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- शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर से प्रारंभ हो रहे हैं। इस बार मां दुर्गा की सवारी हाथी है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। आदिशक्ति मां दुर्गा का आशीर्वाद पाने के लिए यह नौ दिन अत्यंत खास माने गए हैं। मान्यता है कि इन दिनों में मां दुर्गा को उनके प्रिय फूल या पुष्प अर्पित करने से जातक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और घर में धन-संपदा आती है। जानें नवरात्रि में मां दुर्गा को कौन-से पुष्प अर्पित करने चाहिए।1. लाल गुड़हल: देवी पुराण के अनुसार मां दुर्गा को लाल गुड़हल का फूल अतिप्रिय है। मान्यता है कि मां दुर्गा के पूजन में गुड़हल के फूल का इस्तेमाल उसी तरह से लाभकारी होता है जैसे भगवान शिव पर बेलपत्र का चढ़ाना। मान्यता है कि मां दुर्गा को गुड़हल का फूल अर्पित करने से व्यक्ति को सुख-सौभाग्य के साथ मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।2. गेंदे का फूल: नवरात्रि में मां दुर्गा को गेंदे का फूल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि नवरात्रि पूजन में गेंदे का फूल प्रयोग करने से धन लाभ के साथ ज्ञान व बुद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही मां दुर्गा को इस फूल को अर्पित करने से नकारात्मकता दूर होती है।3. गुलाब का फूल: नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को गुलाब का फूल अर्पित करना लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा की असीम कृपा प्राप्त होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ ही परिवार में सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है।4. हरसिंगार के फूल: नवरात्रि में हरसिंगार के फूल मां दुर्गा को अर्पित करने से जीवन की परेशानियां दूर होने की मान्यता है। मान्यता है कि ऐसा करने से मानसिक तनाव दूर होता है और तरक्की मिलती है।5. कमल का फूल: मां दुर्गा को कमल का फूल भी प्रिय है। मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा को कमल का फूल अर्पित करने से कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
- शारदीय नवरात्रि का पर्व हर साल देशभर में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस बार 22 सितंबर से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। इन 9 दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरुपों की पूजा की जाती है। इन 9 दिनों का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि, जो भक्त इन दिनों में माता रानी की सच्ची उपासना करता है मां दुर्गा उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। शारदीय नवरात्रि का आरंभ आश्विन प्रतिपदा तिथि से होता है और समापन दशमी तिथि को होता है। वैसे को माता का वाहन शेर है लेकिन, नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा अलग-अलग वाहन से आगमन और प्रस्थान करती हैं। माता के अलग-अलग वाहन पर आने और जाने का प्रभाव भी अलग होता है। आइए जानते हैं नवरात्रि 2025 से जुड़ी बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी।नवरात्रि का आरंभ कब से हो रहा है?शारदीय नवरात्रि का आरंभ 22 सितंबर से हो रहा है और 2 अक्टूबर को दशमी तिथि के दिन नवरात्रि का समापन हो जाएगा। साथ ही इस बार नवरात्रि पर ग्रहों का बहुत ही शुभ संयोग बना हुआ है। नवरात्रि पर इस बार बुधादित्य राजयोग, भद्र राजयोग, धन योग (चंद्र मंगल युति तुला राशि में), त्रिग्रह योग (चंद्रमा बुध और सूर्य की युति कन्या राशि में), और गजेसरी राजयोग का शुभ संयोग रहने वाला है। नवरात्रि का आरंभ गजकेसरी राजयोग से हो रहा है क्योंकि, गुरु और चंद्रमा एक दूसरे से केंद्र भाव में होंगे। गुरु मिथुन राशि में और चंद्रमा कन्या राशि में गोचर करेंगे जिससे गजकेसरी राजयोग का निर्माण होगा। साथ ही इस बार मां दुर्गा भी गज पर सवाल होकर आ रही हैं तो यह बेहद ही दुर्लभ संयोग हैं।नवरात्रि 2025 मां दुर्गा का वाहन ?शशिसूर्ये गजारूढ़ा , शनिभौमे तुरंगमे ।गुरुशुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्तिता ।।फलम् - गजे च जलदा देवी , छत्रभङ्ग तुरंगमे ।नौकायां सर्व सिद्धिस्यात् दोलायां मरणं धुव्रम् ।।इस बार शारदीय नवरात्रि का आरंभ 22 सितंबर सोमवार से हो रहा है। जब भी नवरात्रि का आरंभ रविवार या सोमवार से होता है तो उस दिन माता का आगमन गज यानी हाथी पर होता है। श्रीमदेवी भागवत महापुराण के अनुसार, जब भी माता का आगमन हाथी पर होता है तो यह बेहद ही शुभ माता जाता है। माता के हाथी पर आगमन का अर्थ है कि कृषी में वृद्धि होती साथ ही देश में धन समृद्धि में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।नवरात्रि 2025 मां दुर्गा के प्रस्थान का वाहन ?शशिसूर्यदिने यदि सा विजया, महिषा गमनेरूज शोककरा,शनिभौमे यदि सा विजया चरणायुधयानकरी विकला ,बुधशुक्रे यदि सा विजया गजवाहनगा शुभवृष्टिकरा ,सुरराजगुरौ यदि सा विजया नरवाहनगा शुभसौख्यकरा ।।शारदीय नवरात्रि का समापन 2 अक्टूबर गुरुवार विजयदशमी के दिन होगा। जब भी माता का प्रस्थान गुरुवार के दिन होता है तो मां दुर्गा मनुष्य की सवारी करके प्रस्थान करती हैं। इस बार भी मां मनुष्य की सवारी करके प्रस्थान करेंगे जिसे बहुत ही शुभ संकेत माना गया है। इसका मतलब है कि लोगों के बीच प्रेम बढ़ेगा और सुथ शांति बनी रहेगी।नवरात्रि 2025 किस दिन कौनसी देवी की पूजा करें?1) नवरात्रि पहला दिन 22 सितंबर 2025 : मां शैलपुत्री की पूजा2) नवरात्रि दूसरे दिन 23 सितंबर 2025 : मां ब्रह्मचारिणी की पूजा3) नवरात्रि तीसरे दिन 24 सितंबर 2025 : मां चंद्रघंटा की पूजा4) नवरात्रि तीसरे दिन 25 सितंबर 2025 : मां चंद्रघंटा की पूजा5) नवरात्रि चौथा दिन 26 सितंबर 2025 : मां कूष्माण्डा की पूजा6) नवरात्रि पांचवां दिन 27 सितंबर 2025 : मां स्कंदमाता की पूजा7) नवरात्रि छठा दिन 28 सितंबर 2025 : मां कात्यायनी की पूजा8) नवरात्रि सातवां दिन 29 सितंबर 2025 : मां कालरात्रि की पूजा9) नवरात्रि आठवा दिन 30 सितंबर 2025 : मां महागौरी सिद्धिदात्री की पूजा10) नवरात्रि नौवां दिन 1 अक्टूबर 2025 : मां सिद्धिदात्री की पूजा11 ) नवरात्रि दसवा दिन 2 अक्तूबर 2025 : विजयदशमीबता दें कि इस बार नवरात्रि में तृतीया तिथि दो दिन लग रही है। इसलिए 24 और 25 सितंबर दोनों ही दिन मां चंद्रघंटा की उपासना की जाएगी।
- माता पार्वती ही संसार की समस्त शक्तियों का स्रोत हैं। उन्ही का एक रूप माँ दुर्गा को भी माना जाता है। उनपर आधारित ग्रन्थ "दुर्गा सप्तसती" में माँ के 108 नामों का उल्लेख है। प्रातःकाल इन नामों का स्मरण करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर होते हैं। आइये उन नामों और उनके अर्थों को जानें:सती: भगवान शंकर की पहली पत्नी। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाली इन देवी का माहात्म्य इतना है कि उसके बाद पति परायण सभी स्त्रियों को सती की ही उपमा दी जाने लगी।साध्वी: ऐसी स्त्री जो आशावादी हो।भवप्रीता: जिनकी भगवान शिव पर अगाध प्रीति हो।भवानी: समस्त ब्रह्माण्ड ही जिनका भवन हो।भवमोचनी: संसार बंधनों से मुक्त करने वाली।आर्या: देवी, पुरुषश्रेष्ठ की पत्नी।दुर्गा: दुर्गमासुर का वध करने वाली, अपराजेय।जया: जो सदैव विजयी हो।आद्या: सभी का आरम्भ।त्रिनेत्रा: तीन नेत्रों वाली।शूलधारिणी:शूल को धारण करने वाली।पिनाकधारिणी: जो भगवान शिव का धनुष धारण कर सकती हो।चित्रा: अद्वितीय सुंदरी।चण्डघण्टा: प्रचण्ड स्वर में नाद करने वाली।महातपा:अत्यंत कठिन तपस्या करने वाली।मन: मानस शक्ति।बुद्धि: सर्वज्ञता।अहंकारा: अभिमान करने वाली।चित्तरूपा: वो जो मनन की अवस्था में है।चिता: मृत्युशैय्या के समान।चिति: सब को चेतना प्रदान करने वाली।सर्वमन्त्रमयी: सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली।सत्ता: जो सबसे परे है।सत्यानन्दस्वरूपिणी: जो अनन्त आनंद का रूप हो।