- Home
- धर्म-अध्यात्म
- इस साल होलिका दहन 28 मार्च को किया जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रति वर्ष होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा के दिन शुभ मुहूर्त में किया जाने का विधान है। होलिका दहन अच्छाई पर बुराई की जीत का प्रतीक पर्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलिका दहन में अपनी राशि के अनुसार कुछ विशेष उपाय करने से जातकों को लाभ प्राप्त होता है। आप शुभ मुहूर्त पर अपनी राशि के इन उपायों से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।फाल्गुन पूर्णिमा 2021पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – मार्च 28, 2021 को 03:27 बजेपूर्णिमा तिथि समाप्त – मार्च 29, 2021 को 00:17 बजेहोलिका दहन 2021होलिका दहन मुहूर्त – 18:37 से 20:56अवधि – 02 घंटे 20 मिनटहोली 2021भद्रा पूंछ -10:13 से 11:16भद्रा मुख – 11:16 से 13:0---मेषइस राशि के लोग खैर या खादिर की लकड़ी अर्पित करें।वृषइस राशि के जातक गूलर की लकड़ी होलिका दहन में अर्पित करें।मिथुनइस राशि के जातक अपामार्ग की लकड़ी होलिका दहन में अर्पित करें।कर्ककर्क राशि के लोग पलाश की लकड़ी होलिका दहन में अर्पित करें।सिंहइस राशि के लोग मदार की लकड़ी होलिका में डालेंगे तो फायदा होगा।कन्याइस राशि के जातक अपामार्ग की लकड़ी को होलिका दहन में अर्पित करें।तुलाआपको गूलर की लकड़ी होलिका में डालने से लाभ होगा।वृश्चिकइस राशि के लोग खैर या खादिर की लकड़ी अर्पित करें।धनुइस राशि के लोगों के लिए पीपल की लकड़ी फलदाई रहेगी।मकरइस राशि वाले लोग होलिक दहन में शमी की लकड़ी अर्पित करें।कुंभइस राशि वाले लोग होलिक दहन में शमी की लकड़ी अर्पित करें।मीनइस राशि के लोगों के लिए पीपल की लकड़ी फलदाई रहेगी।__File photo
- होली रंगों और खुशियों का त्योहार है। इस त्योहार में गुलाल, मिठाई, फाल्गुन के गीत, प्रेम, समरसता इन सभी चीजों का समावेश देखने को मिलता है। इस साल होली 29 मार्च को मनाई जाएगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन अपनी राशि के अनुसार रंग का प्रयोग करना बेहद ही लाभकारी माना जाता है। आप अपनी राशि के अनुसार इन रंगों का प्रयोग होली में जरूर करें।मेष राशिमेष राशि को लाल और पीले रंग से होली का त्योहार मनाना चाहिए। इन रंगों से होली खेलने से आपके जीवन में प्यार और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहेगा।वृषभ राशिवृषभ राशि के जातकों को होली के दिन सफेद कपड़े पहनकर नारंगी और बैंगनी रंग से होली खेलनी चाहिए। ऐसा करने से आपके सौभाग्य में वृद्धि होती है।मिथुन राशिमिथुन राशि के जातकों को हरे रंग से होली खेलनी चाहिए। ऐसा करने से ना सिर्फ इनके मान-सम्मान में बढ़ोत्तरी होगी बल्कि संबंधों में प्रगाढ़ता भी आएगी।कर्क राशिकर्क राशि के जातकों को सफेद कपड़े पहनकर होली खेलनी चाहिए। ऐसा करने से उन्हें धन, यश के साथ बेहद सुकून भी मिलेगा।सिंह राशिसिंह राशि के लोग गोल्डन, पीले, लाल और नारंगी रंग से होली खेल सकते हैं। ऐसा करने से न सिर्फ ये लोग ऊर्जावान बने रहेंगे बल्कि इनके साथ होली खेलने वाले लोग भी उत्साह से भर जाएंगे।कन्या राशिकन्या राशि के लोगों को हरे, भूरे और नारंगी रंग से होली खेलनी चाहिए। इन रंगों से होली खेलने से इस राशि के लोगों का आर्थिक संकट दूर होता है।तुला राशितुला राशि के जातक सफेद और हल्के गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर होली खेलें। ऐसा करने से आपको अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे।