- Home
- आलेख
- -हर पात्र छात्रा को मिलेगी प्रतिवर्ष 30 हजार रुपए की आर्थिक सहायतालेख- एस.आर. पाराशर, उपसंचालकधमतरी। आर्थिक परिस्थितियां अब बेटियों की उच्च शिक्षा के रास्ते में बाधा न बनें, इसी उद्देश्य से अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप 2026-27 के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। इस पहल के तहत पात्र छात्राओं को स्नातक शिक्षा पूरी करने तक प्रतिवर्ष 30 हजार रुपए की वित्तीय सहायता दी जाएगी। छात्राएं इस राशि का उपयोग ट्यूशन फीस सहित शिक्षा से जुड़े अन्य आवश्यक खर्चों के लिए कर सकेंगी।यह छात्रवृत्ति केवल आर्थिक सहायता का माध्यम नहीं, बल्कि बेटियों को उच्च शिक्षा से जोड़ने और उन्हें आत्मनिर्भर भविष्य की ओर बढ़ाने की महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक कठिनाइयों के कारण कोई प्रतिभाशाली छात्रा अपनी कॉलेज शिक्षा बीच में न छोड़े।अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप के अंतर्गत चयनित छात्राओं को उनकी स्नातक शिक्षा की अवधि के अनुसार 2 से 5 वर्षों तक प्रतिवर्ष ₹30,000 की सहायता मिलेगी। इस तरह पात्र छात्रा को पूरी अवधि में अधिकतम ₹1.50 लाख तक की छात्रवृत्ति प्राप्त हो सकती है।इस छात्रवृत्ति की एक विशेषता यह है कि इसका चयन मेरिट, जाति, आय या धर्म के आधार पर नहीं किया जाता। सरल पात्रता मानदंड और आसान ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया के माध्यम से अधिक से अधिक पात्र छात्राओं तक इस योजना का लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया है।17 अगस्त को कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा ने भी महाविद्यालयों के प्राचार्यों को पात्र छात्राओं की पहचान कर विशेष अभियान चलाने, आवेदन में मार्गदर्शन देने और यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे कि आर्थिक कठिनाई के कारण किसी छात्रा की पढ़ाई बाधित न हो।कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा ने कहा कि आर्थिक परिस्थितियों के कारण किसी भी छात्रा की उच्च शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए। अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप जैसी पहल छात्राओं को कॉलेज शिक्षा जारी रखने के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक संबल प्रदान करती है। जिले के महाविद्यालयों को निर्देशित किया गया है कि वे पात्र छात्राओं की पहचान कर उन्हें इस योजना की जानकारी दें, आवेदन प्रक्रिया में आवश्यक मार्गदर्शन उपलब्ध कराएं और अधिक से अधिक पात्र छात्राओं को योजना से जोड़ें। उन्होंने कहा कि जानकारी के अभाव में कोई भी पात्र छात्रा छात्रवृत्ति जैसे महत्वपूर्ण अवसर से वंचित न रहे। कलेक्टर ने छात्राओं और अभिभावकों से अपील की है कि वे उच्च शिक्षा के अवसरों का लाभ उठाने के लिए आगे आएं और निर्धारित समय-सीमा में अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करें। महाविद्यालयों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे छात्राओं को आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेजों और प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध कराते हुए उनका सहयोग करें।वर्ष 2026-27 में अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप का तीसरा कोहोर्ट शुरू किया जा रहा है। इसमें 19 राज्य और 2 केंद्रशासित प्रदेश, अर्थात कुल 21 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं। इनमें छत्तीसगढ़ के अलावा आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, दिल्ली, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पुडुचेरी, राजस्थान, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं।शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए वे छात्राएं आवेदन कर सकती हैं, जिन्होंने कक्षा 10वीं और 12वीं दोनों की पढ़ाई किसी पात्र राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के सरकारी स्कूल या कॉलेज से नियमित छात्रा के रूप में पूरी की हो। साथ ही, उन्होंने 2026-27 में भारत के किसी सरकारी संस्थान अथवा विश्वसनीय एवं मान्यता प्राप्त निजी कॉलेज/विश्वविद्यालय में 2 से 5 वर्ष की अवधि वाले मान्यता प्राप्त स्नातक डिग्री या डिप्लोमा पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष में नियमित छात्रा के रूप में प्रवेश लिया हो।छात्राओं को आवेदन के लिए दो चरणों में अवसर दिया गया है। पहला आवेदन चरण 10 से 31 अगस्त 2026 तक है, जबकि दूसरा चरण 10 से 31 जनवरी 2027 तक रहेगा। आवेदन केवल अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन किया जा सकता है।आवेदन के लिए छात्राओं को पासपोर्ट आकार का फोटो, आधार कार्ड, बैंक खाते का विवरण, कक्षा 10वीं एवं 12वीं की मूल अंकतालिका तथा प्रवेश का प्रमाण जैसे बोनाफाइड प्रमाणपत्र या शिक्षण शुल्क रसीद की स्पष्ट, रंगीन और बिना संपादन की गई प्रतियां तैयार रखनी होंगी।फाउंडेशन द्वारा स्पष्ट किया गया है कि छात्रवृत्ति के लिए आवेदन प्रक्रिया के किसी भी चरण में कोई शुल्क नहीं लिया जाता। फाउंडेशन फोन कॉल या संदेश के माध्यम से बैंक खाते की जानकारी अथवा OTP नहीं मांगता और छात्रवृत्ति के लिए किसी प्रकार का साक्षात्कार भी आयोजित नहीं किया जाता। छात्राओं को किसी भी संदिग्ध कॉल, संदेश या व्यक्ति से सावधान रहने की सलाह दी गई है।अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की स्थापना 9 मार्च 2001 को हुई थी। शिक्षा की गुणवत्ता और समानता के क्षेत्र में लंबे समय से कार्यरत फाउंडेशन ने वर्ष 2024 में अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप की शुरुआत की। इस पहल के माध्यम से आर्थिक बाधाओं के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह जाने वाली छात्राओं को आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध कराया जा रहा है।“अब हर लड़की कॉलेज जाएगी” की भावना के साथ यह छात्रवृत्ति बेटियों के सपनों को आर्थिक संबल देने के साथ-साथ परिवारों में उच्च शिक्षा के प्रति विश्वास को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। धमतरी जिले की पात्र छात्राओं से अपील है कि वे निर्धारित अवधि में आवेदन कर इस अवसर का लाभ उठाएं और उच्च शिक्षा के माध्यम से अपने उज्ज्वल भविष्य की नींव मजबूत करें।आधिकारिक वेबसाइट: अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की वेबसाइट पर “Azim Premji Scholarship” अनुभाग में जाकर आवेदन किया जा सकता है।
-
-सुरक्षित श्रम, सामाजिक सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और डिजिटल सेवाओं का व्यापक विस्तार
विशेष लेख- छगल लाल लोन्हारे- संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
रायपुर / राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। श्रमिकों के सम्मान, सुरक्षा और समग्र विकास के बिना विकसित राज्य की कल्पना संभव नहीं है। इसी सोच को आधार बनाकर छत्तीसगढ़ शासन का श्रम विभाग श्रमिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। श्रम मंत्री श्री लखन लाल देवांगन के निर्देशन में श्रमिकों के हितों की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता तथा आधुनिक तकनीक के माध्यम से सेवाओं को सरल बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। राज्य सरकार के ढाई साल में श्रम विभाग की उपलब्धियाँ राज्य सरकार की श्रमिक हितैषी सोच और संवेदनशील प्रशासन का परिचायक हैं।श्रम कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन तथा श्रमिकों को त्वरित और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने पाँच नए जिलों में श्रम पदाधिकारी कार्यालय स्थापित किए हैं। मंत्री श्री लखन लाल देवांगन ने बताया कि पाँच श्रम पदाधिकारी कार्यालयों को सहायक श्रमायुक्त कार्यालय के रूप में उन्नत किया गया है। अब प्रदेश में 10 सहायक श्रमायुक्त कार्यालय एवं 23 श्रम पदाधिकारी कार्यालय सहित कुल 33 श्रम कार्यालय संचालित हैं। इससे श्रमिकों की समस्याओं के त्वरित निराकरण और योजनाओं के प्रभावी संचालन को नई गति मिली है।औद्योगिक विकास और श्रमिक हितों के संतुलन को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने श्रम कानूनों में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। छत्तीसगढ़ कारखाना नियम, 1962 में संशोधन कर निर्धारित सुरक्षा प्रावधानों के साथ महिलाओं के रोजगार के अवसरों का विस्तार किया गया है। वहीं छत्तीसगढ़ दुकान एवं स्थापना नियम, 2021 में संशोधन के माध्यम से श्रम पहचान पंजीयन प्रमाण-पत्र अब 24 घंटे के भीतर जारी किए जाने का प्रावधान किया गया है। इससे उद्योगों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सरल एवं पारदर्शी सेवाएँ उपलब्ध होंगी तथा ष्ईज ऑफ डूइंग बिजनेसष् को भी बढ़ावा मिलेगा।श्रम विभाग के अंतर्गत संचालित छत्तीसगढ़ श्रम कल्याण मंडल, भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल तथा असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल के माध्यम से अब तक लगभग 56.83 लाख संगठित, निर्माण एवं असंगठित श्रमिकों का पंजीयन किया जा चुका है।वर्ष 2026 में 30 जून तक विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लगभग 3.48 लाख श्रमिकों को बीमा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं कौशल उन्नयन जैसी सुविधाओं का लाभ प्रदान किया गया है। इन योजनाओं पर लगभग 173.32 करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं, जो श्रमिक कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना के अंतर्गत आवास निर्माण अथवा घर खरीदने के लिए दी जाने वाली सहायता राशि एक लाख रुपये से बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये कर दी गई है। यह निर्णय निर्माण श्रमिकों के अपने घर के सपने को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।इसी प्रकार दीदी ई-रिक्शा सहायता योजना के अंतर्गत पंजीकृत महिला निर्माण श्रमिकों एवं उनके समूहों को ई-रिक्शा खरीदने के लिए सहायता राशि भी एक लाख रुपये से बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये कर दी गई है। इससे महिला श्रमिकों को स्वरोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर मिल रहे हैं।राज्य सरकार ने श्रमिक परिवारों के भविष्य को संवारने के उद्देश्य से अटल कैरियर निर्माण योजना प्रारंभ की है। इसके माध्यम से पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के बच्चों को इंजीनियरिंग एवं मेडिकल जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गुणवत्तापूर्ण निःशुल्क कोचिंग उपलब्ध कराई जाएगी।वहीं मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक स्वास्थ्य परीक्षण योजना के माध्यम से पंजीकृत निर्माण श्रमिकों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण किया जाएगा। इस पहल से बीमारियों की प्रारंभिक पहचान, समय पर उपचार तथा स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।श्रमिक परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के तहत पात्र निर्माण श्रमिकों के प्रथम दो बच्चों को कक्षा 6वीं से 12वीं तक उत्कृष्ट निजी आवासीय विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है।मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप वर्ष 2026-27 से इस योजना के अंतर्गत लाभान्वित बच्चों की संख्या 100 से बढ़ाकर 200 कर दी गई है। यह पहल श्रमिक परिवारों के बच्चों के भविष्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का माध्यम बनेगी।शहीद वीर नारायण सिंह श्रम अन्न योजना के माध्यम से पंजीकृत निर्माण, संगठित एवं असंगठित श्रमिकों को मात्र 5 रुपये में गरम एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। वर्तमान में प्रदेश के 18 जिलों में 39 भोजन केन्द्र संचालित हैं, जो हजारों श्रमिकों के लिए राहत का माध्यम बने हुए हैं।श्रम विभाग द्वारा विकसित 'ई-श्रम साथी मोबाइल एप' श्रमिकों और नियोजकों के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है। इस एप के माध्यम से स्वयं पंजीयन, श्रमिक एवं नियोजक के बीच सीधा संपर्क तथा रोजगार संबंधी जानकारी आसानी से उपलब्ध हो रही है। इससे पारदर्शिता के साथ रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि हो रही है।राज्य सरकार द्वारा मॉडल लेबर चौक फेसिलिटेशन सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केन्द्रों पर श्रमिकों के पंजीयन, विभिन्न योजनाओं के आवेदन, भोजन, पेयजल, विश्राम एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। इससे श्रमिकों को सम्मानजनक एवं सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध होगा।मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता योजना के अंतर्गत सामान्य मृत्यु पर आश्रितों को 1 लाख रुपये, कार्यस्थल दुर्घटना में मृत्यु होने पर 5 लाख रुपये तथा स्थायी दिव्यांगता की स्थिति में 2.50 लाख रुपये की सहायता प्रदान की जाती है। साथ ही अपंजीकृत निर्माण श्रमिकों की कार्यस्थल दुर्घटना में मृत्यु होने पर भी उनके आश्रितों को 1 लाख रुपये की सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।इसी प्रकार असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल के अंतर्गत पंजीकृत श्रमिकों की मृत्यु पर आश्रितों को 1 लाख रुपये तथा दिव्यांगता की स्थिति में 50 हजार रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाती है।राज्य के विभिन्न कारखानों में श्रमिकों को उनके कार्य के अनुरूप वरिष्ठ अधिकारियों एवं सुरक्षा अधिकारियों द्वारा नियमित प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इससे कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित होने के साथ-साथ दुर्घटनाओं में कमी और उत्पादकता में वृद्धि हो रही है।छत्तीसगढ़ में श्रम विभाग द्वारा किए जा रहे व्यापक सुधार यह सिद्ध करता है कि राज्य सरकार श्रमिकों को केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास यात्रा का महत्वपूर्ण सहभागी मानती है। प्रशासनिक ढाँचे का विस्तार, श्रम कानूनों का आधुनिकीकरण, डिजिटल सेवाओं का विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सामाजिक सुरक्षा एवं सम्मानजनक रोजगार जैसी पहलें श्रमिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रही हैं। श्रमिकों के कल्याण और सशक्तिकरण के इन प्रयासों से छत्तीसगढ़ समावेशी और संवेदनशील विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। - -गुलजार साहब का पहला फिल्मी गीत- मोरा गोरा अंग लइ ले, मोहे शाम रंग देइ दे, छुप जाऊंगी रात ही में , मोहे पी का रंग दइदेगुलजार- जन्मदिन (18 अगस्त) विशेषआलेख-प्रशांत शर्माजाने-माने शायर, गीतकार, लेखक और निर्देशक गुलजार साहब का 18 अगस्त को जन्मदिन है। आज भी समझ नहीं आता कि वे ऐसे-ऐसे शब्द कहां से उठा लाते हैं और इतने सलीके से उसे गीतों के रूप में खूबसूरत मोतियों की माला तरह पिरो देते हैं, कि सुनने वाला बस सुनता ही रह जाता है। उनके गाने सुनो तो लगता है जैसे शब्द किसी झरने से झर रहे हैं बिना किसी अतिरिक्त शोर के अविरल। बस आप उसकी प्राकृतिक आवाज को सुनते रहिए , आवाज दिल तक ही उतरेगी। गुलजार साहब पुराने जमाने को याद करते हुए लिखते हैं- उस वक्त तस्वीरें दिल से बनती थी, कैमरों से नहीं।यू ट्यूब पर उनकी शायरी उन्हीं की आवाज में सुनी, खासकर जगजीत सिंह के साथ उनकी जुगलबंदी , लगा ही नहीं, कि कोई शायर या गीतकार अपनी रचनाएं पढ़ रहा है, बल्कि ऐसे लगा जैसे कोई हमारी देखी सुनी कहानी ही सुना रहा है । उन्हें सुनने वाला नि:शब्द डूबता चला जाता है, आंखों के सामने तब गुलजार साहब नहीं, बल्कि एक जीती जागती तस्वीर किसी फिल्म की तरह सेल्युलाइट पर चलने लगती है। यह उनके शब्दों, आवाज के माड्यूलेशन और सहजता का जादू ही है।सफ़ेद पैरहन के भीतर धड़कता एक शायर दिल जिसकी ज़ुबान में शीरे की महक आती हैं। जो नज़्मों की ऊंगलियां पकड़ कभी बादलों पर सैर करता है तो कभी गज़़लों के साथ दिल बहलाने के लिए चांद-तारों को निहारता है। एक लेख़क जिसकी कलम शब्दों के साथ ऐसे ख़ेलती है कि देखने और पढऩे वाले दोनों का दिल बहल जाए। जो हिन्दी की किताबों में उर्दू की जिल्द चढ़ाते हैं वो ग़ुलज़ार हैं।जायकेदार हवा, मासूम पानी, गुनगुनाती निगाहें, रंगीली सांसें... चांद, तारे, आकाश, नदियों और इंसानी अहसास, दिल का पड़ोसी होना, और कभी दिल की तरह बीड़ी जलाइले, जैसे शब्द वे ही गढ़ सकते हैं। वे बच्चों के लिए लिखते समय चड्डी पहनकर फूल भी खिला सकते हैं । कहते हैं कि किसी शायर के मन की थाह लेना वैसे भी मुश्किल है , लेकिन गुलजार के शब्दों और आवाज की गहराई का भी कोई सिरा ही नहीं नजर आता है। आप कितनी भी कोशिश करें उनके शब्दों के जादू से दूर नहीं भाग सकते। शायर, लेखक, निर्देशक गुलजार ने करीब छह दशकों के अपने कॅरिअर में कविता, गीत, शेर, टीवी सीरियल, फिल्में समेत उर्दू और हिंदी साहित्य की कई विधाओं के लिए कलम चला रहे हैं।उर्दू के प्रति उनका प्रेम आज भी उनके हिन्दी गीतों में झलकता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि वे आज भी गीतों को उर्दू शब्दावली में ही लिखना पसंद करते हैं, फिर उसे हिन्दी में लिखा जाता है।आज 86 साल की उम्र में भी उनका रिश्ता लेखनी के साथ पूरे दम खम के साथ जारी है और हर गुजरते वक्त के साथ नए -नए मोती गढ़ रहा है। गंभीर अहसास और रूमानियत भरे गीतों के साथ ही कजरारे कजरारे और बीड़ी जलइले जैसे गीत भी उनकी कलम ने लिखे हैं। हिंदी फिल्मों के वो अकेले शायर हैं जिनके हिस्से में भारत के सारे बड़े फिल्मी पुरस्कारों के अलावा अंतरराष्ट्रीय जगत का ऑस्कर और ग्रैमी पुरस्कार भी हासिल है। पद्म भूषण दादा साहेब फाल्के जैसे सम्मान के भी वे हकदार बने हैं।