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 आत्मनिर्भर दलहन मिशन योजना"  :  किसानों के बीच उन्नत गुणवत्ता वाले बीजों का वितरण

 महासमुंद।  कृषि विज्ञान केन्द्र, महासमुंद द्वारा "आत्मनिर्भर दलहन मिशन योजना" अंतर्गत खरीफ 2026 में जिले के किसानों के बीच उन्नत गुणवत्ता वाले दलहन एवं तिलहन बीजों का वितरण तथा वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जिले में दलहन एवं तिलहन फसलों के क्षेत्रफल एवं उत्पादकता में वृद्धि करना, धान आधारित फसल प्रणाली में विविधीकरण को बढ़ावा देना, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है।कार्यक्रम के अंतर्गत 50 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए अरहर, 25 हेक्टेयर के लिए उड़द तथा 20 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए मूंगफली की उन्नत किस्मों का वितरण किया गया। साराईपाली विकासखंड के ग्राम सालडीह, देवाभाठा, खिसड़ी एवं मानकी में किसानों को सीजी अरहर-2 तथा ग्राम राजाडीह में आईपीयू-13-1 उड़द के प्रमाणित बीज वितरित किए गए। वहीं बसना विकासखंड के ग्राम मिलाराबाद सहित महासमुंद विकासखंड के चयनित गांवों में भी किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराकर तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को वैज्ञानिक खेती की नवीनतम तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण बीज, जैव उर्वरकों, संतुलित पोषण, मृदा परीक्षण, जल संरक्षण, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा मौसम आधारित कृषि सलाह की जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने बीजोपचार, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, जैव उर्वरकों के उपयोग, जल संरक्षण तथा समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाने पर बल दिया।
विषय वस्तु विशेषज्ञ (कृषि सस्य विज्ञान) डॉ. मुकेश कुमार पाण्डेय ने कहा कि महासमुंद जिले की कृषि मुख्यतः धान आधारित होने से मिट्टी में नाइट्रोजन एवं जैविक कार्बन की मात्रा लगातार घट रही है। उन्होंने किसानों से धान के साथ दलहनी फसलों को अपनाने की अपील करते हुए बताया कि दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं। उन्होंने बुवाई से पूर्व ट्राइकोडर्मा, राइजोबियम एवं पीएसबी से बीजोपचार करने की सलाह दी। विषय वस्तु विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. कुनाल चंद्राकर ने मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन अपनाने पर जोर देते हुए संतुलित पोषण, सल्फर, जिंक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के महत्व की जानकारी दी। वहीं डॉ. समस्थ बघेल ने प्रमाणित एवं उन्नत बीजों के उपयोग को अधिक उत्पादन का आधार बताया। डॉ. शिल्पा लाकड़ा ने किसानों को एफपीओ एवं कृषि विभाग की योजनाओं से जुड़ने तथा नियमित प्रशिक्षण में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। डॉ. रविश केशरी ने वर्षा जल संरक्षण, खेत में नमी संरक्षण एवं जल निकास व्यवस्था पर किसानों को तकनीकी जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने बताया कि अरहर, उड़द एवं मूंगफली जैसी फसलें जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में भी बेहतर विकल्प हैं। इनकी खेती से फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है, मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है तथा किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलता है। 
कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने किसानों से धान आधारित एकल खेती के स्थान पर दलहन एवं तिलहन आधारित फसल प्रणाली अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि इससे उत्पादन लागत में कमी आएगी, मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होगा, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा तथा किसानों की आय में स्थायी वृद्धि होगी। कार्यक्रम में शामिल किसानों ने कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा उपलब्ध कराए गए उन्नत बीज, वैज्ञानिक प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन की सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि इन तकनीकों को अपनाकर वे अधिक उत्पादन एवं बेहतर आय प्राप्त कर सकेंगे। कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा आगामी खरीफ एवं रबी मौसम में भी जिले के विभिन्न गांवों में वैज्ञानिक प्रशिक्षण, अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन, फसल निरीक्षण एवं तकनीकी परामर्श कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जाएंगे।
 

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