वृश्चिक राशिवृश्चिक राशि के लोगों को लाल, मैरून और पीले रंग से होली खेलने जाना चाहिए। ऐसा करने से आपके आर्थिक संकट दूर होते हैं।धनु राशिधनु राशि के जातकों को होली खेलने के लिए लाल, और पीले रंग का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा करने से आपका अपने परिजनों के साथ रिश्ता मजबूत बनेगा और गुरु ग्रह से जुड़ी कोई परेशानी भी आपके सामने नहीं आएगी।मकर राशिमकर राशि के लोगों को होली जरूर खेलनी चाहिए. इसके लिए इन्हें नीले, काले रंग का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा करने से आपको शीध्र ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति होगी।कुंभ राशिकुंभ राशि के जातकों को होली खेलने के लिए काला, बैंगनी और लाल रंग के गुलाल का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा करने से आप कठिन परिस्थितियों को भी अपने बस में कर पाएंगे।मीन राशिमीन राशि के लोगों को पीले रंग से होली खेलनी चाहिए। इस राशि के लोगों को होली के दिन पीला रंग शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद ही होली खेलने जाना चाहिए। माना जाता है कि ऐसा करने से आपको धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
- जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 230
साधक का प्रश्न ::: महाराज जी तीर्थ का क्या महत्व है? एक व्यक्ति तीर्थ करके लौट आया और एक तीर्थ करने गया नहीं, दोनों में क्या अंतर है? तीर्थ किसे कहते हैं?जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा उत्तर ::: जहाँ कभी भगवान या महापुरुष रहे हों उस स्थान को तीर्थ कहते हैं, मथुरा हो, वृंदावन हो, अयोध्या हो। ये भगवान के जहाँ-जहाँ अवतार हुए हैं या महापुरुष लोग जहाँ-जहाँ पैदा हुए या साधना की या कोई लीला की तो उन जगहों का नाम तीर्थ पड़ जाता है। हमारे भारत में तो इतने महापुरुष हुए कि पग-पग पर तीर्थ हैं। स्मारक नहीं बनवाया लोगों ने लेकिन ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ महापुरुष पैदा न पैदा हुआ हो।
हमारा देश ऐसा है, कि तीर्थ ही तीर्थ हैं सब। और सबसे प्रमुख बात एक समझ लेनी चाहिए कि भगवान सबके हृदय में रहता है, नोट करो सब लोग। भगवान् सबके हृदय में बैठा उसके प्रतिक्षण के आइडिया नोट करता है। वही भगवान् वृन्दावन में श्रीकृष्ण बनकर लीला करता है, वही भगवान् अयोध्या में राम बनता है, वही भगवान् गौरांग बनकर आये, वही भगवान् जगन्नाथ जी हैं। दो चार प्रकार के भगवान् नहीं हुआ करते। एक ही सुप्रीम पॉवर है वह जो सबके दिल में रहता है। वही, कभी कहीं अवतार लेकर आई थी और सर्वव्यापक भी है।
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना।
वह समान रूप से व्याप्त है। हिरण्यकशिपु को ये दिमाग में बीमारी थी कि हम तो राक्षस हैं, हमारे घर में तो भगवान् आयेगा नहीं। तो जब प्रहलाद ने कहा भगवान् सर्वत्र है, तो उसने कहा इस खम्भे में भी है? हाँ। तो खम्भे को उसने जो मारा और खम्भा टूटा तो नृसिंह भगवान् प्रकट हो गए। प्रहलाद ठीक कहता है, देख ले मैं सब जगह रहता हूँ।
