- Home
- धर्म-अध्यात्म
-
देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन वृंदावन की बात ही कुछ और है। जहां नटखट कान्हा ने अपना बचपन बिताया, लीला रची और गोपियों संग रास रचाया, वहां जन्माष्टमी पर भक्ति की छटा देखते ही बनती है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर भक्तों में जबरदस्त उत्साह होता है। मंदिरों को भव्य तरीके से सजाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
खासकर वृंदावन स्थित प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर पूरे वृंदावन में दिव्य ऊर्जा और आनंद की अनुभूति होती है। आइए जानते हैं कि इस बार 2025 में वृंदावन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कब और कैसे मनाई जाएगी।भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और उनकी लीलाओं की भूमि वृंदावन, दोनों ही स्थान जन्माष्टमी के पर्व पर विशेष महत्व रखते हैं। हालाँकि पूरे देश में जन्माष्टमी धूमधाम से मनाई जाती है, लेकिन ब्रज की रौनक और भक्ति का माहौल अलग ही नजर आता है। इस वर्ष 2025 में मथुरा और वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव 16 अगस्त (शनिवार) को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर मंदिरों को सजाया जाएगा, भजन-कीर्तन होंगे और हजारों की संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए उमड़ेंगे।बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी की खास परंपरावृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव बेहद खास होता है। इस दिन रात 12 बजे ठाकुर जी की मंगला आरती की जाती है, जो पूरे साल में सिर्फ एक बार, इसी शुभ अवसर पर होती है। इस मौके पर लड्डू गोपाल का विधिपूर्वक महाभिषेक किया जाता है और विशेष पूजन होता है। यही कारण है कि जन्माष्टमी की रात बांके बिहारी मंदिर में एक बार होने वाली मंगला आरती पूरे वर्ष में सबसे खास मानी जाती है। इस दुर्लभ दर्शन के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से वृंदावन आते हैं।बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी पर क्यों होती है मंगला आरती?बांके बिहारी मंदिर की एक खास परंपरा है कि वहां रोजाना मंगला आरती नहीं होती। पूरे साल में केवल एक ही बार जन्माष्टमी के दिन ठाकुर जी की मंगला आरती की जाती है। इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता और परंपरा जुड़ी हुई है।कहा जाता है कि स्वामी हरिदास जी की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर बांके बिहारी जी का प्राकट्य निधिवन में हुआ था। यही वजह है कि यह स्थान अत्यंत पावन माना जाता है। मान्यता है कि आज भी भगवान श्रीकृष्ण, राधा रानी और गोपियों के साथ रात्रि में रास रचाते हैं और फिर तृतीय प्रहर में विश्राम करते हैं। इसी कारण से उन्हें प्रातःकाल मंगला आरती के लिए नहीं उठाया जाता।लेकिन जन्माष्टमी का दिन विशेष होता है, क्योंकि यह भगवान कृष्ण के प्राकट्य का पर्व है। इसी शुभ अवसर पर एकमात्र दिन के लिए बांके बिहारी जी की मंगला आरती की जाती है, जो पूरे वर्ष में केवल एक बार होने वाली दुर्लभ और दिव्य आरती मानी जाती है। -
घर में हाल ही में बच्चे की किलकारी गूंजी है और आप उसका नाम रखने की सोच रहे हैं, तो जन्माष्टमी से बेहतर मौका और क्या हो सकता है. 16 अगस्त 2025 को जन्माष्टमी है – वो दिन जब भगवान श्रीकृष्ण ने धरती पर जन्म लिया था. भगवान कृष्ण को बचपन से ही बहुत प्यार मिला, चाहे वो यशोदा मां हों या गोकुल की गोपियां. उनकी लीलाएं आज भी लोगों के दिल को छूती हैं. इसलिए अगर आप अपने बच्चे का नाम उनके नामों पर रखें, तो उसमें आशीर्वाद और संस्कार दोनों मिलते हैं. आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य अंशुल त्रिपाठी से.
क्यों खास होता है जन्माष्टमी पर नामकरण करना?हिंदू परंपरा में जन्म के बाद बच्चे का नाम रखने को बेहद अहम माना जाता है. नाम सिर्फ एक पहचान नहीं होती, बल्कि उसमें भाव और ऊर्जा भी होती है. अब अगर ये नाम भगवान श्रीकृष्ण के नामों में से कोई हो, तो मान्यता है कि बच्चा उनका आशीर्वाद लेकर बड़ा होता है.श्रीकृष्ण को बचपन से ही अलग-अलग नामों से बुलाया गया – जैसे कान्हा, गोपाल, मुरलीधर, श्याम, वासुदेव आदि. हर नाम के पीछे एक कहानी, एक भाव और एक पहचान जुड़ी है. जब आप अपने बच्चे को ऐसा नाम देते हैं, तो उसका जुड़ाव खुद-ब-खुद संस्कारों से हो जाता है.भगवान श्रीकृष्ण के 30 सुंदर नाम, जो आप अपने बच्चे के लिए चुन सकते हैंजन्माष्टमी के मौके पर अगर आप अपने लाडले का नाम रखने की सोच रहे हैं, तो नीचे दिए गए श्रीकृष्ण के 30 नामों में से कोई एक चुन सकते हैं, ये नाम ना सिर्फ धार्मिक रूप से शुभ हैं, बल्कि मॉडर्न जमाने के हिसाब से भी ट्रेंडी और प्यारे लगते हैं.श्रीकृष्ण के 30 लोकप्रिय नाम:1. अच्युत2. आरिव3. अदित्या4. अजया5. अमृत6. ईशान7. कान्हा8. कन्हैया9. कृष्णा10. केशव11. कमलनयन12. करुणानिधि13. गोविंद14. गोपाल15. गोपेश16. गोपालप्रिय17. जगदीश18. जनारधन19. जगन्नाथ20. ज्योतिरादित्य21. मदन22. मुरलीधर23. माधव24. मधुसूदन25. मुकुंद26. सुमेध27. सारथी28. श्याम29. पार्थ30. वासुदेवनाम चुनते वक्त किन बातों का ध्यान रखें?1. नाम छोटा, साफ और उच्चारण में आसान होना चाहिए2. उसमें कोई अच्छा अर्थ होना चाहिए3. नाम ऐसा हो जिसे बच्चा गर्व से बोले4. परिवार की आस्था और पसंद भी जरूर ध्यान में रखेंअगर आपने किसी नाम को चुन लिया है, तो उसका सही उच्चारण और स्पेलिंग भी जरूर जांच लें. आजकल कई लोग यूनिक नाम रखने की चाह में उसकी स्पेलिंग बिगाड़ देते हैं, जिससे आगे चलकर दस्तावेज़ों में परेशानी हो सकती है. - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हर वर्ष देशभर में बड़े हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की स्मृति में विशेष रूप से मनाया जाता है, जब भक्तगण व्रत रखते हैं, झांकियां सजाते हैं, मंदिरों में भजन-कीर्तन होते हैं और रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म की पूजा कर उनका स्वागत किया जाता है। हर कोना भक्ति और प्रेम के रंग में रंग जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी से पहले कुछ खास और पवित्र चीजों को घर लाना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से न केवल भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास भी होता है। यदि आप भी इस बार जन्माष्टमी को खास और शुभ बनाना चाहते हैं, तो इन वस्तुओं को पहले से घर लाकर तैयारियां शुरू कर सकते हैं। आइए जानते हैं वे कौन-कौन सी चीजें हैं।लड्डू गोपाल की बाल स्वरूप मूर्तिभगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की एक सुंदर मूर्ति को जन्माष्टमी से पहले घर लाना बहुत शुभ माना जाता है। इसे घर के मंदिर में स्थापित कर अगर विधि-विधान से पूजा की जाए, तो घर में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।बांसुरीकृष्ण भगवान की पहचान उनकी प्रिय बांसुरी से भी होती है। जन्माष्टमी से पहले एक सुंदर बांसुरी घर लाकर पूजा स्थान पर रखना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे न केवल मन को शांति मिलती है बल्कि घर में भी सकारात्मकता और मधुरता बनी रहती है। चांदी या पीतल की बांसुरी विशेष शुभ मानी जाती है।मोर पंखमोर पंख श्रीकृष्ण के मुकुट का हिस्सा होता है और उन्हें अत्यंत प्रिय है। इसे घर में लाकर पूजा स्थल या मुख्य द्वार पर लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर का वास्तु दोष भी समाप्त होता है।गाय और बछड़े की मूर्तिकृष्ण जी का गहरा संबंध गायों से रहा है। जन्माष्टमी के अवसर पर गाय और बछड़े की मूर्ति लाना शुभ संकेत माना जाता है। इसे घर में रखने से समृद्धि आती है और संतान सुख की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। धातु की मूर्ति को पूजा स्थान पर रखना श्रेष्ठ होता है।माखन-मिश्रीमाखन और मिश्री श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं। जन्माष्टमी से पहले इन्हें घर में लाकर भोग की तैयारी करनी चाहिए। यह प्रेम, मिठास और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। पूजा में इसका उपयोग करने से भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।