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फेफड़े की दुर्लभ विकृति से पीड़ित शिशु की जटिल सर्जरी एम्स दिल्ली के लिए नयी उपलब्धि

नयी दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के डॉक्टरों ने चार महीने के एक शिशु के फेफड़े बचाने के लिए उसकी बेहद जटिल और दुर्लभ सर्जरी सफलतापूर्वक की है। यह शिशु जन्मजात विकृति से पीड़ित था, जिससे उसके दोनों फेफड़े प्रभावित थे। अस्पताल प्रशासन ने बुधवार को यह जानकारी दी। अस्पताल प्रशासन ने बताया कि ऑपरेशन के महज दो दिन बाद शिशु को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
डॉक्टरों के मुताबिक, फेफड़े के एक हिस्से को निकालने वाली 'सेगमेंट-लेवल लंग रिसेक्शन या सेगमेंटेक्टॉमी सर्जरी' इतनी कम उम्र के मरीज पर की गई अपनी तरह की सबसे दुर्लभ सर्जरी में से एक है। यह देश के अग्रणी संस्थान में उपलब्ध उन्नत बाल चिकित्सा सर्जिकल सुविधाओं को भी दर्शाती है। डॉक्टरों के अनुसार, शिशु के दाएं फेफड़े में यह सर्जरी की गई, जबकि बाएं फेफड़े की सर्जरी कुछ महीने बाद निर्धारित की जाएगी। डॉक्टरों ने बताया कि जन्म से पहले ही शिशु में जन्मजात पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (सीपीएएम) की पहचान कर ली गई थी। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भावस्था के दौरान फेफड़े का कुछ हिस्सा असामान्य रूप से विकसित हो जाता है और उसमें गांठ जैसी संरचनाएं बन जाती हैं, जो फेफड़े के सामान्य ऊतकों की तरह काम नहीं कर पातीं। डॉक्टरों ने बताया कि यह मामला विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि इस विकृति ने एक फेफड़े के बजाय दोनों फेफड़ों को प्रभावित किया था, जबकि आमतौर पर यह स्थिति केवल एक ही फेफड़े में देखी जाती है। उन्होंने बताया कि पूरे फेफड़े के एक हिस्से को निकालने से भविष्य में फेफड़ों की क्षमता में काफी कमी आ सकती थी, इसलिए डॉक्टरों की टीम ने फेफड़े को बचाने वाली तकनीक अपनाई और दाएं फेफड़े के केवल प्रभावित हिस्सों को ही हटाया। प्रत्येक फेफड़ा छोटे-छोटे कार्यात्मक हिस्सों में बंटा होता है, जिन्हें सेगमेंट कहा जाता है। इनमें से हर हिस्से की अपनी अलग वायु नली और रक्त आपूर्ति होती है। डॉक्टरों ने बताया कि जहां फेफड़े के एक बड़े हिस्से को निकालने की सर्जरी अपेक्षाकृत आसान होती है, वहीं सेगमेंटेक्टॉमी में गहराई में स्थित रक्त वाहिकाओं और वायु नलियों को बेहद सावधानी से अलग करना पड़ता है, ताकि आसपास के स्वस्थ ऊतकों को सुरक्षित रखा जा सके। यह सर्जरी बाल शल्य चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. विशेष जैन के नेतृत्व में की गई। ऑपरेशन बिना किसी जटिलता के सफलतापूर्वक पूरा हुआ और शिशु को दो दिन बाद स्थिर स्थिति में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉक्टरों ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि फेफड़ों की जन्मजात विकृति से पीड़ित चुनिंदा शिशुओं में समूचे हिस्से को हटाने के बजाय केवल प्रभावित भाग को निकालना संभव है। उन्होंने कहा कि इससे फेफड़ों की कार्यक्षमता को बनाए रखने में मदद मिलती है और मरीज के लिए लंबे समय तक बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

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