उन्होंने जाने-माने डायरेक्टर बिमल रॉय और ऋषिकेश मुखर्जी के सहायक के रूप में अपना कॅरिअर शुरु किया था। शायद इसीलिए उनमें सहजता के साथ अपनी बात कहने वाला अंदाज और परिपक्व होता गया। बिमल रॉय ने उनकी किताब रावी पार पढ़ी और उन्होंने अपनी फिल्म बंदिनी में गीत लिखने के लिए कहा। गुलजार साहब ने लिखा- मोरा गोरा अंग लइ ले, मोहे शाम रंग देइ दे, छुप जाऊंगी रात ही में , मोहे पी का रंग दइदे। सचिन देव बर्मन ने इस गाने को बहुत ही खूबसूरती के साथ सुरों में ढाला। लता मंगेशकर की प्यारी आवाज और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का जादू, नूतन की सहजता, गाने को और भी खूबसूरती बना गई। यह सबसे हिट गाना साबित हुआ। हालांकि फिल्म के गाने उस दौर के मशहूर गीतकार शैलेन्द्र लिख रहे थे। उन्होंने भी गुलजार को गाने लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। इस गाने ने लता मंगेशकर और सचिन देव बर्मन के बीच का झगड़ा भी खत्म कराया था। गुलजार साहब के 74 वें जन्मदिन पर लता मंगेशकर ने इस वाकये को याद किया था।लता ने बताया था, बर्मन दादा के साथ मेरा झगड़ा चल रहा था। इस बीच एक दिन उनका फ़ोन आया कि एक नया लड़का आया है उसने फि़ल्म बंदिनी के लिए ये गाना लिखा है मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे। मुझे ये गाना इतना पसंद आया कि मैं गाने के लिए मान गई। यही गाना गुलज़ार के फि़ल्मी कॅरिअर का पहला गाना था। लता मंगेशकर के मुताबिक गुलज़ार की शायरी बाकी शायरों से बिलकुल अलग होती है। उनके सोचने का ढंग बिलकुल जुदा होता है। वो कहती हैं - कई बार मैं उनसे पूछती कि आपने ये शब्द क्यों लिखा है या ये लाइन क्यों लिखी है, तो वो सिर्फ़ हंस देते और कहते मुझे अच्छा लगा तो मैंने लिख दिया। वो उसकी कोई वजह नहीं बताते। उन्हें जो अच्छा लगता है वो वही लिखते हैं। गुलज़ार के लिखे लता के पसंदीदा गाने हैं -नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, यारा सीली-सीली और पानी-पानी रे। उन्होंने बताया था -मैं भगवान की शुक्रगुज़ार हूं कि मुझे गुलज़ार के लिखे ढेर सारे गाने गाने का मौका मिला। उन्होंने आरडी बर्मन से लेकर विशाल भारद्वाज और आज की पीढ़ी के संगीतकारों के लिए भी गाने लिखे और खूब लिखे।गोरा गोरा अंग लई ले ....गाना लोकप्रिय हुआ था और इसके लिए गुलजार को प्रशंसा भी मिली, लेकिन उस दौर में गुलजार फिल्मों में गाने लिखने के लिए उत्सुक नहीं थे। गुलजार साहब ने खुद एक साक्षात्कार में बताया था कि जब उन्होंने अपने कॅरिअर का पहला फि़ल्मी गीत मोरा गोरा अंग लई ले.. लिखा तो वो फि़ल्मों के लिए गाने लिखने को लेकर बहुत ज़्यादा उत्सुक नहीं थे, लेकिन फिर एक के बाद एक गाने लिखने का मौका मिलता गया और वो गाने लिखते चले गए।गुलजार जाने-माने शायर गालिब के मुरीद रहे हैं। इसलिए शेरो शायरी के प्रति उनका झुकाव शुरू से रहा है। गालिब के लिए उनके मन में इतनी इज्जत है कि वो खुद को गालिब का एक नौकर ही मानते हैं। वो गालिब से इतने प्रभावित थे कि उनकी जिंदगी पर एक फिल्म बनाना चाहते थे। इस फिल्म में पहले वो संजीव कुमार को लेना चाहते थे। लेकिन किसी ना किसी वजह से ये प्रोजेक्ट टलता गया और आखिर में इस प्रोजेक्ट में गालिब बनने का मौका नसीरुद्दीन शाह को मिला। वो तब तक जमाना था जब दूरदर्शन बढ़ रहा था। ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने के लिए फिल्म मेकर्स दूरदर्शन की तरफ बढऩे लगे थे। ऐसे में गुलजार ने भी अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए दूरदर्शन को चुना और फिल्म की जगह एक टीवी सीरियल की शुरुआत की। इस वक्त तक नसीर इंडस्ट्री में अच्छी पहचान बना चुके थे। इस रोल के लिए गुलजार ने नसीर को चुना था। इसके साथ ही गुलजार और नसीर दोनों का एक पुराना सपना सच हुआ। जब पहले गुलजार ने गालिब के रोल के लिए संजीव को चुना था तो नसीर ने उनके इस फैसले पर सवाल उठाते हुए एक चिट्ठी लिखी थी। वो चिट्ठी तो गुलजार साहब तक नहीं पहुंची थी। लेकिन कुदरती कुछ ऐसे हालात बनते गए कि यह फिल्म एक सीरियल के रूप में सामने आई। नसीर को उनका पसंदीदा कैरेक्टर मिला और गुलजार के लिए उनका सपना सच हो गया था। गालिब की गक़ालों को जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने आवाज दी।गालिब के प्रति गुलजार साहब की दीवानगी उनके लिखे गानों में नजर आ ही जाती है। जैसे कि गालिब ने लिखा... दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन, बैठे रहें तसव्वर-ए-जानां किए हुएइसी शेर पर गुलज़ार ने यह नज़्म लिखी जिसे फिल्म मौसम में शामिल किया गया।दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिनबैठे रहें तसव्वर-ए-जानां किए हुएजाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट करआँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साये कोऔंधे पड़े रहें, कभी करवट लिये हुए ..या गर्मियों की रात जो पुरवाइयाँ चलेंठंडे सफ़ेद बिस्तर पर जागें देर तकतारों को देखते रहें छत पर पड़े हुएबर्फीली सर्दियों में किसी रात में कभीवादी में गूँजती हुई ख़ामोशियाँ सुनेंआँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिये हुएदिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिनइस गाने को मदनमोहन साहब ने ऐसे सुरों में ढाला कि बरसों बाद भी इसकी रुमानियत दिल धड़का जाती है। जाते-जाते गुलजार साहब की रिश्तों के ताने-बाने पर लिखी एक प्यारी सी नज्म, तो मुझे बहुत पसंद है-मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहेअक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनतेजब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआफिर से बाँध केऔर सिरा कोई जोड़ के उसमेंआगे बुनने लगते होतेरे इस ताने में लेकिनइक भी गाँठ गिरह बुनतर कीदेख नहीं सकता है कोईमैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्तालेकिन उसकी सारी गिरहेंसाफ़ नजऱ आती हैं मेरे यार जुलाहे
- 15 अगस्त पर विशेष आलेख- डॉ. ओम प्रकाश डहरिया- सहायक जनसम्पर्क अधिकारीरायपुर । देश 80वें स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मना रहा है। यह अवसर केवल स्वतंत्रता के गौरव का नहीं, बल्कि विकास की उस सतत् यात्रा का भी है, जिसने भारत के कृषि क्षेत्र को नई दिशा दी है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले ढाई वर्षों में खेती-किसानी को केवल उत्पादन तक सीमित न रखकर उसे आधुनिक, पारदर्शी, तकनीक आधारित और किसान-केंद्रित बनाने का व्यापक अभियान चलाया है। कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्री श्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन तथा कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी के निर्देशन में कृषि विभाग ने किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान उपलब्ध कराने, उर्वरकों की सतत् निगरानी, पारदर्शी वितरण व्यवस्था तथा गुणवत्ता नियंत्रण के माध्यम से ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। छत्तीसगढ़ के किसानों को आत्मनिर्भर, समृद्ध बनाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।राज्य सरकार की प्राथमिकता रही है कि किसानों को समय पर प्रमाणित खाद-बीज उपलब्ध हो और किसी भी स्थिति में खाद की कालाबाजारी, जमाखोरी अथवा नकली उर्वरकों का नुकसान किसानों को न उठाना पड़े। इसी सोच के परिणामस्वरूप खरीफ 2026 में प्रदेश में 48.69 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के विरुद्ध 11 अगस्त तक 45.62 लाख हेक्टेयर अर्थात लगभग 94 प्रतिशत क्षेत्र में बोनी पूरी हो चुकी है। किसानों को अब तक 11.23 लाख मीट्रिक टन उर्वरक तथा 4.55 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित किए जा चुके हैं। उर्वरकों के 15.55 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य के विरुद्ध 15.83 लाख मीट्रिक टन का भंडारण कर राज्य ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी किसान को खाद की कमी का सामना न करना पड़े। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने स्वयं अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सुगमता से प्रमाणित खाद-बीज उपलब्ध कराया जाए और किसी भी प्रकार की लापरवाही पर कठोर कार्रवाई हो। इसके साथ ही किसानों को खेती किसानी करने में किसी प्रकार की समस्या न हो, इस उद्देश्य से ठोस रासायनिक खाद के विकल्प के रूप में तरल नैनो उर्वरक के प्रति किसानों को जागरूक करने का काम भी विभाग के माध्यम से किया जा रहा है।कृषि क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि उर्वरकों की गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था रही है। कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी के नेतृत्व में विभाग ने नकली एवं अमानक उर्वरकों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया। वर्ष 2025 की तुलना में वर्ष 2026 में प्रवर्तन कार्रवाइयों में 11.20 गुना वृद्धि दर्ज हुई और कुल कार्रवाई 44 से बढ़कर 493 मामलों तक पहुंच गई। न्यायालयीन प्रकरण 4 से बढ़कर 65, जब्ती की कार्रवाई 2 से बढ़कर 107, लाइसेंस निलंबन 3 से बढ़कर 106, लाइसेंस निरस्तीकरण 2 से बढ़कर 15 तथा विक्रय प्रतिबंध 33 से बढ़कर 189 मामलों तक पहुंचा। पहली बार ग्यारह एफआईआर दर्ज होना विभाग की शून्य सहिष्णुता नीति का प्रमाण है। इन कठोर कदमों ने किसानों का भरोसा मजबूत किया और कृषि आदानों की आपूर्ति व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया।सरकार की किसान हितैषी नीतियों का प्रभाव केवल उर्वरकों तक सीमित नहीं है। कृषक उन्नति योजना के माध्यम से खरीफ 2023 से खरीफ 2025 तक लगभग 25.52 लाख किसानों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिए 35,892.90 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अंतर्गत 24.63 लाख किसानों को 23वीं किस्त के रूप में 493 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मिली। किसानों की सुविधा के लिए एग्रीस्टैक, ई-केवाईसी और डिजिटल सेवाओं का विस्तार कर योजनाओं को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया गया है।कृषि को आधुनिक स्वरूप देने के लिए राज्य सरकार ने कृषि यंत्रीकरण, सूक्ष्म सिंचाई और प्राकृतिक खेती पर विशेष बल दिया है। अब तक 7,745 किसानों को आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराए गए हैं तथा 568 फार्म मशीनरी बैंक स्थापित किए गए हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत लगभग 41,967 हेक्टेयर क्षेत्र में ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार किया गया है। वहीं 57 हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़कर पर्यावरण संरक्षण और कम लागत वाली खेती को प्रोत्साहित किया गया है।उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य पालन के क्षेत्रों में भी राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़कर 8.91 लाख हेक्टेयर पहुंच चुका है। ऑयल पाम और बांस रोपण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि हाईटेक नर्सरी, पैक हाउस और कोल्ड स्टोरेज जैसी अधोसंरचनाएं तेजी से विकसित की जा रही हैं। पशुपालन में दुग्ध उत्पादन, डेयरी भुगतान व्यवस्था और मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार हुआ है, वहीं मत्स्य उत्पादन लगभग 23 प्रतिशत बढ़कर 9.59 लाख टन तक पहुंच गया है, जिससे छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी मत्स्य उत्पादक राज्यों में शामिल हो चुका है।कृषि विपणन और अधोसंरचना के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां सामने आई हैं। राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) से प्रदेश की 21 मंडियां जुड़ चुकी हैं तथा कृषि अवसंरचना निधि के अंतर्गत 1,900 करोड़ रुपये के लक्ष्य के विरुद्ध 3,026 करोड़ रुपये की उपलब्धि प्राप्त हुई है। बीज उत्पादन एवं प्रमाणीकरण की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन की गई है तथा रायपुर की शासकीय बीज परीक्षण प्रयोगशाला को एनएबीएल मान्यता मिलना राज्य की वैज्ञानिक कृषि व्यवस्था का प्रमाण है।स्वतंत्रता के 79 वर्षों की इस ऐतिहासिक बेला पर छत्तीसगढ़ का कृषि परिदृश्य स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार की योजनाबद्ध नीति, प्रभावी प्रशासन, पारदर्शी व्यवस्था और किसानों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने खेती-किसानी को नई ऊर्जा प्रदान की है। गुणवत्तापूर्ण उर्वरकों की उपलब्धता, कठोर गुणवत्ता नियंत्रण, डिजिटल सेवाओं का विस्तार, आधुनिक तकनीकों का समावेश और किसान-केंद्रित योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन प्रदेश के कृषि विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व, कृषि मंत्री श्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन और कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी के प्रशासनिक नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर, आधुनिक और समृद्ध कृषि व्यवस्था की दिशा में एक सशक्त उदाहरण बनकर उभर रहा है।
-
छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति परंपरा व आस्था से जुड़ा है हरेली तिहार
•छगन लाल लोन्हारे
संयुक्त संचालक जनसंपर्क
रायपुर/प्रदेश सरकार किसानों के आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। गांव, गरीब और किसान सरकार की पहली प्राथमिकता में हैं। देश की जीडीपी में कृषि का बड़ा योगदान है, छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी कृषि ही है और छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार की इन ढाई साल के अवधि में किसानों के हित में लिए गए नीतिगत फैसलों से खेती किसानी को नया संबल मिला है। बीते खरीफ विपणन वर्ष में किसानों से समर्थन मूल्य पर 141.05 लाख मीेट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। छत्तीसगढ़ में हरेली त्यौहार का विशेष महत्व है। हरेली छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह त्यौहार परंपरागत् रूप से उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन किसान खेती-किसानी में उपयोग आने वाले कृषि यंत्रों की पूजा करते हैं और घरों में माटी पूजन होता है। गांव में बच्चे और युवा गेड़ी का आनंद लेते हैं। इस त्यौहार से छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक पर्वों की महत्ता भी बढ़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में गेड़ी के बिना हरेली तिहार अधूरा है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार द्वारा पंजीकृत किसानों से समर्थन मूल्य पर प्रति एकड़ 21 क्विंटल 3100 रूपए प्रति क्विंटल की मान से धान खरीदीकर न सिर्फ किसानों को मान बढ़ाया, बल्कि किसानों को उन्नति की ओर ले जाने में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। साथ ही किसानों के खाते में रमन सरकार के पिछले दो वर्ष का बकाया धान के बोनस 3716.38 करोड़ रूपए अंतरित कर किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर दी है। मुख्यमंत्री का मानना है कि भारत गांवों में बसता है। जब किसान खुशहाल होंगे तो प्रदेश का व्यापार, उद्योग बढे़गा।
परंपरा के अनुसार वर्षों से छत्तीसगढ़ के गांव में अक्सर हरेली तिहार के पहले बढ़ई के घर में गेड़ी का ऑर्डर रहता था और बच्चों की जिद पर अभिभावक जैसे-तैसे गेड़ी भी बनाया करते थे। हरेली तिहार के दिन सुबह से तालाब के पनघट में किसान परिवार, बड़े बजुर्ग बच्चे सभी अपने गाय, बैल, बछड़े को नहलाते हैं और खेती-किसानी, औजार, हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को साफ कर घर के आंगन में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है। अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं की साथ पूजा करते हैं। गांवों के गुड़ी में ठाकुरदेव की पूजा की जाती है।
हरेली पर्व के दिन पशुधन के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए औषधियुक्त आटे की लोंदी खिलाई जाती है। गांव में यादव समाज के लोग वनांचल जाकर कंदमूल लाकर हरेली के दिन किसानों को पशुओं के लिए वनौषधि उपलब्ध कराते हैं। गांव के सहाड़ादेव अथवा ठाकुरदेव के पास यादव समाज के लोग जंगल से लाई गई जड़ी-बूटी उबाल कर किसानों को देते हैं। इसके बदले किसानों द्वारा चावल, दाल आदि उपहार में यादवों को भेंट करने की परंपरा रही हैं।
सावन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरेली पर्व मनाया जाता है। हरेली का आशय हरियाली ही है। वर्षा ऋतु में धरती हरा चादर ओड़ लेती है। वातावरण चारों ओर हरा-भरा नजर आने लगता है। हरेली पर्व आते तक खरीफ फसल आदि की खेती-किसानी का कार्य लगभग हो जाता है। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धोकर, धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ का चीला भोग लगाया जाता है। गांव के ठाकुर देव की पूजा की जाती है और उनको नारियल अर्पण किया जाता है।
हरेली तिहार के साथ गेड़ी चढ़ने की परंपरा अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग सभी परिवारों द्वारा गेड़ी का निर्माण किया जाता है। परिवार के बच्चे और युवा गेड़ी का जमकर आनंद लेते है। गेड़ी बांस से बनाई जाती है। दो बांस में बराबर दूरी पर कील लगाई जाती है। एक और बांस के टुकड़ों को बीच से फाड़कर उन्हें दो भागों में बांटा जाता है। उसे नारियल रस्सी से बांध़कर दो पउआ बनाया जाता है। यह पउआ असल में पैर दान होता है जिसे लंबाई में पहले कांटे गए दो बांसों में लगाई गई कील के ऊपर बांध दिया जाता है। गेड़ी पर चलते समय रच-रच की ध्वनि निकलती हैं, जो वातावरण को औैर आनंददायक बना देती है। इसलिए किसान भाई इस दिन पशुधन आदि को नहला-धुला कर पूजा करते हैं। गेहूं आटे को गंूथ कर गोल-गोल बनाकर अरंडी या खम्हार पेड़ के पत्ते में लपेटकर गोधन को औषधि खिलाते हैं। ताकि गोधन को रोगों से बचाया जा सके। गांव में पौनी-पसारी जैसे राऊत, लोहार व बैगा हर घर के दरवाजे पर नीम की डाली खोंचते हैं। गांव में लोहार अनिष्ट की आशंका को दूर करने के लिए चौखट में कील लगाते हैं। यह परम्परा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान है।