वैजयंती मालावैजयंती माला भगवान कृष्ण के गले का एक अहम आभूषण मानी जाती है। इसे घर लाकर कान्हा जी को पहनाने से धन और समृद्धि की वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि इसे धारण करने या पूजा में उपयोग करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।पीले वस्त्रभगवान श्रीकृष्ण को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। जन्माष्टमी से पहले घर में पीले वस्त्र जैसे कि पर्दे, चादरें या पूजा की पोशाक लाना शुभ माना जाता है। इससे मां लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है और घर में आर्थिक समृद्धि आती है।तुलसी का पौधातुलसी बिना श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है। इस पर्व से पहले तुलसी का नया पौधा लगाना या पुराने पौधे की सेवा करना पुण्यदायी होता है। तुलसी की पत्तियों के बिना श्रीकृष्ण को भोग भी नहीं लगाया जाता।शंखशंख की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने वाली मानी जाती है। जन्माष्टमी से पहले घर में शंख लाकर पूजा स्थल पर स्थापित करें और नियमित रूप से उसका उपयोग करें। इससे घर का वातावरण पवित्र और ऊर्जावान बना रहता है।
- 12 अगस्त को उत्तर भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई से रचा-बसा एक महत्वपूर्ण पर्वकजरी तीज उत्तर भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई से रचा-बसा एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे विशेष रूप से महिलाएं पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाती हैं। यह त्योहार सावन की रिमझिम फुहारों के बीच सुहागिनों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन वे अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। पारंपरिक वेशभूषा, कजरी गीतों की मधुर धुन और झूला झूलने की परंपरा इस पर्व की सुंदरता को और भी बढ़ा देती है।कजरी तीज का एक विशेष पक्ष है नीमड़ी पूजन, जिसमें महिलाएं नीम की डाली को देवी रूप में पूजती हैं। नीम को शास्त्रों में रोग नाशक और वातावरण को शुद्ध करने वाला वृक्ष माना गया है। इस पूजा से न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है, बल्कि यह प्रकृति से जुड़ाव और स्त्री सशक्तिकरण का भी संदेश देती है। यह पर्व पारिवारिक एकता, प्रेम और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है, जो समाज में सकारात्मकता और शांति का संचार करता है।क्या है कजरी तीज और इसका महत्व?कजरी तीज उत्तर भारत में मनाया जाने वाला एक पावन पर्व है, जो हरियाली तीज के लगभग पंद्रह दिन बाद आता है। यह त्योहार खासतौर पर विवाहित महिलाओं द्वारा पति की लंबी उम्र, पारिवारिक सुख-समृद्धि और संतान प्राप्ति की कामना के लिए मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं, पारंपरिक कजरी गीत गाती हैं और रात को पूजा कर धार्मिक कथा सुनती हैं। कजरी तीज की सबसे खास परंपरा है निमड़ी पूजन, जिसमें नीम को देवी के रूप में पूजने की परंपरा है।क्या होती है नीमड़ी पूजन की परंपरा?नीमड़ी पूजन में महिलाएं नीम के पेड़ या उसकी टहनी को प्रतीक रूप में स्थापित करके उसे माता का स्वरूप मानती हैं। कुछ स्थानों पर नीम की पत्तियों के ऊपर मिट्टी से बनी देवी की प्रतिमा रखकर पूजा की जाती है। महिलाएं हल्दी, चूड़ी, सिंदूर, रोली और सुहाग की अन्य सामग्रियों से नीमड़ी माता की पूजा करती हैं। यह पूजन सौभाग्य, संतान सुख और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है।व्रत और पूजन विधिसुबह महिलाएं स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं और दिनभर निर्जल उपवास करती हैं। शाम को नीम की टहनी या उसकी प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है। कजरी माता की कथा सुनी जाती है, जिसमें एक ब्राह्मणी के व्रत और उसकी परीक्षा की कहानी होती है। अंत में चावल और गुड़ का भोग लगाकर सुखद वैवाहिक जीवन और पारिवारिक सुख की प्रार्थना की जाती है।नीमड़ी पूजन से जुड़ी मान्यताऐसा माना जाता है कि नीम में देवी दुर्गा का वास होता है और उसका पूजन करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। नीम की शीतलता और औषधीय गुण तन और मन दोनों को शुद्ध करने में सहायक होते हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कजरी गीत गाते हुए नीम के पेड़ के नीचे झूला झूलती हैं और नीमड़ी माता से सुख, समृद्धि और सुरक्षा की कामना करती हैं।कजरी तीज के पर करें ये उपायकजरी तीज के दिन कुछ विशेष और आसान उपाय करके महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन को और भी सुखमय बना सकती हैं। इन उपायों से न केवल देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि घर में शांति, प्रेम और समृद्धि भी बनी रहती है।पूजन के बाद नीम की टहनी पर चूड़ियां, बिंदी, कंघी, सिंदूर जैसी सुहाग की सामग्री चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है। इससे पति-पत्नी के रिश्तों में मधुरता आती है और आपसी समझ मजबूत होती है।गाय के दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल को मिलाकर नीम की डाली का अभिषेक करने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा आती है और जीवन में पवित्रता बनी रहती है।कुआं, नदी या तालाब की मिट्टी से शिव और पार्वती की छोटी मूर्ति बनाकर उनका पूजन करना इस दिन बहुत फलदायी होता है। यह उपाय अखंड सौभाग्य बनाए रखने में सहायक होता है।कजरी तीज की कथा सुनने के बाद किसी सुहागिन महिला को साड़ी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर आदि दान करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है। इससे घर में चल रहे संकट और तनाव कम होते हैं।जब रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें, तो मन में यह भाव रखें। "हे चंद्र देव, जैसे आप अपने प्रकाश से पूरे संसार को रोशन करते हैं, वैसे ही मेरे घर को सुख, शांति और सौभाग्य से भर दें।" इस भावना के साथ दिया गया अर्घ्य बहुत प्रभावशाली माना जाता है।
- श्रावण मास यानी सावन, भगवान शिव की आराधना और आत्मिक शुद्धि का महीना माना जाता है। इस महीने में केवल व्रत-पूजा ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा और ध्यान साधना का विशेष महत्व है। ऐसे में अगर आप शोर-शराबे से दूर कुछ शांत, शक्तिशाली और सकारात्मक ऊर्जा वाले स्थानों की तलाश में हैं, तो भारत के कुछ प्रसिद्ध आश्रम आपकी आत्मा को संपूर्ण विश्राम दे सकते हैं।इस लेख में आपको भारत के 5 ऐसे आध्यात्मिक आश्रमों के बारे में बताया जा रहा है, जहां आप ना केवल ध्यान और योग का अभ्यास कर सकते हैं, बल्कि अपने भीतर के "मैं" से भी जुड़ सकते हैं। सावन के पावन महीने में इन स्थानों की यात्रा एक जीवन बदलने वाला अनुभव बन सकती है।परमार्थ निकेतन, ऋषिकेशउत्तराखंड के ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन नाम का आश्रम है। गंगा किनारे स्थित यह आश्रम विश्वविख्यात है। यहां योग, ध्यान और गंगा आरती का दिव्य अनुभव मिलता है। इस आश्रम में सावन माह में शिवभक्तों के लिए विशेष कार्यक्रम और मंत्र साधना का आयोजन होता है।ईशा योग केंद्र, कोयंबटूरतमिलनाडु के कोयंबटूर में ईशा योग केंद्र स्थित है। यह आश्रम सद्गुरु द्वारा स्थापित किया गया है। ईशा योग केंद्र में ध्यान और विज्ञान का समागम है। यहां स्थित 112 फीट ऊंची आदियोगी शिव प्रतिमा बेहद प्रसिद्ध है। सावन के समय विशेष ध्यान सत्र और शिव साधना का आयोजन किया जाता है।ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट, पुणेमहाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले में भी एक आश्रम है, जिसका नाम ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसाॅर्ट है। अगर आप ध्यान को नए दृष्टिकोण से अनुभव करना चाहते हैं तो यह आश्रम उपयुक्त है। यहां ओशो की डायनामिक मेडिटेशन टेक्निक सिखाई जाती है। सावन में यहां गहन ध्यान रिट्रीट्स आयोजित होते हैं।रामकृष्ण मिशन आश्रम, बेलूर मठपश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन आश्रम है। स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित यह आश्रम गंगा नदी के किनारे स्थित है। यहां ध्यान, भजन और सामाजिक सेवा के साथ-साथ आध्यात्मिक अध्ययन भी कराया जाता है। सावन में शिव को समर्पित मंत्रोच्चारण और विशेष पूजा होती है।श्री अरविंद आश्रम, पुदुचेरीपुदुचेरी में स्थित इस आश्रम में श्री अरविंद और मां की शिक्षाओं के अनुसार ध्यान और साधना करवाई जाती है। यह आश्रम शांति और चित्त की स्थिरता का प्रतीक है। सावन के दौरान यह स्थान श्रद्धालुओं और साधकों के लिए ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।