तो सब जगह रहते हैं भगवान्, इसलिए हम किसी मन्दिर में जा रहे हैं इतनी दूर मेहनत करके, रास्ते में तकलीफ होगी और कहीं जेब कट गयी या कोई लफंगा मिल गया तो उसका चिन्तन होगा। सबसे प्यारा पैसा है, वह भी खर्च करेगा तो तीर्थ में लाभ के बजाय और हानि कमाकर आ गया, क्या मिला? प्राचीन काल में तीर्थों में सन्त ही रहते थे और कोई गृहस्थ वहां नहीं रहता था। महात्मा लोग रहते थे तो हम जब वहाँ जाते थे तो महात्माओं का प्रवचन सुनकर, सिद्धान्त समझकर अपना कल्याण करते थे। अब वो सब है नहीं, गड़बड़ है। अब तो मन्दिरों में जेबकतरे खड़े रहते हैं चारों तरफ, जरा मौका लगे तो अपना हिसाब बैठावें और पंडा- पुजारी तो इतना तंग करते हैं कि लोग कान पकड़ते हैं, मैं अब आउंगा नहीं कभी। दान करने के लिए कोई जाता है, पिंड दान है, बाप वगैरह के मरने पर, और बेचारा गरीब है, वह कहता है बस दस रुपया देंगे, नहीं सौ रुपये से कम नहीं लेंगे। तो तीर्थों में अब वह सन्त नहीं रहा, वह लाभ नहीं रहा और गड़बड़ बहुत हो गयी तो नुकसान हो गया हमारा।
तो भगवान् जब हमारे अंदर बैठा है, भगवान् तो इतना दयालु है, उसने कहा, भई कोई पंगुला हो तो वो कहेगा कि भई हमारे पैर नहीं हैं, हम कैसे जायँ मथुरा, वृन्दावन, द्वारिका, जगन्नाथ जी, हमको तो भगवत्प्राप्ति फ्री में कराई जाय। तो भगवान कहते हैं गधे मैं तो तेरे हृदय में रहता हूँ, कहीं जाने की जरूरत क्या है? और अगर नहीं जानते तुम कि मेरे दिल में वही भगवान् हैं जो जगन्नाथ जी में, मन्दिर में हैं तो फिर तुम नास्तिक हो तुम्हारा ज्ञान बुद्धि ही अभी ठीक नहीं हुआ है कि भगवान् वही हैं भगवान् का सही बटा नहीं होता है, 1/4 भगवान, 1/6 भगवान, ऐसा नहीं होता। वेदव्यास ने बड़ा सुन्दर निरूपण किया है उन्होंने कहा है एक तराजू लो और एक पलड़े में;
गो कोटि दानं ग्रहणेषु काशी प्रयागगंगायुतकल्पवासः।यज्ञायुतं मेरुसुवर्णदानं गोविंदनाम्ना न कदापि तुल्यम्।।(पाण्डव-गीता)
चन्द्रग्रहण के समय काशी में दान का बड़ा फल है। एक करोड़ गाय का दान करे कोई काशी में चन्द्रग्रहण के समय, इसका जो पुण्य हो, इतना बड़ा वो तराजू के एक पलड़े में रख दो; गो कोटि दानं ग्रहणेषुु काशी। और प्रयाग गंगायुतकल्पवास:, प्रयाग में कल्पवास करते हैं लोग माघ में, दस हजार वर्ष तक कोई कल्पवास करे, उसका जो पुण्य हो, वो भी तराजू के पलड़े में रख दो और यज्ञायुतुम मेरु सुवर्णदानम् , सुमेरु गिरि पहाड़ को कोई दान कर दे, सोने का पहाड़ पूरा यज्ञ में, जो पुण्य हो वो भी तराजू के एक पलड़े में रख दो और एक तरफ 'गोविन्द' नाम रख दो तो वो सब उसकी बराबरी नहीं कर सकता। गोविंदनाम्ना न कदापि तुल्यम्।
तो भगवान् सर्वत्र है और सबसे बड़ी बात हमारे हृदय में है। ये बात मान लो, मान लो, गाँठ बाँध लो। हजार बार वेद कह रहा हैं, शास्त्र कह रहे हैं, पुराण कह रहे हैं, सन्त कह रहे हैं और कृपालु ने भी हजार बार कहा आप लोगों को। नहीं मानते, भूल जाते हैं। जो मैं सोच रहा हूँ कोई नहीं जानता, ये प्राइवेसी नहीं हो सकती है। वो अंदर बैठा नोट कर रहा हैं, ये बात रियालज़ करो। बार-बार अभ्यास करो इसको तो इतना सुख मिलेगा तुमको जैसे कोई कंगाल खरबपति हो जाय एक सेकण्ड में ऐसे। हमारे दिल में वो बैठे हैं, महसूस करो, इसको रियलाइज़ करो। फिर बाहर भागना बन्द हो जाय। और अगर तीर्थ में जाओ तो किसी महापुरुष के साथ जाओ तो लाभ मिलेगा। वो उस महापुरुष के साथ सत्संग भी मिलेगा, इसलिए लाभ मिलेगा। पत्थर की और लक्कड़ की और सोने चांदी की मूर्ति में क्या है? उसमें भी ईश्वर व्याप्त है, वह तुम्हारे अंदर भी व्याप्त है, इसमें कोई अन्तर नहीं है।
तीर्थ में महापुरुष जाते हैं इसलिए वो तीर्थ हैं, महापुरुष न जायें तो तीर्थ का कुछ नहीं। सब एक-सी पृथ्वी है, एक-सा जल है, एक-सी वायु है, एक-सा सब कुछ है। आप लोगों ने पढ़ा होगा इतिहास में, हमारे इसी भारतवर्ष के सब मन्दिर तोड़ दिए गए थे एक जमाने में, सोमनाथ वगैरह के बड़े-बड़े। मन्दिर में पत्थर की मूर्ति ने क्या कमाल दिखाया?