अनन्ता: जिनका कोई अंत नहीं।भाविनी: सभी की जननी।भाव्या: ध्यान करने योग्य।भव्या: भव्य स्वरूपा।अभव्या: जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं।सदागति: मोक्ष प्रदान करने वाली।शाम्भवी: शम्भू (भगवान शंकर का एक नाम) की पत्नी।देवमाता: देवताओं की माता।चिन्ता: चिंतन करने वाली।रत्नप्रिया: जिन्हे आभूषणों से प्रेम हो।सर्वविद्या: ज्ञान का भंडार।दक्षकन्या: प्रजापति दक्ष की पुत्री।दक्षयज्ञविनाशिनी: दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाली।अपर्णा: तपस्या के समय पूर्ण निराहार रहने वाली।अनेकवर्णा: अनेक रंगों वाली।पाटला: रक्तिम (लाल) रंग वाली।पाटलावती: लाल पुष्प एवं वस्त्र धारण करने वाली।पट्टाम्बरपरीधाना: रेशमी वस्त्र धारण करने वाली।कलामंजीरारंजिनी: पायल को प्रसन्नतापूर्वक धारण करने वाली।अमेय: जो सीमा से परे हो।विक्रमा: अनंत पराक्रमी।क्रूरा: दुष्टों के प्रति क्रूर।सुन्दरी: अनिंद्य सुंदरी।सुरसुन्दरी: जिनके सौंदर्य की कोई तुलना ना हो।वनदुर्गा: वन की देवी।मातंगी: मतंगा की देवी।मातंगमुनिपूजिता: गुरु मतंगा द्वारा पूजनीय।ब्राह्मी: भगवान ब्रह्मा की शक्ति का स्रोत।माहेश्वरी: महेश की शक्ति।इंद्री: देवराज इंद्र की शक्ति।कौमारी: किशोरी।वैष्णवी: भगवान विष्णु की शक्ति।चामुण्डा: चंड और मुंड का नाश करने वाली।वाराही: वराह पर सवार होने वाली।लक्ष्मी: सौभाग्य की देवी।पुरुषाकृति: जो पुरुष का रूप भी धारण कर सके।विमिलौत्त्कार्शिनी: आनंद प्रदान करने वाली।ज्ञाना: ज्ञानी।क्रिया: हर कार्य का कारण।नित्या: नित्य समरणीय।बुद्धिदा: बुद्धि प्रदान करने वाली।बहुला: जो विभिन्न रूप धारण कर सके।बहुलप्रेमा: सर्वप्रिय।सर्ववाहनवाहना: सभी वाहनों पर सवार होने वाली।निशुम्भशुम्भहननी: शुम्भ एवं निशुम्भ का वध करने वाली।महिषासुरमर्दिनि: महिषासुर का वध करने वाली।मधुकैटभहंत्री: मधु एवं कैटभ का नाश करने वाली।चण्डमुण्ड विनाशिनि: चंड और मुंड का नाश करने वाली।सर्वासुरविनाशा: सभी राक्षसों का नाश करने वाली।सर्वदानवघातिनी: सबके संहार में समर्थ।सर्वशास्त्रमयी: सभी शास्त्रों में निपुण।सत्या: सदैव सत्य बोलने वाली।सर्वास्त्रधारिणी: सभी शस्त्रों को धारण करने वाली।अनेकशस्त्रहस्ता: हाथों में अनेक हथियार धारण करने वाली।अनेकास्त्रधारिणी: अनेक हथियारों को धारण करने वाली।कुमारी: कौमार्य धारण करने वाली।एककन्या: सर्वोत्तम कन्या।कैशोरी: किशोर कन्या।युवती: सुन्दर नारी।यति: तपस्विनी।अप्रौढा: जो कभी वृद्ध ना हो।प्रौढा: प्राचीन।वृद्धमाता: जगतमाता, शिथिल।बलप्रदा: बल प्रदान करने वाली।महोदरी: ब्रह्माण्ड को धारण करने वाली।मुक्तकेशी: खुले केशों वाली।घोररूपा: भयानक (दुष्टों के लिए) रूप वाली।महाबला: अपार शक्ति की स्वामिनी।अग्निज्वाला: अग्नि के समान तेजस्विनी।रौद्रमुखी: भगवान रूद्र के समान रूप वाली।कालरात्रि: रात्रि के समान काले रंग वाली।तपस्विनी: तपस्या में रत।नारायणी: भगवान नारायण की शक्ति।भद्रकाली: काली का रौद्र रूप।विष्णुमाया: भगवान विष्णु की माया।जलोदरी: ब्रह्माण्ड निवासिनी।शिवदूती: भगवान शिव की दूत।करली: हिंसक।अनन्ता: जिसके स्वरुप का कोई छोर ना हो।परमेश्वरी: प्रथम पूज्य देवी।कात्यायनी: ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय।सावित्री: सूर्यनारायण की पुत्री।प्रत्यक्षा: वास्तविकता।ब्रह्मवादिनी: हर स्थान पर वास करने वाली।
- अबसे कुछ ही दिन में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाएगी। अमूनन नवरात्रि नौ दिन की होती है लेकिन इस बार इसे 10 दिन के लिए मनाया जा रहा है। बता दें कि हर साल नवरात्रि अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष को पड़ती है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए लोग कई तरहके उपाय करते हैं। मान्यता भी यही है कि नवरात्रि पर अगर पूरे विधि विधान के साथ मां दुर्गा की पूजा कर ली जाए तो उनकी कृपा बरसती है। इस दौरान लोग घर में अखंड ज्योत भी जलाते हैं। हिंदू धर्म में अखंड ज्योत का खास महत्व है। अगर वास्तु के हिसाब से आप घर में अखंड़ ज्योत रखने के लिए सही दिशा का चुनाव करेंगे तो इससे आपकी हर इच्छा पूरा होगी।अखंड ज्योत रखने की सही दिशाबता दें कि पूरी नवरात्रि घर में अखंड ज्योत जलाने की परंपरा होती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार इस ज्योत को सही दिशा में रखने से घर में खूब बरकत आती है। शास्त्र के हिसाब से अखंड ज्योत की दिशा हमेशा दक्षिण-पूर्व की ओर ही होनी चाहिए। दिया या फिर अखंड ज्योत के लिए ये दिशा सबसे ज्यादा अच्छी मानी जाती है। अगर बिना किसी बाधा के इस दिशा में पूरी नवरात्रि अखंड ज्योत जलती रहे तो घर के सदस्यों के जीवन में पैसों का फ्लो अच्छा होगा। वहीं लोगों की हेल्थ भी अच्छी होगी। अच्छा माहौल होगा तो घर का हर एक कोना पॉजिटिविटी से भर जाएगी।नवरात्रि से पहले खरीद लें ये चीजेंअगर नवरात्रि से पहले कुछ चीजों को खरीदकर घर में रख दिया तो इससे देवी मां प्रसन्न होती हैं। ज्योतिष शास्त्र के हिसाब से नवरात्रि से पहले महालक्ष्मी यंत्र, नवग्रह यंत्र, मां दुर्गा के श्रृंगार का सामान और शंख इत्यादि को खरीद लेना चाहिए। इस चीजों को पूजा में शामिल करना काफी शुभ होता है।
- हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है। इन दिनों मां के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। 9 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में भक्त व्रत, उपवास, घटस्थापना, दुर्गा पूजन और कन्या पूजन जैसे अनुष्ठान करते हैं। माना जाता है कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की उपासना करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है। इस साल मां दुर्गा की आराधना व पूजन का पावन पर्व शारदीय नवरात्र का प्रारंभ 22 सितंबर से होने जा रहा है। इस बार नवरात्र में माता रानी हाथी पर सवार होकर आ रही हैं। मां दुर्गा का आगमन और प्रस्थान सप्ताह के दिन के अनुसार होता है। इस बार नवरात्र का प्रारंभ 22 सितंबर यानि सोमवार से हो रहा है। यदि नवरात्र की प्रतिपदा सोमवार या रविवार को हो तो मां दुर्गा गज (हाथी) पर सवार होकर आती हैं। हाथी पर सवार होकर आना शुभ लक्षण का प्रतीक है। पूरे साल सुख-समृद्धि व सौभाग्य का संचार होगा।कलश स्थापना मुहूर्त-आचार्य ने बताया कि आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 22 सितंबर को देर रात 1.23 मिनट पर हो रही है। जो 23 सितंबर को रात 2.55 बजे समाप्त होगी। ऐसे में 22 सितंबर से नवरात्र शुरू होगा व कलश स्थापना की जाएगी। कलश स्थापना सुबह 6.09 से 8.06 बजे तक किया जा सकता है। अगर दोपहर में घट स्थापना कर रहे हैं तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11.49 से 12.38 बजे तक व्याप्त रहेगा। यह समय स्थापना के लिए उपयुक्त माना जाता है।10 दिनों के नवरात्रइस साल 9 नहीं बल्कि 10 दिन के शारदीय नवरात्र होंगे। एक तिथि में वृद्धि हो रही है। नवरात्र में तिथि की वृद्धि अति शुभ फलदायक मानी जाती है। शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू होंगे। नवरात्रि की अष्टमी, नवमी पर कन्या पूजन और दशमी पर रावण दहन होता है।10 दिनों के नवरात्र क्यों?- इस साल श्राद्ध पक्ष में एक तिथि का क्षय और नवरात्र में एक तिथि में वृद्धि हो रही है, इसलिए इस साल 9 दिन के नहीं 10 दिन के नवरात्र होंगे। इस तरह इस बार शारदीय नवरात्र में चतुर्थी तिथि की वृद्धि हो रही है। नवरात्र में तिथि की वृद्धि अति शुभ फलदायक मानी जाती है। इस कारण से नवरात्र का प्रभाव शुभ की प्राप्त होगा।