- पहली राशि मेष का गृह स्वामी मंगल ग्रह होता है। मंगल काफी उग्र ग्रह होता है और इसका प्रभाव मेष राशि वालों पर हमेशा दिखता है। रत्न शास्त्र के हिसाब से हर राशि वालों के लिए कोई ना कोई ऐसा रत्न जरूर होता है जो उनके जीवन के हर पहलू के लिए मददगार साबित होता है। रत्नों की मदद से कुंडली में कमजोर पडऩे वाले ग्रहों की स्थिति को ठीक किया जा सकता है। वहीं अगर मेष राशि वालों में कॉन्फिडेंस की कमी है तो ज्योतिषियों के अनुसार उन्हें तीन रत्नों को धारण करना चाहिए। नीचे विस्तार से जानिए कि आखिर ये रत्न कौन-कौन से हैं?रूबीमाणिक को रुबी कहा जाता है। इसे रत्नों का राजा भी कहा जाता है। इसकी एनर्जी काफी तेज होती है जोकि मेष राशि वालों से मेल भी खाती है। इस रत्न की मदद से लोग साहसी और मजबूत इच्छाशक्ति वाले बनते हैं। मेष राशि वालों को ये रत्न सबसे ज्यादा सूट करता है। इस रत्न की मदद से लोग आसानी से अपने सपनों को पूरा कर लेते हैं।जैस्परलाल जैस्पर की गिनती विशेष रत्नों में होती है। अगर मेष राशि के लोग इस रत्न को धारण करते हैं तो उनकी जिंदगी में स्थिरता आती है। साथ ही उनकी धैर्य करने की क्षमता आ जाती है। सेल्फ कंट्रोल के लिए भी ये रत्न काफी अच्छा माना जाता है। साथ ही इसे धारण करने से क्लैरिटी भी आती है।हीराडायमंड की ऊर्जा अपने आप में ही खास होती है। अगर मेष राशि वालों को अपने कॉन्फिडेंस को बूस्ट करना है तो उनके लिए हीरे की अंगूठी पहनना सबसे लाभदायक होता है। इसे धारण करने से सोच में क्लैरिटी आती है। इसके जरिए मेष राशि वालों की पर्सनैलिटी में निखार भी आता है।
- सावन का महीना शिव भक्ति के लिए विशेष समय माना जाता है। इस वर्ष 4 अगस्त को सावन का अंतिम सोमवार मनाया जाएगा। इस दिन कई शुभ योग बन रहे हैं, जैसे सर्वार्थ सिद्धि योग, ब्रह्म योग और इंद्र योग। साथ ही चंद्रमा, वृश्चिक राशि में अनुराधा और चित्रा नक्षत्रों में गोचर करेंगे। इन विशेष योगों के चलते इस दिन किया गया पूजा-पाठ और दान-पुण्य अत्यंत फलदायी सिद्ध होगा।सावन के आखिरी सोमवार पर करें ये सरल उपायरुद्राभिषेक कराएंभगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे प्रभावशाली उपाय है रुद्राभिषेक। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और जीवन में शुभता लाता है। कहा जाता है कि रुद्राभिषेक से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।चंद्र से जुड़ी वस्तुओं का दानयदि आपकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर स्थिति में है, तो आप इस दिन दूध, दही, चावल, चीनी और सफेद वस्त्र जैसे चंद्रमा से संबंधित चीजें दान करें। इससे चंद्रमा की स्थिति बेहतर होगी और मानसिक तनाव से राहत मिलेगी।108 बेलपत्रों पर लिखें "ॐ नमः शिवाय"सफेद चंदन से 108 बेलपत्रों पर "ॐ नमः शिवाय" लिखें और उन्हें भगवान शिव को अर्पित करें। साथ ही शमी के पत्तों पर शहद लगाकर शिवलिंग पर अर्पण करें। यह उपाय अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
- सावन का महीना चल रहा है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान शिव की उपासना करते हैं और उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत और जलाभिषेक करते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की पूजा के बाद उनके वाहन और प्रिय सेवक नंदी की भी पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि नंदी के कानों में अपनी मनोकामना कहने से वह इच्छा भगवान शिव तक पहुंचती है। लेकिन क्या आपको पता है कि इस मान्यता के पीछे की वजह क्या है? ऐसा क्यों किया जाता है और इसके नियम क्या हैं? आइए इससे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में जानते हैं....इस परंपरा के पीछे क्या है पौराणिक कथा?एक कथा के अनुसार भगवान शिव ने नंदी को यह आशीर्वाद दिया था कि जो भी व्यक्ति तुम्हारे कान में अपनी इच्छा कहेगा, वह मुझ तक जरूर पहुंचेगी और उसे पूर्ण भी किया जाएगा। इसीलिए आज भी भक्त नंदी के कान में अपनी मन की बात कहते हैं। एक अन्य कथा में बताया गया है कि एक ऋषि ने नंदी से पूछा कि वह भगवान शिव से अपनी मनोकामनाएं कैसे साझा करते हैं। नंदी ने उत्तर दिया कि वह तो सिर्फ भगवान की सेवा करते हैं और कुछ नहीं कहते। तब ऋषि ने कहा कि जो भी व्यक्ति अपनी इच्छा शिवजी तक पहुंचाना चाहता है, वह उसे नंदी के कान में कहे, और नंदी स्वयं उसे भगवान तक पहुंचा देंगे। तभी से यह परंपरा शुरू हुई।नंदी के कानों में अपनी मनोकामना कहने से वह इच्छा पूर्ण होती है, लेकिन इससे पहले "ॐ" का उच्चारण करना आवश्यक होता है, ताकि नंदी ध्यान से आपकी बात सुनें और उसे शिवजी तक पहुंचाएं।नंदी के कान में कैसे कहें अपनी इच्छा?सबसे पहले नंदी का विधिवत पूजन करें, दीपक जलाएं और भोग अर्पित करें। इसके बाद "ॐ" का उच्चारण करते हुए अपनी मनोकामना नंदी के बाएं कान में कहें। ऐसा माना जाता है कि बाएं कान में कही गई बात जल्दी शिवजी तक पहुंचती है और पूरी भी होती है।
- अगस्त का महीना हर मायने में खास होता है। पॉजिटिविटी से भरे इस महीने में जन्म लेने वाले लोग दूसरों को खूब आकर्षित करते हैं। अंकशास्त्र और ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अगस्त महीने में जन्म लेने वाले लोग सिंह और कन्या राशि के अंदर आते हैं। जो लोग 23 जुलाई से 22 अगस्त के बीच जन्म लेते हैं, वो सिंह राशि के होते हैं। इसके बाद जन्मे लोग कन्या राशि के होते हैं। ऐसे में अगस्त में जन्म लेने वाले लोगों को में सिंह और कन्या राशि के कुछ-कुछ गुण होते हैं। साहसी और कॉन्फिडेंट होने के साथ-साथ ये लोग काफी इमोशनल और केयरिंग भी होते हैं। नीचे विस्तार से जानें अगस्त महीने में जन्म लेने वालों के गुण...आसानी से शेयर नहीं करते दिल की बातअगस्त में जन्म लेने वाले लोग कभी भी आसानी से अपने दिल की बात शेयर नहीं करते हैं। अपनी पर्सनल बातों को शेयर करने में इन्हें थोड़ा समय लगता है। ये जल्दी किसी पर भरोसा नहीं कर पाते हैं। ऐसे में धीरे-धीरे ये लोग अपनी प्रॉब्लम का हाल खुद ही निकाल लिया करते हैं।होते हैं करियर फोकस्डअगस्त में जन्मे हुए लोग महत्वाकांक्षी होते हैं। ये हमेशा बड़े सपने ही देखते हैं। उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं होता है कि उनके लिए गए फैसलों पर कोई सवाल उठाएं। ऐसे में ये लोग जिस काम को शुरू करते हैं, उसे स्मार्ट तरीके से पूरा करके ही दम लेते हैं। अगस्त में जन्मे लोग कॉन्फिडेंट भी होते हैं और यही वजह है कि उन्हें हर काम में सफलता मिल ही जाती है। ये लोग मजबूत इच्छाशक्ति वाले होते हैं।सकारात्मक होते हैं अगस्त में जन्मे लोगअगस्त के महीने में जन्म लेने वालों की सोच काफी पॉजिटिव होती है। अपनी पॉजिटिव बॉडी लैग्वेंज और प्रभावशाली आवाज के चलते ये दूसरों से अलग दिखते हैं। इनकी पर्सनैलिटी मैग्नेट की तरह होती है। ये पॉजिटिव सोच वाले लोगों को अपनी ओर जल्दी से अट्रैक्ट कर लेते हैं। इनका फ्रेंड सर्कल छोटा होता है। ये लोग भरोसेमंद दोस्त होते हैं।
