छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेल
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
भारत के मध्य भाग में स्थित छत्तीसगढ़ भौतिक संसाधनों, कृषि एवं वन-संपदा के साथ-साथ वैचारिक, बौद्धिक व सांस्कृतिक विशेषताओं से भी समृद्ध है। यहाँ के जनमानस में सादगी,सौम्यता, शांति और सद्भावना के दर्शन होते हैं। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पर्व, रीति-रिवाज, परंपराओं में मिट्टी की सोंधी महक है जो इत्र की तरह धीरे-धीरे देश-विदेश में फ़ैल कर अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। आइए जानते हैं छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेलों के बारे में जो लोक-संस्कृति का परिचय तो देते ही हैं, मनोरंजन के साथ-साथ पारस्परिक सहयोग, नेतृत्व, धैर्य , सामंजस्य इत्यादि विविध गुणों के विकास में भी अपना योगदान देते हैं।
1अटकन-बटकन :--
छत्तीसगढ़ी खेलों में अटकन-बटकन सर्वप्रिय सामूहिक खेल है जिसमें बच्चे बैठकर गोलाकार घेरा बनाते हैं और जमीन में अपने दोनों हाथों के पंजे रख देते हैं । एक खिलाड़ी गीत गाते हुए सर्वप्रथम अपने दाहिने हाथ की तर्जनी सबके पंजों पर बारी-बारी छुआता है , जहाँ गीत खत्म होता है वह अपनी हथेली पलट (सीधी ) देता है इसी क्रम में जब सबकी हथेली सीधी हो जाती है तो अंतिम बच्चा गीत को आगे बढ़ाता है। गीत है -
अटकने भटकन दही चटाकन, लउहा लाटा बन में काँटा।
तुहुर-तुहुर पानी गिरय, सावन म करेला फूटय।
चल-चल बेटी गंगा जाबो, गंगा ले गोदावरी।
पाका-पाका बेल खाबो, बेल के डार टूटगे।
भरे कटोरा फूटगे।।
शेष खिलाड़ी गाते हैं –अतल के रोटी पतल के धान, एकर लंगड़ी धर बुची कान ।
इस गीत के बाद वे एक-दूसरे के कान पकड़कर गीत गाते हैं- केऊ-मेऊ मेकरा के जाला, फूटगे कोहनी के आला और सभी खिलाड़ी पीछे की ओर गिर जाते हैं।
हँसी और मस्ती से भरे इस खेल में समरसता और समन्वय की धारा खिलखिलाती है।
2 फुगड़ी :- बालिकाओं द्वारा खेला जाने वाला यह एक लोकप्रिय खेल है। इसमें प्रतिभागियों की कोई निश्चित संख्या नहीं है, जितने लोग हों भाग ले सकते हैं। चार ,छः लड़कियाँ ऊँखरु बैठकर लचक के साथ पैर के पंजों को आगे-पीछे चलातीं हैं। थककर या साँस भरने पर जिसके पाँव रुके वह खेल से बाहर हो जाती है। सबसे अधिक समय तक बिना रुके फिसलने वाला ही विजेता होता है। यह खेल भी गीत के बोलों से आरंभ होता है जो निम्नानुसार है –
गोबर दे बछरु गोबर दे, चारों खूंटा लीपन दे।
अपन खाथे गूदा-गूदा, मोला देथे बीजा।
ए बीजा ला का करबो, रहि जाबो तीजा।
तीजा के बिहान दिन, सरि-सरि लुगरा।
हेर दे भौजी कपाट के खीला,
केंव-केंव नरियाही मंजूर के पीला ।।
पाके बुंदलिया राजा घर के पुतरी,
खेलन दे फुगरी, फुगरी के फुन -फुन।।
इसके बाद बालिकाएँ अपने पैरों को आगे-पीछे,दाँये-बाँये सरकाती हुई खेलतीं हैं । फुगड़ी के बीच में निम्न गीत गातीं हैं –
बेल आई बेल आई कोन्हा म छबील बाई ।
मारेन मुटका, हेराबोन तल, पतरंगी छूटगे, छुवैया गड़ी मोर ।
फुगड़ी खेलते समय जमीन में हाथ छू जाने से खिलाड़ी फाउल हो जाता है तब बाकी लोग यह पंक्तियाँ गाते हुए उसे चिढ़ाते हैं
भरे कराही, भर गे, हरही टूरी हटगे, फुगरी रे फुन-फुन-फुन।
चुस्ती-फुर्ती और छेड़छाड़ से भरपूर यह खेल सबको मनभावन लगता है।
3 लंगड़ी
इस खेल में खिलाड़ी एक के ऊपर एक हाथ रख एक दो तीन की गिनती के साथ हथेली खोलते हैं। ऑड