- सर्वपितृ अमावस्या, पितृपक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। यह तिथि उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को समर्पित होती है जिनकी मृत्यु तिथि का पता नहीं होता या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश न किया जा सका हो। ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष की समाप्ति पर पितरों की आत्माएं अपने परिजनों को आशीर्वाद देकर पुनः अपने लोक को लौटती हैं। ऐसे में यदि इस दिन श्रद्धा और नियमों के अनुसार तर्पण, पिंडदान व दान किया जाए, तो पूर्वज अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को सुख, शांति और समृद्धि का वरदान देते हैं।इस शुभ अवसर पर एक विशेष परंपरा का भी महत्व है , दान की टोकरी तैयार करना। इस टोकरी में जीवनोपयोगी वस्तुएं जैसे अनाज, वस्त्र, तिल, गुड़, पंचमेवा, दक्षिणा, और श्राद्ध सामग्री रखकर किसी ब्राह्मण, मंदिर या ज़रूरतमंद व्यक्ति को दान दिया जाता है। यह न केवल पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति का साधन बनता है, बल्कि दान करने वाले व्यक्ति के जीवन में भी धन, आरोग्य और सौभाग्य बना रहता है।दान की टोकरी क्यों बनाई जाती है?सर्वपितृ अमावस्या के दिन दान का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह दिन पितरों को विदाई देने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अंतिम अवसर होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितरों को प्रसन्न करने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम दान है। यही कारण है कि इस दिन विशेष रूप से दान की टोकरी तैयार करने की परंपरा है।इस टोकरी में रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएं जैसे अनाज, तिल, गुड़, वस्त्र, दक्षिणा, आदि रखी जाती हैं और श्रद्धा भाव से इसे किसी ब्राह्मण, मंदिर या ज़रूरतमंद को अर्पित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह दान पितरों तक पहुंचता है और उनकी आत्मा को तृप्त करता है। बदले में वे अपने वंशजों को सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति का आशीर्वाद देते हैं। इस परंपरा से न सिर्फ पितृ कृपा मिलती है, बल्कि यह परिवार की उन्नति और कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करती है।दान की टोकरी में क्या रखें और कैसे करें दान?सर्वपितृ अमावस्या पर जब हम अपने पितरों को विदा देने के भाव से तर्पण और दान करते हैं, तो एक विशेष दान की टोकरी तैयार करने की परंपरा बहुत शुभ मानी जाती है। यह टोकरी पितरों की तृप्ति और कृपा पाने का श्रेष्ठ माध्यम मानी जाती है। आइए जानें इसमें क्या-क्या रखना चाहिए और इसे कैसे दान करना चाहिए।दान की टोकरी में क्या रखें?चावल, गेहूं और काले तिल टोकरी में अवश्य रखें। यह पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए अति आवश्यक माने गए हैं।सफेद या पीले रंग का कपड़ा (धोती, साड़ी या सुथनी) रखें। इससे पितरों को शांति और संतोष प्राप्त होता है।हरी सब्जियां जैसे लौकी, कद्दू का दान करने से पितृदोष का शमन होता है और जीवन में रुकावटें दूर होती हैं।तांबे या पीतल के बर्तन शुद्ध धातु के पात्र जैसे लोटा या थाली टोकरी में रखें। यह मां लक्ष्मी की कृपा पाने का मार्ग खोलते हैं।थोड़ी सी दक्षिणा रुपए या सिक्के, गुड़, खील या कोई मिठाई ज़रूर रखें। यह पूर्ण श्रद्धा का प्रतीक होता है।दान की विधि कैसे करें?सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और शांत मन से पितरों का ध्यान करें।दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करें, यानी जल अर्पित करें।फिर, श्रद्धा और प्रेमपूर्वक यह टोकरी किसी ब्राह्मण, गौशाला या ज़रूरतमंद व्यक्ति को भेंट करें।दान सदा प्रसन्न मन से करें, तभी उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।
- यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में पितृदोष हो तो जीवन में विघ्न-बाधाएं आती ही रहती हैं। दरअसल, पितृदोष पूर्वजन्म में किए गए पाप कर्मों का फल अथवा पितरों के पाप के दंड को भोगता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में सूर्य, गुरु, चंद्रमा, मंगल, शुक्र, बुध, शनि आदि की युति जब राहु के साथ बनती है अथवा राहु के साथ अन्य ग्रहों की युति बनती है तो पितृदोष होता है। इसी प्रकार जब हाथ में बृहस्पति पर्वत और मस्तिष्क रेखा के बीच से निकलकर आ रही रेखा बृहस्पति और मस्तिष्क रेखा को काटती है तो हस्तरेखा शास्त्रानुसार यह पितृदोष का सूचक है। ज्योतिष शास्त्र में इसे मंगल का कारक भी माना गया है, क्योंकि मंगल ज्योतिष शास्त्रानुसार रक्त संबंध को जोड़ता है। यही कारण है कि विद्वान पितृदोष की तुलना मंगलदोष से करते हैं। कुछ उपायों से पितृदोष के असर को कम किया जा सकता है।कैसे करें निवारणपितृ पक्ष में प्रतिदिन भोजन करने से पहले अपने आहार में से कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते और कौवे या अन्य पक्षी को जरूर दें।पितृ पक्ष के पहले दिन एक पीपल का पेड़ किसी सुरक्षित स्थान अथवा मंदिर में लगाएं। पीपल का पेड़ लगाने से पहले संकल्प लें- ‘मैं यह पौधा अपने पूर्वओं के लिए एवं जाने-अनजाने में मेरे तथा परिवार के किसी अन्य सदस्यों से हुई गलतियों की माफी मांगते हुए लगा रहा हूं। इसके माध्यम से मैं अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहता हूं और पूरे वर्ष इस पेड़ की सेवा करूंगा तथा प्रत्येक महीने की अमावस्या को भोजन दान करूंगा।’पितृ पक्ष के सोलह दिनों तक घर में प्रतिदिन श्रीमद्भागवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें अथवा इस दौरान रोजाना सूर्यास्त के समय पीपल पेड़ के नीचे दक्षिण मुख कर चार बत्ती वाला दीपक, सरसों के तेल में लोबान मिलाकर जलाएं तथा प्रार्थना करें कि पितृ मुझे और मेरे परिवार को पितृदोष से मुक्त करें।श्राद्ध के दौरान किसी बालक या जरूरतमंद को भोजन कराएं अथवा भोजन दान भी कर सकते हैं। भोजन देने से पहले संकल्प करें कि मैं यह भोजन अपने पितरों को समर्पित करता हूं। आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त हो।पितृ पक्ष में नागबलि, नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध आदि का पाठ नित्य करने से भी पितृदोष का प्रभाव कम होता है। इन दिनों पूर्वजों का ध्यान कर दो मूली दान करने या गाय को खिलाने से भी पितरों का आशीर्वाद मिलता है।पितृ पक्ष में रोजाना स्नान करने के बाद एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। इससे भी पितृदोष दूर होता है। इसके अलावा आप प्रत्येक महीने की नाग पंचमी का व्रत भी एक साल तक के लिए कर सकते हैं।
- श्राद्ध संस्कार हिंदू धर्म में पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया है। पिंडदान कहां किया जाए, यह अक्सर उलझन का विषय बनता है, क्योंकि लोग स्थान, परंपरा और श्रद्धा के आधार पर निर्णय नहीं ले पाते, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।ब्रह्म कपाल : यह स्थल हिमालय पर्वत पर स्थित बद्रीधाम में है। इसे वैकुंठ धाम भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाभारत के बाद पांडवों ने अपने सभी पितरों का पिंडदान यहीं किया था। अलकनंदा नदी के तट पर बसे बद्रीनाथ धाम स्थित ब्रह्म कपाल में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। पिंडदान का यह सर्वोच्च स्थान माना गया है।जगन्नाथ पुरी : यह भगवान जगदीश का तारण क्षेत्र है। इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। इसकी भी प्रमुख तीर्थों में गणना की जाती है, इसलिए यहां भी पिंडदान करने से पितरों को शांति मिलती है।ओंकारेश्वर : यह स्थान नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है और यहां ब्रह्मा-विष्णु-महेश का निवास माना गया है। मान्यता है कि यहां पितरों को मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है।पुष्कर : राजस्थान स्थित पुष्कर को तीर्थों का राजा भी कहा गया है। यहां पर पिंडदान का अधिक महत्व है। कहते हैं कि यहां पिंडदान करने से करोड़ों यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।हरिद्वार : यह पावन तीर्थ स्थल है। यहां हर की पौड़ी पर श्राद्ध करने का विधान है। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों की मुक्ति का मार्ग खुलता है।