- पूजा के दौरान खास चीजों का धुआं हिंदू धर्म में जरूर दिया जाता है। जैसे आरती के लिए कपूर जलाना। कपूर जलाने के कई सारे फायदे हैं। लेकिन केवल कपूर ही नहीं पूजा में कपूर के साथ दो और चीजों को धुआं किया जाता है। जो घर से केवल निगेटिविटी ही नहीं निकालता बल्कि इसके कई सारे हेल्थ बेनिफिट्स भी है। अक्सर पूजा के बाद घरों में लोबान और गुग्गल का धुआं किया जाता है। अगर कपूर के साथ लोबान या लोहबान का धुआं या फिर कपूर में गुग्गल मिलाकर धुआं किया जाता है। तो इससे हेल्थ को कई सारे बेनिफिट्स होते हैं। जानें घर में लोबान और गुग्गल को कपूर में मिलाकर जलाने के फायदे।घर में आती है पॉजिटिव एनर्जीअक्सर पूजा के बाद घर में मौजूद देवी-देवताओं को प्रसन्न करने और घर में वास करने के लिए उनके सामने कपूर में गुग्गल और लोबान का धुआं किया जाता है। इससे पॉजिटिव एनर्जी आती है और धुएं की मदद से निगेटिव एनर्जी बाहर निकल जाती है।सांस की समस्या कम करेधुआं करने से सांस में समस्या नहीं होगी। अगर लोबान को गोबर के उपलों में डालकर और देसी घी मिलाकर जलाया जाता है तो इससे सांस फूलने और अस्थमा की समस्या में राहत मिलती है।मिलती है मानसिक शांतिघर में गुग्गल को कपूर के साथ मिलाकर जलाने से मन शांत होता है। इसकी मीठी महक घर के वातावरण को प्योर करती है और निगेटिव थाट्स से छुटकारा दिलाती है।बैक्टीरिया मरते हैंलोबान को गोबर के उपले और कपूर के साथ मिलाकर जलाने से घर में पनप रहे बैक्टीरिया मरते हैं। जिससे ना केवल पेट की बीमारी बल्कि बुखार और इंफेक्शन के बैक्टीरिया भी खत्म होते हैं।हवा को शुद्ध करता हैगुग्गल को कपूर के साथ मिलाकर जलाया जाता है तो घर की हवा में मौजूद बैक्टीरिया को मारने में मदद मिलती है। एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टी की वजह से ये घर के पॉल्यूशन को खत्म करता है और घर की हवा को शुद्ध बनाता है।
-
पॉकेट हमेशा पैसों से भरा रहे...ये कौन नहीं चाहता है? कई बार ऐसा होता है ना कि अच्छी खासी कमाई के बाद भी तंगी की स्थिति बनी रहती है। आपको भी महीने के खत्म होते-होते ऐसा लगने लगता है कि आखिर सारा पैसा गया तो गया कहां? अगर आपको भी ऐसा ही कुछ फील होता है तो इस स्थिति को कुछ आसान उपायों से दूर कर सकते हैं। फेंगशुई में ऐसे कई टिप्स हैं जिन्हें अगर मान लिया जाए तो जिंदगी में सकारात्मक ऊर्जा की कमी कभी नहीं रहेगी। वहीं पैसों का फ्लो भी अच्छा रहेगा। अपनी पॉकेट में आप कुछ चीजों को रखकर ऐसी स्थिति से बच सकते हैं। जानिए आखिर वो कौन सी चीजें हैं...
ग्रीन एवेंच्यूरिनये खास किस्म का एक स्टोन है जोकि भाग्य और समृद्धि ले आता है। ये आपके सपनों को जल्दी अट्रैक्ट करने की क्षमता रखता है। इस स्टोन के जरिए किसी भी व्यक्ति का इमोशनल बैलेंस भी बढ़िया रहता है। पॉकेट में इसे रखने से आपकी जिंदगी में सकारात्मकता आएगी और पैसों का फ्लो भी धीरे-धीरे अच्छा होने लगेगा।सिट्रीन क्रिस्टलये भी एक स्टोन है जोकि पीले रंग का होता है। इसमें सूर्य की शक्ति होती है। इस वजह से इसे रखने वालों की एनर्जी हमेशा अच्छी रहती है। ये क्रिस्टल हमेशा अच्छी चीजों को अटैक्ट करता है। इसकी मदद से सफलता जल्दी हासिल होती है और समृद्धि भी खूब अट्रैक्ट होती है। ऐसे में इस क्रिस्टल को पॉकेट में रखना सही होता है।फेंगशुई सिक्केलाल रंग के धागे से बंधे हुए सिक्के अगर आप अपनी पॉकेट रखेंगे तो ये शुभ होगा। ध्यान रखें कि इस धागे में सिक्कों की संख्या 6 हो। बता दें कि न्यूमेरेलॉजी में 6 नंबर काफी लकी माना जाता है। वहीं फेंगुशुई के सिक्कों का मेटल पैसों और सुख समृद्धि को अट्रैक्ट करता है।तेजपत्तापॉकेट में तेजपत्ता रखने से भी कई लाभ मिलते हैं। आप अपनी इच्छा को पेंसिल के माध्यम से तेजपत्ते पर लिख दें। इसे मोड़कर फेंगशुई वाले सिक्के के बगल ही रख दें। ध्यान रहे कि हर हफ्ते आपको ये काम करना है। पुराने वाले तेजपत्ते को अच्छी इंटेंशन के साथ जला दें ताकि किसी भी तरह की ब्लॉकेज और निगेटिव एनर्जी दूर हो जाए। -
नई दिल्ली। देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक महाकाल नगरी उज्जैन में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट सोमवार रात ठीक 12 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। यह मंदिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की तीसरी मंजिल पर स्थित है और खास बात यह है कि इसके पट पूरे वर्ष में केवल एक दिन, नागपंचमी के शुभ अवसर पर ही खोले जाते हैं। मंदिर के खुलने के साथ ही 24 घंटे तक श्रद्धालु यहां दर्शन कर सकते हैं।
हिंदू धर्म में नागों की पूजा का विशेष महत्व है। इन्हें भगवान शिव का आभूषण और उनका रक्षक माना जाता है।नागचंद्रेश्वर मंदिर भी इसी परंपरा का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि यहां दर्शन मात्र से नागदोष, कालसर्प दोष और अन्य बाधाएं दूर हो जाती हैं। महाकाल मंदिर के गर्भगृह के ऊपर ओंकारेश्वर मंदिर और सबसे ऊपर नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है, जिसे देखने का दुर्लभ अवसर केवल नागपंचमी पर ही मिलता है। मंदिर में स्थित प्रतिमा अद्वितीय है, जिसे नेपाल से लाया गया था। इसमें भगवान शिव शेषनाग की शैय्या पर विराजमान हैं और उनके साथ माता पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी, सिंह, सूर्य और चंद्रमा की सुंदर मूर्तियां भी स्थापित हैं। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां भोलेनाथ इस रूप में विराजते हैं।मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा करवाया गया था। बाद में 1732 में मराठा सरदार राणोजी सिंधिया ने इसका पुनर्निर्माण कराया। नागचंद्रेश्वर की मूर्ति भी तभी नेपाल से मंगाकर तीसरी मंजिल पर स्थापित की गई थी।धार्मिक कथा के अनुसार, नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। इसके बाद तक्षक देव ने शिवजी के साथ ही रहना शुरू किया, लेकिन शिवजी को यह प्रिय नहीं था, क्योंकि वह एकांत और ध्यान के प्रेमी थे। तक्षक ने शिव की भावना को समझा और तभी से तय किया कि वह साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी के दिन ही उनके दर्शन करने आएंगे। इसी परंपरा के कारण मंदिर के कपाट केवल इसी दिन खोले जाते हैं। प्रशासन की ओर से अनुमान है कि इस एक दिन में करीब 10 लाख श्रद्धालु नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन करेंगे। हर श्रद्धालु को लगभग 40 मिनट के भीतर दर्शन कराने की योजना बनाई गई है। दर्शन व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए विशेष सुरक्षा और मार्गदर्शन की व्यवस्था की गई है। - हिन्दू धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि घर में पूजा-पाठ के दौरान कपूर का इस्तेमाल करने से घर का माहौल सकारात्मक रहता है. मान्यता के अनुसार पूजा के समय कपूर को जलाने से घर में ख़ुशहाली बनी रहती है और नकारात्मकता नष्ट हो जाती है. कपूर के जलने पर निकलने वाला धुआं घर के वातावरण को शुद्ध करता है और कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से भी छुटकारा दिलाता है. कपूर के धुएं में जो सुगंध मौजूद होती है, वह सकारात्मकता को बढ़ाती है. साथ ही कीट-पतंगों को भी घर से दूर रखती है. इसके अलावा हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, पूजा-पाठ या हवन में कपूर का इस्तेमाल न किया जाए तो पूजन अधूरा माना जाता है. चलिए जानते हैं पंडित से पूजा-पाठ के दौरान कपूर जलाना शुभ क्यों होता है, और इसको जलाने के क्या फ़ायदे होते हैं?पूजा-पाठ में क्यों जलाया जाता है कपूरहिन्दू धर्म में की जाने वाली पूजा-पाठ अनुष्ठान में कपूर प्राचीन काल से ही जलाया जाता आ रहा है. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कपूर जलाने के कई आध्यात्मिक लाभ हैं. घर में कपूर जलाने से सकारात्मकता और शांति आती है. कपूर का उपयोग करने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं.कपूर जलाने के फ़ायदेकपूर को घर में जलाने से घर के अंदर का वातावरण शुद्ध होता है. जलते हुए कपूर की सुगंध हानिकारक वायरस और बैक्टीरिया को ख़त्म करती है. कपूर को शाम के समय मिट्टी के किसी बर्तन में रखकर जलाना चाहिए और इसका धुआं पूरे घर में फैलाया जाना चाहिए. ऐसा करने से ही घर के सभी दोष समाप्त होते हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार घर में कपूर जलाने से पितृ दोष भी दूर होता है. इसके अलावा घर को लगी बुरी नजर का प्रभाव कम होता है और रिश्तों में मधुरता बनी रहती है.कपूर जलाने का वैज्ञानिक कारणविज्ञान के अनुसार घर के अंदर कपूर जलाने से हानिकारक बैक्टीरिया और प्रदूषण से राहत मिलती है. इसका धुआं कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकता है. घर में इस्तेमाल होने वाला कपूर कई तरह से लाभदायक होता है. यह हवा को शुद्ध करके स्वास्थ्य लाभ देता है.
