प्रधानमंत्री मोदी ने अदालतों में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल पर जोर दिया
नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अदालतों में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल पर जोर देते हुए शनिवार को कहा कि इससे न्याय प्रणाली में आम नागरिकों का विश्वास बढ़ेगा और वे इससे अधिक जुड़ाव महसूस करेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अपील की कि वे जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों से संबंधित मामलों को प्राथमिकता दें और उन्हें मानवीय संवेदनाओं के आधार पर कानून के अनुसार रिहा करें। प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायिक सुधार केवल एक नीतिगत मामला नहीं है। मोदी ने कहा कि मानवीय संवेदनाओं को सभी चर्चाओं के केंद्र में रखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि हर जिले में जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति होती है, ताकि इन मामलों की समीक्षा की जा सके और जहां भी संभव हो ऐसे कैदियों को जमानत पर रिहा किया जा सके। उन्होंने कहा, ''मैं सभी मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से मानवीय संवेदनशीलता और कानून के आधार पर इन मामलों को प्राथमिकता देने की अपील करता हूं।'' मोदी ने यहां छह साल के अंतराल पर हुए मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि एक समूह दो प्रारूपों में कानून बनाने पर विचार कर रहा है - एक विशिष्ट कानूनी भाषा में और दूसरा साधारण भाषा में जिसे आम लोग समझ सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह विभिन्न देशों में प्रचलन में है और दोनों प्रारूपों को कानूनी रूप से स्वीकार्य माना जाता है। अदालती सुनवाई के मुद्दे पर मोदी ने कहा, ''हमें अदालतों में स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इससे न केवल आम नागरिकों का न्याय प्रणाली में विश्वास बढ़ेगा, बल्कि वे इससे अधिक जुड़ाव भी महसूस करेंगे।'' प्रधानमंत्री के बोलने से पहले, प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण ने कहा कि अदालतों में स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल करने के लिए एक कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है। प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि समाचार पत्रों को सकारात्मक शीर्षक मिल गया है। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों से न्याय प्रदान करने को आसान बनाने के लिए पुराने कानूनों को निरस्त करने की भी अपील की। उन्होंने कहा, ''2015 में, हमने लगभग 1,800 कानूनों की पहचान की, जो अप्रासंगिक हो चुके थे। इनमें से, केंद्र के ऐसे 1,450 कानूनों को समाप्त कर दिया गया। लेकिन, राज्यों ने केवल 75 ऐसे कानूनों को समाप्त किया है।'' प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जब भारत स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो एक ऐसी न्यायिक प्रणाली के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जहां न्याय आसानी से उपलब्ध, त्वरित और सभी के लिए हो। उन्होंने कहा, हमारे देश में, जहां न्यायपालिका की भूमिका संविधान के संरक्षक की है, वहीं विधायिका नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। मेरा मानना है कि इन दोनों का संगम एक प्रभावी व समयबद्ध न्यायिक प्रणाली के लिए रोडमैप तैयार करेगा।










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