पिहले के दशक में गांव में बारिश के समय कीचड़ आदि हो जाता था उस समय गेड़ी से गली का भ्रमण करने का अपना अलग ही आनंद रहता था। गांव-गांव में गली कांक्रीटीकरण से अब कीचड़ की समस्या काफी हद तक दूर हो गई है। हरेली के दिन गृहणियां अपने चूल्हे-चौके में कई प्रकार के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाती है। किसान अपने खेती-किसानी के उपयोग में आने वाले औजार नांगर, कोपर, दतारी, टंगिया, बसुला, कुदारी, सब्बल, गैती आदि की पूजा कर छत्तीसगढ़ी व्यंजन गुलगुल भजिया व गुड़हा चीला का भोग लगाते हैं। इसके अलावा गेड़ी की पूजा भी की जाती है। शाम को युवा वर्ग, बच्चे गांव के गली में नारियल फेंक और गांव के खेल मैदान में कबड्डी आदि कई तरह के खेल खेलते हैं। बहु-बेटियां नए वस्त्र धारण कर सावन झूला, बिल्लस, खो-खो, फुगड़ी आदि खेल का आनंद लेती हैं।
हरेली तिहार सामाजिक समरसता का प्रतीक है यह केवल धार्मिक या कृषि पर्व नहीं है यह समाज के सभी वर्गों को एक साथ जोड़ने का माध्यम है। गांव के लोग मिल-जुलकर पूजा और कार्यक्रमों का आयोजन करते है। इस दिन परिवार में सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। - - डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।जग पुलकित हर्षित पर मेरी, देह-लता मुरझाई है ।।ताल दे रहीं बूँदें छम-छम, मौन हुई मेरी पायल।प्रेमी युगल प्रणय क्रीड़ा रत, देख हुआ अंतस् घायल।छवि-दर्शन कर तस्वीरों में, आती मुझे रुलाई है ।।सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।।नेह-मेह आराधन करते, उमड़-घुमड़ गरजें बादल।अश्रु-धार की झड़ी लगी है, बिखरा नैनों का काजल ।खिल-खिल बेला इठलाती पर, मन को नहीं लुभाई है।।सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।।प्रेम-रंग में मन अनुरंजित, रंग नहीं देखे दूजा ।शिव भक्तों पर करें अनुग्रह, करती हूँ मन से पूजा।निविड़ निशा कारा पीड़ा की, दिवस लगे दुखदाई है।।सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।।
-
श्रमिकों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता
विशेष लेख : छगन लाल लोन्हारे , संयुक्त संचालक, जनसंपर्करायपुर । पिछले ढाई साल में श्रम विभाग ने गढ़ी सुरक्षा, सम्मान और समृद्धि की मिसाल। छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले ढाई वर्षों में श्रमिकों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए अनेक ऐतिहासिक पहल की हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने श्रमिक कल्याण को केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सुशासन, पारदर्शिता और तकनीकी नवाचार से जोड़ते हुए श्रमिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य किया है। वहीं श्रम एवं उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन के मार्गदर्शन में विभाग ने श्रमिकों तक योजनाओं का लाभ तेज़ी और सरलता से पहुंचाने के लिए व्यापक सुधार किए हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा श्रमिकों एवं उनके परिजनों की बेहतरी के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही है, इन योजनाओ के माध्यम से श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। राज्य में संगठित, असंगठित और निर्माण श्रमिकों के हितों के संरक्षण के लिए विभिन्न श्रम कल्याण मंडलों के माध्यम से 67 कल्याणकारी योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। श्रमिकों के पंजीयन, सहायता और योजनाओं के लाभ को अधिक पारदर्शी एवं सुगम बनाने के लिए श्रम विभाग ने नई यूजर-फ्रेंडली वेबसाइटhttps://shramevjayate.cg.gov.in/श्रमेव जयते मोबाइल एप विकसित किया है, जिससे श्रमिक अब ऑनलाइन आवेदन, पंजीयन और अन्य सुविधाओं का लाभ आसानी से प्राप्त कर रहे हैं। ढाई वर्षों में श्रम विभाग ने प्रशासनिक व्यवस्था को भी मजबूत किया है। 5 नए जिलों (मोहला-मानपुर-अंबागढ़,चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, ,सारंगढ़-बिलाईगढ़, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर एवं सक्ती) में श्रम अधिकारी कार्यालय की स्थापना हेतु 20 पदों का सृजन किया गया है। वर्तमान में 10 जिलों के सहायक श्रमायुक्त कार्यालय तथा 23 जिलों में श्रम पदाधिकारी कार्यालय संचालित है। इस प्रकार राज्य के सभी 33 जिलों में श्रम कार्यालयों का संचालन सुनिश्चित किया गया है। इसके साथ ही विभिन्न पदों पर नियुक्तियां कर विभागीय क्षमता को भी बढ़ाया गया है। उद्योगों और श्रमिकों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से श्रम कानूनों में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। दुकानों एवं स्थापना अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन, फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट, महिला श्रमिकों के लिए रात्रिकालीन कार्य की सुविधा, फैक्ट्री लाइसेंस की अवधि बढ़ाने जैसे अनेक निर्णयों ने रोजगार सृजन के साथ श्रमिक अधिकारों को भी मजबूत किया है। श्रम विभाग की उपलब्धियों में सबसे उल्लेखनीय सफलता श्रमिक पंजीयन और हितलाभ वितरण रही है। 1 जनवरी 2024 से 30 जून 2026 के बीच लगभग 12.65 लाख नए श्रमिकों का पंजीयन किया गया। लगभग 17.82 लाख श्रमिकों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाभान्वित किया गया, जिन पर लगभग 800 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। निर्माण श्रमिकों को लगभग 780 करोड़ रुपये तथा असंगठित श्रमिकों को लगभग 187 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई। लाभ वितरण को पारदर्शी बनाने के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली लागू की गई है।मुख्यमंत्री श्रम संसाधन केंद्रों की स्थापना श्रमिकों के लिए बड़ी राहत साबित हुई है। मुख्यमंत्री श्रमिक सहायता केंद्र 24 घंटे, सात दिन संचालित किया जा रहा है। संचालित राज्यभर में मोबाइल शिविर आयोजित कर लाखों श्रमिकों के पंजीयन, नवीनीकरण और आवेदन संबंधी समस्याओं का समाधान किया गया है। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के श्रमिकों को भी सरकारी सेवाओं का लाभ घर के समीप मिल रहा है। राज्य सरकार ने श्रमिक परिवारों के सामाजिक सुरक्षा कवच को भी मजबूत किया है। मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना के तहत आवास सहायता राशि बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये की गई है। मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता, छात्रवृत्ति, श्रमिक परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा सहायता तथा अन्य योजनाओं के माध्यम से हजारों परिवारों को आर्थिक संबल मिला है।महिला श्रमिकों के सम्मान और सुरक्षा की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। मिनीमाता महतारी जतन योजना के अंतर्गत निर्माण एवं असंगठित क्षेत्र की 1.60 लाख से अधिक महिला श्रमिकों को मातृत्व सहायता प्रदान की गई। वहीं ’शहीद वीरनारायण सिंह श्रम अन्न योजना’ के माध्यम से पंजीकृत श्रमिकों को मात्र 5 रुपये में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। श्रमिकों के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए मेधावी शिक्षा सहायता, निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग तथा छात्रवृत्ति योजनाओं का प्रभावी संचालन किया जा रहा है। हजारों विद्यार्थियों को इन योजनाओं का लाभ मिला है, जिससे श्रमिक परिवारों के सपनों को नई उड़ान मिल रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में श्रमिक कल्याण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का जो संकल्प लिया गया है, उसे श्रम एवं उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन के नेतृत्व में श्रम विभाग प्रभावी रूप से जमीन पर उतार रहा है। पारदर्शी व्यवस्था, तकनीकी नवाचार, त्वरित सेवा, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक सम्मान की भावना ने छत्तीसगढ़ को श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में नई पहचान दी है। ढाई वर्षों की यह यात्रा केवल योजनाओं और आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि लाखों श्रमिक परिवारों के जीवन में आए विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि की नई शुरुआत है। - -सामाजिक सुरक्षा से आत्मनिर्भरता की राह परआलेख- डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर (उप संचालक )रायपुर । भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह स्पष्ट हो चुका है कि वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज का कोई भी वर्ग पीछे न छूटे। सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन, सुगम अवसर और आत्मनिर्भरताकृये चार स्तंभ किसी भी आधुनिक कल्याणकारी राज्य की पहचान होते हैं। छत्तीसगढ़ ने पिछले ढाई वर्षों में इन्हीं मूल्यों को केंद्र में रखकर समाज कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन प्रस्तुत किया है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में राज्य ने दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक, विधवा एवं परित्यक्त महिलाओं, उभयलिंगी व्यक्तियों और अन्य जरूरतमंद वर्गों के लिए ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित की हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय को प्रशासनिक प्राथमिकता के रूप में स्थापित किया है। दिसंबर 2023 से जून 2026 के बीच की उपलब्धियाँ इस परिवर्तन की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।राज्य की पेंशन योजनाएँ आज लाखों परिवारों के लिए आर्थिक संबल बन चुकी हैं। मुख्यमंत्री पेंशन योजना के लाभार्थियों की संख्या 7.10 लाख से बढ़कर 7.56 लाख हो गई है। वृद्धावस्था, विधवा, दिव्यांगजन, सामाजिक सुरक्षा और सुखद सहारा जैसी योजनाओं को मिलाकर 21.73 लाख से अधिक नागरिक नियमित सहायता प्राप्त कर रहे हैं।इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता इसका डिजिटल सशक्तीकरण है। लगभग 96 प्रतिशत हितग्राहियों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से भुगतान किया जा रहा है और आधार सीडिंग का कार्य भी लगभग पूर्ण हो चुका है। ई-केवाईसी आधारित सत्यापन ने अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय बनाया है।छत्तीसगढ़ ने दिव्यांगजन कल्याण को दान या सहायता की दृष्टि से नहीं, बल्कि अधिकार और समान अवसर के दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया है। विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (यूडीआईडी) धारकों की संख्या 2.44 लाख से बढ़कर 2.77 लाख हो गई है।कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण योजना में लाभार्थियों की संख्या 1,161 से बढ़कर 17,038 तक पहुँचना राज्य की सक्रिय पहुँच और प्रभावी क्रियान्वयन का प्रमाण है। सामर्थ्य विकास योजना के माध्यम से कौशल, पुनर्वास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया गया है।दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति योजनाओं का विस्तार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राज्य छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 14 हजार से अधिक हो गई है। इससे स्पष्ट है कि राज्य शिक्षा को दिव्यांगजन सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी माध्यम मान रहा है।फिजिकल रिफरल रिहैबिलिटेशन सेंटर, स्पेशल पाली क्लिनिक और विशेष विद्यालयों के विस्तार ने स्वास्थ्य, शिक्षा और पुनर्वास सेवाओं को एकीकृत स्वरूप प्रदान किया है।बढ़ती वृद्धजन आबादी के बीच छत्तीसगढ़ ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए संवेदनशील सहायता तंत्र विकसित किया है। वृद्धाश्रमों, आश्रय गृहों और देखरेख संस्थाओं की क्षमता में वृद्धि के साथ-साथ सियान हेल्पलाइन (155326) को प्रभावी सहायता मंच के रूप में विकसित किया गया है।इस हेल्पलाइन पर प्राप्त कॉलों की संख्या 1.14 लाख से बढ़कर 2.87 लाख तक पहुँच गई है। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि बुजुर्ग नागरिकों के बढ़ते विश्वास और प्रशासन की सक्रिय पहुँच का संकेत है।समाज कल्याण विभाग ने नशामुक्ति को स्वास्थ्य और सामाजिक पुनर्वास दोनों से जोड़कर देखा है। भारत माता वाहिनी योजना के अंतर्गत संचालित नशामुक्ति केंद्रों की संख्या 11 से बढ़कर 29 हो गई है, जबकि लाभार्थियों की संख्या 1,967 से बढ़कर 5,220 तक पहुँच गई है।इन केंद्रों में उपचार के साथ परामर्श, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे प्रभावित व्यक्तियों को पुनः सम्मानजनक जीवन की मुख्यधारा में लौटने का अवसर मिल रहा है।दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम और ‘एक्सेसिबल इंडिया अभियान’ की भावना को आगे बढ़ाते हुए राज्य ने “सुगम्य छत्तीसगढ़ अभियान” प्रारंभ किया है। सार्वजनिक भवनों, कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सरकारी परिसरों को दिव्यांग-अनुकूल बनाने की दिशा में व्यवस्थित कार्य किया जा रहा है।यह पहल केवल रैंप या भौतिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन सेवाओं को सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाने की व्यापक सोच का हिस्सा है। दिव्यांगजनों के अधिकारों की प्रभावी निगरानी के लिए “आयुक्त राज्य” के नवीन पद की स्वीकृति इस दिशा में दूरदर्शी प्रशासनिक पहल मानी जा रही है।कल्याणकारी योजनाओं की स्थिर सफलता के लिए मजबूत संस्थागत ढाँचा आवश्यक होता है। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार ने विशेष विद्यालय, माना कैंप रायपुर के भवन निर्माण, दृष्टि एवं श्रवण बाधित विद्यालयों के उन्नयन, फिजिकल रिहैबिलिटेशन सेंटर के विस्तार, दिव्यांगजन वित्त विकास निगम के माध्यम से ऋण वितरण तथा नशामुक्ति केंद्रों के सुदृढ़ीकरण के लिए महत्वपूर्ण निवेश किए हैं।वित्तीय वर्ष 2023-24 में समाज कल्याण विभाग का बजट 1,512 करोड़ रुपये था, जिसे बढ़ाकर वर्ष 2025-26 में 1,600 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया गया है। यह वृद्धि दर्शाती है कि राज्य सरकार सामाजिक कल्याण को व्यय नहीं, बल्कि मानव पूंजी और सामाजिक स्थिरता में दीर्घकालिक निवेश के रूप में देख रही है।छत्तीसगढ़ मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहाँ डिजिटल प्रशासन और मानवीय संवेदनशीलता एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं। डीबीटी, आधार सीडिंग, ई-केवाईसी, डिजिटल डेटा प्रबंधन और हेल्पलाइन आधारित सहायता प्रणाली ने योजनाओं की दक्षता बढ़ाई है।साथ ही पुनर्वास, परामर्श, आश्रय, सामुदायिक सहयोग और व्यक्तिगत सहायता जैसी सेवाओं को समान महत्व देकर यह सुनिश्चित किया गया है कि तकनीक मानव केंद्रित शासन का माध्यम बने, उसका विकल्प नहीं।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने यह प्रमाणित किया है कि प्रभावी समाज कल्याण केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि संवेदनशील नीति, पारदर्शी क्रियान्वयन और सतत संस्थागत निर्माण से संभव होता है।पिछले ढाई वर्षों की उपलब्धियाँ लाखों वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षित वृद्धावस्था, हजारों दिव्यांगजनों की बढ़ती आत्मनिर्भरता, जरूरतमंद महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा, नशामुक्त जीवन की ओर बढ़ते युवाओं और सम्मानजनक पुनर्वास की नई संभावनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं।छत्तीसगढ़ का यह समावेशी समाज कल्याण मॉडल सामाजिक न्याय, तकनीकी नवाचार और मानवीय गरिमा के संतुलित समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह केवल राज्य की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस विकसित और संवेदनशील भारत की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है, जहाँ हर नागरिक को सुरक्षा, सम्मान और आगे बढ़ने का समान अवसर प्राप्त हो सके।