- पंडित प्रकाश उपाध्यायआज 21 जुलाई को सावन का दूसरा सोमवार है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस साल सावन का दूसरा सोमवार अत्यंत महत्वपूर्ण और शुभ माना जा रहा है क्योंकि इस दिन तीन दुर्लभ और शक्तिशाली योग बना हैं। ऐसे योगों में की गई पूजा और व्रत का प्रभाव अधिक गहरा और फलदायक होता है। सावन के इस दूसरे सोमवार को बन रहे इन दुर्लभ योगों का प्रभाव पूरे दिन रहेगा, जो जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक बदलाव लेकर आते हैं। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा करें, शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग आदि अर्पित करें और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। शिव चालीसा, रुद्राष्टक या महामृत्युंजय मंत्र का पाठ भी फलदायी रहता है। अपने मन की इच्छा के साथ संकल्प लेकर पूजा करें ताकि आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हों। इन योगों में दान करना भी बहुत शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है और ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं -वृद्धि योगवृद्धि जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है प्रगति और बढ़ोतरी। इस योग के दौरान किए गए कार्यों में सफलता मिलने की संभावना अधिक होती है, खासकर धन, व्यापार या किसी भी प्रकार की वृद्धि से जुड़े मामलों में। सावन के दूसरे सोमवार को यदि इस योग में भगवान शिव की पूजा की जाए तो आर्थिक समृद्धि और भौतिक सुखों में बढ़ोतरी होती है।सर्वार्थ सिद्धि योगयह योग सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और हर प्रकार के कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना जाता है। सर्वार्थ का मतलब है सभी उद्देश्य और सिद्धि का मतलब है पूर्णता या सफलता। इस योग के दौरान शुरू किए गए किसी भी शुभ कार्य में बाधाएं कम आती हैं और सफलता मिलने के योग होते हैं। यह योग मंत्रों की सिद्धि, अनुष्ठान या किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है।अमृत सिद्धि योगअमृत का अर्थ है अमरता और सिद्धि का अर्थ है पूर्णता। इस योग में किए गए कार्यों के परिणाम स्थायी होते हैं और यह दीर्घायु, अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि लाता है। यह योग नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा आकर्षित करता है।
- शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए ये तो बहुत लोग जानते हैं किन्तु कुछ ऐसी वस्तुएं भी हैं जिसे भगवान शिव को अर्पण करने को शास्त्रों में मना किया गया है। आइये ऐसी ही कुछ वस्तुओं के विषय में जानते हैं।हल्दी: भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ती है क्यूंकि इसका सम्बन्ध भगवान विष्णु से है। विष्णु-लक्ष्मी को हल्दी चढाने का विधान है क्यूंकि नारायण को हल्दी या पीली वस्तुएं बड़ी पसंद हैं। यही कारण है कि उन्हें पीतांबर कहा गया है। इसके अतिरिक्त चूँकि हल्दी का सम्बन्ध रसोईघर से है इसीलिए भी ये महादेव को नहीं चढ़ाई जाती।चंपा और केवड़े का फूल: इन दोनों फूलों को महादेव पर नहीं चढ़ाया जाता। इन दोनों की गंध अत्यंत तेज होती है। इसके अतिरिक्त दोनों से, विशेषकर केवड़े के फूल से इत्र बनाया जाता है जो सांसारिक अथवा भौतिक वस्तुओं का द्योतक है। महादेव भैतिक वस्तुओं से परे हैं इसीलिए ये दोनों फूल उनके लिए वर्जित है।शंख और तुलसी: महादेव को शंख और तुलसी भी अर्पित नहीं की जाती क्यूंकि भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक राक्षस का वध किया था। उसे ही कई जगह जालंधर के नाम से जाना जाता है। वृंदा इसी शंखचूड़ की पत्नी थी और उसे वरदान था कि जब तक उसका पतिव्रत अखंड रहेगा तब तक उसके पति को कोई मार नहीं सकेगा। इसी कारण युद्ध में महादेव शंखचूड़ का वध नहीं कर रहे थे ताकि वरदान का अपमान ना हो। तब उनकी प्रेरणा से भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का वेश लेकर वृंदा का पतिव्रत भंग कर दिया और तब महादेव ने शंखचूड़ का वध कर दिया। जब वृंदा को इसका पता चला तो उन्होंने नारायण को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया और स्वयं भस्म हो गयी। उनके भस्म से ही तुलसी की उत्पत्ति हुई और नारायण श्राप के कारण शालिग्राम के रूप में जन्मे। तब से शंख और तुलसी महादेव स्वीकार नहीं करते।नारियल: इसे श्रीफल कहते हैं, अर्थात देवी लक्ष्मी का फल। देवी लक्ष्मी का सम्बन्ध भगवान विष्णु से है इसी कारण महादेव को नारियल या नारियल का पानी नहीं चढ़ाया जाता।तिल: ऐसी मान्यता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के मैल से हुई थी। यही कारण है कि इसे भगवान शिव पर नहीं चढ़ाया जाता।खंडित चावल: इसे किसी भी देवता को नहीं चढ़ाना चाहिए। पूजा में चढ़ने वाले चावल को "अक्षत" कहते हैं, अर्थात जिसकी कोई क्षति ना हुई हो। खंडित अथवा क्षत चावल इसी कारण महादेव या किसी अन्य देवता को नहीं चढ़ाया जाता है।खंडित बेलपत्र: बेलपत्र महादेव को अत्यंत प्रिय है किन्तु बेलपत्र केवल तीन की संख्या में महादेव को समर्पित किया जाना चाहिए। उसे तोड़ कर एक अथवा दो बेलपत्र भगवान शिव को अर्पण नहीं किया जाता है।लाल वस्त्र: भगवान शिव को लाल वस्त्र भी अर्पण नहीं किया जाता क्यूंकि ये माता पार्वती को प्रिय नहीं है। ये कथा कुमकुम से भी सम्बंधित है क्यूंकि दोनों का रंग लाल होता है।कुमकुम: ये भी माता पार्वती को प्रिय नहीं क्यूंकि ऐसी कथा आती है कि एक बार कुमकुम चढाने के कारण माता को रक्त का भ्रम हो गया था। इस विषय में विस्तार पूर्वक पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ।उबला दूध: अक्षत की ही भांति उबला दूध ना केवल महादेव को बल्कि किसी और देवता को नहीं चढ़ाना चाहिए। भगवान शिव को गाय का ताजा दूध ही अर्पित करना चाहिए। अगर गाय का दूध उपलब्ध ना हो तो भी बाजार से खरीदे गए दूध को बिना उबले भगवान शिव पर चढ़ाना चाहिए। दूध को उबलने पर वो जूठा माना जाता है और इसीलिए भगवान शिव पर नहीं चढ़ाया जाता।लौह पात्र से जल: भगवान शिव को केवल कांसे या ताम्बे के पात्र से जल चढ़ाया जाता है। लौह पात्र उनके लिए वर्जित है। कई जगह उन्हें लौह के साथ-साथ उन्हें स्वर्ण और रजत पात्र से भी जल चढाने से मना किया जाता है क्यूंकि महादेव ने त्रिपुर, जो क्रमशः स्वर्ण, रजत और लौह से बने थे, का संहार किया था और त्रिपुरारि कहलाये।केतकी का फूल: ये पुष्प महादेव को प्रिय नहीं क्यूंकि इसने महादेव से असत्य कहा था। ये कथा भगवान ब्रह्मा और विष्णु के प्रतियोगिता की है।