प्रयागराज : गंगा-यमुना-सरस्वती तीनों पवित्र नदियों का संगम यहां यानी प्रयागराज में होता है। यह भगवान भारद्वाज का तपोक्षेत्र है। इस संगम में पिंडदान का अधिक महत्व है।पशुपतिनाथ : यह नेपाल में गंडकी नदी के तट पर स्थित भगवान का धाम है। भगवान कपिल ने इस धाम का महत्व बताया है और यहां पिंडदान करने से पितृ खुश होते हैं।द्वारिका : श्रीकृष्ण की पावन धरती द्वारिका में पिंडदान किया जाता है। कहते हैं कि श्रीकृष्ण को भी यहीं मुक्ति मिली थी, इसलिए यहां पिंडदान करने से भी पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है।नासिक : इसे कुंभ क्षेत्र कहा जाता है। यहां अमृत की बूंदें गिरी थीं। यहां भी पिंडदान किया जा सकता है।महाकाल : उज्जैन नगरी में शिप्रा नदी के तट पर भगवान शिव का तपोस्थल है। यहां से सीधे महाकाल के चरणों में जगह मिलती है। कहा जाता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है।रामेश्वरम : यह स्थल भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित है। यहां श्रीराम ने भगवान शिव की तपस्या की थी। इस वजह से यह भूमि पितरों को मुक्ति दिलाती है।कैलास मानसरोवर : भगवान शिव के इस पावन क्षेत्र में पिंडदान करने से पितरों को सीधे वैकुंठ की प्राप्ति होती है। इसके अलावा वृंदावन की भूमि को भी पिंडदान के योग्य माना गया है।गया : धर्मशास्त्र के अनुसार, गया की 54 वेदियों में विष्णु पद प्रथम है। इसके दर्शन मात्र से पितर नारायण रूप हो जाते हैं। फल्गु नदी में स्नान और तर्पण करने से पितरों को देव योनि मिल जाती है। हिंदू समाज का यह दृढ़ विश्वास है कि गया में श्राद्ध पिंडदान करने से उसकी सात पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिलती है।
- भारतीय वास्तुशास्त्र में दक्षिण दिशा को लेकर विशेष सावधानियां बरती जाती हैं. इसे यम (मृत्यु के देवता) से जोड़ा गया है, जिसके चलते कई लोग दक्षिणमुखी घर खरीदने से बचते हैं. वे मानते हैं कि ऐसा घर उनके लिए दुर्भाग्य लेकर आएगा. लेकिन यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है.ऊर्जा का असंतुलन और मानसिक प्रभावदक्षिण दिशा गर्म और तीव्र ऊर्जा वाली होती है. यदि इसका प्रबंधन ठीक ढंग से न किया जाए तो यह घर में तनाव, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और पारिवारिक कलह पैदा कर सकती है. दक्षिणमुखी घरों में सूर्य की रोशनी कम होती है, जिससे वातावरण उदासीपूर्ण रह सकता है और लोग मानसिक तनाव या डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तुशास्त्र केवल ऊर्जा संतुलन पर ध्यान देता है, न कि अंधविश्वास पर.धन-संपत्ति और व्यवसाय पर प्रभावदक्षिणमुखी घरों में धन टिकता नहीं और खर्चे बढ़ जाते हैं. यदि मुख्य द्वार वास्तु नियमों के अनुसार न बनाया गया हो, तो यह आर्थिक हानि और व्यवसाय में रुकावट का कारण बन सकता है. यह नकारात्मक प्रभाव केवल तब होता है जब वास्तु नियमों का पालन नहीं किया गया हो.सामाजिक मान्यता और मानसिक तनावसमाज में पहले से फैली मान्यताओं के कारण लोग दक्षिणमुखी घर को लेकर डर या संदेह रखते हैं. इस मानसिक तनाव का असर घर के वातावरण और परिवार के स्वास्थ्य पर पड़ता है.दक्षिणमुखी घर को शुभ बनाने के उपायदक्षिणमुखी घर भी सही उपायों से बहुत शुभ हो सकता है. मुख्य द्वार दक्षिण-पूर्व ( में होना चाहिए. उत्तर और उत्तर-पूर्व भाग खुला और साफ-सुथरा रखें. दक्षिण दिशा की दीवारें भारी और ऊँची और उत्तर दिशा हल्की रखें. घर में वास्तु यंत्र, दर्पण और पौधों का उचित प्रयोग करें. नियमित हवन, दीपक जलाना और मंत्रों का जाप सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में मदद करता है.केवल दिशा के नाम पर घर को अशुभ मानना गलत है. दक्षिणमुखी घर सही योजना और वास्तु उपायों के साथ घरवालों के लिए सुख, सफलता और समृद्धि लाने वाला बन सकता है. यह केवल मिथक नहीं, बल्कि सही प्रबंधन और ऊर्जा संतुलन का परिणाम है.
- भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष चलता है जिसे पितृपक्ष भी कहते हैं। यदि आप इस दौरान अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान करने जा रहे हैं तो यह भी जान लें कि शास्त्रों के अनुसार किस स्थान पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए और किस जगह पर श्राद्ध करना शुभ माना जाता है।वर्जित है इन 4 जगहों पर श्राद्ध कर्म करनादेव स्थान: किसी मंदिर के भीतर या परिसर में या किसी भी अन्य देवस्थान श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि यह देवभूमि होती है। पंडित या विद्वान की सलाह पर ही स्थान का चयन करें।अपवित्र भूमि: किसी भी प्रकार से अपवित्र हो रही भूमि पर भी श्राद्ध नहीं करते हैं। कांटेदार भूमि या बंजर भूमि पर भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। जहां लोग खुले में मल-मूत्र त्यागने जाते हैं वहां भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए भले ही उस भूमि को शुद्ध कर लिया गया हो।दूसरों की भूमि : किसी दूसरे की व्यक्तिगत भूमि पर भी श्राद्ध नहीं करना चहिए। यदि दूसरे के घर या भूमि पर श्राद्ध करना पड़े तो किराया या दक्षिणा भूस्वामी को दे देना चाहिए।शमशान : किसी ऐसे शमशान में श्राद्ध नहीं कर सकते हैं जिसे तीर्थ नहीं माना जाता। देश में कुछ ऐसे श्मशान हैं जिन्हें तीर्थ माना जाता है। जैसे उज्जैन का चक्रतीर्थ शमशान घाट को तीर्थ का दर्जा प्राप्त है। हालांकि ऐसी जगहों पर श्राद्ध करना मजबूरी हो तो ही करें। वैसे तीर्थ शमशान में श्राद्ध करने के पहले किसी विद्वान से सलाह जरूर लें।
- पितृ पक्ष 7 सितंबर, रविवार से है और इनका समापन 21 सितंबर, रविवार के दिन ही सर्व पितृ अमावस्या के दिन होगा. पितृ पक्ष के दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध और तर्पण करने का विधान बताया गया है.पंचांग के मुताबिक, पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से शुरू होकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर समाप्त होते हैं. मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों के लिए पितर धरती पर आते हैं और अपने लोगों को आशीर्वाद देकर जाते हैं.ज्योतिषियों के मुताबिक, पितृ पक्ष में लोग अपने पितरों का पिंडदान या श्राद्ध कर्म करने के लिए कई तीर्थस्थलों जैसे गया, वाराणसी, इलाहाबाद, हरिद्वार आदि जगहों पर जाते हैं जिससे पितरों की आत्मा को शांति प्रदान होती है. लेकिन कई बार तीर्थस्थलों पर जाकर श्राद्ध कर्म करना संभव नहीं हो पाता है, जिसके कारण लोग अपने घरों पर ही ब्राह्मण को बुलाकर श्राद्ध कर्म या पिंडदान की प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं. तो चलिए जानते हैं कि घर पर पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने की पूरी विधि क्या है.पितृ पक्ष में घर पर श्राद्ध करने की विधिघर पर श्राद्ध करने से लिए सबसे पहले जल्दी उठकर स्नान करें और सफेद रंग के साफ सुथरे वस्त्र पहनें. उसके बाद घर की किसी शांत या खुली जगह पर आसन बिछाएं. फिर, उस पर कपड़ा डालकर अपने पितर की तस्वीर रखें और उनकी तस्वीर के आगे तांबे का लोटा रखें. उस लोटे में जल, काले तिल और कुश डालें.उसके बाद, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हाथ में जल, तिल और कुश लें और पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करें. इसके बाद पितरों को जल अर्पित करते हुए 'ऊं पितृदेवाय नम: मंत्र का जाप करें.याद रखें कि पितरों का तर्पण कुतप वेला यानी दोपहर में ही करें क्योंकि इस वेला में तर्पण का विशेष महत्व होता है. कुतुप वेला दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक होती है.फिर, पितरों को सात्विक भोजन अर्पित करें जैसे खिचड़ी, खीर, चावल, मूंग आदि और यह सात्विक भोजन केले के पत्ते पर ही रखें. उसके बाद संभव हो तो घर पर बुलाए ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन या दान दें.
- भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से पितृपक्ष प्रारंभ होते हैं। इनका समापन आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर होता है। इस बार 7 सितंबर रविवार को पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है, जो 21 सितंबर रविवार तक रहेगा। यह अवधि मुख्य रूप से पूर्वजों की आत्मशांति के लिए श्राद्ध कर्म के लिए जानी जाती है। पितृपक्ष का सनातन धर्म में बहुत ही विशेष महत्व होता है। मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों पितृ अपने परिवार को आशीर्वाद देने का लिए धरती पर आते हैं। उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण आदि कार्य किए जाते हैं। कहा जाता है कि विधि विधान से पितरों के नाम से तर्पण आदि करने से वंश की वृद्धि होती है और पितरों के आशीर्वाद से व्यक्ति को सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। वरना पितृ नाराज हो जाते हैं। अगर आप इन नियमों की अनदेखी करते हैं तो पितर नाराज हो जाते हैं।ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पितृपक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। अगर किसी मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसी स्थिति में अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितर संबंधित कार्य करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पक्ष में विधि-विधान से पितर संबंधित कार्य करा जाए तो पितरों का आर्शावाद प्राप्त होता है।श्राद्ध पक्ष के दौरान श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए। इस पाठ का फल आत्मा को समर्पित होता है। आश्विन कृष्ण प्रतिपदा इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।पंचमी तिथिपंचमी जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।नवमी तिथिनवमी सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।एकादशी और द्वादशीएकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।नवमी तिथिचतुर्दशी इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।सर्वपितृमोक्ष अमावस्याकिसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए।प्रत्येक व्यक्ति के लिए श्राद्धकर्म अनिवार्य है, वह करना ही चाहिए लेकिन उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जीवित अवस्था में अपने माता-पिता की सेवा करना। जिसने जीवित अवस्था में ही अपने माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट कर दिया हो उसे अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता ही है।
- पंचांग के मुताबिक, 7 सितंबर से पितृ पक्ष की शुरुआत होने वाली है और साल का आखिरी चंद्रग्रहण भी पड़ेगा. ज्योतिषियों के मुताबिक, दोनों घटनाओं का एक ही दिन में होना बहुत ही खतरनाक संयोग माना जा रहा है. दरअसल, पितृ पक्ष वह समय है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके नाम का तर्पण और पूजा करते हैं ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और उनका आशीर्वाद हमें मिलता रहे. ये दिन हमारे और पितरों के बीच जुड़ाव का एक पवित्र समय होता है. वहीं, चंद्र ग्रहण का दिन भी बहुत ही शक्तिशाली माना जाता है. इस दौरान की गई प्रार्थना और साधना का असर कई गुना ज्यादा होता है. यानी छोटी-सी साधना या दान भी बड़ा फल दे सकती है.अब सोचिए, जब पितृ पक्ष की शुरुआत और चंद्र ग्रहण एक साथ हों, तो इस समय की ताकत कितनी बढ़ जाएगी. यही वजह है कि इसे बेहद दुर्लभ और खास योग कहा जा रहा है. इस दिन अगर आप सच्चे मन से अपने पितरों को याद करेंगे, उनका श्राद्ध करेंगे, तो उसका असर कई गुना होगा.यह दिन क्यों खास है?पितृ पक्ष और चंद्रग्रहण का संयोग एक साथ बहुत ही कम देखने को मिलता है. साल 2025 में ये घटना ओर भी खास इसलिए है क्योंकि ये घटना पितृ पक्ष के पहले ही दिन हो रही है.आध्यात्मिक नजरिए से माना जा रहा है कि इस समय पितरों की पूजा, दान या तर्पण करते हैं, तो उसका फल सामान्य दिनों से कहीं ज्यादा फल प्राप्त होगा.पितृ पक्ष के दिन जरूर करें ये कार्यइस खास दिन पितरों को याद करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए बहुत सारे अनुष्ठान किए जाते हैं. जिनमें से कुछ विशेष हैं-1. इस दिन एक लोटे में जल लें और उसमें काले तिल डालें. फिर, पितरों का नाम लेकर और मंत्रों का जाप करते हुए उनका तर्पण करें. अगर संभव हो तो गंगा, यमुना या नर्मदा जैसी पवित्र नदी के किनारे बैठकर पितरों का तर्पण करें.2. इसके अलावा, ग्रहण के समय घर की दक्षिण दिशा में एक दिया जलाएं. उसके सामने थोड़ी देर आंखें बंद करके शांति से बैठें और अपने पूर्वजों को याद करें.3. ग्रहण के दौरान अगर आप 'ऊं नमो भगवते वासुदेवाय' जैसे मंत्रों का जाप जरूर करें.4. इसके अलावा, इस दिन पितरों के नाम का नाम दान जरूर करें. साथ ही इस दिन गाय, कुत्ते, पक्षियों को खाना खिलाना और पानी पिलाना बहुत ही पुण्यकारी माना जाता है.ग्रहण लगने के समय करें ये काम7 सितंबर को जब चंद्र ग्रहण की शुरुआत हो तो उस समय भूल से भी खाना खाने से बचें और सोने से बचें. बल्कि, इस दिन भगवान ध्यान करें या भगवद् गीता, विष्णु सहस्रनाम या रामचरितमानस जैसे पवित्र ग्रंथ पढ़ें. मान्यतानुसार, ग्रहण का समय भगवान से प्रार्थना के लिए बहुत ही पवित्र और शुभ माना जाता है.चंद्र ग्रहण की अवधि7 सितंबर को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा और यह ब्लड मून भी रहेगा. इस चंद्र ग्रहण की शुरुआत रात 9 बजकर 57 मिनट से होगी और इसका समापन अर्धरात्रि 1 बजकर 26 मिनट पर होगा. इस ग्रहण का पीक टाइम रात 11 बजकर 42 मिनट रहेगा.
- वास्तुशास्त्र का जीवन में महत्वपूर्ण योगदान रहता है। वास्तुशास्त्र सही नहीं होने पर व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। मान्यताओं के अनुसार जब वास्तु दोष लगता है तो व्यक्ति का जीवन बुरी तरह से प्रभावित हो जाता है। वास्तु के कुछ खास उपाय होते हैं, जिनको करने से वास्तु दोष खत्म हो जाता है और व्यक्ति का जीवन सुखमय हो जाता है। आइए जानते हैं,वास्तु के खास उपाय-काले रंग का प्रयोग न करेंवास्तुशास्त्र के अनुसार घर में काले, मटमैले, गहरे कत्थई रंगों का प्रयोग बिल्कुल न करें। इन रंगों का प्रयोग करने से वास्तु दोष लग सकता है। अगरये बर्तन हटा देंवास्तुशास्त्र के अनुसार घर में अगर कोई बर्तन लीक करता है तो उसे हटा दें। ऐसी व्यवस्था करें कि पानी बिल्कुल न बहे। पानी की बर्बादी करने से भी वास्तु दोष लग जाता है। इसकी साथ ही छत पर रखी हुई पानी की टंकी में भी यदि ओवर फ्लो के कारण पानी बहता है तो यह बहुत बड़ा दोष है।तुलसी का पत्ता मुंह में रखेंवास्तुशास्त्र के अनुसार घर से बाहर निकलते समय एक तुलसी का पत्ता मुंह में रखें। तुलसी के पत्ते को चबाना नहीं चाहिए।फूलदान या पॅाट को खाली न रखेंवास्तुशास्त्र के अनुसार घर में फूलदान या पॉट आदि रखते हैं तो उन्हें खाली न रखें। उसमें मेवा, चावल, गेहूं आदि कुछ डालकर रखें।दौड़ते घोड़ों की तस्वीर घर में लगाएंवास्तुशास्त्र के अनुसार घर या ऑफिस में दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर या मूर्ति लगाएं। यह शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है और आलस्य दूर करती है।
- देशभर में भक्तों ने 27 अगस्त को बड़े धूमधाम से अपने घरों में बप्पा का स्वागत किया और अब उनकी विदाई का समय करीब आ रहा है. 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान लोग गणेश जी की स्थापना कर विधिवत पूजा करते हैं.10 दिवसीय गणेशोत्सव के दौरान पंडालों और घरों में बप्पा की विधिवत आराधना करते हैं, उनके प्रिय भोग लगाते हैं और फिर अंनत चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से उनका विसर्जन करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी पर ही क्यों होता है?इस साल अनंत चतुर्दशी 6 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी और इसी दिन गणेश उत्सव का समापन हो जाएगा. गणेश उत्सव में भक्त 3, 5, 7 और 10 दिनों के लिए बप्पा को घर लाते हैं. 10वें दिन का गणपति विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर ही होता है.अनंत चतुर्दशी पर ही गणेश उत्सव क्यों समाप्त होता है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा मिलती है. अनंत चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, गणेश जी ने लगातार 10 दिन तक महाभारत लिखा, जिससे उनके शरीर का तापमान बहुत बढ़ गया था.गणेश जी के शरीर के बढ़ते तापमान को कम करने के लिए महर्षि वेदव्यास ने उन्हें जल में डुबकी लगाने को कहा. और जिस दिन यह हुआ वह अनंत चतुर्दशी का दिन था. इसी वजह से अनंत चतुर्दशी के इस शुभ अवसर पर गणेश जी को शीतल करने की परंपरा के रूप में विसर्जन किया जाता है.तब से लेकर आज तक गणेश जी की 10 दिनों के लिए स्थापना की जाती है और फिर 11वें यानी अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा को विसर्जित किया जाता है. इसी दिन गणेश उत्सव समाप्त हो जाता है. इसके बाद पितृ पक्ष की शुरुआत हो जाती है.