वेदव्यास कहते हैं कि वह तो भावना बनाने से आपको लाभ मिलता है, किसी मूर्ति में कोई विशेष बात नहीं होती है। लेकिन हम लोग चूँकि शास्त्र-वेद नहीं जानते, इसलिए ऊँचाई पर, पहाड़ पर, एक मन्दिर बनवा के छोटा-सा, इसमें एक दुर्गा जी की मूर्ति रख दो। ऐ बहुत बड़ा महत्व है, वो दुर्गा जी का। अरे! वो दुर्गा जी हों, चाहे वैष्णो देवी हों, चाहे आपकी बगल के मन्दिर वाली देवी जी हों और आपके हृदय में तो आपकी देवी जी राधा बैठी हैं, काहे को परेशान हो रहे हैं, यहाँ-वहाँ दौड़ने में। देख आवें। क्या देखोगे? क्या चीज़ देखकर विभोर होओगे तुम? जितने लोग जगन्नाथ जी के दर्शन करने गए, सच-सच बतावें कि जितना सुख उन्हें अपनी बीबी, अपने बेटे, अपनी माँ, बाप, अपने दोस्तों को देखने में मिलता है, उतनी खुशी मिली? देखा, जय हो, जय हो, एबाउट टर्न। ये तो आपने भगवान् का अपमान किया कि अपने बेटे, माँ-बाप, स्त्री-पति के बराबर भी भगवान् का स्थान नहीं माना और दर्शन करके एबाउट टर्न और तुरन्त जल्दी चलो।
तो तीर्थ का महत्व कुछ नहीं होता, उसके भीतर भगवद् भावना करने का महत्व होता है। भीतर भगवत् भावना जितनी करोगे, उतना ही लाभ मिलेगा। जितने लोग गए जगन्नाथ जी, जो वहां खड़े होकर मूर्ति के सामने आँसू बहाया, बस वो गया तीर्थ करने, बाकी कुछ नहीं। तो भगवान् के धाम, भगवान् के नाम, भगवान् के सन्त, ये सब एक हैं लेकिन भावना हो, बस ये शर्त है। उसी सन्त के प्रति नामपराध भी कमा लो और उसी सन्त के प्रति शरणागत होकर भगवत्प्राप्ति भी कर लो। इसी प्रकार भगवान् के अवतार काल में भी उन्हीं भगवान् को देखा, सब अलग-अलग लोगों ने, अलग-अलग प्रकार से देखा। जो सन्त थे उन्होंने भगवान् के रूप में देखा और सबने नहीं देखा, उन्हें वह फल नहीं मिला। तो हमको हमारी भावना का फल मिलेगा। अगर कोई तीर्थ में जाता है, जाय लेकिन वो किसलिए जाय ये सोच ले।
हमारा लक्ष्य है राधाकृष्ण का प्रेम पाना। ये वहां हुआ? नहीं हुआ। तो आप व्यर्थ में चले गए, तन को कष्ट पहुंचाया, मन को कष्ट पहुंचाया, धन को बिगाड़ा, कोई लाभ नहीं, नुकसान हुआ अलग। और अगर हमारी भक्ति बढ़ी राधा-कृष्ण में तो जहाँ चाहो, वहाँ जाओ। जिस मन्दिर में, जिस मयखाने में, जहाँ भी तुम्हारा मन लग जाए भगवान् में, वहाँ जाओ।
जप तप नियम योग निज धर्मा।श्रुति सम्भव नाना शुभ कर्मा ।।ज्ञान दया दम तीरथ मज्जन।जहँ लगि धर्म कहे श्रुति सज्जन।।आगम निगम पुरान अनेका।पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।।
एक फल;
तव पद पंकज प्रीति निरंतर।
बस भगवान् में हमारा प्रेम बढ़ा, ठीक-ठीक तीर्थ आपने किया। प्रेम नहीं बढ़ा तो बेकार गया। प्रेम कम हो गया, वहाँ के लोगों के व्यवहार से और नुकसान हो गया और अपराध अर्जित हो गया। क्या करें, वहाँ का पुजारी ऐसा हमको तंग कर रहा था, वहाँ का वो। अरे! आप तो भगवान् के दर्शन करने गए थे? हाँ, गए तो थे, लेकिन वो ऐसे लोग मिल गए हमको वहाँ। तो हमारा मन, हमारे राधाकृष्ण और हमारे गुरु बस इतने के अंदर रहे। जहां कहीं भी इतने में लाभ मिले वहां जाओ। जहाँ वह लाभ नहीं मिला उसको नमस्ते।