- भगवान शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप की कथा तो सभी जानते होंगे, लेकिन इस बात की जानकारी कम लोगों को ही होगी, कि एक बार भगवान शिव ने हरिहर का रूप भी धरा था, और बताया था कि वे और श्रीहरि एक ही हैं. हरिहर को हिंदू धर्म शास्त्रों में ‘शंकरनारायण’ के नाम से भी जाना जाता है. यह अवतार हिंदू धर्म में एकता और सद्भाव का प्रतीक है, जो दर्शाता है कि दोनों देवता एक ही शक्ति के दो पहलू हैं. हरिहर अवतार में, शरीर का आधा भाग विष्णु (हरि) और आधा भाग शिव (हर) का प्रतिनिधित्व करता है. आइये जानते हैं, महादेव को हरिहर का अवतार क्यों लेना पड़ा था, और सावन माह से इस तथ्य का कितना गहरा संबंध है.हरिहर के स्वरूप का गूढ़ भावभगवान शिव एवं श्रीहरि के संयुक्त स्वरूप 'हरिहर' के रूप में, दाहिना भाग रुद्र के प्रतीकों के साथ भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि बायां भाग भगवान विष्णु को दर्शाता है. भगवान हरिहर अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल और भाला तथा बाएं हाथ में गदा और चक्र धारण करते हैं. उनके दाहिने हाथ में देवी गौरी और बाएं हाथ में देवी लक्ष्मी विराजमान हैं.हरिहर अवतार की कथाएक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार शिव और श्रीहरि के भक्तों के बीच यह बहस उठी कि दोनों में कौन सर्वश्रेष्ठ हैं. श्रीहरि के भक्त श्रीहरि को तो भगवान शिव के भक्त शिव को सर्वश्रेष्ठ मानते थे. धीरे-धीरे बहस इतनी बढ़ी कि दोनों भगवान शिव के पास पहुंचे, और अपनी बात उनके सामने रखी. शिवजी ने इस बहस को गलत मानते हुए हरिहर के रूप में प्रकट हुए और अहसास कराया कि विष्णु ही शिव हैं और शिव ही विष्णु हैंहरिहर का आध्यात्मिक महत्व‘हरिहर अवतार’ का हिंदू धर्म में गहरा आध्यात्मिक महत्व है. भगवान शिव को संहारक और भगवान विष्णु को पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है, यह दर्शाता है कि सृष्टि विनाश और संरक्षण दोनों के माध्यम से चलती रहती है, जिससे ब्रह्मांड का चक्र पूरा होता है, चूंकि चातुर्मास काल में भगवान विष्णु योग निद्रा में लीन रहते हैं, उनकी जगह भगवान शिव ब्रह्मांड का संचालन करते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि इस दौरान शिव पृथ्वी पर निवास करते हैं. इसलिए सावन माह में हरिहर स्वरूप की पूजा करने से भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
- जम्मू.। जम्मू कश्मीर सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुंछ जिले में आगामी 13 दिवसीय बूढ़ा अमरनाथ तीर्थयात्रा के सुचारू संचालन के लिए व्यवस्थाओं की समीक्षा की। पुलिस उप महानिरीक्षक तेजिंदर सिंह ने पुंछ में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया। प्रवक्ता ने कहा, ‘‘ पहला जत्था 28 जुलाई को जम्मू के भगवती नगर आधार शिविर से रवाना होगा और पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पुंछ की मंडी तहसील की ओर बढ़ेगा।" जम्मू संभागीय आयुक्त रमेश कुमार और पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) भीम सेन टूटी ने व्यवस्थाओं की समीक्षा की। कुमार ने अधिकारियों को तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए भगवती नगर और जम्मू रेलवे स्टेशन पर सहायता डेस्क और पंजीकरण काउंटर स्थापित करने का निर्देश दिया। प्रवक्ता ने बताया कि राजौरी और पुंछ के उपायुक्तों को निर्देश दिया गया है कि वे मार्ग पर बिजली आपूर्ति, पेयजल, लंगर, पार्किंग, वाटरप्रूफ टेंट और शौचालय सहित आवश्यक सुविधाओं के साथ पर्याप्त आवास सुनिश्चित करें।
- वास्तुशास्त्र में कई ऐसे नियम बताए गए हैं जिसके जरिए घर में आसानी से खुशियां लाई जा सकती हैं। कई लोग इसे नजरअंदाज करते हैं लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ वास्तु टिप्स शादी में हो रही देरी जैसी समस्याओं को भी काफी हद तक खत्म कर देते हैं। अगर आप भी अपनी शादी का इंतजार कर रहे हैं और सही पार्टनर ढूंढते परेशान हो चुके हैं तो एक बार घर का वास्तु चेक कर लीजिए। नीचे कुछ ऐसे टिप्स हैं जिसे अपनाकर आप जिंदगी में आ रही अड़चनों को दूर सकते हैं।दीवारों का रंगआपके घर की दीवारों का रंग हल्का होना चाहिए। अगर आप पेस्टल रंगों का इस्तेमाल करेंगे तो ये बेस्ट होगा। कभी भी घर में डार्क रंगों का इस्तेमाल ना करें।बेड की दिशावास्तुशास्त्र के हिसाब से बेड की दिशा का सही होना भी जरूरी है। कुंवारी लड़कियों को सोने के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा का चयन करना चाहिए। वहीं लड़कों को उत्तर-पूर्व दिशा चुननी चाहिए। सोने के लिए दक्षिण दिशा सही नहीं है।ऐसा हो चादर का रंगअपने कमरे की बेडशीट को अगली बार खरीदते वक्त रंग का ध्यान हमेशा रखें। कोशिश करें कि हल्के रंग की चादर ही खरीदें। पीला, सफेद, गुलाबी, आसमानी रंग बेहतर होगा। इन रंगों से अच्छी ऊर्जा आती है। इससे शादी वगैरह के योग बनने में मदद मिलती है।यहां ना रखें भारी सामानघर के बीच में कभी भी भारी सामान ना रखें। वहीं सेंटर पार्ट में कभी भी सीढ़ियां ना बनवाएं। वास्तुशास्त्र में इसे अशुभ माना गया है। माना जाता है कि इससे शादी वगैरह में बाधा आती है। भारी सामान अच्छी ऊर्जा के आगमन को घर में आने से रोकती है। इस वजह से इसे रखने के लिए सही स्थान चुने।पास ना रखें लोहे का सामानजिसकी शादी होनी है, उसके बेड के आसपास या नीचे लोहे का कोई भी सामान नहीं होना चाहिए। कमरे को साफ-सुथरा रखें और वहां का माहौल हमेशा खुशनुमा ही रखें। इससे ना सिर्फ कमरे में बल्कि धीरे-धीरे जिंदगी में भी सकारात्मक ऊर्जा आने लगेगी।
- श्रीनगर। कश्मीर में भारी बारिश के कारण स्थगित की गई अमरनाथ यात्रा शुक्रवार को फिर से शुरू हो गई। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।अधिकारियों ने बताया कि नुनवान और बालटाल आधार शिविरों से तीर्थयात्रियों का एक नया जत्था पवित्र गुफा मंदिर के लिए रवाना हुआ।भारी बारिश के कारण कई स्थानों पर हुए भूस्खलन की वजह से बृहस्पतिवार को यात्रा स्थगित कर दी गई थी। यह तीर्थयात्रा तीन जुलाई को शुरू हुई थी और नौ अगस्त को समाप्त होगी। यात्रा शुरू होने के बाद से अब तक ढाई लाख से अधिक तीर्थयात्री दक्षिण कश्मीर हिमालय में अमरनाथ गुफा मंदिर में दर्शन कर चुके हैं।