- घर पर कोई शुभ कार्य हो या तीज-त्योहार, हिंदू परिवारों में घर के प्रवेश द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बांधकर लगाने की परंपरा सदियों पुरानी है। आम के पत्तों का तोरण सिर्फ उत्सव और शुभता का प्रतीक नहीं हैं बल्कि इनमें गहरा प्रतीकात्मक अर्थ भी छिपा हुआ है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि घर के बाहर मुख्य द्वार पर आम का तोरण लगाने से घर से नकारात्मकता दूर रहती है। लेकिन क्या आप जानते हैं, आम के पत्ते नकारात्मक ऊर्जा को सोखने के साथ सेहत जुड़े कई फायदे भी देते हैं। आइए जानते हैं कैसे।आम के पत्तों का तोरण घर के बाहर लगाने से मिलते हैं ये 5 फायदेवायु और पर्यावरण को शुद्ध रखते हैंआम के पत्तों से बने तोरण का सिर्फ धार्मिक परंपरा से ही जुड़ाव नहीं बल्कि वैज्ञानिक आधार भी है। आम के हरे पत्ते, तने सहित, तोड़ने के बाद भी कुछ समय तक प्रकाश संश्लेषण करते रहते हैं। यह पत्ते ऑक्सीजन छोड़ते हैं और हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। ये पत्ते फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया के माध्यम से वातावरण को शुद्ध करते हैं। दरवाजे पर तोरण के रूप में लटकाए गए पत्ते हवा में ताजगी भरकर घर के प्रवेश द्वार पर स्वच्छ वातावरण बनाए रखते हैं।एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुणआम के पत्तों में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण पाए जाते हैं। इनमें मौजूद प्राकृतिक रासायनिक यौगिक, जैसे कि मैंगीफेरिन हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करने में मदद करते हैं। आम के पत्तों को तोरण के रूप में दरवाजे पर जब लटकाया जाता है, तो ये हवा में मौजूद रोगाणुओं को कम करने में मदद करते हैं, जिससे घर में प्रवेश करने वाली हवा स्वच्छ और सुरक्षित बनी रहती है।सकारात्मक ऊर्जा और तनाव से राहतआम के पत्तों का हरा रंग मानसिक शांति और सकारात्मकता को बढ़ावा देता है। वैज्ञानिक रूप से, हरा रंग आंखों को सुकून देकर तनाव कम करने में मदद करता है।कीड़ों को दूर भगाएंआम के पत्तों में जीवाणुरोधी, रोगाणुरोधी और कीट-विकर्षक गुण होते हैं। लोग आमतौर पर मक्खियों, मच्छरों और अन्य कीड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए इन्हें दरवाजे पर लटकाते हैं। बता दें, आम के पत्तों में एल्कलॉइड, सैपोनिन और फ्लेवोनोइड जैसे यौगिक होते हैं, जो विभिन्न हानिकारक जीवाणुओं के विकास को रोकते हैं।पर्यावरण के लिए सुरक्षितआम के पत्ते प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल होने की वजह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। प्लास्टिक या कृत्रिम सजावटी सामग्री की तुलना में आम के पत्तों का उपयोग पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल है।
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--पंडित प्रकाश उपाध्याय
सितंबर 2025 में साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लगेगा, जो भारत में भी दिखाई देगा। यह एक पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा । खगोलविद इसे ‘ब्लड मून’ (रक्त चंद्रमा) कहते हैं, क्योंकि इस दौरान चंद्रमा का रंग लाल दिखाई देता है। हालांकि, इस चंद्र ग्रहण की तारीख को लेकर लोग भ्रमित हैं, क्योंकि कुछ लोग इसे 7 सितंबर और कुछ 8 सितंबर को बता रहे हैं। आइए जानते हैं सही तारीख और समय के बारे में।चंद्र ग्रहण 2025: समय और तारीखतारीख: 7 सितंबर 2025समय: यह चंद्र ग्रहण रात 9:58 बजे से शुरू होगा और सुबह 1:26 बजे तक रहेगा। इसका कुल समय 3 घंटे 28 मिनट का होगा।सूतक काल का समय:चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले शुरू होता है, यानी यह 7 सितंबर को दोपहर 12:57 बजे से प्रारंभ होगा।कब और कहां देखा जाएगा चंद्र ग्रहण:यह चंद्र ग्रहण भारत के अलावा एशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका, फिजी और अंटार्कटिका के कुछ हिस्सों में भी दिखाई देगा।चंद्र ग्रहण और सूतक काल में क्या न करें:धार्मिक कार्य: चंद्र ग्रहण और सूतक काल के दौरान मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। पूजा और धार्मिक अनुष्ठान नहीं किए जाते।सावधानी: गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को घर से बाहर जाने से बचना चाहिए। गर्भवती महिलाओं को नुकीले औजारों का प्रयोग, सब्जी काटना, खाना पकाना, और तवे- कड़ाही पर छोंकने से बचना चाहिए।पितृपक्ष और चंद्र ग्रहण:यह चंद्र ग्रहण भाद्रपद मास की पूर्णिमा को लगेगा, जो पितृपक्ष की शुरुआत का संकेत है। 7 सितंबर को ही पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। ज्योतिषी सलाह देते हैं कि पितृपक्ष से जुड़े रिवाज और श्राद्ध कर्म सूतक काल शुरू होने से पहले ही कर लिए जाएं।चंद्र ग्रहण का वैज्ञानिक कारण:जब पृथ्वी अपनी कक्षा में घूमते हुए सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, तो सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाती, और चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ जाती है, जिससे चंद्रमा लाल या काले रंग में दिखाई देता है। इसे चंद्र ग्रहण कहा जाता है। - हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का खूब महत्व है। पूजा में कई चीजें लगती हैं जैसे- कुमकुम, अक्षत, गंगाजल और फूल। वहीं कपूर और लौंग भी जरूरी है। धार्मिक मान्यता है कि घर में नियमित रूप से कपूर जलाने से नेगेटिव एनर्जी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। इसी के साथ घर में सुख-शांति बनी रहती है। सनातन धर्म में कपूर और लौंग को एक साथ जलाने की परंपरा काफी पुरानी है। कई लोग घरों में इसे इसलिए जलाते हैं ताकि कोई बुरी नजर हो तो वो टल जाए लेकिन क्या आपको इसे जलाने का सही समय पता है? नीचे जानें लौंग और कपूर को जलाने के सही समय के बारे में…कब जलाएं लौंग और कपूर?अगर आप अपने मन से कभी भी लौंग और कपूर जलाने लगते हैं तो आपको इसका सही समय पता होना चाहिए। मान्यता है कि शाम के समय घर में पूजा के बाद लौंग और कपूर जलाकर उसका धुंआ पूरे घर में दिखा देना चाहिए। इससे घर और घर के लोगों को लगने वाली हर बुरी नजर टल जाती है। वहीं पैसों की कभी भी कोई कमी नहीं होती है। कपूर और लौंग को जलाने के बाद दिए को कुछ देर के लिए घर के एक कोने में रख देना चाहिए।लौंग से कर सकते हैं आरतीआरती के दिए में लौंग डालना भी काफी शुभ होता है। इसके खूब लाभ मिलते हैं। अगर ये आरती सुबह की जाती है तो घर का हर एक कोना शुद्ध हो जाता है। हर ओर सिर्फ पॉजिटिव एनर्जी का ही एहसास होता है। यही आरती घर में अगर शाम को की जाए तो इससे सभी लोग हर तरह के रोग से दूर रहते हैं। ज्योतिष शास्त्र के हिसाब से आरती के लिए लौंग की 6 से 8 कलियां ही काफी हैं। कई लोगों ने गणेश चतुर्थी के अवसर पर घर में बप्पा की मूर्ति की स्थापना की है। ऐसे में उनके भोग में पान के पत्ते के साथ लौंग, ,सुपारी और इलायची का रखना काफी शुभ माना जाता है। इस उपाय को विसर्जन के पहले कभी भी कर लेना बेहतर होगा। इस उपाय की वजह सारे बिगड़े हुए काम बनने लगेंगे।
- भगवान गणेश की पूजा और उत्सव का दिन गणेश उत्सव पूरे धूमधाम से भारतभर में मनाया जाता है। इसके साथ ही लोग घरों में, मंदिरों में पूरे दस दिन के लिए भगवान की प्रतिमा की स्थापना करते हैं और उनकी विशेष पूजा इन दस दिनों में की जाती है। वैसे तो भारत में गणपति देव की महिमा वाले कई सारे मंदिर बने हैं और इन मंदिरों पर भक्तों की गहरी श्रद्धा और आस्था है। लेकिन केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भगवान गणेश को विशेष देवता के रूप में पूजा जाता है और इन देशों में सुंदर मंदिर की स्थापना की गई है। थाइलैंड से लेकर सेशेल जैसे देशों में भगवान के ये सुंदर मंदिर बनाए गए हैं जहां गणेश भक्त इनकी पूजा करते हैं।गणेश देवस्थान, थाईलैंडथाईलैंड में भगवान गणपति की पूजा के लिए विशाल मूर्तियों से सजे मंदिर की स्थापना की गई है। जिसे गणेश देवस्थान के नाम से जाना जाता है। ये मंदिर बैंकॉक में बना है और यहां भक्त दर्शन के लिए जरूर जाते हैं।श्री महामरियम्मन टेंपलमलेशिया के क्वालालांपुर में साउथ इंडियन आर्किटेक्ट से प्रभावित होकर भव्य गणेश टेंपल स्थापित किया गया है। जिसे महामरियम्मन टेंपल के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में मलेशिया में रहने वाले इंडियन दर्शन के लिए जाते हैंसूर्यबिनायक टेंपलनेपाल के भक्तपुर में सूर्यबिनायक नाम से भगवान गणेश का मंदिर बना है। जो भक्तों के साथ ही टूरिस्ट लोगों का भी अट्रैक्शन है। नेपाल में लोग भगवान गणेश को सिद्धदाता और संकटमोचन के रूप में पूजते हैं और उन्हें मुश्किल परिस्थितियों से बचने वाले देवता के रूप में जाना जाता है।अरुलमिहू नवसक्ति विनायगर टेंपलसेशेल्स जैसे छोटे से सुंदर देश में भी भगवान गणेश मंदिर है। वैसे इस देश में ये एकमात्र हिंदू मंदिर है। जो साउथ इंडिया के मंदिरों के आर्किटेक्ट से इंस्पायर होकर बनाया गया है। ये मंदिर सेशेल्स की राजधानी विक्टोरिया में बना हुआ है।सबसे बड़े गणेश टेंपल में से एक है नीदरलैंड का ये मंदिरनीदरलैंड के डेनहेल्डर शहर में श्री वरथराज सेल्वाविनयगर मंदिर भगवान गणेश जी का मंदिर है। ये नीदरलैंड के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और इस मंदिर की गिनती दुनिया के कुछ सबसे बड़े मंदिरों में की जाती है।
