दानवीर कर्ण ऐसे हुए पित्र ऋण से मुक्त
पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड तथा दान को ही श्राद्ध कहते है। मान्यता अनुसार सूर्य के कन्याराशि में आने पर पितर परलोक से उतर कर अपने पुत्र - पौत्रों के साथ रहिने आते हैं, अतः इसे कनागत भी कहा जाता है। श्राद्ध तीन पीढि़यों तक करने का विधान बताया गया है। यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा के समान तथा आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं।
श्राद्ध का एक प्रसंग महाभारत महाकाव्य से इस प्रकार है, कौरव-पांडवों के बीच युद्ध समाप्ति के बाद, जब सब कुछ समाप्त हो गया, दानवीर कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचे। उन्हें खाने मे सोना, चांदी और गहने भोजन के जगह परोसे गये। इस पर, उन्होंने स्वर्ग के स्वामी इंद्र से इसका कारण पूछा। इस पर, इंद्र ने कर्ण को बताया कि पूरे जीवन में उन्होंने सोने, चांदी और हीरों का ही दान किया, परंतु कभी भी अपने पूर्वजों के नाम पर कोई भोजन नहीं दान किया। कर्ण ने इसके उत्तर में कहा कि, उन्हें अपने पूर्वजों के बारे मैं कोई ज्ञान नही था, अतः वह ऐसा करने में असमर्थ रहे । तब, इंद्र ने कर्ण को 16 दिनों के लिए पुन: पृथ्वी पर वापस जाने के सलाह दी ।
अन्न और जल का दान: पृथ्वी पर आकर कर्ण ने लगातार 16 दिनों तक अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए गरीबों और ब्राह्मणों को अन्न, जल और वस्त्र का दान किया तथा तर्पण किया।
पितृ ऋण से मुक्ति: 16 दिनों के तर्पण और दान के पश्चात जब कर्ण पुनः स्वर्ग लौटे, तब उन्हें तृप्ति कारक भोजन प्राप्त हुआ और वे अपने पितृ ऋण से पूरी तरह मुक्त हो गए।

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