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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सिद्ध योगी और समाज परिवर्तन के अग्रदूत पं. ज्वाला प्रसाद शर्मा...

-स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सिद्ध योगी और युगपुरुष पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि 
-लेखक-प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार) 
16 जुलाई का दिन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव, स्मरण और प्रेरणा का दिन है। आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, अखिल भारतीय गायत्री परिवार के सिद्ध योगी एवं समाज चेतना के प्रखर संवाहक पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती है। यदि वे आज हमारे बीच होते, तो उनका 100वाँ जन्मदिन पूरे प्रदेश में बड़े उत्साह, श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जो भी एक बार उनके संपर्क में आता, वह जीवन भर उनका सम्मान करता और उनके स्नेह का मुरीद हो जाता।  उनकी कर्मभूमि महासमुंद ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ उनके कार्यों का साक्षी है। अखिल भारतीय गायत्री परिवार के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से महासमुंद सहित पूरे प्रदेश में आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ऐसी अलख जगाई, जिसकी ज्योति आज भी असंख्य लोगों के जीवन को आलोकित कर रही है।  मेरा उनसे केवल पारिवारिक रिश्ता नहीं था। वे मेरे बड़े पिताश्री थे, जिन्हें हम सभी स्नेहपूर्वक बड़ा जी कहकर पुकारते थे। बचपन से ही मुझे हमेशा यह अनुभव हुआ कि हमारा संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि संस्कारों, श्रद्धा और आत्मीयता का था। मेरा पैतृक गांव टेकारी (जिला रायपुर) उनकी जन्मभूमि थी, इसलिए इस गाँव से उनका विशेष लगाव था।  यह मेरा सौभाग्य रहा कि उनके सान्निध्य में मुझे अपने पैतृक गाँव टेकारी में तीन बार माँ गायत्री महायज्ञ आयोजित कराने का अवसर मिला। आयोजन की जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि उनके मार्गदर्शन में कोई बाधा नहीं आएगी। 25 गाँवों से हजारों श्रद्धालु तीन दिनों तक इस महायज्ञ में शामिल हुए। बड़ा जी के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से सभी लोगों ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ इतनी सहजता और समर्पण के साथ निभाईं कि पूरा आयोजन बिना किसी विघ्न के सफलतापूर्वक संपन्न हो गया।  आज उस घटना को लगभग 24 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि इतना विशाल आयोजन कितनी सहजता, अनुशासन और सामूहिक सहयोग से सम्पन्न हुआ। मुझे संतोष है कि मैं अपने बड़ा जी की अपने पैतृक गाँव में गायत्री महायज्ञ कराने की इच्छा पूरी करने का माध्यम बन सका। साथ ही मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि यदि उनका आशीर्वाद, आत्मबल और अटूट विश्वास साथ न होता, तो यह कार्य संभव नहीं हो पाता।  पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जी केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के भी सच्चे योद्धा थे। उन्होंने दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामूहिक एवं दहेज-मुक्त विवाह की अभिनव परंपरा की शुरुआत की। समाज में समानता, भाईचारे और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने सभी जातियों और वर्गों को साथ लेकर सामूहिक विवाह सम्मेलनों का आयोजन कराया। उनके द्वारा बोए गए समाज सुधार के बीज आज छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह जैसी योजनाओं के रूप में फलते-फूलते दिखाई देते हैं।  पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अत्यंत प्रिय शिष्यों में से एक थे। शांतिकुंज, हरिद्वार की युगनिर्माण विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और विश्वबंधुत्व के लिए समर्पित कर दिया। उनके अथक प्रयासों और छत्तीसगढ़ में विचार-क्रांति के संकल्प के परिणामस्वरूप युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का तीन बार महासमुंद आगमन हुआ।  पहली बार 8 जनवरी 1969 को आचार्य श्री महासमुंद पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास स्थित साधना कक्ष में अखंड ज्योति की स्थापना की, जो आज भी निरंतर प्रज्ज्वलित होकर उनकी साधना, तपस्या और आध्यात्मिक विरासत की साक्षी बनी हुई है। इसके बाद लगातार दो वर्षों तक आचार्य श्री का महासमुंद आगमन होता रहा। पाँच कुंडीय गायत्री महायज्ञ से प्रारंभ हुआ यह अभियान आगे चलकर 1008 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ के रूप में फलीभूत हुआ।  इन आयोजनों की ख्याति केवल महासमुंद तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ इसका साक्षी बना। दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु इन महायज्ञों में भाग लेने महासमुंद पहुँचे। उन दिनों युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का प्रवास राम मंदिर के समीप स्थित पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास पर ही होता था। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी। इसलिए मैं न तो आचार्य श्री की महानता को पूरी तरह समझ पाता था और न ही बड़ा जी के तेजस्वी व्यक्तित्व की गहराई को। फिर भी आज तक आचार्य श्री का स्नेहिल स्पर्श मेरी स्मृतियों में जीवंत है। उस वक्त पता ही नहीं चलता था कि कब उनके सान्निध्य में, उसी बिस्तर पर, उनकी छत्रछाया में रहता था। आज वे पल मेरी सबसे अनमोल धरोहर हैं।  जब भी पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा शांतिकुंज, हरिद्वार जाते थे, तब आचार्य श्री स्वयं उनका आत्मीय स्वागत करते थे। यह उनके प्रति आचार्य श्री के विशेष स्नेह, विश्वास और सम्मान का प्रमाण था। विश्वबंधुत्व, मानव कल्याण और  समाज निर्माण की दिशा में बड़ा जी ने जो कार्य किए, वे आज भी प्रेरणादायी और अनुकरणीय हैं।  इतना महान योगदान देने के बावजूद पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जीवनभर आत्मप्रचार से दूर रहे। वे साधना, सेवा और तप में ही रमे रहे। संभवत: यही कारण है कि उनकी तपोभूमि, उनके साधना कक्ष में आचार्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति और उनके सामाजिक-आध्यात्मिक योगदान का जितना व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका।  उनकी शताब्दी जयंती पर हम सबका दायित्व है कि उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाएं तथा उनके बताए सेवा, साधना और संस्कार के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  8 मार्च 2019 को उनका स्वर्गारोहण समाज और प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति थी। उनके निधन से एक ऐसा शून्य उत्पन्न हुआ, जिसकी भरपाई करना अत्यंत कठिन है।

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