- गणेश उत्सव की शुरुआत हो चुकी है। अब पूरे 11 दिनों तक यह उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। इस समय पूरे देश में हर जगह 'गणपति बप्पा मोरया' का ही नाम गूंज रहा है। लोग अपने-अपने घरों और पंडालों में गणेश जी की प्रतिमाएं स्थापित कर पूरे भक्ति-भाव से उनकी पूजा कर रहे हैं। ढोल-ताशों की आवाज से माहौल गूंज रहा है और श्रद्धालु खुशी-खुशी गणपति बप्पा का स्वागत कर रहे हैं। इस पावन अवसर पर हर कोई गणेश जी से अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि प्रदान करने की प्रार्थना कर रहा है। गणेश जी का हर रूप, हर प्रतीक हमें जीवन के गहरे संदेश सिखाता है। आइए इस गणेश चतुर्थी पर जानते हैं गणपति बप्पा से जुड़े 5 खास तथ्य, जिनका महत्व बहुत ही गहरा है।शिव और पार्वती के पुत्र हैं विघ्नहर्ता गणेशभगवान गणेश भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं। उन्हें धरती पर प्रथम देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी नए कार्य की शुरुआत करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। किसी भी पूजा या अनुष्ठान में भी सबसे पहले गणेश जी का ही स्मरण किया जाताहै। गणेश जी को 'विघ्नहर्ता' और 'सिद्धि विनायक' के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले यदि गणेश जी की पूजा की जाती है तो इससे आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं और कार्य सफल होता है।गणेश जी के हाथी वाले सिर में छिपा है खास संदेशगणेश जी का हाथी जैसे सिर के पीछे एक गहरा संदेश छिपा हुआ है। उनका बड़ा सिर और कान हमें जीवन की एक बड़ी सीख देते हैं। इसका अर्थ है कि इंसान को किसी भी चीज को बुद्धिमानी और धैर्य से सुनना चाहिए। वहीं उनके छोटे नेत्र यह बता रहे हैं कि जीवन में ध्यान और एकाग्रता कितनी जरूरी है। इस अनोखे रूप के माध्यम से गणेश जी हमें सिखाते हैं कि धैर्य और ज्ञान से ही जीवन की कठिनाइयों को आसान किया जा सकता है।बुद्धि और ज्ञान के देवता है श्री गणेश जीगणेश जी केवल विघ्नहर्ता ही नहीं बल्कि ज्ञान के देवता भी माने जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इन्होंने महाभारत जैसे महान ग्रंथ का लेखन किया था। जब महर्षि वेदव्यास महाभारत की रचना सुना रहे थे, तब गणेश जी उसे लिख रहे थे। इस घटना से यह साफ है कि गणेश जी ना केवल शक्ति बल्कि ज्ञान और बुद्धि के भी प्रतीक हैं। इसलिए जो श्रद्धालु सच्चे मन से गणेश जी की पूजा और अर्चना करते हैं, उनका ज्ञान, बुद्धि और विवेक बढ़ता है।गणेश जी के पेट का महत्वआपने देखा होगा कि गणेश जी का पेट काफी बड़ा है। दरअसल गणेश जी का बड़ा पेट भी एक खास संदेश देता है। ये हमें बताता है कि जीवन में आने वाले अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों को हमें धैर्य और समझ के साथ स्वीकार करना चाहिए। गणेश जी बड़ा पेट संतुलन और सहनशीलता का प्रतीक है। यह हमें ये सिखाता है कि कठिन समय में भी हमें संयम बनाए रखना चाहिए।दांत से मिलती है ये सीखगणेश जी की प्रतिमा को अक्सर एक टूटे हुए दांत के साथ दिखाया जाता है। दरअसल इनका टूटा हुआ दांत त्याग और धैर्य का प्रतीक है। इसके पीछे की कथा के अनुसार जब गणेश जी महाभारत लिख रहे थे, उस दौरान उनकी कलम टूट गई थी तब उन्होंने अपने एक दांत को ही कलम बना लिया और बिना रुके लिखना जारी रखा। इस बात से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची लगन और दृढ़ निश्चय से राह में आने वाली हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।
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भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि जगत की देवी राधा रानी को समर्पित है। इस शुभ अवसर पर श्रीजी की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। सनातन शास्त्रों में निहित है कि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर राधा रानी अवतरित हुई थीं। इसके लिए हर साल भाद्रपद महीने में राधा अष्टमी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राधा रानी के महज नाम जप से व्यक्ति विशेष का उद्धार हो जाता है। वह पुण्यकाल भागी बन जाता है। इसके लिए साधक श्रद्धा भाव से राधा अष्टमी के दिन श्रीजी और कृष्ण कन्हैया की पूजा करते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 30 अगस्त को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी। वहीं 31 अगस्त को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर अष्टमी तिथि का समापन होगा। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए राधा अष्टमी का त्योहार 31 अगस्त को मनाया जाएगा।
राधा अष्टमी पर कई शुभ संयोग- राधा अष्टमी पर सिंह राशि में बुध और सूर्य ग्रह के होने से बुधादित्य योग बनेगा। साथ ही सिंह राशि में केतु, सूर्य और बुध के होने से त्रिग्रही योग का भी निर्माण भी हो रहा है।इस विधि से करें पूजा- प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद मंडप के नीचे मंडल बनाकर उसके मध्यभाग में मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करें। कलश पर तांबे का पात्र रखें। अब इस पात्र पर वस्त्राभूषण से सुसज्जित राधाजी की सोने (संभव हो तो) की मूर्ति स्थापित करें।तत्पश्चात राधाजी का षोडशोपचार से पूजन करें। ध्यान रहे कि पूजा का समय ठीक मध्याह्न का होना चाहिए। पूजन पश्चात पूरा उपवास करें अथवा एक समय भोजन करें। दूसरे दिन श्रद्धानुसार सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणों को भोजन कराएं व उन्हें दक्षिणा दें।राधा अष्टमी का विशेष महत्व होता है-जन्माष्टमी की तरह राधाष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं संतान सुख और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार जो लोग राधा रानी जी को प्रसन्न कर लेते हैं। उनसे भगवान श्री कृष्णा अपने आप प्रसन्न हो जाते हैं। कहा जाता है कि व्रत करने से घर में मां लक्ष्मी आती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। राधा रानी के बिना भगवान श्री कृष्ण की पूजा भी अधूरी मानी जाती है। इसलिए राधा अष्टमी का त्यौहार भी कृष्ण जन्माष्टमी की तरह बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। - हमारे घरों में अक्सर आपने बुजुर्गों को ये कहते सुना होगा कि थाली में कभी तीन रोटियां नहीं परोसनी चाहिए. मां अगर अपने बच्चों को थाली में तीन (3 Rotis In Thali) रोटियां लेते देख ले तो तुरंत हाथ झटक देती हैं और कहती हैं कि तीन नहीं लेते दो या चार ले लो. सिर्फ रोटियां ही नहीं बल्कि परांठे (Parathe Banane Ki Recipe), पूड़ी या चीला जैसी कोई भी चीज हो. उसे तीन की संख्या में एक साथ परोसने से मना किया जाता है. ये देखने वाले के मन में ये सवाल जरूर उठता होगा कि ऐसा क्यों. क्या ये कोई पुरानी रवायत है या फिर इसके पीछे कोई लॉजिक है.ज्योतिष और धार्मिक मान्यता क्या कहती है?अंक ज्योतिष के हिसाब से तीन का अंक धार्मिक कार्यों के लिहाज से अच्छा नहीं माना जाता. माना जाता है कि तीन का संबंध कुछ नकारात्मक ऊर्जा से होता है, इसलिए पूजा-पाठ या रोजमर्रा की जिंदगी में इससे दूरी बनाना ही ठीक होता है.एक और बड़ी मान्यता ये है कि जब किसी मृतक के नाम से भोजन की थाली लगाई जाती है. तो उसमें तीन रोटियां रखी जाती हैं. इसी वजह से लोग मानते हैं कि किसी जिंदा इंसान की थाली में तीन रोटियां परोसना अशुभ होता है. शायद इसीलिए बहुत से परिवारों में भले ही आप दो या चार रोटियां खा लें. लेकिन तीन कभी नहीं दी जातीं.सेहत से जुड़ा पहलूकुछ लोगों का ये भी मानना है कि तीन रोटियां एक साथ खाना सेहत के लिए ठीक नहीं होता. हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बैलेंस्ड डाइट के हिसाब से एक इंसान के लिए दो रोटियां, एक कटोरी दाल, थोड़े चावल और सब्जी काफी होती है. इससे न सिर्फ पेट भरता है बल्कि शरीर का वजन भी कंट्रोल में रहता है. ऐसे में तीन रोटियों को छोड़ना एक हेल्दी आदत भी मानी जा सकती है.और भी हैं खाने से जुड़ी मान्यताएंभारतीय संस्कृति में खाने-पीने को लेकर कई मान्यताएं हैं. जैसे रात को दही नहीं खाना चाहिए, खाना बनाते वक्त चुटकी से नमक डालना चाहिए या खाने के बाद मीठा जरूर खाना चाहिए. ये सारी बातें हमने अपने बड़ों से सीखी हैं और अक्सर बिना सवाल किए मानते आ रहे हैं.क्या इन बातों में सच्चाई है?अब ये सोचने वाली बात है कि क्या इन सभी मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार है? सच तो ये है कि थाली में तीन रोटियां नहीं परोसना जैसी बातों का कोई ठोस वैज्ञानिक कारण नहीं है. इन्हें फॉलो सिर्फ इसलिए किया जाता है क्योंकि ये एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन में चली आ रही हैं. और, निभाई भी जा रही हैं. इसलिए भी लोग एक साथ तीन रोटी सर्व करने से या खाने से बचते हैं.