वन आउट की स्थिति में खिलाड़ी बाहर होते जाते हैं और अंत तक नहीं निकलने वाला दाम देता है। छु-छुऔला की भाँति दाम देने वाला एक पैर उठाकर दौड़ता है और किसी एक को छूने की कोशिश करता है। जो पकड़ा जाता है फिर वह दाम देता है।
4 चुन-चुन मुंदरी
यह मुख के भाव परखने , बुद्धि व चातुर्य का खेल है। इसमें खिलाड़ी वृत्त बना कर बैठते हैं, घुटने मोड़ कर उस पर अपनी हथेली को पाकेटनुमा बना कर रखते हैं। लीडर एक अँगूठी या कोई वस्तु सबकी हथेली में डालने का अभिनय करता है और किसी एक की हथेली में चुपके से डाल देता है। दाम देने वाले को अनुमान लगा कर यह बताना होता है कि किसकी हथेली में अँगूठी है। यदि उसका अनुमान सही हुआ तो जिसके पास अंगूठी है वह दाम देता है। अनुमान गलत होने पर उसे फिर से दाम देना पड़ता है।
5 भौंरा
इस खेल में लकड़ी के बने भौंरे के ऊपर डोरी लपेट कर तेजी से जमीन पर छोड़ा जाता है, जिससे भौंरा चक्करदार घूमता है। जिसका भौंरा अधिक समय तक चक्कर लगाए वही विजेता होता है।
6 खुड़ुवा ( कबड्डी )
खुडुवा वर्तमान में खेले जाने वाले कबड्डी के समान खेल है। सारे खिलाड़ी दो दलों में बँटकर इसे खेलते हैं। इसमें मैदान की बाहरी सीमा खींच दी जाती है और मध्य की लाइन से कोई गीत या स्वर के साथ कबड्डी करने जाते हैं। दल बनाने के लिए दो लोग अगुवा बनते हैं, उसके बाद बाकी खिलाड़ी दो-दो की जोड़ी में फूल, फल या धरती-आकाश जैसे नामकरण कर आते जाते रहते हैं और अगुवा के द्वारा एक नाम चयन करने पर दलों में बँटते जाते हैं। खेलते समयगीत भी गुनगुनाने लगते हैं -
चल कबड्डी आवन दे, तबला बजाना दे ।।
खुडुवा डुडुवा नागर के हरी
भेलवा उधवा, सुकुवा पहनाती
मारे मुक्का फूटे बेल
तीन टुटुवा तिल्ली तेल ।।
हार-जीत के साथ चिढ़ाने व गीतों के द्वारा छेड़छाड़ दलों के बीच चलता रहता है।
7 कोठी-ढाबा
घर के भीतर खेला जाने वाला यह सर्वप्रिय खेल है। इसके लिए लकड़ी के पटिए पर छह-छह गड्ढे बनाए जाते हैं और दोनों कोनों में बड़ा गड्ढा होता है जिसे कोठी या ढाबा कहते हैं। सभी छह-छह खानों में इमली के बीज डाल दिये जाते हैं, फिर एक गड्ढे से बीज उठाकर बाएँ तरफ से प्रत्येक खाने में में एक-एक बीज डालता है,जहाँ बीज खत्म होता है उसके अगले खाने से फिर बीज निकाल कर उसी तरह प्रत्येक खाने में डालते जाते हैं। यदि किसी बार बीज उस खाने में खत्म हो जिसके अगले खाने में बीज न हो तो खिलाड़ी का दाँव खत्म हो जाता है। उसके बाद दूसरा खिलाड़ी अपने खाने से निकालकर यही खेल शुरू करता हैजब एक खिलाड़ी के सारे बीज दूसरी तरफ हो जाए तो वह खिलाड़ी जीत जाता है। इस खेल में संख्या आकलन में लाभ होता है , विरोधी खिलाड़ी के सारे बीज अपनी कोठी में भर जाए उस हिसाब से चाल चलते हैं।
8 डंडा-पिचरंगा
इसमें एक खिलाड़ी पीछे मुँहकर दोनों हाथों में डंडे को पकड़ कर खड़ा हो जाता है और बाकी खिलाड़ी बारी-बारी अपने डंडे से उसे उछालते हैं जिससे वह कम दूरी तक उछलता है वह पहले दाम देता है। दाम देने वाले के डंडे को जमीन में रखा जाता है जिसे बाकी खिलाड़ी अपने डंडे से खींच कर फेंकते जाते हैं और दाम देने वाला खींचते समय उन्हें छूने की कोशिश करता है। यदि उसके डंडे को खींचते समय किसी को छू लिया तो वह दाम देता है। इस प्रकार क्रम बढ़ते रहता है। बुद्धि, चतुराई और चुस्ती भरा यह खेल स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करता है।
9 गिल्ली डंडा
