आपको बता दें, कि खीरा काटने की परंपरा श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी हुई है। दरअसल, जिस तरह बच्चे के जन्म के समय उसकी गर्भनाल काटी जाती है, उसी तरह जन्माष्टमी की रात खीरे का तना काटा जाता है। हिंदू धर्म में यह परंपरा श्रीकृष्ण के जन्म का प्रतीक मानी जाती है। जिसे कई जगह 'नल छेदन' के नाम से भी जाना जाता है।कृष्ण जन्म पर डंठल वाला खीरा ही क्यों काटा जाता है?अकसर कई बार लोग इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते हैं कि कृष्ण जन्म के दौरान डंठल वाला खीरा ही क्यों काटा जाता है। अगर आप भी इस सवाल का जवाब जानना चाहते हैं तो आपको बता दें कि जिस तरह बच्चे के जन्म के समय उसकी गर्भनाल को मां के गर्भ से काटकर अलग किया जाता है, ठीक उसी तरह हिंदू मान्यताओं के अनुसार डंठल वाले खीरे को भगवान श्री कृष्ण का गर्भनाल माना जाता है और खीरे के डंठल को खीरे से काटकर अलग करना, उसे श्री कृष्ण को मां देवकी से अलग करने की रस्म के तौर पर मनाया जाता है। इस खीरे के डंठल को काटने की रस्म को नाल छेदन के नाम से जाना जाता है। जो रात के 12 बजे की जाती है।संतान प्राप्ति का आशीर्वाद है खीराखीरे का नाल छेदन करने के बाद श्रीकृष्ण आरती होती है। जिसके बाद खीरे को भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है। थोड़ी देर बाद वही खीरा प्रसाद के रूप में भक्तों में बांट दिया जाता है। खीरे को पवित्र फल माना जाता है, जिसे जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को अर्पित करने से शुभ फल मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से भक्तों को प्रजनन क्षमता और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इतना ही नहीं जन्माष्टमी पर प्रसाद के रूप में खीरा खाने से संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपत्तियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी मिलता है। गर्भवती महिलाओं के लिए, खीरा सौभाग्य और ईश्वर की सुरक्षा का प्रतीक भी माना जाता है।
- भगवान श्रीकृष्ण का नाम आते ही मन में उनकी मधुर बांसुरी की धुन गूंज उठती है। यह बांसुरी केवल संगीत और प्रेम का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का माध्यम भी मानी जाती है। जन्माष्टमी के अवसर पर जहां एक ओर श्रीकृष्ण की पूजा से जीवन में आनंद और समृद्धि आती है, वहीं धार्मिक और वास्तु शास्त्र की मान्यता के अनुसार घर में बांसुरी रखने से वास्तु दोष भी दूर होते हैं। माना जाता है कि बांसुरी में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की ऊर्जा का आशीर्वाद होता है, जो घर में सकारात्मक कंपन फैलाती है और नकारात्मकता को खत्म करती है। आइए जानते हैं जन्माष्टमी पर बांसुरी के 7 ऐसे उपाय, जिनसे घर का वास्तु दोष दूर हो सकता है।1. मुख्य द्वार पर बांसुरी लगानाअगर घर में बार-बार नकारात्मक ऊर्जा का अनुभव हो या घर में प्रवेश करने पर भारीपन लगे, तो मुख्य द्वार के ऊपर पीतल या बांस की बांसुरी को लाल धागे से बांधकर लगाएं। यह उपाय बुरी शक्तियों को घर में प्रवेश करने से रोकता है।2. शयनकक्ष में बांसुरी रखनापति-पत्नी के रिश्ते में खटास या अनबन हो तो शयनकक्ष की पूर्व दिशा में दो बांसुरियां लाल या पीले रेशमी धागे से बांधकर रखें। यह उपाय प्रेम, सामंजस्य और आपसी विश्वास बढ़ाता है।3. आर्थिक तंगी दूर करने के लिएअगर घर में पैसों की कमी बनी रहती है तो तिजोरी या अलमारी, जहां आप धन रखते हैं, वहां पर छोटी चांदी की बांसुरी रखें। यह उपाय लक्ष्मी कृपा पाने और धन वृद्धि में सहायक होता है।4. बच्चों की पढ़ाई में प्रगति के लिएबच्चों का पढ़ाई में मन न लगे या एकाग्रता की कमी हो, तो उनकी पढ़ाई की मेज पर छोटी बांसुरी रखें। यह बुद्धि और स्मरण शक्ति को बढ़ाती है तथा पढ़ाई में बाधाएं दूर करती है।5. रोग और मानसिक तनाव से मुक्ति के लिएघर के मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ पीली बांसुरी रखें और रोज सुबह-शाम आरती के समय बांसुरी पर हल्का-सा फूंक मारें। माना जाता है कि यह उपाय घर के वातावरण को शुद्ध करता है और स्वास्थ्य लाभ देता है।6. वास्तु दोष दूर करने के लिए जल उपायअगर घर में लगातार कलह रहती है, तो घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में एक पात्र में जल भरकर रखें और उसमें पीली बांसुरी डाल दें। जल को रोज बदलें। यह उपाय ईशान कोण के दोष को दूर करता है।7. व्यापार में तरक्की के लिएदुकान या ऑफिस में, जहां आप कैश काउंटर रखते हैं, वहां पर पीतल की बांसुरी रखें। इससे ग्राहकों की संख्या बढ़ती है और कारोबार में प्रगति होती है।
