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प्राकृतिक खेती आज समय की जरूरत बन चुकी है : अमिताभ कांत

नयी दिल्ली. नीति आयोग के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कांत ने प्राकृतिक खेती को समय की जरूरत बताते हुए सोमवार को कहा कि इस समय रसायनों और उर्वरकों के उपयोग के कारण खाद्यान्न उत्पादन की लागत बढ़ गई है। कांत ने नीति आयोग की तरफ से ‘नवाचार कृषि' पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अब गेहूं और चावल का निर्यातक बन चुका है। हालांकि, अकुशल आपूर्ति शृंखला और अधूरे बाजार संपर्कों के कारण भारत की कृषि क्षेत्र की उत्पादकता कम है। उन्होंने कहा, ‘‘प्राकृतिक खेती समय की जरूरत है और यह महत्वपूर्ण है कि हम वैज्ञानिक तरीकों की पहचान करें ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि किसान इससे सीधे लाभान्वित हों और उनकी आमदनी बढ़े।'' कांत ने कहा, ‘‘रसायनों और उर्वरकों के अधिक उपयोग के कारण खाद्यान्नों और सब्जियों के उत्पादन की लागत बढ़ गई है।'' प्राकृतिक खेती में रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और इसे कृषि-पारिस्थितिकी पर आधारित खेती की विविध प्रणाली के रूप में देखा जाता है। यह जैव विविधता के साथ फसलों, पेड़ों और मवेशियों को भी समाहित करते हुए चलती है। इस कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य (कृषि) रमेश चंद ने कहा कि प्राकृतिक खेती के जैविक खेती, विविधीकरण और सतत खेती जैसे कई तरीके हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे साझा अनुभवों के माध्यम से, प्रत्येक तरीके के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को समझना महत्वपूर्ण है।'' चंद ने कहा कि रासायनिक खेती को बढ़ावा देना आसान है लेकिन प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत अब खाद्यान्न-अधिशेष देश बनने के बाद रासायनिक खेती का विकल्प चुनने की स्थिति में है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने और बड़े पैमाने पर लोगों, खासकर किसानों के साथ इसके लाभों को साझा करने का समय आ गया है। कुमार ने कहा, ‘‘राज्यों के साझा अनुभव देश में नवीन कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए एक मजबूत रूपरेखा तैयार करने में मदद करेंगे।

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