लकड़ी का एक डंडा और छोटी-सी लकड़ी के टुकड़े को दोनों छोर से नुकीला करके गिल्ली बनाई जाती है। गिल्ली को एक गड्ढे में रखकर डंडे से उछाला जाता है और मार कर जितना अधिक दूर पहुँचाया जाता है। इसे दो से लेकर 8-10 लोग खेल सकते हैं। शक्ति और संतुलन का यह खेल ग्रामीण इलाकों में बहुत लोकप्रिय है।
10 पिट्ठूल
इस खेल में दो समूह होते हैं, खिलाड़ियों की संख्या बराबर होती है। एक गोल घेरे के भीतर सात खपरैल के टुकड़े एक के ऊपर एक रखें जाते हैं । सबसे पहले एक समूह गेंद मारकर खपरों को गिराता है, फिर दूसरा समूह मौका पाकर उन्हें जमाने की कोशिश करता है । इस बीच दूसरा समूह जमाने वाले समूह को गेंद से मारते हैं। इसी प्रकार जमाने और गिराने की कोशिश चलती रहती है। पिट्ठूल जमा देने पर दूसरे समूह को दाम देना पड़ता है। इस खेल के लिए फुर्ती की आवश्यकता होती है ।
11 नदी-पहाड़
यह खेल गाँव में खेलते समय घर के किनारे बने हुए चबूतरों को पहाड़ तथा नीचे जमीन को नदी मानकर खेला जाता है। जो खिलाड़ी दाँव देता है वह नदी में आने वाले खिलाड़ियों को दौड़ा-दौड़ाकर छूने की कोशिश करता है तथा उन्हें पहाड़ पर ही रहने को बाध्य करता है। जो खिलाड़ी नदी में उतर कर दाम देने वाले से छू लिया जाता है तो उसे दाँव देना पड़ता है।
12 गेंड़ी
बाँस के चार-पाँच फीट डंडे में एक दूसरे बाँस के टुकड़े को चीरकर बाँध दिया जाता है जिसे गेंड़ी कहते हैं। इसमें चढ़ कर खिलाड़ी रच-मच की आवाज के साथ दौड़ लगाते हैं। यह खेल हथेली पर्व पर विशेष रूप से खेला जाता है। बारिश के मौसम में कीचड़ से बचने का यह अद्भुत उपाय है।
13 धँसउला या गड़उला
इस खेल को बारिश के मौसम में खेला जाता है जब मिट्टी गीली होती है। इसके लिए लोहे कि एक नुकीला लंबा ( लगभग एक फीट ) टुकड़ा फेंक कर जमीन में गड़ाते हैं , फिर उसे उखाड़ कर धँसाते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं जब तक वह जड़ फेंकने पर बिना खड़े गिर न जाए।
14 रेस-टीप
इस सामूहिक खेल में खिलाड़ी कितने भी हो सकते हैं। एक खिलाड़ी दाम देता है और बाकी अलग-अलग स्थानों में छिप जाते हैं। छिपे हुए खिलाड़ियों को ढूँढ़ना पड़ता है।जो पहले दिख जाता है उसका नाम लेकर दाम देने वाला चिल्ला कर कहता है –पहला टीप मोहन, दूसरा टीप— इस प्रकार उसे सभी साथियों को ढूँढ़ना होता है। सभी पकड़े गए तो पहले दिखने वाले को दाम देना पड़ता है और सबके पकड़ाने के पहले कोई चुपके से आकर दाम देने वाले को छूकर रेस कर दें तो उसे फिर से दाम देना पड़ता है।
15 साँकली
सँकली अर्थात सांकल (चेन ) यह छू-छूवव्वल जैसा खेल है पर यह जोड़ी में खेला जाता है।इस सामूहिक खेल में विषम संख्या में खिलाड़ी लेते हैं ताकि एक खिलाड़ी बचा रहे। जो दाम देता है वह अकेले खड़े खिलाड़ी को छूने दौड़ाता है और दूसरा खिलाड़ी दौड़ कर उसका हाथ पकड़ता है। जो भी अकेला होता है दाम देने वाला उसे दौड़ाता है, अकेला खिलाड़ी स्वयं भी सांखली बनाने दूसरे खिलाड़ी की ओर भागता है। इस प्रकार सांकल की तरह एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर भागते हैं। जो खिलाड़ी बिना जोड़ी का हाथ पकड़े छू लिया जाता है,उसे दाम देना पड़ता है।
इस खेल का दूसरा स्वरूप भी है जिसमें पाँच या छह खिलाड़ी सांकल बना कर (एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए) सामने वाली टीम के सदस्यों को बारी-बारी से छूकर आउट करते जाते हैं। दो पालियों में यह खेल समय निश्चित कर खेला जाता है।जो टीम अधिक सदस्यों को या पूरी टीम को निश्चित समय पर छू लेती है वह टीम विजयी होती है।
16 तिरी-पासा