- -माँ का दूध नवजात शिशु की प्रतिरक्षा की पहली खुराक है-अमृत तुल्य है माँ का पहला गाढ़ा पीला दूधविशेष लेख - धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्करायपुर / विश्व स्तनपान सप्ताह हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य शिशु के स्वास्थ्य के लिए माँ के दूध के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करना है। जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और शुरुआती छह महीने तक केवल माँ का दूध ही देना बच्चे के लिए सबसे जरूरी है। स्तनपान के दौरान त्वचा से त्वचा का संपर्क मां और बच्चे के बीच भावनात्मक बंधन को मजबूत करता है, जिससे आराम, गर्माहट और सुरक्षा की भावना मिलती है जो स्वस्थ भावनात्मक विकास में सहायक होती है।हर साल 1 अगस्त से 7 अगस्त तक दुनिया भर में विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य माताओं और समाज को शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के अनुसार, शिशु के जन्म के बाद पहला घंटा और शुरुआती छह महीने उसका पूरा जीवन संवारने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। स्तनपान करने वाले शिशुओं में दस्त, निमोनिया, कान के संक्रमण और कुछ श्वसन संबंधी संक्रमण जैसी आम बचपन की बीमारियों का खतरा कम होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, इष्टतम स्तनपान शिशुओं को जानलेवा संक्रमणों से बचाकर विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लाखों शिशु मृत्यु को रोकने की क्षमता रखता है।जन्म के पहले कुछ घंटों में, माँ का दूध सिर्फ़ भोजन नहीं होता, बल्कि यह नवजात शिशु की प्रतिरक्षा की पहली खुराक होती है, जो सीधे माँ के शरीर से बच्चे तक पहुँचती है। जन्म के बाद का पहला घंटा, जिसे अक्सर गोल्डन आवर कहा जाता है, स्तनपान शुरू करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान बच्चे स्वाभाविक रूप से सतर्क रहते हैं और सहज रूप से स्तन की तलाश करते हैं। त्वचा से त्वचा का शुरुआती संपर्क न केवल सफल स्तनपान की दर को बढ़ाता है, बल्कि बच्चे के तापमान, हृदय गति और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।शिशु के जन्म के तुरंत बाद (एक घंटे के भीतर) मां का पहला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलस्ट्रम कहा जाता है, बच्चे का पहला प्राकृतिक टीका होता है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीबॉडीज, प्रोटीन और विटामिन होते हैं, जो नवजात शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती प्रदान करते हैं और उसे विभिन्न प्रकार के संक्रमणों से बचाते हैं।चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है कि जन्म से लेकर 6 महीने की उम्र तक बच्चे को केवल मां का दूध ही देना चाहिए। इस अवधि के दौरान बच्चे को पानी, ऊपर का दूध या शहद जैसी चीजें देने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि मां के दूध में बच्चे की प्यास और भूख बुझाने के लिए सही अनुपात में पानी और सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। 6 महीने पूरे होने के बाद, स्तनपान जारी रखते हुए बच्चे को धीरे-धीरे ऊपरी पौष्टिक आहार देना शुरू किया जा सकता है, जिसे 2 साल या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।शिशु के लिए स्वास्थ्य वरदान है, स्तनपान कराने से बच्चों में दस्त, निमोनिया, कान के संक्रमण और कुपोषण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि स्तनपान करने वाले बच्चों का बौद्धिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य अन्य बच्चों की तुलना में बेहतर होता है। यह आगे चलकर बच्चों में मोटापा, डायबिटीज और अस्थामा जैसी क्रोनिक बीमारियों की संभावना को घटाता है।स्तनपान कराने से माताओं में स्तन कैंसर और अंडाशय के कैंसर का जोखिम कम होता है। यह प्रसव के बाद वजन घटाने और गर्भाशय को पुनः सामान्य आकार में लाने में मदद करता है। मां और बच्चे के बीच एक भावनात्मक और अटूट संबंध स्थापित होता है। स्तनपान केवल एक मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज की साझी जिम्मेदारी है। अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव, सामाजिक रूढ़ियों, या कामकाजी माहौल में सुविधाओं की कमी के कारण महिलाएं समय पर स्तनपान नहीं करा पातीं। प्रसव के बाद मां को सही पोषण, मानसिक शांति और आराम मिलना आवश्यक है ताकि वह बिना किसी तनाव के बच्चे को स्तनपान करा सके। कामकाजी माताओं के लिए कार्यस्थलों में क्रैच सुविधा, मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) और ब्रेस्टफीडिंग ब्रेक जैसी सुविधाएं होना बेहद जरूरी है। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और मॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर माताओं के लिए सुरक्षित और स्वच्छ फीडिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए।विश्व स्तनपान सप्ताह हमें यह याद दिलाता है कि बच्चों को उनका मौलिक अधिकार मां का दूध दिलाने के लिए हम सभी को मिलकर एक अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। जब एक मां बिना किसी संकोच और बाधा के अपने बच्चे को स्तनपान करा सकेगी, तभी हम एक कुपोषण-मुक्त और स्वस्थ समाज की कल्पना साकार कर सकते हैं।
- -बच्चों के पोषण, संरक्षण और सर्वांगीण विकास का नया अध्याय-पोषण पखवाड़ा में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर पहले स्थान परआलेख • डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर(उप, संचालक)रायपुर / किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति उसके बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा से मापी जाती है। छत्तीसगढ़ ने इसी सोच को आधार बनाकर बच्चों के सर्वांगीण विकास को शासन की सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की दूरदर्शी नीतियों और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के सक्रिय नेतृत्व में प्रदेश में बच्चों के पोषण, संरक्षण और भविष्य निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई हैं। आईसीडीएस, मिशन वात्सल्य, पोषण अभियान और बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन ने राज्य को बाल विकास के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई है।प्रदेश में 11 हजार 490 आंगनबाड़ी केंद्रों को सक्षम और आकर्षक बनाने का कार्य तेजी से जारी है। इन केंद्रों में बिल्डिंग एज़ लर्निंग एड (BaLA) पेंटिंग, पोषण वाटिका, खेल एवं शिक्षण आधारित गतिविधियों जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जिससे बच्चे सीखने के साथ आनंदमय वातावरण में विकसित हो सकें। मनरेगा अभिसरण के माध्यम से 2 हजार 337 नए आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण को स्वीकृति मिली है। वहीं पीएम जनमन योजना के अंतर्गत 191 नए आंगनबाड़ी केंद्र संचालित किए जा चुके हैं। नियद नेल्ला नार 2.0 के तहत 10 जिलों में 12 हजार 964 आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं।मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की संख्या 51 हजार 45 से बढ़कर 52 हजार 258 तथा सहायिकाओं की संख्या 44 हजार 826 से बढ़कर 51 हजार 548 हो गई है, जिससे सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में सुधार आया है। छत्तीसगढ़ राज्य में बच्चों में कुपोषण कम करने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। पोषण ट्रैकर ऐप के आंकड़ों के अनुसार 0-5 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में स्टंटिंग में 7.82 प्रतिशत की कमी, वेट में 4.36 प्रतिशत की कमी, अंडरवेट में 2.76 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दिसंबर 2023 में जहां बौनापन की दर 30.27 प्रतिशत थी, वह जून 2026 तक घटकर 22.45 प्रतिशत रह गई। यह उपलब्धि पोषण प्रबंधन, नियमित मॉनिटरिंग, सामुदायिक सहभागिता और आंगनबाड़ी आधारित सेवाओं के प्रभावी संचालन का परिणाम है।राष्ट्रीय पोषण माह और पोषण पखवाड़ा के दौरान छत्तीसगढ़ ने देशभर में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वित्तीय वर्ष 2024-25 में छत्तीसगढ़ राज्य प्रति आंगनबाड़ी गतिविधियों में प्रथम स्थान पर रहा। अप्रैल 2025 के पोषण पखवाड़ा में भी छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान प्राप्त किया। प्रदेश में सितंबर-अक्टूबर 2025 के पोषण माह के दौरान 71 हजार 887 गतिविधियां और अप्रैल 2026 के पोषण पखवाड़ा में 34 लाख 93 हजार 474 गतिविधियां आयोजित की गईं। साथ ही स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए रेडी टू ईट इकाइयों की स्थापना की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल शुरू हो चुकी है।अनाथ, परित्यक्त और विशेष संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए मिशन वात्सल्य प्रभावी सुरक्षा कवच बनकर उभरा है। राज्य में बाल देखरेख संस्थाओं की संख्या बढ़कर 109 हो गई है।मुख्यमंत्री बाल उदय योजना के माध्यम से सैकड़ों बच्चों को शिक्षा, देखभाल और पुनर्वास का लाभ मिला है। चाइल्ड हेल्पलाइन में प्राप्त 1 लाख 65 हजार 979 कॉलों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए हजारों मामलों का निराकरण किया गया। बाल संरक्षण सेवाओं के विस्तार का प्रभाव दत्तक ग्रहण और स्पॉन्सरशिप योजनाओं में भी स्पष्ट दिखाई देता है। दत्तक ग्रहण से लाभान्वित बच्चे 42 से बढ़कर 234 और स्पॉन्सरशिप से लाभान्वित बच्चे 767 से बढ़कर 2 हजार 37 हो गए हैं। यह वृद्धि बच्चों को पारिवारिक वातावरण और बेहतर भविष्य उपलब्ध कराने की दिशा में राज्य सरकार की संवेदनशील प्रतिबद्धता को दर्शाती है।राज्य सरकार द्वारा प्रारंभ किए गए बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान ने सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता दोनों को नई दिशा दी है। बाल विवाह प्रतिरोध अधिकारियों की संख्या बढ़कर 1 हजार 382 हो गई है। इसके परिणामस्वरूप रोके गए बाल विवाहों की संख्या 109 से बढ़कर 888 तक पहुंच गई है। यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि बेटियों के शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का संकेत है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में संचालित ये प्रयास छत्तीसगढ़ के लाखों बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षा, शिक्षित और सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर कर रहे हैं। आधुनिक आंगनबाड़ी व्यवस्था, पोषण सुधार, बाल संरक्षण सेवाओं का विस्तार और बाल विवाह उन्मूलन जैसे बहुआयामी प्रयासों ने छत्तीसगढ़ को बाल विकास के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी और आदर्श राज्य के रूप में स्थापित किया है।सशक्त बचपन ही विकसित छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत नींव है और राज्य सरकार उसी नींव को और अधिक मजबूत बनाने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।
- सजल- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)कृष्ण-राधा-प्रेम ने जग को अचंभित कर दिया।छोड़कर अधिकार सब प्रिय को समर्पित कर दिया।।आज की पीढ़ी न जाने त्याग करना प्रेम में।स्वार्थ का विष घोल रिश्तों को कलंकित कर दिया।।प्रेम है विश्वास का घर क्यों भला संशय वहाँ?दंभ के वातास ने प्रियता तिरोहित कर दिया।।दूसरों की थाल लगती है सदा व्यंजन भरी।मूल्य संस्कृति भूल बैठे आत्म प्रवंचित कर दिया।।दीप के नीचे अँधेरा पल रहा था रात भर।रोशनी को दोष देकर व्यर्थ दंडित कर दिया।।
-
मोहम्मद रफी- पुण्यतिथि पर विशेष-31 जुलाई
आलेख प्रशांत शर्मासुहानी रात ढल चुकी , न जाने तुम कब आओगे, यह गाना मोहम्मद रफी साहब ने गाया है और आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर इसी गाने और इस फिल्म तथा इसके कलाकारों की चर्चा हम यहां कर रहे हंै।फिल्म थी दुलारी और इसका निर्माण 1949 में हुआ था। फि़ल्म के मुख्य कलाकार थे सुरेश, मधुबाला और गीता बाली। फि़ल्म का निर्देशन अब्दुल रशीद कारदार साहब ने किया था। 1949 का साल गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद के लिए ढेर सारी खुशियां लेकर आया। 1949 में महबूब ख़ान की फि़ल्म अंदाज़ , ताजमहल पिक्चर्स की फि़ल्म चांदनी रात , तथा ए. आर. कारदार साहब की दो फि़ल्में दिल्लगी और दुलारी प्रदर्शित हुई थीं और ये सभी फि़ल्मों का गीत संगीत बेहद लोकप्रिय सिद्ध हुआ था। फिल्म दुलारी 1 जनवरी 1949 को प्रदर्शित हुई थी। पूरी फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट है।आज जब दुलारी के इस गाने की चर्चा हो रही है, तो हम बता दें कि इसी फिल्म में लता मंगेशकर और रफ़ी साहब ने अपना पहला डुएट गीत गाया था और यह गीत था-मिल मिल के गाएंगे दो दिल यहां, एक तेरा एक मेरा । फिल्म में दोनों का गाया एक और युगल गीत था -रात रंगीली मस्त नज़ारे, गीत सुनाए चांद सितारे । लता और रफी की यह जोड़ी काफी पसंद की गई और उसके बाद तो उन्होंने ऐसे- ऐसे यादगार गाने दिए हैं कि यदि उनका जिक्र करते जाएं तो न जाने कितने ही दिन गुजर जाएंगे, लेकिन बातें खत्म नहीं होंगी।फिल्म में मोहम्मद रफ़ी की एकल आवाज़ में नौशाद साहब ने सुहानी रात ढल चुकी गीत.. -राग पहाड़ी पर बनाया । इसी फि़ल्म का गीत तोड़ दिया दिल मेरा.. भी इसी राग पर आधारित है। राग पहाड़ी नौशाद साहब का काफी लोकप्रिय शास्त्रीय राग रहा है और उन्होंने इस पर आधारित कई गाने तैयार किए हैं। इसमें से जो गाने रफी साहब की आवाज में हैं, वे हैं-1.. आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (फिल्म-राम और श्याम)2. दिल तोडऩे वाले तुझे दिल ढ़ूंढ रहा है (सन ऑफ़ इंडिया)3. दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात (कोहिनूर)4. कोई प्यार की देखे जादूगरी (कोहिनूर)5. ओ दूर के मुसाफिऱ हम को भी साथ ले ले (उडऩ खटोला)फिल्म दुलारी में कुल 12 गाने थे। 14 रील की इस फिल्म में ये गाने कहानी की तरह ही चलते हैं । नायिका मधुबाला के लिए लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। वहीं गीता बाली के लिए शमशाद बेगम ने दो गाने गाए थे। जिसमें से शमशाद बेगम का गाया एक गाना - न बोल पी पी मोरे अंगना , पक्षी जा रे जा...काफी लोकप्रिय हुआ था। नायक सुरेश के लिए रफी साहब ने आवाज दी थी। इसमें से 9 गाने लता मंगेशकर ने गाए जिसमें रफी साहब के साथ उनका दो डुएट भी शामिल है। रफी साहब ने केवल एक गाना एकल गाया और वह है -सुहानी रात ढल चुकी जिसे आज भी रफी साहब के सबसे हिट गानों में शामिल किया जाता है। पूरा गाना इस प्रकार है-सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगेजहां की रुत बदल चुकी, ना जाने तुम कब आओगेअंतरा-1. नज़ारे अपनी मस्तियां, दिखा-दिखा के सो गयेसितारे अपनी रोशनी, लुटा-लुटा के सो गयेहर एक शम्मा जल चुकी, ना जाने तुम कब आओगेसुहानी रात ढल...अंतरा- 2- तड़प रहे हैं हम यहां, तुम्हारे इंतज़ार मेंखिजां का रंग, आ-चला है, मौसम-ए-बहार मेंहवा भी रुख बदल चुकी, ना जाने तुम कब आओगेसुहानी रात ढल......गाने में नायक की नायिका से मिलने की बैचेनी और इंतजार का दर्द शकील साहब ने अपनी कलम से बखूबी उतारा है, तो रफी साहब ने अपनी आवाज से इस गाने को जीवंत बना दिया है। गाने में शब्दों का भारी भरकम जाल नहीं है बल्कि बोल काफी सिंपल हैं, जो बड़ी सहजता से लोगों की जुबां पर चढ़ जाते हैं। गाने की यही खासियत इसे आज तक जिंदा रखे हुए है। गाने के शौकीन आज भी किसी कार्यक्रम में इसे गाना नहीं भूलते हैं। राग पहाड़ी के अनुरूप इसका फिल्मांकन भी हुआ है और दृश्य में नायक चांदनी रात में सुनसान जंगल में नायिका का इंतजार करते हुए यह गाना गाता है। दृश्य में एक टूटा फूटा खंडहर भी नजर आता है, तो नायक की विरान जिंदगी को दर्शाता है, जिसे बहार आने का इंतजार है।दुलारी फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार थी-प्रेम शंकर एक धनी व्यावसायिक का बेटा होता है जिसकी शादी उसके माता-पिता रईस खानदान में करना चाहते हंै। प्रेम शंकर को एक बंजारन लड़की दुलारी से प्यार हो जाता है। यह लड़की बंजारन नहीं बल्कि एक रईस खानदान की बेटी शोभा रहती है, जिसे बंजारे लुटेरे बचपन में उठा लाए थे। यह रोल मधुबाला ने निभाया है। प्रेमशंकर इस लड़की को इस नरक से निकालने के लिए उससे शादी करने का फैसला लेता है। बंजारन की टोली में एक और लड़की रहती है कस्तूरी जिसका रोल गीता बाली ने निभाया है। वह इसी टोली के एक बंजारे लड़के से प्यार करती है, लेकिन उसकी नजर दुलारी पर होती है। प्रेमशंकर के पिता इस शादी के खिलाफ हैं। काफी जद्दोजहद के बाद प्रेमशंकर , दुलारी को इस नरक से निकालने में कामयाब हो जाता है और उनके पिता को भी इस बात का पता चल जाता है कि दुलारी और कोई नहीं उनके ही मित्र की खोई हुई बेटी है जिसे वे बचपन से ही अपनी बहू बनाने का फैसला कर चुके थे। फिल्म के अंत में सब कुछ ठीक हो जाता है और नायक को अपना सच्चा प्यार मिल जाता है। फिल्म में मधुबाला से ज्यादा खूबसूरत गीता बाली नजर आई हैं, लेकिन उनके हिस्से में सह नायिका की भूमिका ही थी। लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के एक साल बाद ही उन्हें फिल्म बावरे नैन में राजकपूर की नायिका बनने का मौका मिला और इसके कुछ 5 साल बाद उन्होंने शम्मी कपूर के साथ शादी कर ली। दुलारी फिल्म मधुबाला की प्रारंभिक फिल्मों में से है। मधुबाला ने जब यह फिल्म की उस वक्त उनकी उम्र मात्र 16 साल की थी।फिल्म की पूरी कहानी चंद पात्रों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। सुरेश के पिता के रोल में अभिनेता जयंत थे जिनका असली नाम जकारिया खान था, लेकिन उन्हें जाने-माने फिल्म निर्माता और निर्देशक विजय भट्ट ने जयंत नाम दिया था। विजय भट्ट आज की फिल्मों के निर्माता-निर्देशक विक्रम भट्ट के दादा थे। जयंत के बेटे अमजद खान हैं जिन्हें आज भी गब्बर सिंह के रूप में पहचाना जाता है। फिल्म दुलारी में नायक सुरेश की मां का रोल प्रतिमा देवी ने निभाया था, जो ज्यादातर फिल्मों में मां का रोल में ही नजर आईं। उनकी फिल्मों में अमर अकबर एंथोनी, पुकार प्रमुख हैं। आखिरी बार वे वर्ष 2000 में बनी फिल्म पलकों की छांव में दिखाई दी थीं। मधुबाला के पिता के रोल में अभिनेता अमर थे। अभिनेता श्याम कुमार ने खलनायक का रोल निभाया था, जो बाद में रोटी, जख्मी जैसी कई फिल्मों में खलनायक के रूप में नजर आए।कभी फुरसत मिले तो इस फिल्म को जरूर देखिएगा, अपने दिलकश गानों की वजह से यह फिल्म दिल तो सुकून देती है। हालांकि अब इसके प्रिंट काफी धुंधले पड़ गए हैं। फिल्म की तकनीक और कहानी आज की पीढ़ी को भले ही पुरानी लगे, लेकिन अपने दौर की यह हिट और क्लासी फिल्म है। - सजल- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)सबका वक्त बदलते देखा।खोटा सिक्का चलते देखा।।कंटक मध्य सुमन मुस्काते।पीड़ा में सुख पलते देखा।।सब कुछ देकर कुछ न माँगते।पावस बनकर ढलते देखा ।।अनजानों से मिला सहारा।अपनों को भी छलते देखा।।सूर्य अस्त हो गया साँझ को।दीप रात भर जलते देखा।।