- हिंदू धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का फर्व अत्यंत पवित्र और विशेष माना जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इस दिन देशभर में भक्ति, उत्साह और श्रद्धा के साथ उनके जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है। मंदिरों में लड्डू गोपाल की विशेष पूजा होती है, और भक्त पूरे दिन व्रत रखकर मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण का अभिषेक और आरती करते हैं।शास्त्रों में बताया गया है कि जन्माष्टमी के दिन किया गया दान-पुण्य सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना फलदायी होता है। यह दिन केवल उपवास और पूजा का ही नहीं, बल्कि सेवा और दान का भी है। माना जाता है कि यदि इस दिन जातक अपनी राशि के अनुसार विशेष वस्तुओं का दान करें, तो उन्हें पूरे वर्ष भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।मेष राशि- इस राशि के लोगों को गेहूं और गुड़ का दान करना शुभ माना जाता है। इससे जीवन में ऊर्जा और उत्साह बना रहता है।वृषभ राशि- जन्माष्टमी के दिन माखन, मिश्री और चीनी का दान करने से सौभाग्य और समृद्धि में वृद्धि होती है।मिथुन राशि- इस राशि के जातकों के लिए अन्नदान अत्यंत फलदायी है। किसी जरूरतमंद को भोजन सामग्री देना श्रेष्ठ कर्म है।कर्क राशि- दूध, दही, चावल और मिठाई का दान करने से मानसिक शांति और पारिवारिक सुख प्राप्त होता है।सिंह राशि- गुड़, शहद और मसूर की दाल का दान करने से नेतृत्व क्षमता और आत्मबल में वृद्धि होती है।कन्या राशि- इस राशि के जातकों के लिए गौ सेवा विशेष पुण्य प्रदान करती है। गौ माता को चारा खिलाना या उनकी देखभाल करना शुभ होता है।तुला राशि- लंबे समय से चली आ रही आर्थिक समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए इस दिन श्वेत और नीले रंग के वस्त्र का दान करना चाहिए।वृश्चिक राशि- गेहूं, गुड़ और शहद का दान करने से जीवन में सकारात्मकता और उन्नति आती है।धनु राशि- गीता या अन्य धार्मिक पुस्तकों का दान करने से ज्ञान, धर्म और आस्था में वृद्धि होती है।मकर राशि- किसी गरीब को मध्य नीले रंग का वस्त्र दान करना शुभ माना गया है, जिससे कर्मफल में सुधार होता है।कुंभ राशि- इस राशि के जातक धन का दान करके आर्थिक स्थिरता और ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।मीन राशि- केले, बेसन के लड्डू, मिश्री और माखन का दान करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- जन्माष्टमी का पर्व बेहद पावन और शुभ माना जाता है। इस साल यह पर्व 15 अगस्त को मनाया जाएगा। यह भगवान कृष्ण के जन्मदिन का प्रतीक है। इस दिन साधक उपवास रखते हैं और रात में कृष्ण जन्म के बाद व्रत खोलते हैं। वहीं, जन्माष्टमी की रात को लेकर कई सारे उपाय बताए गए हैं, जिन्हें करने से जीवन की मुश्किलों का अंत होता है/आइए इस आर्टिकल में इस दिन से जुड़े कुछ प्रमुख उपाय के बारे में जानते हैं....तुलसी की माला - रात में भगवान कृष्ण का शृंगार करें और उन्हें तुलसी की माला अर्पित करें। इसके बाद, तुलसी के पौधे के सामने 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। ऐसा करने से कारोबार में वृद्धि होगी।माखन-मिश्री भोग - रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म के बाद उन्हें माखन-मिश्री का भोग लगाएं। इस उपाय को करने से रिश्ते मधुर होते हैं। साथ ही जीवन में शुभता का आगमन होता है।मोर पंख - भगवान कृष्ण को मोर पंख बहुत प्रिय है। ऐसे में जन्माष्टमी की रात, मोर पंख को अपने घर के प्रमुख स्थानों पर रखें। इससे जीवन में नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इसके साथ ही तरक्की होती है।शंख - रात में भगवान कृष्ण की पूजा करते समय शंख बजाएं। शंख की ध्वनि से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। पूजा के बाद इस शंख को अपनी दुकान या दफ्तर में रखें। ऐसा करने से व्यापार में वृद्धि होती है।गीता का पाठ - जन्माष्टमी की रात को भगवान कृष्ण के सामने बैठकर भगवत गीता के 11वें अध्याय का पाठ करें। इस अध्याय में भगवान ने अपने विराट स्वरूप का वर्णन किया है। ऐसा करने से जीवन में सफलता और मान-सम्मान बढ़ता है।गाय की सेवा - रात में व्रत खोलने के बाद किसी गाय को हरा चारा खिलाएं। गाय की सेवा करने से भगवान कृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं, जिससे जीवन में मान-सम्मान और यश बढ़ता है।पीपल के पेड़ की पूजा - रात में पीपल के पेड़ के नीचे घी का दीपक जलाएं। पीपल में सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है। ऐसा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।गरीबों को दान - जन्माष्टमी की रात गरीबों को भोजन और वस्त्र दान करें। दान-पुण्य करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जीवन में खुशहाली आती है।


























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