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 नैनो डीएपी में बढ़ा विश्वास, घटी लागत और बढ़ी उम्मीद: किसान इंद्रभान सिंह कंवर

 रायपुर।  मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले ग्राम मैनपुर के प्रगतिशील किसान इंद्रभान सिंह कंवर, पिता श्री ललन सिंह कंवर वर्षों से खेती-किसानी कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। हर किसान की तरह उनकी भी यही इच्छा थी कि कम लागत में अधिक उत्पादन मिले, मिट्टी की उर्वरता बनी रहे और खेती पहले से अधिक लाभकारी बन सके। लगातार बढ़ती खेती की लागत और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में कृषि विभाग और सहकारी समिति के मार्गदर्शन में उन्होंने इफको नैनो डीएपी के बारे में जानकारी प्राप्त की और इसे अपनी खेती में अपनाने का निर्णय लिया।
 शुरुआत में उनके मन में भी कई तरह की शंकाएं थीं। उन्हें लगता था कि पारंपरिक डीएपी की जगह इतनी कम मात्रा में उपयोग होने वाला नैनो डीएपी क्या वास्तव में उतना ही प्रभावी होगा। लेकिन कृषि विशेषज्ञों ने उन्हें इसकी विशेषताओं, उपयोग की विधि और लाभों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नैनो डीएपी पौधों द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाता है, जिससे पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है और फसल का विकास अधिक प्रभावी ढंग से होता है। इसी विश्वास के साथ उन्होंने खरीफ सीजन में अपनी धान की फसल में नैनो डीएपी का उपयोग किया।
  फसल बढ़ने के साथ ही उन्हें सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे। पौधों की बढ़वार पहले की तुलना में अधिक समान और स्वस्थ दिखाई दी। खेत में हरियाली बनी रही तथा पौधों की वृद्धि संतुलित रही। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उन्हें महसूस हुआ कि नई तकनीक वास्तव में खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
 इंद्रभान सिंह कंवर बताते हैं कि नैनो डीएपी के उपयोग से उन्हें उर्वरक के बेहतर उपयोग का लाभ मिला। कम मात्रा में उत्पाद का उपयोग होने से परिवहन और भंडारण भी आसान रहा। खेती की लागत को नियंत्रित करने में सहायता मिली और फसल की गुणवत्ता में भी सकारात्मक सुधार देखने को मिला। उनका मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार नैनो डीएपी का उपयोग करें तो बेहतर उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। वे बताते हैं कि पहले जहां पारंपरिक उर्वरकों पर अधिक खर्च करना पड़ता था, वहीं अब आधुनिक तकनीक आधारित उर्वरकों के उपयोग से खेती अधिक व्यवस्थित और सुविधाजनक होती जा रही है। 

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