शरद का चाँद
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
शुभ्र धवल एक फूल खिला है ,
अंबर के स्यामल पट में ।
प्रस्फुटित हो रहा माणिक ज्यों ,
अंतर्मन के पनघट में ।।
चंद्रिका के अभिनव शृंगार से ,
चंचल सिंधु चपल होता ।
चकोर तनिक न पलक झपकता ,
चंद्र मुख न छिन पल खोता ।
प्रेम सजा लेता है सपने ,
सदा के लिए हृद- पट में ।।
ज्योत्सना की झिलमिल रश्मियाँ ,
लहरों पर क्रीड़ा करतीं ।
कम्पित होता शशि मुख जल में ,
कभी निकली कभी छुपती ।
दुल्हन झाँक रही हो जैसे ,
झीने- झीने घूँघट में ।।
पीयूष बूँद झरे धरा पर ,
तृषा मिटे इन अधरों की ।
उन्मादित करती स्निग्ध किरण ,
प्रेम आँच उन नजरों की ।
चाँदनी आई है सँवर कर ,
स्नेहिल प्रेमिल मन- तट में ।।
रजत पुष्प शाखों पर खिलकर ,
नेह - निमंत्रण भेज रहे ।
मंद- मंद समीर कानों में ,
प्रिय के मन की बात कहे ।
श्री का सुरभित पाश बिछा है ,
भ्रमर घिरा अब संकट में ।।
आत्म - मुग्धा वह रूप प्रगल्भा ,
मान किए कुछ ऐंठी सी ।
दूर जा रही वह ज्योतिविभा ,
कोपभवन में बैठी सी ।
आकर्षित सब जीव चराचर ,
मस्ती छाई घट -घट में ।।
पूनम शरद धवल प्रभास ने ,
कहर प्रकृति पर यूँ ढाया ।
रंग-प्रीति में रँगे हुए सब ,
काम - रति की पड़ी छाया ।
मना रहे मधुमास सभी जन ,
मदहोशी के आहट में ।।








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