- भाद्रपदके शुक्लपक्ष की चतुर्थी को व्रत करने वाला शिवलोक को प्राप्त करता है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का पूजन करके मनुष्य सभी मनोकामनाओं को प्राप्त कर लेता है। चतुर्थी तिथि तीन प्रकार की होती है-शिवा, शान्ता और सुखा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का नाम शिवा है। इस साल गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जा रही है। इस दिन जो स्नान, दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता है, वह गणपति के प्रसाद से सौ गुना हो जाता है। इस दिन पूजा करते समय आगच्छोल्काय कहकर गणेशजी का आवाहन करें । इस प्रकार गन्धादि उपचारों एवं लड्डुओं से गणपति का पूजन करें। तदनन्तर निम्नलिखित गणेश गायत्री मंत्र का जप करें।ॐ महोलकाय विद्दाहे वक्रतुण्डायधीमहि।तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥गणेश गायत्री मंत्र का जप करें। इस मंत्र का अर्थ है कि हम उस विशाल शरीर वाले भगवान गणेश का ध्यान करते हैं, जिनकी सूंड वक्र या मुड़ी हुई है, और वह दंतधारी हमें बुद्धि से प्रकाशित करते हैं। कहते हैं कि गणेश जी के इस मंत्र से पूजा करने से भगवान गणेश की सभी पर कृुा रहती है।गणेश चतुर्थी पर किस चीज का दान करना चाहिएपुराणों में लिखा है किइस दिन जो दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता है, वह गणपति के कई सौ गुना हो जाता है। इस चतुर्थी को गुड़, लवण ओर घी का दान करना चाहिए। यह शुभकर माना गया है और गुड़ के मालपूआ से ब्राह्यणों को भोजन कराना चाहिए । पति की कामना करने वाली कन्या विशेष रूप से इस चतुर्थी का व्रत करें और गणेशजी की पूजा करें।गणेश चतुर्थी मुहूर्तब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 28 मिनट से 05 बजकर 12 मिनट तकविजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 31 मिनट से 03 बजकर 22 मिनट तकगोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 48 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तकइस दिन निशिता मुहूर्त रात 12 बजे 12 बजकर 45 मिनट तक
- गणेश जी की मूर्ति को गलत दिशा में रखना पूजा के फल को कम करता है। वास्तु के अनुसार, मूर्ति को उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में रखें। दक्षिण दिशा में मूर्ति रखने से बचें, क्योंकि यह अशुभ माना जाता है। सही दिशा से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।टूटी या खंडित मूर्ति की पूजा ना करेंगणेश चतुर्थी पर टूटी या खंडित मूर्ति की पूजा करना अशुभ माना जाता है। ऐसी मूर्ति नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है। हमेशा सही आकार और सुंदर मूर्ति चुनें। पूजा से पहले मूर्ति की जांच करें और सुनिश्चित करें कि वह पूरी तरह ठीक हो।चंद्र दर्शन से बचेंगणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखना वर्जित है, क्योंकि इससे मिथ्या दोष लगता है। पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रमा ने गणेश जी का मजाक उड़ाया था, जिसके कारण यह नियम बना। यदि गलती से चंद्रमा दिख जाए, तो 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जप करें।गलत प्रसाद का भोगगणेश जी को तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली या लहसुन-प्याज युक्त भोजन का भोग ना लगाएं। गणपति को मोदक, लड्डू और फल प्रिय हैं। तुलसी पत्र का उपयोग भी न करें, क्योंकि यह गणेश जी को नहीं चढ़ाया जाता। सात्विक भोग से पूजा का फल बढ़ता है।साफ-सफाई नजरअंदाज ना करेंगणेश चतुर्थी पर पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। गंदा या अव्यवस्थित पूजा स्थान नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। मूर्ति स्थापना से पहले स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। फूल, दीपक और धूपबत्ती सही ढंग से सजाएं ताकि पूजा का प्रभाव बढ़े।शयनकक्ष में मूर्ति ना रखेंगणेश जी की मूर्ति को शयनकक्ष में रखना वास्तु दोष उत्पन्न करता है। इससे मानसिक तनाव और अशांति हो सकती है। मूर्ति को पूजा घर, ड्रॉइंग रूम या मुख्य द्वार के पास स्थापित करें। यह स्थान सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है और पूजा का शुभ फल देता है। शयनकक्ष में पूजा सामग्री रखने से बचें।गलत समय पर पूजा ना करेंगणेश चतुर्थी पर पूजा और मूर्ति स्थापना शुभ मुहूर्त में करें। सुबह का समय या पंचांग के अनुसार निर्धारित समय सबसे उत्तम है। रात में मूर्ति स्थापना या पूजा करने से बचें, क्योंकि यह अशुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त में पूजा करने से गणपति की कृपा और कार्यों में सफलता मिलती है।सम्मान के साथ करें विसर्जनगणेश चतुर्थी के बाद मूर्ति का विसर्जन सम्मानपूर्वक करें। मूर्ति को गंदे पानी या कूड़ेदान में न फेंकें। इसे नदी या समुद्र में प्रवाहित करें या मंदिर में सौंप दें। विसर्जन के समय 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जप करें। सम्मानजनक विसर्जन से पूजा का पूरा फल मिलता है।
- हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का त्योहार का बड़ा महत्व है। यह पर्व विघ्नहर्ता भगवान गणेश के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। किसी भी धार्मिक या शुभ कार्य में सबसे पहले गणपति जी की पूजा करने का विधान है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं और श्रद्धा भाव के साथ दस दिनों तक धूमधाम से उत्सव मनाते हैं। यदि आप पहली बार घर में गणेश जी की स्थापना करने जा रहे हैं, इसके लिए तो कुछ आवश्यक नियमों के बारे में जानना जरूरी है।गणेश चतुर्थी 2025 की तिथिदृक पंचांग के अनुसार इस वर्ष भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट से आरंभ होगी और 27 अगस्त को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त को मनाया जाएगा और इसी दिन गणपति की स्थापना की जाएगी।गणेश जी की प्रतिमाघर में गणेश भगवान की स्थापना के लिए हमेशा ऐसी मूर्ति चुनें, जिसमें भगवान गणेश की सूंड बाईं ओर झुकी हो। इसे अत्यंत शुभ माना गया है।गणपति जी की बैठी हुई प्रतिमा को घर लाना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इससे सुख और समृद्धि का वास होता है।मूर्ति का चेहरा प्रसन्न और हंसमुख होना चाहिए। साथ ही यह भी देखें कि उनके एक हाथ में आशीर्वाद की मुद्रा हो और दूसरे हाथ में मोदक होना चाहिए।गणपति स्थापना की विधिगणपति स्थापना के लिए प्रतिमा को हमेशा ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में ही रखें। ध्यान रहे उनका मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।मूर्ति को चौकी पर रखने से पहले चौकी को अच्छी तरह से साफ करें और गंगाजल से पवित्र करें।प्रतिमा के पास रिद्धि-सिद्धि का स्थान अवश्य दें। अगर मूर्तियां उपलब्ध न हों, तो उनकी जगह आप सुपारी रख सकते हैं।गणेश जी की दाईं ओर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। इसके बाद फूल और अक्षत हाथ में लेकर गणपति बप्पा का ध्यान करें।



























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