यह बहुत प्राचीन खेल जिसे वर्तमान समय में लूडो कहते हैं। पहले तिरी यानी कि गोंटी रंग-बिरंगी चूड़ियों के टुकड़े, बीज इत्यादि लेते थे और पासा अर्थात डाइस की जगह कौड़ियों का उपयोग होता था। जमीन पर खड़िया पत्थर या स्लेट पर लिखने वाली कलम, चाक इत्यादि से लाइन खींचकर खंड बनाते थे और उस पर गोंटियाँ रख तिरी पासा खेलते थे। छुट्टियों में यह बच्चों का मनपसंद खेल होता था।
17 बिल्लस
खपरैल या पत्थर के छोटे टुकड़े को बिल्लस कहते थे जिसे खेलने के लिए चौखाने खींचे जाते थे। चौखानों का निश्चित क्रम रहता था। एक, दो , एक ,दो और बिल्लस को जिस खाने में डालते थे उसको कूदकर लंगड़ी (एक पैर उठाकर) दूसरे घर में जाना होता था। लौट कर एक पैर से ही बिल्लस को घर से बाहर खिसका कर उस पर पैर रखना पड़ता। खेलते समय चौखाने की लाइन पर पैर पड़ने से खेल से बाहर कर दिया जाता। यह खेल शारीरिक संतुलन और फुर्ती का खेल है और विशेषकर लड़कियों द्वारा खेला जाता था।
18 गोंटा
यह भी लड़कियों द्वारा खेला जाता था। पत्थर (गिट्टी) के लगभग समान गोल टुकड़ों को छाँटकर उनसे घोंटा खेला जाता था। पाँच या सात गोंटे लिए जाते थे जिन्हें जमीन पर एक साथ फेंककर एक-एक कर उठाना होता वह भी एक गोंटा हवा में उछालते हुए दूसरा गोंटा उठाना । दृष्टि और हाथों का सही संतुलन बनाकर पहले एक-एक गोंटा उठाना, फिर दो-दो , फिर तीन , चार इस तरह खेला जाता। दोनो खिलाड़ी द्वारा कुशलता से उठाने पर अंक जोड़े जाते। सभी फेरों में कुशलता से उठाने वाले खिलाड़ी को विजयी माना जाता।
19 बाँटी
काँच की गोलियाँ या कंचे लड़कों के प्रिय खेल होते थे जिसे एक गोले में रखकर दूर से एक कंचे से निशाना लगाया जाता। एक कंचे से मार कर दूसरे कंचे को खिसकाते हुए गोले तक ले जाना, कंचा जीत इत्यादि विभिन्न तरीकों से इसे खेला जाता था। बाँटी या कंचे जीत कर जमा करना लड़कों के लिए धन संचित करने जैसा महत्व रखता था।
20 घोड़ा बादाम छई
यह खेल समूह में खेला जाता था और इसमें जितनी संख्या में खिलाड़ी भाग ले सकते हैं। सभी खिलाड़ी गोलाकार बैठ जाते हैं और एक खिलाड़ी रूमाल या कोई कपड़ा लेकर पीछे -पीछे चक्कर लगाता। वह कहता –” घोड़ा बादाम छई, पीछे देखे मार खाई “ सभी खिलाड़ी सिर झुकाकर बैठे रहते । दाम देने वाला चुपके से किसी एक के पीछे रूमाल डाल कर आगे चक्कर लगाता और उसके पास आकर रूमाल उठाकर उसको मारते जाता। वह खिलाड़ी भागकर सभी के पीछे एक चक्कर घूमकर वापस अपनी जगह पर आकर बैठ जाता । यदि रूमाल रखकर चक्कर लगा कर वापस आने से पहले किसी को यह भनक लग गई कि उसके पीछे रूमाल है तो वह फुर्ती से रूमाल उठाकर दाम देने वाले को मारकर दौड़ाता है और दाम देने वाला उसकी जगह पर आकर बैठ जाता है। इस प्रकार क्रम चलता रहता है। छोटे बच्चों में यह खेल बहुत लोकप्रिय और मनोरंजन प्रदान करने वाला है।
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक अधिकांश खेल कम संसाधनों में, बिना खर्च के , आस-पास मिलने वाली वस्तुओं का उपयोग कर खेले जाते थे। छत्तीसगढ़ की सादगीपूर्ण जीवन-शैली यहाँ के प्रचलित खेलों में भी दिखाई देती है। ये सभी खेल स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धि, चातुर्य, स्फूर्ति, शक्ति, संतुलन को बढ़ाते हैं और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। हमें अपने राज्य के इन पारंपरिक खेलों का महत्व जानना चाहिए और इन्हें संरक्षित करने का प्रयास कर, खेलों को बढ़ावा देना चाहिए।










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