- क्रिस्टल ग्लोब बुद्धि, स्पष्टता और नए अवसरों का प्रतीक है। इसे ऑफिस डेस्क के उत्तर-पूर्व कोने में रखने से करियर में प्रगति और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। अगर आप क्रिस्टल ग्लोब को रख रहे हैं, तो इसे नियमित रूप से साफ करें और इसे कुछ अंतराल पर घुमा दें, ताकि सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहे।चीनी सिक्केफेंगशुई में तांबे के गोल सिक्के, जिनके बीच में वर्गाकार छिद्र होता है, समृद्धि का प्रतीक हैं। तीन सिक्कों को लाल रिबन में बांधकर ऑफिस के मुख्य द्वार के अंदर या कैश बॉक्स में रखें। यह आय बढ़ाता है और अनावश्यक खर्चों को रोकता है। सिक्कों को साफ रखें और दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थापित करें।लाफिंग बुद्धालाफिंग बुद्धा खुशी और समृद्धि का प्रतीक है। इसे ऑफिस डेस्क पर या रिसेप्शन क्षेत्र में रखने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यह तनाव कम करता है और व्यवसाय में उन्नति लाता है। लाफिंग बुद्धा का चेहरा ऑफिस के प्रवेश द्वार की ओर होना चाहिए। सुनिश्चित करें कि यह ऊंचे स्थान पर हो।मनी प्लांटमनी प्लांट फेंगशुई में धन और समृद्धि का प्रतीक है। इसे ऑफिस के दक्षिण-पूर्व कोने (धन क्षेत्र) में रखने से आर्थिक वृद्धि होती है। मनी प्लांट को गमले में लगाएं और सुनिश्चित करें कि यह हरा-भरा रहे। मुरझाया हुआ पौधा नकारात्मक ऊर्जा लाता है।फेंगशुई ड्रैगनफेंगशुई ड्रैगन शक्ति, साहस और सफलता का प्रतीक है। इसे ऑफिस में पूर्व दिशा में रखने से व्यवसाय में नई ऊंचाइयां मिलती हैं और प्रतिस्पर्धा में जीत हासिल होती है। ड्रैगन की मूर्ति को डेस्क पर या शेल्फ पर रखें, लेकिन इसे बहुत ऊंचा न रखें। इसका मुंह कार्यस्थल की ओर होना चाहिए।फेंगशुई फव्वाराफेंगशुई फव्वारा धन और समृद्धि के प्रवाह का प्रतीक है। इसे ऑफिस के उत्तर या दक्षिण-पूर्व कोने में रखने से आर्थिक स्थिरता आती है और खर्चे नियंत्रित होते हैं। फव्वारे में पानी साफ और बहता हुआ रखें। रुका हुआ या गंदा पानी नकारात्मक ऊर्जा लाता है। छोटे डेस्कटॉप फव्वारे भी प्रभावी हैं।फेंगशुई से समृद्ध ऑफिसचीनी सिक्के, लाफिंग बुद्धा, मनी प्लांट, ड्रैगन, और क्रिस्टल ग्लोब जैसी फेंगुशई संबंधित चीजें ऑफिस में सकारात्मक ऊर्जा लाती हैं। ये खर्चों को नियंत्रित करती हैं और आय में वृद्धि करती हैं। इन्हें सही दिशा में और स्वच्छता के साथ रखें। इन उपायों को अपनाकर अपने ऑफिस को समृद्ध, ऊर्जावान और सफल बनाएं।
- देवशयनी एकादशी के दिन से चातुर्मास शुरू हो जाता है। देव यानी श्रीहरि पाताल लोक में निवास करने जाते हैं। अगले चार महीने तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निंद्रा में जाते हैं। ऐसे में भगवान शिव सृष्टि का संचालन संभालते हैं। यह चार मास का समय चातुर्मास कहलाता है। इसमें सावन का महीना और भी पावन माना गया है। सावन में भक्त भोलेनाथ का जलाभिषेक, रूद्राभिषेक करवाते हैं, लेकिन क्या आपने जानने की कोशिश की कि आखिर क्यों भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। इसके पीछे समुंद्र मंथन के पीछे की कहानी जुड़ी है।शास्त्रों की माने समुद्र मंथन किया गया था, तो उससे अमृत निकला, जिसको पीकर अमर हो जाते हैं, लेकिन इसी समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष भी निकला, इसके निकलने से संपूर्ण विश्व को खतरा था। ऐसे में भगवान शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए विषपान किया। इसकी वजह से भगवान शिव का गला नीला पड़ गया। इसलिए उन्हें नीलकंठ कहते हैं। विष की तीव्र पीड़ा के कारण भोलेबाबा ने हलाहल को अपने कंठ में रोक लिया। लेकिन इसकी पीड़ा कम न हुई, भगवान आशुतोष दग्ध होने लगे। ऐसे में भगवान शिव को इस पीड़ा से बचाने के लिए और उन्हें शीतलता देने के लिए विभिन्न चीजों से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। इसलिए भगवान शिव के भक्त इस घटना को याद कर पवित्र गंगाजल से उनका जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि इससे भगवान शिव को शीतलता मिलती है। कहते हैं भगवान शिव को अभिषेक अत्यंत प्रिय है। इसलिए उनके भक्तगण उन्हें पवित्र गंगाजल से सावन में जलाभिषेक करते हैं, तो भगवान उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।किन चीजों से अभिषेक करने पर मिलता है क्या फलदूध से अभिषेक करने पर -मन मस्तिष्क, समृद्धि के साथ-साथ आरोग्यता भीअक्षत चावल -स्थिर लक्ष्मीमधु, गुड और घृत -आरोग्यता समृद्धि
- सावन में इस साल कई उत्तम योग बन रहे हैं। इस साल सावन सोमवार पर सर्वार्थ सिद्धि के साथ अमृत योग की वर्षा होगी। सावन के चारों सोमवार पर कुल सात फलदायी योग रहेंगे। वहीं, 72 साल बाद दो ग्रह शनि और बुध की चाल बदल जाएगी। यानी वह वक्री हो जाएंगे। दो ग्रह पहले से ही वक्री हैं। वह सावन में भी इसी स्थिति में रहेंगे। सावन का कृष्ण पक्ष में एक दिन क्षय हो रहा है तो शुक्ल पक्ष में एक दिन की वृद्धि भी हो रही है।आचार्य सुरेंद्रनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि सावन 11 जुलाई से शुरू होकर नौ अगस्त तक रहेगा। इस दौरान कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस माह में सात सर्वार्थ सिद्धि और एक अमृत सिद्धि योग का अनुपम संयोग बन रहा है। इस दौरान भगवान शिव का पूजन-अर्चन करने से उनकी कृपा बरसेगी। सात जुलाई को देवताओं के गुरु बृहस्पति उदय होंगे। 72 साल बाद 13 जुलाई को बुध और 14 जुलाई को शनि देव वक्री होंगे। राहु और केतु पहले से ही वक्री हैं।सावन के सोमवार पर बन रहे ये अद्भुत योग और नक्षत्र: आचार्य सुरेंद्रनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि सावन के पहले सोमवार यानी 14 जुलाई को धनिष्ठा नक्षत्र और आयुष्मान योग का शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन गणेश चतुर्थी का भी दुर्लभ संयोग है। दूसरे सोमवार 21 जुलाई को रोहिणी नक्षत्र में चंद्रमा वृषभ राशि में रहेंगे। कामिका एकादशी और सर्वार्थ सिद्धि योग का भी शुभ संयोग है। इस दिन व्रत करने से भगवान शिव के साथ साथ भगवान विष्णु की कृपा बरसेगी। सावन के तीसरे सोमवार यानी 28 जुलाई को चंद्रमा पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में होगा। सिंह राशि में चंद्रमा के होने से धन योग बनेगा। वृद्ध चतुर्थी का भी संयोग है। इस दिन भगवान शिव और गणेशजी के आशीर्वाद भक्तों को मिलेंगे। अंतिम सोमवार चार अगस्त को सर्वार्थ सिद्धि योग, ब्रह्म और इंद्र योग रहेगा। चंद्रमा अनुराधा नक्षत्र और चित्रा नक्षत्र से वृश्चिक राशि पर संचार करेंगे।ये कर सकते हैं शुभ कार्य- सावन में सात सर्वार्थ सिद्धि और एक अमृत सिद्धि योग बन रहे हैं। सावन के समापन पर नौ अगस्त को बुद्ध-आदित्य योग के साथ श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को होगा। इस मास के फलदायी होने से अनुष्ठान, नए कार्य, संकल्प, रजिस्ट्रेशन, संपत्ति क्रय-विक्रय और उद्योग स्थापना जैसे कार्य करना लाभकारी है।