- -धमतरी में बनेंगे व्यवसायिक परिसर, बोरई बनेगा अंतर्राज्यीय व्यापार एवं परिवहन का नया केंद्रलेख एस.आर.पाराशर, उप संचालकधमतरी । राज्य शासन एवं भारत सरकार द्वारा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के समग्र विकास के लिए संचालित योजनाओं को धमतरी जिले में प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जा रहा है। विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय को आत्मनिर्भर बनाने, आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराने तथा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में जिला प्रशासन द्वारा कई महत्वपूर्ण पहलें की जा रही हैं। इसी कड़ी में जिले के विभिन्न क्षेत्रों में कमार समुदाय के लिए आधुनिक व्यवसायिक परिसरों (कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स) का निर्माण कराया जाएगा, ताकि वे स्वरोजगार स्थापित कर अपनी आय में वृद्धि कर सकें।जिला प्रशासन द्वारा प्रस्तावित इन व्यवसायिक परिसरों का निर्माण जिले के बेलरगांव, कसपुर, बोरई, कुकरेल, सिंगपुर, दुगली एवं केरेगांव में किया जाएगा। इन परिसरों में कमार समुदाय के हितग्राही अपनी आवश्यकता एवं रुचि के अनुसार दुकानें संचालित कर सकेंगे। इससे उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे, आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ेगी तथा आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी नई मजबूती मिलेगी।भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जनमन (PM JANMAN - Pradhan Mantri Janjati Adivasi Nyaya Maha Abhiyan) योजना के माध्यम से विशेष पिछड़ी जनजातियों तक मूलभूत सुविधाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सड़क, पेयजल, बिजली, आजीविका एवं अन्य विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। धमतरी जिले में इस योजना के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप जिले को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, जो जिले के लिए गौरव का विषय है। यह उपलब्धि जनजातीय विकास के प्रति जिला प्रशासन की प्रतिबद्धता तथा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का प्रमाण है।शिक्षा के क्षेत्र में भी कमार समुदाय के बच्चों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। वर्तमान में संचालित कमार विद्यालय को उच्चीकृत कर कक्षा दसवीं से बारहवीं तक संचालित करने की प्रक्रिया जारी है। इससे विद्यार्थियों को उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए दूरस्थ क्षेत्रों में जाने की आवश्यकता नहीं होगी तथा विशेष पिछड़ी जनजाति के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अपने क्षेत्र में ही उपलब्ध हो सकेगी। यह पहल नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों तथा जनजातीय विद्यार्थियों के शैक्षणिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी।इसी प्रकार जिले के औद्योगिक एवं व्यापारिक विकास को गति देने के उद्देश्य से बोरई में अंतर्राज्यीय बस टर्मिनल स्थापित करने का प्रस्ताव भी शासन को भेजा गया है। छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं कांकेर जिले को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु के रूप में विकसित हो रहे बोरई में बस टर्मिनल के निर्माण से यातायात सुविधाएं बेहतर होंगी, यात्रियों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी तथा व्यापार एवं पर्यटन को भी नई गति मिलेगी। बस टर्मिनल के साथ विकसित होने वाला व्यवसायिक परिसर स्थानीय युवाओं एवं जनजातीय हितग्राहियों के लिए रोजगार और व्यवसाय के नए अवसर उपलब्ध कराएगा। बस टर्मिनल के लिए स्थल चयन कर लिया गया है ।राज्य शासन की जनजातीय कल्याण संबंधी योजनाओं तथा भारत सरकार की पीएम जनमन, प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय आजीविका मिशन एवं अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं के समन्वित क्रियान्वयन से धमतरी जिले के दूरस्थ एवं जनजातीय क्षेत्रों में विकास की नई तस्वीर उभर रही है। जिला प्रशासन का प्रयास है कि विकास की मुख्यधारा का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे तथा विशेष पिछड़ी जनजातियों को सम्मानजनक जीवन, स्थायी आजीविका और बेहतर भविष्य उपलब्ध कराया जा सके।कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा ने बताया कि “विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के समग्र विकास के लिए जिला प्रशासन पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है। हमारा उद्देश्य केवल आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें स्थायी आजीविका, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ना है। विभिन्न क्षेत्रों में बनाए जा रहे व्यवसायिक परिसर कमार समुदाय के लोगों को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करेंगे। साथ ही कमार विद्यालय को उच्च माध्यमिक स्तर तक विकसित करने तथा बोरई को अंतर्राज्यीय परिवहन एवं व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री जनमन योजना के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिए जिले को प्राप्त राष्ट्रपति पुरस्कार हमारी पूरी टीम और जनप्रतिनिधियों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। आने वाले समय में भी जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी रूप से पहुंच सके।” मालूम हो कि धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत संकरा के आश्रित गाँव मसानडबरा में प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के तहत विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के लिए पक्के मकान बनाए गए हैं, ताकि उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक आवास मिल सके। यह पहल कमार जनजाति के रहन-सहन और मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए की जा रही है |यह देश की दूसरी और छत्तीसगढ़ की पहली पीएम जनमन आवास कॉलोनी है । यह कॉलोनी विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के लिए बनाई जा रही है। आधुनिकता के दौर में कमार समुदाय की परम्परा,सांस्कृतिक से जुड़े रहने का भी पूरा ख्याल रखा गया है । ताकि नई पीढ़ी को भी अपनी समुदाय की परम्परा, सांस्कृतिक से जुड़े रहे। मसानडबरा में पीएम जनमन आवास कॉलोनी में. पी.एम. सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना से की कार्य योजना बनाई जा रही है । ये आवास पी.एम. सूर्य घर मुफ्त बिजली से जगमग होंगे ।जिले में 1481 आवास स्वीकृत किए गए हैं। इनमें से 1046 आवास पूर्ण हो चुके हैं, जबकि 435 आवास निर्माणाधीन हैं। अधिकारियों ने बताया कि शेष आवास अगले चार माह में पूर्ण कर लिए जाएंगे। ग्रामीणों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण आवास उपलब्ध कराना प्रशासन की पहली प्राथमिकता है।पीएम–जनमन योजना के तहत 36 सड़कों का निर्माण स्वीकृत किया गया है। इन सड़कों की कुल स्वीकृति लागत 1341.60 लाख रुपए है। अधिकांश निर्माण कार्य प्रगति पर है। सड़कें बन जाने से दूरस्थ बसाहटों को बाजार, स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक सेवाओं से बेहतर जोड़ मिलेगा।जल जीवन मिशन के अंतर्गत सभी घरों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करा दिया गया है। साथ ही हर घर का विद्युतीकरण पूर्ण हो चुका है। गांवों में रोशनी पहुँचने से बच्चों की पढ़ाई, आजीविका कार्यों और सुरक्षा की स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है।जनजातीय समुदायों के सर्वांगीण विकास के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित बहुउद्देश्यीय केंद्र ग्रामीण अंचलों में नई संभावनाएँ तैयार कर रहे हैं।नगरी ब्लॉक के बोईरगांव में निर्मित नया बहुउद्देश्यीय केंद्र शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और आजीविका संबंधी गतिविधियों का केंद्र बन रहा है।आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों को ज्ञानवर्धक शिक्षण सामग्री और खिलौने उपलब्ध कराए गए हैं। ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का लाभ, प्रशिक्षण और आवश्यक मार्गदर्शन भी यहीं प्राप्त होगा।50-सीटर बालक छात्रावास निर्माण नगरी विकासखंड के बाजार कुर्रीडीह में 50-सीटर बालक छात्रावास का निर्माण जारी है। इसका कार्य जनवरी तक पूर्ण हो जाएगा। छात्रावास तैयार होने के बाद कमार जनजाति के बच्चों को सुरक्षित आवास, भोजन और अध्ययन की सभी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध होंगी।ग्राम पिपरहीभर्री में एकीकृत ग्राम योजना एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत सामाजिक एवं संसाधन मानचित्र, गैप एनालिसिस, लघुवनोपज प्रबंधन और आजीविका कार्ययोजनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है।यह कार्य ग्रामीण समुदाय को अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन और टिकाऊ विकास की दिशा में सशक्त आधार प्रदान करता है।133 बसाहटों में त्वरित गतिविधियों की सौ फीसदी संतृप्तिजिले की 133 बसाहटों में त्वरित गतिविधियों की पूर्ण संतृप्ति हासिल की गई है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि प्रत्येक कमार परिवार तक योजना का लाभ समय पर पहुँचे। पीएम–जनमन योजना के माध्यम से विकास, सम्मान और आत्मनिर्भरता की रोशनी अब जिले की हर जनजातीय बसाहट तक पहुँच रही है।दूरस्थ अंचलों में रहने वाले परिवार अब मुख्यधारा से तेजी से जुड़ रहे हैं और सुरक्षित, स्वस्थ तथा बेहतर जीवन की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा रहे हैं।
- -320.15 हेक्टेयर में फैला नंदनवन जंगल सफारी बना प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों का पसंदीदा केंद्रआलेख -धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक, जनसंपर्क ,अशोक कुमार चंद्रवंशी ,सहायक जनसंपर्क अधिकारीनंदनवन जंगल सफारी नवाँ रायपुर में पर्यटकों के लिए कई प्रकार की रोमांचक सफारी राइड्स उपलब्ध हैं, जिनमें शाकाहारी सफारी, टाइगर सफारी, भालू सफारी और लायन सफारी प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ एक छोटा चिड़ियाघर (नंदनवन जू) भी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित नंदनवन जंगल सफारी राज्य के प्रमुख पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण केंद्रों में शामिल है। 320.15 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह विशाल परिसर प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों को प्राकृतिक वातावरण में वन्यजीवों को देखने और उनके बारे में जानने का अवसर मिलता है। नंदनवन की शुरुआत वर्ष 1979 में रायपुर में ‘नंदनवन मिनी जू’ के रूप में हुई थी। यह वन्यजीवों के रेस्क्यू और राहत केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। वर्ष 2008 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) ने इसे आधिकारिक रूप से ‘मिनी जू’ की मान्यता दी।इसके बाद नवा रायपुर में आधुनिक और विशाल जंगल सफारी विकसित करने के लिए वर्ष 2012 से 2015 के बीच 320.15 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई। 1 नवंबर 2016 को छत्तीसगढ़ राज्य के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने नंदनवन जंगल सफारी का उद्घाटन किया। नंदनवन जंगल सफारी का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण, दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप सुरक्षित और तनावमुक्त आवास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीवों तथा जैव विविधता के महत्व की जानकारी देने के लिए यहां विभिन्न पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। नंदनवन जंगल सफारी को वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जोन में विकसित किया गया है। 30.89 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जोन में चीतल, सांभर, नीलगाय और काला हिरण जैसे वन्यजीव प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हैं। 20.03 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित भालू सफारी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां भालुओं को प्राकृतिक वातावरण में देखने का अवसर मिलता है।20.04 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली बाघ सफारी में पर्यटक देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को करीब से देखने का रोमांचक अनुभव प्राप्त करते हैं। 20.01 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित सिंह सफारी में एशियाई शेरों का संरक्षण किया जा रहा है।50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जू जोन में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, सरीसृप और अन्य वन्यजीव आकर्षण का केंद्र हैं। नंदनवन जंगल सफारी में विभिन्न चिड़ियाघरों के साथ पशु विनिमय कार्यक्रम के माध्यम से कई दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों को लाया गया है। यहां सफेद बाघ, दरियाई घोड़ा, घड़ियाल और क्लोन जंगली भैंसा ‘दीपाशा’ जैसे वन्यजीव पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं।वनमंडलाधिकारी श्री थेजस शेखर ने बताया कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप की मंशानुरूप नंदनवन जंगल सफारी पर्यटकों के बीच लगातार लोकप्रिय हो रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 में ही देश-विदेश से 1 लाख 74 हजार 611, वर्ष 2019-20 में 1 लाख 60 हजार 767 ,वर्ष 2020-21 में 1 लाख 60 हजार 32, वर्ष 2021-22 में 1 लाख 73 हजार 72, वर्ष 2022-23 में 2 लाख 77 हजार 881, वर्ष 2023-24 में 2 लाख 62 हजार 486, वर्ष 2024-25 में 2 लाख 70 हजार 942, वर्ष 2025-26 में 3 लाख 24 हजार 785, से अधिक पर्यटकों ने जंगल सफारी का भ्रमण किया। यह आंकड़ा इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। नंदनवन जंगल सफारी में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, विश्व बाघ दिवस और वन्यजीव सप्ताह जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से लोगों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है।नंदनवन जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित है। यह स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, रायपुर से लगभग 15 किलोमीटर और रायपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंगल सफारी प्रत्येक सोमवार को बंद रहती है। नंदनवन जंगल सफारी आज छत्तीसगढ़ में पर्यटन, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र बन चुका है, जहां प्रकृति के करीब पहुंचकर वन्यजीवों को देखने के साथ-साथ उनके संरक्षण का संदेश भी मिलता है l
-
मेहमूद की पुण्यतिथि पर विशेष-23 जुलाई
_आलेख- प्रशांत शर्मालोगों को हंसाने की विलक्षण प्रतिभा के धनी प्रख्यात हास्य कलाकार महमूद को कॉमेडी को भारतीय फिल्मों का अभिन्न अंग बनाने का श्रेय जाता है। हंसी-मजाक में बड़ी खूबसूरती से जिंदगी का फलसफा बयान करने का हुनर रखने वाले इस कलाकार ने हास्य भूमिका को नए आयाम और मायने दिये।महमूद ने भारतीय फिल्मों में महज औपचारिकता मानी जाने वाली कॉमेडी को एक अलग और विशेष स्थान दिलाया। उन्होंने कॉमेडी को एक नया स्तर और ऊंचाई देने के साथ-साथ यह भी साबित किया कि फिल्म का हास्य कलाकार उसके नायक पर भी भारी पड़ सकता है।महमूद को भारतीय फिल्मों में कॉमेडी के नए युग की शुरुआत करने वाला कलाकार माना जाता है। इस फनकार ने कॉमेडी को भारतीय फिल्मों के कथानक का अंतरंग हिस्सा बनाया। उन्हीं के प्रयासों का नतीजा था कि 60 के दशक में फिल्मों पर कॉमेडी हावी होने लगी थी और महमूद अभिनय की इस विधा के बेताज बादशाह बन गए थे। महमूद ने 60 के दशक में अपने अभिनय की विशिष्ट शैली के जादू से हिन्दी फिल्मों में कॉमेडियन की भूमिका को विस्तार दिया और एक वक्त ऐसा भी आया जब महमूद दर्शकों के लिये अपरिहार्य बन गए।महमूद का जन्म 29 सितम्बर 1932 को मुम्बई में हुआ था। अपने माता-पिता की आठ में से दूसरे नम्बर की संतान महमूद ने शुरुआत में बाल कलाकार के तौर पर कुछ फिल्मों में काम किया था।बॉलीवुड में कदम रखने के लिए महमूद सभी तरह के प्रयास करते थे। महमूद ने इसके लिए ड्राइविंग तक सीख ली और निर्माता ज्ञान मुखर्जी के ड्राइवर बन गए। महमूद ने सोचा की अब उन्हें कलाकारों और निर्माता, निर्देशक के करीब जाने का मौका मिलेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। यही से खुली महमूद की किस्मत और उन्हें दो बीघा जमीन , प्यासा जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल मिलने शुरू हो गए। 1958 में आई फिल्म परवरिश से महमूद को बड़ा ब्रेक मिला। इस फिल्म में उन्होंने राजकपूर के भाई की भूमिका निभाई थी। महमूद के अभिनय को हर किसी ने पसंद किय। इसके बाद छोटी बहन फिल्म उनके करिअर की अहम फिल्म साबित हुई। इन फिल्मों की सफलता के बाद तो महमूद के लिए बॉलीवुड के दरवाजे पूरी तरह से खुल गए। महमूद ने फिल्म गुमनाम में एक दक्षिण भारतीय रसोइये का कालजयी किरदार अदा किया। उसके बाद उन्होंने प्यार किये जा, प्यार ही प्यार, ससुराल, लव इन टोक्यो और जिद्दी जैसी हिट फिल्में दीं।बॉलीवुड में महमूद की धाक का अंदाज आप इस तरह से लगा सकते हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन को पहला सोलो रोल दिया था। ये वही महमूद हैं जिन्होंने आर.डी बर्मन और पंचम दा जैसे संगीत के धुरंधरों को पहला ब्रेक दिया था। अपनी अनेक फिल्मों में महमूद नायक के किरदार पर भारी नजर आए। यह उनके अभिनय की खूबी थी कि दर्शक अक्सर नायक के बजाय उन्हें देखना पसंद करते थे।फिल्मों में अपनी बहुविविध कॉमेडी से दर्शकों को दीवाना बनाने के बाद महमूद ने अपनी फिल्म निर्माण कम्पनी पर ध्यान देने का फैसला किया। उनकी पहली होम प्रोडक्शन फिल्म छोटे नवाब थी। बाद में उन्होंने बतौर निर्देशक सस्पेंस-कॉमेडी फिल्म भूत बंगला बनाई। जिसमें उन्होंने अपने दोस्त और संगीतकार आर. डी. बर्मन को भी अभिनय करने का मौका दिया। उसके बाद उनकी फिल्म पड़ोसन 60 के दशक की जबरदस्त हिट कॉमेडी फिल्म साबित हुई। पड़ोसन को हिंदी सिने जगत की श्रेष्ठ हास्य फिल्मों में गिना जाता है। इसमें सुनील दत्त भी एक अच्छे कॉमेडी कलाकार बनकर उभरे।अभिनेता, निर्देशक, कथाकार और निर्माता के रूप में काम करने वाले महमूद ने बॉलीवुड के मौजूदा किंग शाहरुख खान को लेकर वर्ष 1996 में अपनी आखिरी फिल्म दुश्मन दुनिया बनाई , लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही। अपने जीवन के आखिरी दिनों में महमूद का स्वास्थ्य काफी खराब हो गया। उन्हें अनेक बीमारियां हो गई थी। वह इलाज के लिये अमेरिका गए जहां 23 जुलाई 2004 को उनका निधन हो गया। उनकी बीमारी का एक कारण उनका अत्यधिक धूम्रपान करना भी था। -
