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मजबूत न्याय व्यवस्था के लिए जनविश्वास और संवैधानिक अनुशासन जरूरी: उपराष्ट्रपति

 नई दिल्ली।  उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन् ने उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में ‘द वॉयस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स’ पुस्तक का विमोचन किया। प्रो. (डॉ.) एस. शिवकुमार द्वारा संपादित और कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (सीएलईए) के सहयोग से थॉमसन रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई के भाषणों, व्याख्यानों और विचारों का संकलन किया गया है। उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि यह पुस्तक अनुभव, संवैधानिक अनुशासन और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से परिपक्व न्यायिक सोच का प्रतिबिंब है। उन्होंने कहा कि यह संविधान, विधि के शासन, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है तथा संवैधानिक विमर्श और विधिक अध्ययन को नई मजबूती देगी।

 सी. पी. राधाकृष्णन् ने कहा कि भारतीय संविधान एक जीवंत और निरंतर विकसित होने वाला दस्तावेज है, जिसने पिछले 75 वर्षों में अधिकार और जवाबदेही, अधिकारों और कर्तव्यों तथा निरंतरता और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि संविधान लोकतांत्रिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता की आधारशिला बना हुआ है, जबकि संसद की संशोधन शक्ति उसे समय की जरूरतों के अनुरूप विकसित होने में सक्षम बनाती है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि न्यायपालिका की भूमिका संवैधानिक शासन व्यवस्था और विधि के शासन में नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में अधिकारों के साथ संयम भी उतना ही आवश्यक है। उनके अनुसार मजबूत संस्थाएं और न्याय व्यवस्था संस्थागत सत्यनिष्ठा, संवैधानिक अनुशासन, जनविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर ही कायम रहती हैं। उन्होंने कहा कि संवैधानिक शासन व्यवस्था को समाज की बदलती जरूरतों और नागरिकों की आकांक्षाओं के प्रति उत्तरदायी रहना चाहिए। वंचित समुदायों के सशक्तीकरण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, अवसर और आशा सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
 उपराष्ट्रपति ने न्यायमूर्ति बी.आर. गवई के योगदान की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी न्यायिक यात्रा संवैधानिक मूल्यों, संस्थागत संतुलन और सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने की अटूट प्रतिबद्धता का परिचायक है।
 अपने संबोधन के अंत में उपराष्ट्रपति ने विधि जगत से जुड़े लोगों से समय-समय पर गरीब और वंचित लोगों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की अपील की, ताकि न्याय सभी के लिए सुलभ बन सके।
 कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, सीएलईए के अध्यक्ष एवं पुस्तक के संपादक प्रो. (डॉ.) एस. शिवकुमार, थॉमसन रॉयटर्स के प्रकाशक गौरी शंकर नटेशन सहित विधि जगत की अनेक प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं।

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