- हिंदू धर्म में सावन के सोलह सोमवार, का खास महत्व माना गया है। पंचांग के अनुसार इस बार सावन का पवित्र महीना 11 जुलाई से शुरू होकर 9 अगस्त को समाप्त होगा। इस पवित्र महीने में भोलेबाबा के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं हर व्रत की तरह सावन के उपवास रखने के लिए भी कुछ खास नियमों का पालन करना होता है। ऐसा ना करने पर आपकी सेहत और आस्था दोनों बिगड़ सकती हैं। आइए जानते हैं सावन के सोमवार व्रत रखते समय आपको किन 5 बातों का खास ख्याल रखना चाहिए।सावन का व्रत रखते समय भूलकर भी ना करें ये 5 गलतियांफ्राइड खाने से बचेंज्यादातर लोग व्रत खोलते समय यह गलती कर बैठते हैं। पूरा दिन उपवास रखने के बाद व्रत खोलते समय तला भुना खाने से गैस और एसिडिटी जैसी समस्याएं परेशान कर सकती है। इससे बचने के लिए साबूदाने की खीर, शीरा जैसे ऑप्शन व्रत खोलने के लिए चुनें। हल्के और पचने में आसान भोजन से व्रत खोलना बेहतर रहता है।डिहाइड्रेशन ना होने देंसावन के महीने में उमस और गर्मी बढ़ने से लोग पसीने से भीगे रहते हैं। ऐसे में व्रत के दौरान पर्याप्त पानी ना पीने से व्यक्ति को डिहाइड्रेशन और चक्कर आने जैसी समस्या हो सकती है। बॉडी को हाइड्रेट रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। इसके लिए दिन की शुरुआत नारियल पानी या लस्सी से कर सकते हैं, इससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और बेवजह थकान महसूस नहीं होती है।भूखा रहने की ना करें गलतीसावन के सोमवार व्रत में अन्न का सेवन वर्जित माना गया है। लेकिन लंबे समय तक पेट को भूखा रखने से गैस, एसिडिटी और सिरदर्द की समस्या हो सकती है। इस समस्या से बचने के लिए छोटे छोटे अंतराल पर कुछ हल्का जैसे पपीता, खीरा, केला जैसी चीजों से फलाहार जरूर करें। ऐसा करने से ना तो आपको कमजोरी फील होगी और आपका मन शिव भक्ति में भी लगेगा।फल और ड्राई फ्रूट्स खाने से बचनासावन के व्रत रखते समय अपनी डाइट में हमेशा पानी वाले फल जैसे तरबूज, खीरा, पपीता शामिल करें। इन फलों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है। इसके अलावा बादाम, अखरोट और किशमिश जैसे सूखे मेवे खाने से लंबे समय तक भूख का अहसास नहीं होता है।ज्यादा शारीरिक मेहनत न करेंउपवास के दौरान ज्यादा शारीरिक मेहनत करने से आप जल्दी थक सकते हैं और बार-बार भूख भी लग सकती है। जिसकी वजह से आपका ध्यान व्रत से भटक सकता है। व्रत के दिन ज्यादा शारीरिक मेहनत वाले काम करने से बचें।
- 11 जुलाई से शुरू हो रहे सावन के महीने में भगवान शिव की अराधना की जाती है। लोग इस पवित्र महीने में भोलेनाथ की सच्चे मन से पूजा अर्चना करते हैं, तमाम अनुष्ठान करते हैं और बहुत से लोग तो कावड़ यात्रा पर भी जाते हैं। बहुत से लोग तो पूजा अर्चना के साथ-साथ सावन में पड़ने वाले सोमवार का व्रत भी रखते हैं। इस व्रत में फलाहार का सेवन किया जाता है। लोगों को लगता है कि फलाहार बनाना काफी कठिन काम होता है, ऐसे में हम यहां आपको पांच ऐसे स्वादिष्ट पकवानों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो झटपट तैयार होते हैं।मिश्रित फल चाटकुछ हेल्दी विकल्प तलाश रहे हैं तो फलाहारी चाट अपने लिए तैयार करें। इसे बनाने के लिए आपको अपने पंसदीदा फल जैसे केला, सेब, अंगूर, अनार, पपीता के साथ-साथ नींबू सेंधा नमक, काली मिर्च की जरूरत पड़ेगी। इसे बनाने के लिए कटे हुए फलों को मिलाकर ऊपर से सेंधा नमक और काली मिर्च छिड़कें। इसका आप भोग भी लगा सकते हैं।साबूदाना खिचड़ीफलाहारी खाने की बात की जाए और साबूदाना खिचड़ी का जिक्र न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। साबुदाना खिचड़ी बनाने का प्लान कर रहे हैं तो सबसे पहले 6-8 घंटे तक साबुदाना को पानी में भिगो दें। पानी में भीगने की वजह से ये फूल जाएगा, जिस कारण ये एकदम खिला-खिला बनेगा और देखने में भी अच्छा लगेगा।कुट्टू का चीलाकुछ ऐसा बनाने का प्लान कर रही हैं, जिसे तैयार करने मे ज्यादा घी तेल न लगे तो कुट्टू का चीला एक बेहतर विकल्प है। कुट्टू का चीला बेहद कम तेल में सिक जाता है। इसे आप आलू की सब्जी या फिर फलाहारी चटनी के साथ भी परोस सकते हैं। इसे बनाते समय बेटर सही तैयार करें, तभी ये एकदम डोसे की तरह तैयार होगा।सिंघाड़े के आटे का हलवासिंघाड़े के आटे का हलवा खाने में कापी स्वादिष्ट लगता है। इसे बनाने के लिए सिंघाड़े का आटा, देसी घी, पानी, चीनी की जरूरत पड़ती है। इसके लिए सबसे पहले सिंघाड़े के आटे को घी में अच्छी तरह से भूनकर उसमें पानी और चीनी डालें। कुछ ही मिनटों में फलाहारी हलवा तैयार करें। इस हलवे में किसी तरह की मेवा डालने की जरूरत नहीं पड़ती।
- भरतपुर। जिले के रूपवास कस्बे से 60 वर्षीय संत केदार कटारा खाटूश्याम (सीकर) तक दंडवत यात्रा पर निकले हैं। 510 दिन की इस कठिन यात्रा में अब तक वे करीब 132 किमी की दूरी तय कर जयपुर-आगरा नेशनल हाईवे स्थित मानपुर चौराहा पहुंचे, जहां श्याम भक्तों ने उनका भव्य स्वागत किया। संत केदार ने यह यात्रा 24 अक्टूबर 2023 को रूपवास के श्री चिंता हरण हनुमान मंदिर से शुरू की थी, जो सात साल बाद अक्टूबर 2030 में पूरी होगी। संत केदार प्रतिदिन 300-400 मीटर का सफर तय करते हुए 2,100 दंडवत करते हैं। खाटू श्याम तक की करीब 321 किमी की दूरी को पूरा करने के लिए वे कुल 17,65,551 दंडवत करेंगे। अब तक 132 किमी की यात्रा में 7,51,000 दंडवत कर चुके हैं, जबकि बाकी 156 किमी की दूरी पूरी करने में छह साल और 8,81,000 दंडवत करने होंगे। संत केदार कटारा ने बताया कि उनकी दंडवत यात्रा सनातन धर्म, हिन्दू देवी-देवताओं और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए है। इसके अलावा, देश और समाज की सेवा के प्रति जागरुकता, वन और गौवंश की रक्षा, विश्व शांति और मानव कल्याण, महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरुकता और भाईचारे और प्रेम का संदेश फैलाना है।13वीं कनक दंडवत यात्रासंत केदार की यह 13वीं कनक दंडवत यात्रा है। इससे पहले वे 12 बार इसी तरह खाटू श्याम तक पहुंच चुके हैं। उनका मानना है कि खाटू श्याम बाबा हर भक्त की सुनते हैं और इच्छाएं पूर्ण करते हैं।मोटरसाइकिल बना आशियानायात्रा के दौरान संत केदार ने एक मोटरसाइकिल को रथ में बदल रखा है, जिसमें खाटू श्याम की अखंड ज्योति जल रही है। वे इसी रथ में ठहरते हैं और रात भी यहीं बिताते हैं। जब दिनभर की दंडवत यात्रा पूरी हो जाती है, तब वे मोटरसाइकिल में ही विश्राम करते हैं।श्रद्धालु कर रहे सहयोगसंत के इस कठिन संकल्प को पूरा करने में खाटू श्याम के श्रद्धालु लगातार उनकी मदद कर रहे हैं। भरतपुर से लेकर खाटू श्याम तक भक्त उन्हें भोजन, पानी और अन्य आवश्यक चीजें मुहैया करा रहे हैं। अन्य श्रद्धालु भी इस पुण्य कार्य में सहयोग कर सकते हैं। सात साल की यह कठिन यात्रा न सिर्फ श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि सनातन संस्कृति के प्रति संत केदार कटारा की अटूट आस्था और समर्पण को भी दर्शाती है।

.jpg)












.jpg)

.jpg)