-3.84 करोड़ रुपये सीधे बैंक खातों में हस्तांतरित, शेष राशि का भुगतान जारी
-तेन्दूपत्ता संग्राहकों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में सरकार का बड़ा कदमलेख: एस.आर.पाराशर, उप संचालकधमतरी । तेन्दूपत्ता संग्राहकों का लंबे समय से प्रतीक्षित प्रोत्साहन पारिश्रमिक (बोनस) अब उनके खातों में पहुंचना शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय द्वारा राष्ट्रीय सहकारिता सप्ताह के दौरान रायपुर स्थित कृषि मण्डपम में तेन्दूपत्ता संग्रहण वर्ष 2023 के संग्राहकों को बोनस वितरण का शुभारंभ किए जाने के बाद धमतरी जिले में भी बोनस राशि का ऑनलाइन भुगतान तेजी से किया जा रहा है। यह पहल वनाश्रित परिवारों की आर्थिक समृद्धि, सामाजिक सुरक्षा और आजीविका सुदृढ़ीकरण की दिशा में राज्य शासन की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।जिला लघु वनोपज सहकारी संघ मर्यादित, वनमंडल धमतरी के प्रबंध संचालक एवं वनमंडलाधिकारी श्री जाधव श्रीकृष्ण ने बताया कि वर्ष 2023 के तेंदूपत्ता विक्रय में लाभ अर्जित करने वाली जिले की 25 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियों के 212 फड़ों से जुड़े ग्रामों के 23 हजार 723 संग्राहक परिवारों को कुल 3 करोड़ 92 लाख रुपये प्रोत्साहन पारिश्रमिक (बोनस) स्वीकृत किया गया है। यह राशि ऑनलाइन सॉफ्टवेयर के माध्यम से सीधे हितग्राहियों के बैंक खातों में अंतरित की जा रही है। 20 जुलाई 2026 तक 3 करोड़ 84 लाख रुपये की राशि संग्राहकों के खातों में सफलतापूर्वक हस्तांतरित की जा चुकी है तथा शेष पात्र हितग्राहियों को भी शीघ्र भुगतान की प्रक्रिया जारी है।उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा वर्ष 2026 के लिए तेन्दूपत्ता संग्रहण दर 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा निर्धारित की गई है, जिससे संग्राहकों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित हुई है। तेन्दूपत्ता संग्रहण केवल मौसमी रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि वनाश्रित परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। राज्य शासन द्वारा पारिश्रमिक, बोनस तथा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस परंपरागत आजीविका को निरंतर सशक्त बनाया जा रहा है।वर्ष 2026 में जिले को 26 हजार 800 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहण का लक्ष्य प्राप्त हुआ था, जिसके विरुद्ध 23 हजार 751 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहित किया गया, जो लक्ष्य का लगभग 88.70 प्रतिशत है। संग्रहण कार्य में 26 हजार 550 संग्राहकों ने भागीदारी निभाई, जिन्हें 13 करोड़ 7 लाख रुपये से अधिक का पारिश्रमिक भुगतान किया जा चुका है।वर्ष 2025 में जिले में 25 हजार 275.63 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहित हुआ था, जिसके लिए 27 हजार 887 संग्राहकों को 13 करोड़ 90 लाख रुपये का पारिश्रमिक पूर्ण रूप से वितरित किया गया था।तेन्दूपत्ता संग्राहकों के कल्याण के लिए विभिन्न सामाजिक सुरक्षा एवं सुविधामूलक योजनाओं का भी प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है। वर्ष 2024-25 में 27 हजार 532 महिला संग्राहकों को चरण पादुका का वितरण किया गया है, जबकि 2025-26 में 28 हजार 723 पुरुष संग्राहकों को चरण पादुका उपलब्ध कराई जा रही है।इसके अलावा, वर्ष 2022 के बोनस के रूप में 24 हजार 529 संग्राहकों को 6 करोड़ 33 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। वहीं वर्ष 2023 के लिए स्वीकृत 3 करोड़ 92 लाख रुपये में से अधिकांश राशि का भुगतान पूर्ण हो चुका है तथा शेष राशि शीघ्र ही लाभार्थियों के खातों में पहुंच जाएगी।वनधन विकास योजना के अंतर्गत वर्ष 2025-26 में न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना के तहत 144.68 क्विंटल लघु वनोपज का संग्रहण किया गया, जिसके एवज में 64 संग्राहकों को लगभग 3.50 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इससे लघु वनोपज संग्रहण को भी आर्थिक मजबूती मिल रही है।संघ संचालित समूह बीमा योजना के अंतर्गत मई 2026 तक प्राप्त 258 प्रकरणों में से 205 प्रकरणों का निराकरण कर 24.60 लाख रुपये की सहायता राशि वितरित की गई है।इसी प्रकार राजमोहिनी देवी तेंदूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत प्राप्त 392 प्रकरणों में से 339 प्रकरणों को स्वीकृति प्रदान कर लगभग 4 करोड़ 43 लाख रुपये की सहायता राशि हितग्राहियों को उपलब्ध कराई गई है। इन योजनाओं से संकट की घड़ी में संग्राहक परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो रही है।तेन्दूपत्ता संग्राहक परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित शिक्षा प्रोत्साहन योजना के तहत शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में 347 छात्र-छात्राओं को 39.13 लाख रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान की गई। इस योजना के माध्यम से मेधावी एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के साथ-साथ व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है।पीएम जनमन योजना के अंतर्गत विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के लिए कल्लेमेटा में वनधन विकास केंद्र स्थापित किया गया है। यहां स्व-सहायता समूहों को दोना-पत्तल निर्माण, बांस आधारित उत्पाद निर्माण तथा अन्य स्वरोजगार गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। इससे जनजातीय परिवारों की आय बढ़ने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं।तेन्दूपत्ता संग्रहण से लेकर बोनस वितरण, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, बीमा, वनधन विकास तथा स्वरोजगार योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से जिला वनोपज सहकारी यूनियन, धमतरी वनाश्रित परिवारों के समग्र विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। राज्य शासन की जनकल्याणकारी नीतियों का लाभ सीधे हितग्राहियों तक पहुंचने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है, बल्कि वन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के जीवन स्तर में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। -
अमर गायक मुकेश की जयंती पर विशेष 22 जुलाई
फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे मुकेश
मुकेश चंद माथुर (जन्म - 22 जुलाई 1923, दिल्ली, भारत - निधन- 27 अगस्त 1976),
-आलेख- प्रशांत शर्मा
लोकप्रिय तौर पर सिर्फ़ मुकेश के नाम से जाने वाले, हिन्दी सिनेमा के एक प्रमुख पाश्र्व गायक थे, जिनके गाने आज की पीढ़ी भी बड़े चाव से गुनगुनाती है।
मुकेश की आवाज़ बहुत खूबसूरत थी पर उनके एक दूर के रिश्तेदार मोतीलाल ने उन्हें तब पहचाना जब उन्होंने उसे अपनी बहन की शादी में गाते हुए सुना। मोतीलाल उन्हें बम्बई ले गये और अपने घर में रहने दिया। यही नहीं उन्होंने मुकेश के लिए रियाज़ का पूरा इन्तजाम किया। इस दौरान मुकेश को एक हिन्दी फि़ल्म निर्दोष (1941) में मुख्य कलाकार का काम मिला। पाश्र्व गायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम 1945 में फि़ल्म पहली नजऱ में मिला। मुकेश ने हिन्दी फि़ल्म में जो पहला गाना गाया, वह था दिल जलता है तो जलने दे ....जिसमें अदाकारी मोतीलाल ने की। इस गीत में मुकेश के आदर्श गायक के एल सहगल के प्रभाव का असर साफ़-साफ़ नजऱ आता है। 1959 में अनाड़ी फि़ल्म के सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्व गायन का पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। 1974 में मुकेश को रजनीगन्धा फि़ल्म में कई बार यूं भी देखा है .... गाना गाने के लिए राष्ट्रीय फि़ल्म पुरस्कार मिला।
60 के दशक में मुकेश का करिअर अपने चरम पर था और अब मुकेश ने अपनी गायकी में नये प्रयोग शुरू कर दिये थे। उस वक्त के अभिनेताओं के मुताबिक उनकी गायकी भी बदल रही थी। जैसे कि सुनील दत्त और मनोज कुमार के लिए गाये गीत। 70 के दशक का आगाज़ मुकेश ने जीना यहां मरना यहां गाने से किया। उस वक्त के हर बड़े फि़ल्मी सितारों की ये आवाज़ बन गये थे। साल 1970 में मुकेश को मनोज कुमार की फि़ल्म पहचान के गीत के लिए दूसरा फि़ल्मफेयर मिला और फिर 1972 में मनोज कुमार की ही फि़ल्म के गाने के लिए उन्हें तीसरी बार फि़ल्मफेयर पुरस्कार दिया गया।
इस दौर में मुकेश ज़्यादातर कल्याणजी-आंनदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर. डी. बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम कर रहे थे। अपने उत्कृष्ट गायन के लिये ऐसा कौन सा पुरस्कार है जिसे मुकेश ने प्राप्त न किया हो। वे फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे। वे उस ऊंचाई पर पहुंच गए थे कि पुरस्कारों कि गरिमा उनसे बढऩे लगी थी, लोकप्रियता के उस शिखर पर विद्यमान थे जहां पहुंच पाना किसी के लिए एक सपना होता है। करोड़ों भारतवासियों के हृदयों पर मुकेश का अखंड साम्राज्य था और रहेगा।
मुकेश ने विनोद मेहरा और फिऱोज़ ख़ान जैसे नये अभिनेताओं के लिए भी गाने गाये। 70 के दशक में भी इन्होंने अनेक सुपरहिट गाने दिये जैसे— फि़ल्म धरम करम का एक दिन बिक जाएगा। फि़ल्म आनंद और अमर अकबर एंथनी की वो बेहतरीन नगमें। साल 1976 में यश चोपड़ा की फि़ल्म कभी कभी के इस शीर्षक गीत के लिए मुकेश को अपने करिअर का चौथा फि़ल्मफेयर पुरस्कार मिला और इस गाने ने उनके करिअर में फिर से एक नयी जान फूंक दी। मुकेश ने अपने करिअर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फि़ल्म के लिए ही गाया था। मुकेश की राजकपूर के साथ अच्छी दोस्ती थी, लेकिन उन्होंने दिलीप कुमार के लिए सबसे अधिक गाने गाए।
अपने करीब 35 साल के कॅरिअर में मुकेश ने हजारों कर्णप्रिय और लोकप्रिय गाने गाए जो आज भी उतने ही हसीन लगते हैं जितने पहली बार लोगों ने इन्हें सुना था। मुकेश ने हर तरह के गीत गाए हैं - रोमांस, देशभक्ति, खुशी और गम में डुबे हुए, लेकिन जो भी गाया पूर्णता और परिपक्वता से। रियाज़ से सन्तुष्ट होने पर ही रिकार्डिंग की सहमति देते थे। मेरा नाम जोकर का कालजयी गीत, जाने कहां गए वो दिन, उन्होंने सत्रह दिनों के अभ्यास के बाद रिकार्ड कराया था। पाश्चात्य और शास्त्रीय संगीत क अद्भुत संगम है इस गीत में। मुकेश की मधुर आवाज़ में उभरते दर्द ने इसे सर्वकालिक महान गीत बना दिया है।
मुकेश का निधन 27 अगस्त, 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पडऩे से हुआ। उस समय वह गा रहे थे, एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल । उस कार्यक्रम का लता मंगेशकर और नितिन मुकेश भी हिस्सा थे।
मुकेश साहब के गाए 15 लोकप्रिय गाने..
1. दिल जलता है, तो जलने दे
2. जाने कहां गए वो दिन 3. सावन का महीना
4. चंदन सा बदन चंचल चितवन
5. कहीं दूर जब दिन ढल जाए
6. कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है
7. ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
8. जीना यहां मरना यहां
9. तारो में सजके अपने सूरज से
10. कई बार यूं भी देखा है
11. मेरा जूता है जापानी
12. मेहबूब मेरे
13. आवारा हूं
14. दुनिया बनाने वाले
15. डम डम डिगा डिगा - -जनभागीदारी से साकार हो रहा हरित छत्तीसगढ़ का संकल्पविशेष लेख -धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक , अशोक कुमार चंद्रवंशी ,सहायक जनसंपर्क अधिकारीसीड बॉल पर्यावरण को हरा-भरा बनाने और वनीकरण (रिफॉरेस्टेशन) का एक बेहद सरल, किफायती और अत्यधिक प्रभावी माध्यम है। इसमें बीजों को मिट्टी और जैविक खाद के मिश्रण से छोटी-छोटी गोलियों के रूप में सुरक्षित कर दिया जाता है, जिससे वे बिना मेहनत के दुर्गम स्थानों पर भी उग जाते हैं। सीड बॉल- बीज, मिट्टी (मुख्य रूप से चिकनी मिट्टी) और जैविक खाद (गोबर या वर्मीकम्पोस्ट) का एक छोटा और सूखा गोला होता है। बीजों को इस प्राकृतिक आवरण में लपेटकर सुखा लिया जाता है। मानसून की पहली अच्छी बारिश के बाद जब मिट्टी में पर्याप्त नमी हो, तब सीड बॉल्स का उपयोग करना सबसे अच्छा होता है। इन्हें यात्रा करते समय या खाली जगहों पर पैदल चलते हुए मिट्टी पर बिखेर दें। पानी के संपर्क में आते ही ये पौधे के रूप में विकसित होना शुरू हो जाती हैं।बारिश का मौसम पौधारोपण और वनों के विस्तार के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इसी उद्देश्य से वन विभाग द्वारा सीड बॉल (बीज गोला) अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान जनभागीदारी के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों में हरियाली बढ़ाने का प्रभावी प्रयास है, जहाँ पौधारोपण करना कठिन होता है।क्या है सीड बॉल?सीड बॉल मिट्टी, गोबर या जैविक खाद और विभिन्न वृक्षों के बीजों से तैयार किया गया छोटा गोलाकार गोला होता है। इसे जंगलों, पहाड़ियों, खाली भूमि और दुर्गम क्षेत्रों में फेंक दिया जाता है। वर्षा का पानी मिलने पर बीज अंकुरित होकर पौधों का रूप ले लेते हैं।वन विभाग का हरित अभियानमुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा एक पेड़ मां के नाम, वन महोत्सव तथा युवा फॉर नेचर जैसे अभियानों के साथ सीड बॉल कार्यक्रम को भी व्यापक स्तर पर संचालित किया जा रहा है। स्कूलों, महाविद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं, महिला स्व-सहायता समूहों और स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी से हजारों-लाखों सीड बॉल तैयार कर जंगलों और खाली भूमि में डाली जा रही हैं।जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिकासीड बॉल में महुआ, इमली, हर्रा, बहेड़ा, जामुन, करंज, नीम, बरगद, पीपल, आम, जामुन, शाल, बीजा, चार, खमार सहित स्थानीय प्रजातियों के बीजों का उपयोग किया जाता है। इससे प्राकृतिक वनों का विस्तार होता है, वन्यजीवों को भोजन और आश्रय मिलता है तथा जैव विविधता का संरक्षण भी सुनिश्चित होता है।पर्यावरण संरक्षण का सशक्त माध्यमसीड बॉल अभियान से हरित आवरण बढ़ने के साथ-साथ जल संरक्षण, मिट्टी के क्षरण या कटाव में कमी, कार्बन अवशोषण तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में भी सहायता मिलती है। यह कम लागत में अधिक क्षेत्र को हरित बनाने का प्रभावी उपाय है।जनभागीदारी से बनेगा हरित भविष्यवन विभाग का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित करना भी है। जब बच्चे, युवा, महिलाएं और ग्रामीण इस अभियान से जुड़ते हैं, तो हर व्यक्ति प्रकृति संरक्षण का सहभागी बनता है।हर नागरिक निभाए अपनी जिम्मेदारीयदि प्रत्येक नागरिक वर्षा ऋतु में कुछ सीड बॉल तैयार कर उपयुक्त स्थानों पर डाले या पौधारोपण में भागीदारी करे, तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ का हरित क्षेत्र और अधिक समृद्ध होगा। सीड बॉल अभियान प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने का एक सरल, सुलभ और प्रभावी माध्यम है।
- -औषधीय पौधों की खेती से बदली महिलाओं की तकदीर, बढ़ेगा दायरा
-अनुपयोगी भूमि पर उगी समृद्धि की नई फसल
विशेष लेख-धनंजय राठौर संयुक्त संचालक, शशिरत्न पाराशर उप संचालक
रायपुर / छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा रायपुर सहित विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष योजना चलाई जा रही है। इसके तहत, अनुपयोगी पड़ी घरों की बाड़ी में महिलाओं को सिंदूरी, सतावर और अश्वगंधा जैसे औषधीय पौधे निरूशुल्क दिए जा रहे हैं, जिससे उन्हें घर पर ही नियमित आय मिल रही है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की महिलाओं द्वारा अनुपयोगी भूमि और यहाँ तक कि बेकार नाले के पानी का उपयोग कर औषधीय पौधे उगाने की कई प्रेरक पहलें देखने को मिली हैं। इन प्रयासों से न केवल बंजर जमीन हरी-भरी हो रही है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भरता और बेहतर स्वास्थ्य का लाभ भी मिल रहा है।“जहां कभी अनुपयोगी भूमि थी, वहां आज औषधीय पौधों की हरियाली लहरा रही है। जहां महिलाएं केवल पारंपरिक खेती तक सीमित थीं, वहीं आज वे लाखों रुपये की आय अर्जित कर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं।” यह केवल एक जिले की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और कृषि नवाचार का ऐसा मॉडल है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। छत्तीसगढ़ का धमतरी जिला आज औषधीय एवं सुगंधीय फसलों के कृषिकरण का राष्ट्रीय मॉडल बनकर उभरा है। यहां कृषि, आजीविका, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ऐसा समन्वय देखने को मिलता है, जो विकसित भारत और आत्मनिर्भर गांवों की अवधारणा को साकार करता है।धमतरी कृषि प्रधान जिला है। यहां की अधिकांश आबादी धान आधारित खेती पर निर्भर रही है। हालांकि धान उत्पादन जिले की पहचान है, लेकिन सीमित आय, प्राकृतिक जोखिम और अनुपयोगी भूमि की चुनौती लंबे समय से बनी हुई थी। महानदी के किनारे की रेतीली भूमि, कटाव प्रभावित क्षेत्र और ग्राम पंचायतों की अनुपयोगी जमीन आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त उपयोग में नहीं आ पा रही थी। ऐसे समय में जिला प्रशासन ने इन चुनौतियों को अवसर में बदलने का निर्णय लिया। सोच स्पष्ट थीकृयदि अनुपयोगी भूमि पर ऐसी फसलें उगाई जाएं जिनकी बाजार में स्थायी मांग हो, जिनमें लागत कम और लाभ अधिक हो, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन लाया जा सकता है।वर्ष 2025 में कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) तथा राज्य औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से औषधीय एवं सुगंधीय फसलों के कृषिकरण की अभिनव पहल प्रारंभ की। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे केवल कृषि कार्यक्रम नहीं माना गया, बल्कि महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका का व्यापक मिशन बनाया गया। योजना के प्रारंभिक चरण में जिले का विस्तृत सर्वेक्षण कराया गया। अनुपयोगी भूमि, रेतीले क्षेत्र और कम उत्पादक भूमि की पहचान कर वहां औषधीय खेती की संभावनाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया।महिला स्व-सहायता समूहों को इस अभियान का केंद्र बनाया गया। राज्य औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से खस, ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों की गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री उपलब्ध कराई गई। महिलाओं को विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और नियमित फील्ड सपोर्ट दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था रहीकृशत-प्रतिशत बाय-बैक, जिससे किसानों और महिलाओं को अपने उत्पाद के विपणन की चिंता नहीं रही। प्रथम चरण में लगभग 150 एकड़ क्षेत्र में 200 महिला स्व-सहायता समूह सदस्यों को जोड़ा गया। लगभग 80 एकड़ में खस, 20 एकड़ में ब्राह्मी, 10 एकड़ में बच तथा 40 एकड़ में लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली का रोपण किया गया। कुछ ही समय में परिणाम सामने आने लगे। जो भूमि पहले अनुपयोगी मानी जाती थी, वहीं से प्रति एकड़ लगभग एक लाख रुपये तक की आय प्राप्त होने लगी। महिलाओं ने इस आय का उपयोग बच्चों की शिक्षा, परिवार की जरूरतों, कृषि उपकरणों की खरीद और छोटे व्यवसाय शुरू करने में किया। इससे उनकी आर्थिक स्थिति के साथ-साथ सामाजिक आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। आदर्श महिला कृषक समूह कंडेल सत्या ढीमर बताती हैं कि पहले उनकी पूरी निर्भरता धान की खेती पर थी। औषधीय खेती के बारे में जानकारी नहीं थी, लेकिन प्रशिक्षण, पौध सामग्री और खरीद की सुनिश्चित व्यवस्था ने उनका भरोसा बढ़ाया। आज उनकी आय कई गुना बढ़ चुकी है। समूह पूना साहू ,श्रीमती कुंती ढीमर कहती हैं कि इस योजना ने केवल आय ही नहीं बढ़ाई, बल्कि महिलाओं को निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी दिया है। अब वे बैंकिंग, समूह प्रबंधन और उद्यमिता में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं तथा अन्य महिलाओं को भी इस दिशा में प्रेरित कर रही हैं।किसान श्री अशोक नेताम बताते हैं कि कम पानी वाली भूमि में लेमनग्रास और खस जैसी फसलें उम्मीद से कहीं अधिक सफल साबित हुई हैं। अब जिले के अनेक किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय खेती को भी अपनाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार की प्राथमिकताओं में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व दिया गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार महिला स्व-सहायता समूहों को स्वरोजगार, मूल्य संवर्धन और बाजार से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। राज्य में ‘लखपति दीदी’ अभियान को गति देने के लिए कृषि, वनोपज, पशुपालन और ग्रामीण उद्यमिता को एकीकृत किया जा रहा है।धमतरी का औषधीय खेती मॉडल इसी सोच का प्रभावी उदाहरण है। इस पहल ने महिलाओं को केवल खेती तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें उद्यमी बनने का अवसर प्रदान किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का स्पष्ट विजन है कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थानीय संसाधनों पर आधारित, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाया जाए। औषधीय एवं सुगंधीय फसलों का विस्तार इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।धमतरी मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल उत्पादन पर नहीं, बल्कि संपूर्ण वैल्यू चेन विकसित करने पर जोर दिया गया है। कुरूद विकासखंड के कोटगांव और पचपेड़ी में औषधीय पौधों की नर्सरी विकसित की जा रही है, ताकि स्थानीय स्तर पर गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही भविष्य में औषधीय उत्पादों के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), आवश्यक तेल (म्ेेमदजपंस व्पस) निष्कर्षण, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। यदि स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित होते हैं, तो इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, परिवहन लागत घटेगी और किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा। यह ग्रामीण औद्योगिकीकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल होगी।धमतरी के इस नवाचार को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली। 9 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित महाकुंभ-2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि जागरण के संयुक्त मंच पर जिले को औषधीय एवं सुगंधीय पौधों के कृषिकरण में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया। इसके बाद हैदराबाद, बिहार, मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के किसान, अधिकारी, स्वयंसेवी संस्थाएं और विभिन्न संगठन धमतरी पहुंचकर इस मॉडल का अध्ययन करने लगे। आज धमतरी का मॉडल देश के अनेक जिलों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।प्रथम चरण की सफलता के बाद अब लक्ष्य इस पहल को 500 एकड़ तक विस्तारित करने का है। इसके माध्यम से 500 से अधिक महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। राज्य औषधीय पादप बोर्ड, कृषि विभाग, उद्यानिकी विभाग, बिहान तथा अन्य विभागों के समन्वय से चारों विकासखंडों में प्रशिक्षण, कार्यशालाएं और तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है, ताकि अधिकाधिक किसान और महिला समूह इस अभियान से जुड़ सकें। औषधीय खेती का महत्व केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं है। ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास और अन्य औषधीय पौधे स्वास्थ्य परंपरा को भी मजबूत करते हैं। इन फसलों से भूमि संरक्षण, हरित आवरण में वृद्धि, जैव विविधता का संवर्धन तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की अनुकूलन क्षमता भी बढ़ती है। आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ कृषि (ैनेजंपदंइसम ।हतपबनसजनतम), प्राकृतिक खेती और जैव विविधता संरक्षण की बात कर रही है, तब धमतरी का यह मॉडल इन सभी उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करता है।धमतरी की यह सफलता बताती है कि जब दूरदर्शी नेतृत्व, प्रभावी प्रशासन, वैज्ञानिक तकनीक, महिला शक्ति और स्थानीय संसाधनों का समन्वय होता है, तब विकास की नई संभावनाएं जन्म लेती हैं। यह मॉडल केवल औषधीय खेती का नहीं, बल्कि ग्रामीण नवाचार, महिला उद्यमिता, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास का जीवंत उदाहरण है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार किसानों की आय बढ़ाने, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने, मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करने और स्थानीय संसाधनों पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित करने के लिए सतत कार्य कर रही है। धमतरी का औषधीय खेती मॉडल इन प्रयासों का उत्कृष्ट प्रतिफल है।आज धमतरी जिला ने यह सिद्ध कर दिया है कि विकास केवल बड़े उद्योगों से नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं के हाथों में नई संभावनाएं सौंपकर भी संभव है। औषधीय खेती की यह हरियाली केवल खेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आत्मनिर्भर गांवों, सशक्त महिलाओं, समृद्ध किसानों और विकसित छत्तीसगढ़ की नई पहचान बन चुकी है। आने वाले वर्षों में यह मॉडल निश्चित रूप से देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा। - -विश्व युवा कौशल विकास दिवस- विशेष लेख • लक्ष्मीकांत कोसरिया, उप संचालक"कौशल ही आज के समय की सबसे बड़ी पूंजी है। जिस युवा के पास हुनर है, उसके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है।" इसी सोच को साकार करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से प्रदेश के युवाओं को रोजगारोन्मुखी एवं उद्योगों की मांग के अनुरूप आधुनिक कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की विशा में लगातार कार्य कर रही है।विश्व युवा कौशल विकास दिवस के अवसर पर यह कहना सार्थक होगा कि छत्तीसगढ़ ने कौशल विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। राज्य में युवाओं को केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के साथ रोजगार सुनिश्चित करने की दिशा में भी प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं।मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के प्रारंभ से अब तक प्रदेश के 4 लाख 94 हजार 330 युवाओं को विभिन्न रोजगारपरक ट्रेडों में कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। इनमें से 2 लाख 74 हजार 934 युवाओं को रोजगार से जोड़ा जा चुका है। वर्तमान में योजना के अंतर्गत राज्यभर में 375 व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रवाता (199 शासकीय एवं 176 अशासकीय) के माध्यम से राष्ट्रीय कौशल अर्हता फ्रेमवर्क (NSQF) के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाले प्रशिक्षण संचालित किए जा रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 9 हजार 418 युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया है, जिनमें से 7 हजार 528 युवाओं को रोजगार प्राप्त हो चुका है, जबकि 6 हजार 679 युवा वर्तमान में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।राज्य सरकार ने युवाओं को भविष्य की तकनीकों से जोड़ने के लिए कौशल प्रशिक्षण में व्यापक बदलाव किए हैं। अब पारंपरिक ट्रेडों के साथ-साथ इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मेंटेनेंस, ड्रोन ऑपरेटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग (AI-ML), साइबर सुरक्षा, सूर्यमित्र (सौर ऊर्जा) जैसे 21 वीं सदी के अत्याधुनिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इस वर्ष विशेष रूप से जल वितरण संचालक (Water Distribution Operator) कोर्स प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत 2,770 युवाओं को मल्टी-स्किल प्रशिक्षण देकर सीधे रोजगार से जोड़ने की कार्ययोजना बनाई गई है।गुणवत्ता पर विशेष जोरछत्तीसगढ़ में कौशल विकास केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। अब प्रत्येक प्रशिक्षक के लिए शैक्षणिक योग्यता एवं अनुभव के साथ प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण (Training of Trainers-TOT) प्रमाणन अनिवार्य किया गया है। इससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आया है। प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी के लिए मूल्यांकन से पहले कम से कम सात दिवस का ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग (OJT) अनिवार्य किया गया है, जिससे उन्हें उद्योगों की वास्तविक कार्यप्रणाली का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके। प्रशिक्षण केंद्रों में फेस आधारित ऑनलाइन बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू की गई है। साथ ही सभी प्रशिक्षण केंद्रों में आई.पी. आधारित सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनके माध्यम से प्रशिक्षण गतिविधियों की सतत निगरानी की जा रही है। इन व्यवस्थाओं से पारदर्शिता बढ़ी है तथा प्रशिक्षण की गुणवत्ता और अनुशासन में सुधार हुआ है।प्रशिक्षण के साथ रोजगार की भी गारंटीमुख्यमंत्री कौशल विकास योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रशिक्षण के बाद युवाओं के रोजगार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रशिक्षण संचालन की अनुमति देने से पहले प्रत्येक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाता द्वारा रोजगार उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं का परीक्षण किया जाता है। परीक्षण के बाद ही प्रशिक्षण संचालन की अनुमति प्रदान की जाती है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण केंद्रों को मिलने वाली राशि का 60 प्रतिशत भुगतान तभी किया जाता है, जब प्रशिक्षित युवाओं का नियोजन सुनिश्चित हो जाता है। यह व्यवस्था प्रशिक्षण संस्थानों को रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण देने के लिए प्रेरित करती है।बस्तर के युवाओं तक पहुंच रहा कौशल विकासप्रदेश के दूरस्थ एवं आदिवासी क्षेत्रों के युवाओं तक कौशल विकास पहुंचाने के लिए बस्तर संभाग के प्रत्येक विकासखंड में स्किल डेवलपमेंट सेंटर (SDC) स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। जिला बीजापुर में असिस्टेंट मेसन कोर्स प्रारंभ किया जा चुका है। वहीं बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर एवं बीजापुर सहित छह पुनर्वास केंद्रों का व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाता के रूप में पंजीयन किया गया है तथा अन्य केंद्रों को भी शीघ्र जोड़ा जा रहा है।उद्योगों के साथ साझेवारी से बढ़ रही रोजगार क्षमताराज्य सरकार ने उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ महत्वपूर्ण समझौते किए हैं।महिंद्रा एंड महिंद्रा के साथ ट्रैक्टर मैकेनिक प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत अब तक 101 युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं तथा 60 युवा प्रशिक्षणरत हैं।साइरोनिक्स टेक्नोलॉजी प्रा. लि. के सहयोग से रायपुर के लाईवलीहुड कॉलेज में इलेक्ट्रिक व्हीकल टेक्नोलॉजी के पांच जॉब रोल में प्रशिक्षण संचालित किया जा रहा है।नांदी फाउंडेशन के सहयोग से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित महिलाओं को एम्प्लॉयबिलिटी स्किल्स का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 1,142 युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं।पर्यटन एवं हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में व लॉन्ड्री बैग के साथ साझेदारी कर लॉन्ड्री सुपरवाइजर एवं अन्य रोजगारपरक प्रशिक्षण प्रारंभ किए गए हैं।स्वास्थ्य क्षेत्र में श्री सत्य साई हेल्थ एवं एजुकेशन ट्रस्ट के सहयोग से कार्डियक एवं स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित उन्नत कौशल प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए जा रहे हैं।लाईवलीहुड कॉलेज बने कौशल विकास के सशक्त केंद्रप्रदेश के जिलों में संचालित लाईवलीहुड कॉलेज आज युवाओं के लिए कौशल विकास का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। वर्ष 2013 से अब तक इन कॉलेजों में 68 हजार 552 युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। इनमें से 28 हजार 820 युवाओं को रोजगार तथा 10 हजार 632 युवाओं को स्वरोजगार प्राप्त हुआ है। इस प्रकार कुल 39 हजार 452 युवा आजीविका से जुड़ चुके हैं। वर्तमान में 2 हजार 413 युवा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत वर्ष 2024 से अब तक 13 हजार 188 युवाओं को लाईवलीहुड कॉलेजों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया गया है।आधुनिक अधोसंरचना का विस्तारराज्य के 26 जिलों में लाईवलीहुड कॉलेज भवन पूर्ण होकर संचालित हैं। नवीन जिलों में भी भवन निर्माण एवं भूमि आबंटन की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। प्रदेश में 26 बालिका छात्रावास तथा 20 बालक छात्रावास पूर्ण होकर संचालित हैं। शेष छात्रावासों का निर्माण एवं भूमि आबंटन कार्य प्रगति पर है।नवा रायपुर में बनेगा सेंटर ऑफ एक्सीलेंसछत्तीसगढ़ सरकार युवाओं को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।नवा रायपुर में लाईवलीहुड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की जाएगी, जहां अत्याधुनिक मशीनों, आधुनिक प्रयोगशालाओं, विशेष कार्यशालाओं तथा उद्योगों की मांग के अनुरूप इंजीनियरिंग एवं गैर-इंजीनियरिंग क्षेत्रों में विश्वस्तरीय कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा। वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भूमि लीज अनुबंध हेतु 2 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है।कौशल विकास से आत्मनिर्भरता की नई विशाविश्व युवा कौशल विकास दिवस पर छत्तीसगढ़ का अनुभव यह दर्शाता है कि कौशल विकास केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और रोजगारयुक्त बनाने का सशक्त अभियान है। नई तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, उद्योगों के साथ साझेदारी, रोजगार सुनिश्चित करने की व्यवस्था तथा आधुनिक अधोसंरचना के माध्यम से छत्तीसगढ़ वेश में कौशल विकास का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रहा है। आने वाले वर्षों में यह पहल न केवल लाखों युवाओं के जीवन में परिवर्तन लाएगी, बल्कि विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ की पहचानप्रदेश के युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिल रहा है। वर्ष 2025-26 में 19 कौशल ट्रेडों में आयोजित जिला एवं राज्य स्तरीय इंडिया स्किल प्रतियोगिता में 3,327 युवाओं ने भाग लिया, जिनमें से 381 प्रतिभागी राज्य स्तर तक पहुंचे। ईस्ट जोन क्षेत्रीय प्रतियोगिता, भुवनेश्वर में छत्तीसगढ़ के 38 प्रतिभागियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए 01 स्वर्ण, 02 रजत, 05 कांस्य एवं 04 मेडल ऑफ एक्सीलेंस सहित कुल 12 पदक अर्जित किए।वहीं राष्ट्रीय स्तर की इंडिया स्किल प्रतियोगिता में राज्य के 03 प्रतिभागियों ने प्रतिनिधित्व किया, जिनमें से 01 प्रतिभागी ने मेडल ऑफ एक्सीलेंस प्राप्त किया। उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं सफल आयोजन के लिए भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ को प्रशस्ति पत्र से भी सम्मानित किया गया।
- -362 सहायक प्राध्यापक बने प्रोफेसर, 152 प्रोफ़ेसर हुए प्राचार्य पदोन्नति, शैक्षणिक नेतृत्व को मिली नई मजबूती-595 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू, 700 नए पदों की मंजूरी, युवाओं के लिए सरकारी सेवा के बड़े अवसर-72 सहायक प्राध्यापकों को 37.23 करोड़ रुपये एरियर्स, 935 की परिवीक्षा अवधि समाप्त-सेवा सुरक्षा को मिला मजबूत आधार, 34 अनुकंपा नियुक्तियां, 118 कर्मचारियों को उच्चतर समयमान वेतनमान, कर्मचारी कल्याण को मिली संवेदनशील दिशाविशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालककिसी भी राज्य की प्रगति का वास्तविक पैमाना उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है और इसकी गुणवत्ता केंद्र में खड़े शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारियों की सक्षमता, सुरक्षा और सम्मान पर निर्भर करती है। जब उच्च शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत मानव संसाधन को पदोन्नति, सेवा सुरक्षा, वित्तीय सम्मान और शोध के अवसर एक साथ मिलते हैं, तब शिक्षा राज्य के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सबसे मजबूत धुरी बन जाती है। छत्तीसगढ़ का उच्च शिक्षा विभाग इन दिनों इसी व्यापक और समग्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग को केवल भवनों, पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं तक सीमित न रखकर उसे अकादमिक गुणवत्ता, प्रशासनिक दक्षता, रोजगार सृजन, शोध संवर्धन और कर्मचारी कल्याण से जोड़ा है। हाल के महीनों में लिए गए निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों को भविष्य के ज्ञान-केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। पदोन्नतियों की लंबित फाइलों को गति देना, नई भर्तियां, वेतनमान व एरियर्स का निराकरण, तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति, शोध को प्रोत्साहन और अनुकंपा नियुक्ति जैसे कदमों से विभाग ने हर मोर्चे पर ठोस और संवेदनशील पहल की है।उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का एक बड़ा आधार उनका नेतृत्व होता है। जब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में योग्य और अनुभवी शिक्षकों को समय पर पदोन्नति मिलती है, तो उसका सीधा असर संस्थान की कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक क्षमता पर दिखाई देता है। लंबित पदोन्नति प्रक्रियाओं को गति देकर राज्य सरकार ने एक निर्णायक पहल की है।वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 362 सहायक प्राध्यापकों को पदोन्नत कर प्राध्यापक (प्रोफेसर) बनाया गया है। इसके साथ ही 152 पदोन्नत प्राध्यापकों को स्नातक प्राचार्य तथा 07 स्नातक प्राचार्यों को स्नातकोत्तर (PG) प्राचार्य के पद पर पदोंन्नत किया गया है। इन निर्णयों से महाविद्यालयों की कमान अनुभवी हाथों में पहुँची है, जिससे संस्थागत निर्णय क्षमता, शैक्षणिक अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होगी।गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था के लिए संस्थानों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक और विशेषज्ञ अनिवार्य हैं। राज्य सरकार ने रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू कर युवाओं के लिए सरकारी सेवा में प्रवेश के बड़े अवसर निर्मित किए हैं। शासकीय महाविद्यालयों में प्राध्यापकों के 595 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से प्रारंभ हो चुकी है।इसके अतिरिक्त, विभागीय संरचना को सशक्त बनाने के लिए कुल 700 पदों पर सीधी भर्ती को मंजूरी दी गई है। इनमें 625 पद सहायक प्राध्यापक, 50 पद ग्रंथपाल और 25 पद क्रीड़ाधिकारी के शामिल हैं। सहायक प्राध्यापकों की भर्ती से विषयवार अध्यापन की गुणवत्ता बेहतर होगी, ग्रंथपालों से पुस्तकालय अकादमिक संसाधनों के प्रभावी केंद्र बनेंगे और क्रीड़ाधिकारियों से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होगा। यह अभियान प्रदेश के योग्य युवाओं को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने का सशक्त माध्यम बनने जा रहा है।राज्य में सहायक प्राध्यापक बनने की आकांक्षा रखने वाले हजारों युवाओं के लिए राज्य पात्रता परीक्षा (CG-SET) एक महत्वपूर्ण अवसर है। विभाग द्वारा CG-SET का आयोजन 04 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है l सरकार नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को अकादमिक करियर में आगे बढ़ाने के लिए गंभीर है। यह परीक्षा छत्तीसगढ़ के युवाओं को प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक परिदृश्य और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाने का अवसर देती है।विज्ञान, प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक विषयों के लिए प्रयोगशालाएं, उपकरण और प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ उतने ही आवश्यक हैं जितने कक्षा और कक्ष। वर्ष 2025-26 के दौरान प्रयोगशाला तकनीशियन के 260 रिक्त पदों के विरुद्ध 247 अभ्यर्थियों तथा प्रयोगशाला परिचारक के 429 रिक्त पदों के विरुद्ध 399 अभ्यर्थियों को नियुक्ति आदेश जारी किए जा चुके हैं। तकनीकी स्टाफ की उपलब्धता से प्रयोगशालाओं का नियमित संचालन और विद्यार्थियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी।विभागीय मजबूती का सबसे बड़ा आधार कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा, न्यायपूर्ण वेतन संरचना और लंबित मामलों का समयबद्ध समाधान है। आपातकालीन रूप से अचयनित रहे 72 सहायक प्राध्यापकों को उनकी प्रथम नियुक्ति तिथि से वरिष्ठ, प्रवर श्रेणी और पे-बैंड-4 की स्वीकृति देकर 37.23 करोड़ रुपये की एरियर्स राशि उनके खातों में अंतरित की गई है, जो संस्थागत न्याय का प्रतीक है।इसी तरह, वर्ष 2021 और 2022 में नियुक्त लगभग 1168 सहायक प्राध्यापकों में से रिकॉर्ड 935 नवनियुक्त प्राध्यापकों की परिवीक्षा अवधि समाप्त करने के आदेश जारी किए गए हैं। परिवीक्षा समाप्त होना कर्मचारियों के लिए स्थायित्व और पेशेवर सुरक्षा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिससे विभाग के भीतर प्रतिबद्ध शैक्षणिक कार्यबल तैयार हुआ है।उच्च शिक्षा व्यवस्था में शोध और नवाचार की भूमिका को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा 577 सहायक प्राध्यापकों को पीएचडी करने की अनुमति देना एक दूरदर्शी निर्णय है। अधिक शिक्षक जब शोध से जुड़ेंगे, तो कक्षा में अद्यतन ज्ञान पहुंचेगा और महाविद्यालयों में बौद्धिक विमर्श का स्तर ऊपर उठेगा। शिक्षकों के साथ-साथ तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी व्यवस्था की रीढ़ हैं। दिसंबर 2023 से अब तक दिवंगत कर्मचारियों के 34 आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की गई है, जो संकटग्रस्त परिवारों को जीवन संभालने का संबल देती है। इसके अतिरिक्त, 324 कर्मचारियों को उच्चतर समयमान वेतनमान प्रदान किया गया है और वर्ष 2024-25 की पदोन्नति संबंधी समस्त कार्यवाहियां समय सीमा में पूर्ण कर ली गई हैं।उच्च शिक्षा विभाग के ये फैसले मिलकर एक व्यापक परिवर्तनकारी मॉडल की रचना करते हैं, जहां नेतृत्व सुदृढ़ीकरण, नई भर्ती, सेवा सुरक्षा, कर्मचारी कल्याण, तकनीकी संसाधन और शोध संवर्धन एक साथ आगे बढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन आज दिखाई दे रहे हैं, वे केवल विभागीय उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि एक ऐसी नीति-दृष्टि हैं जिसमें शिक्षा को राज्य के भविष्य निर्माण का केंद्रीय माध्यम माना गया है। आने वाले समय में ये प्रयास छत्तीसगढ़ के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को ज्ञान, शोध, नेतृत्व और सामाजिक परिवर्तन के सशक्त केंद्र के रूप में स्थापित करेंगे।
- - युगपुरुष पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि-गुुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी तीन बार रुके थे पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के महासमुंद स्थित निवास स्थान में-लेखक-प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)16 जुलाई का दिन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव, स्मरण और प्रेरणा का दिन है। आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, अखिल भारतीय गायत्री परिवार के सिद्ध योगी एवं समाज चेतना के प्रखर संवाहक पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती है। यदि वे आज हमारे बीच होते, तो उनका 100वाँ जन्मदिन पूरे प्रदेश में बड़े उत्साह, श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जो भी एक बार उनके संपर्क में आता, वह जीवन भर उनका सम्मान करता और उनके स्नेह का मुरीद हो जाता। उनकी कर्मभूमि महासमुंद ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ उनके कार्यों का साक्षी है। अखिल भारतीय गायत्री परिवार के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से महासमुंद सहित पूरे प्रदेश में आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ऐसी अलख जगाई, जिसकी ज्योति आज भी असंख्य लोगों के जीवन को आलोकित कर रही है। मेरा उनसे केवल पारिवारिक रिश्ता नहीं था। वे मेरे बड़े पिताश्री थे, जिन्हें हम सभी स्नेहपूर्वक बड़ा जी कहकर पुकारते थे। बचपन से ही मुझे हमेशा यह अनुभव हुआ कि हमारा संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि संस्कारों, श्रद्धा और आत्मीयता का था। मेरा पैतृक गांव टेकारी (जिला रायपुर) उनकी जन्मभूमि थी, इसलिए इस गाँव से उनका विशेष लगाव था। यह मेरा सौभाग्य रहा कि उनके सान्निध्य में मुझे अपने पैतृक गाँव टेकारी में तीन बार माँ गायत्री महायज्ञ आयोजित कराने का अवसर मिला। आयोजन की जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि उनके मार्गदर्शन में कोई बाधा नहीं आएगी। 25 गाँवों से हजारों श्रद्धालु तीन दिनों तक इस महायज्ञ में शामिल हुए। बड़ा जी के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से सभी लोगों ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ इतनी सहजता और समर्पण के साथ निभाईं कि पूरा आयोजन बिना किसी विघ्न के सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। आज उस घटना को लगभग 24 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि इतना विशाल आयोजन कितनी सहजता, अनुशासन और सामूहिक सहयोग से सम्पन्न हुआ। मुझे संतोष है कि मैं अपने बड़ा जी की अपने पैतृक गाँव में गायत्री महायज्ञ कराने की इच्छा पूरी करने का माध्यम बन सका। साथ ही मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि यदि उनका आशीर्वाद, आत्मबल और अटूट विश्वास साथ न होता, तो यह कार्य संभव नहीं हो पाता। पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जी केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के भी सच्चे योद्धा थे। उन्होंने दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामूहिक एवं दहेज-मुक्त विवाह की अभिनव परंपरा की शुरुआत की। समाज में समानता, भाईचारे और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने सभी जातियों और वर्गों को साथ लेकर सामूहिक विवाह सम्मेलनों का आयोजन कराया। उनके द्वारा बोए गए समाज सुधार के बीज आज छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह जैसी योजनाओं के रूप में फलते-फूलते दिखाई देते हैं। पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अत्यंत प्रिय शिष्यों में से एक थे। शांतिकुंज, हरिद्वार की युगनिर्माण विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और विश्वबंधुत्व के लिए समर्पित कर दिया। उनके अथक प्रयासों और छत्तीसगढ़ में विचार-क्रांति के संकल्प के परिणामस्वरूप युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का तीन बार महासमुंद आगमन हुआ। पहली बार 8 जनवरी 1969 को आचार्य श्री महासमुंद पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास स्थित साधना कक्ष में अखंड ज्योति की स्थापना की, जो आज भी निरंतर प्रज्ज्वलित होकर उनकी साधना, तपस्या और आध्यात्मिक विरासत की साक्षी बनी हुई है। इसके बाद लगातार दो वर्षों तक आचार्य श्री का महासमुंद आगमन होता रहा। पाँच कुंडीय गायत्री महायज्ञ से प्रारंभ हुआ यह अभियान आगे चलकर 1008 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ के रूप में फलीभूत हुआ। इन आयोजनों की ख्याति केवल महासमुंद तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ इसका साक्षी बना। दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु इन महायज्ञों में भाग लेने महासमुंद पहुँचे। उन दिनों युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का प्रवास राम मंदिर के समीप स्थित पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास पर ही होता था। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी। इसलिए मैं न तो आचार्य श्री की महानता को पूरी तरह समझ पाता था और न ही बड़ा जी के तेजस्वी व्यक्तित्व की गहराई को। फिर भी आज तक आचार्य श्री का स्नेहिल स्पर्श मेरी स्मृतियों में जीवंत है। उस वक्त पता ही नहीं चलता था कि कब उनके सान्निध्य में, उसी बिस्तर पर, उनकी छत्रछाया में रहता था। आज वे पल मेरी सबसे अनमोल धरोहर हैं। जब भी पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा शांतिकुंज, हरिद्वार जाते थे, तब आचार्य श्री स्वयं उनका आत्मीय स्वागत करते थे। यह उनके प्रति आचार्य श्री के विशेष स्नेह, विश्वास और सम्मान का प्रमाण था। विश्वबंधुत्व, मानव कल्याण और समाज निर्माण की दिशा में बड़ा जी ने जो कार्य किए, वे आज भी प्रेरणादायी और अनुकरणीय हैं। इतना महान योगदान देने के बावजूद पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जीवनभर आत्मप्रचार से दूर रहे। वे साधना, सेवा और तप में ही रमे रहे। संभवत: यही कारण है कि उनकी तपोभूमि, उनके साधना कक्ष में आचार्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति और उनके सामाजिक-आध्यात्मिक योगदान का जितना व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका। उनकी शताब्दी जयंती पर हम सबका दायित्व है कि उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाएं तथा उनके बताए सेवा, साधना और संस्कार के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 8 मार्च 2019 को उनका स्वर्गारोहण समाज और प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति थी। उनके निधन से एक ऐसा शून्य उत्पन्न हुआ, जिसकी भरपाई करना अत्यंत कठिन है।

- प्रकाश मेहरा की जयंती 13 जुलाई पर विशेषपचास हज़ार रुपये, एक फिएट कार, एक फ्लैट... बस हमारी फिल्म डायरेक्ट कर दीजिए।ये ऑफर एक निर्माता ने प्रकाश मेहरा को दिया था। उस समय तक प्रकाश मेहरा ने बतौर निर्देशक अपना सफर शुरू भी नहीं किया था, हालांकि वह अपनी पहली फिल्म की तैयारी में जुटे हुए थे।जिस निर्माता ने यह आकर्षक प्रस्ताव रखा था, वह 'अमर सिंह राठौड़' नाम की फिल्म बनाना चाहता था। फिल्म में निरूपा रॉय और पी. जयराज मुख्य भूमिकाओं में थे। जाहिर है, इतना बड़ा ऑफर किसी के भी कदम डगमगा सकता था।साल 1957 में, जब प्रकाश मेहरा महज़ 300 रुपये महीने की नौकरी कर रहे थे, तब 50 हजार रुपये, एक फिएट कार और एक फ्लैट का प्रस्ताव किसी सपने से कम नहीं था। लेकिन उन्होंने तुरंत हामी नहीं भरी। क्योंकि वे पहले ही तय कर चुके थे कि निर्देशन की शुरुआत अपनी पसंद की फिल्म से ही करेंगे।उन्होंने निर्माता से तीन-चार दिन का समय मांगा। उन दिनों प्रकाश मेहरा, निर्देशक मोहन सहगल के सहायक थे। वहीं एक असिस्टेंट कैमरामैन थे—सरदार बलदेव सिंह। प्रकाश मेहरा ने उनसे इस ऑफर का ज़िक्र किया।बलदेव सिंह जानते थे कि प्रकाश मेहरा सामाजिक विषयों पर फिल्में बनाना चाहते हैं। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा,"गलती से भी हां मत कहना। यह माइथोलॉजिकल फिल्म है। एक बार इस जॉनर में चले गए, तो फिर उसी में सीमित होकर रह जाओगे।"उन्होंने आगे कहा, "अगले साल तुम्हारी फिल्म 'हसीना मान जाएगी' शुरू होगी। थोड़ा सब्र करो।"प्रकाश मेहरा ने अपने साथी की सलाह पर भरोसा किया और इतना बड़ा ऑफर ठुकरा दिया।जब निर्माता को उनके इंकार की खबर मिली, तो वह बेहद नाराज़ हुआ। उसने कई लोगों से कहा,"बेवकूफ तो बहुत देखे हैं, लेकिन ऐसा बेवकूफ नहीं देखा। 300 रुपये महीने की नौकरी करने वाला आदमी 50 हजार रुपये, कार और फ्लैट का ऑफर ठुकरा रहा है!"लेकिन उस निर्माता को नहीं पता था कि प्रकाश मेहरा कोई छोटा फैसला नहीं ले रहे थे। उनका लक्ष्य सिर्फ एक फिल्म निर्देशित करना नहीं, बल्कि लंबी पारी खेलना था।आखिरकार, 1968 में रिलीज़ हुई 'हसीना मान जाएगी' से प्रकाश मेहरा ने निर्देशन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने एक से बढ़कर एक सफल फिल्में दीं और हिंदी सिनेमा के सबसे सफल और प्रभावशाली निर्देशकों में अपनी जगह बना ली।आज, 13 जुलाई को प्रकाश मेहरा की जयंती है। उनका जन्म 13 जुलाई 1939 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित अपने ननिहाल में हुआ था।मुंबई में मिली उनकी सफलता रातों-रात नहीं आई थी। इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, धैर्य, सही फैसले लेने की क्षमता और अपने सपनों पर अटूट विश्वास था। यही वजह है कि प्रकाश मेहरा का सफर आज भी हर उस इंसान को प्रेरित करता है, जो अपने बड़े सपनों के लिए छोटे-छोटे लालच ठुकराने का साहस रखता है।
-
- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सुंदर महल बनाना हो तो, सुदृढ़ प्रथम आधार करो।
रक्षा कर निज स्वाभिमान की, पहले खुद से प्यार करो।।
कठिन परिश्रम सतत प्रयासित, एकलव्य को ज्ञान मिला।
धूप-ताप नित सह-सहकर ही, सरवर में जलजात खिला।
श्रम संयम ताने-बाने से, रूप नवल साकार करो।।
विनम्रता व्यक्तित्व सजाए, रसना मीठे बोल कहे।
ज्ञानवान गुणवान बनो पर, द्वेष-दंभ किंचित न रहे।
धीरज के आभूषण पहनो, शुचिता से शृंगार करो ।।
पर-हितकारी जन को मिलता, लोगों से सम्मान सदा।
सहज-सरल बनकर सहयोगी, वंचित को दो दान सदा।
मानव तन पाया है सुंदर, ईश्वर का आभार करो ।।
दीप ज्ञान का जला हृदय में, कपट-कलुष तम दूर भगा।
प्रेम दया से धोकर कटुता, मन में साहस-शौर्य जगा।
अच्छाई से रहे सुवासित, सुंदर यह संसार करो।।






















.jpg)