तज्यो पिता प्रहलाद विभीषण बंधु भरत महतारी।
मां बाप का सबका त्याग कर देते हैं जहाँ भगवतप्रेम मे वृद्धि न हो तो तीर्थ का महत्व तभी है जब हमारा मन राधा कृष्ण मे अधिक लग जाय। ये ध्यान रखकर तीर्थ में जाना चाहिए।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - हर साल होली का त्योहार फाल्गुन माह की शुक्लपक्ष में मनाया जाता है। होली के आठ दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाते हैं। ये फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होकर होलिका दहन के दिन तक चलते हैं। होलाष्टक के 8 दिनों में शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। हालांकि फाल्गुन माह भगवान कृष्ण और शिव जी को समर्पित होता है, इसलिए होलाष्टक की अवधि में इनकी पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। पंडित विवेक गैरोला के मुताबिक, फाल्गुन माह में शंकर जी और कृष्ण जी की पूजा विशेष महत्व रखती है। विधिविधान से पूजा अर्चना करने पर मनोकामना पूरी होती है।ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यद्यपि होलाष्टक 8 दिन के होते हैं, किंतु इस बार त्रयोदशी तिथि का क्षय हो रहा है अर्थात त्रयोदशी तिथि घट रही है। इसलिए होलाष्टक सात दिन के ही होंगे। होलाष्टक शुभ क्यों नहीं होता है? इसके संबंध में दो पौराणिक कथाएं हैं, जो भक्त प्रह्लाद और कामदेव से जुड़ी हुई हैं।होलाष्टक अशुभ क्यों माना जाता है?1. भक्त प्रहलाद- पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे प्रहलाद को भगवान श्रीहरि की भक्ति से दूर करने के लिए आठ दिनों तक कठिन यातनाएं दी थीं। आठवें दिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका जिसे वरदान प्राप्त था, वो भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर बैठी और जल गई थी लेकिन भक्त प्रहलाद बच गए थे।2. रति पति कामदेव- कहते हैं कि देवताओं के कहने पर कामदेव ने शिव की तपस्या भंग करने के लिए कई दिनों में कई तरह के प्रयास किए थे। तब भगवान शिव ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि को कामदेव को भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उनके अपराध के लिए शिवजी से क्षमा मांगी, तब भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन देने का आश्वासन दिया।ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक होली के दिन 28 मार्च को कन्या राशि में चंद्रमा का गोचर होगा। गुरु और शनि मकर राशि में होंगे। इसे शनि-गुरु की युति को विशेष योग माना जाता है। बृहस्पति की गणना नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह में होती है तो शनि को क्रूर ग्रहों में प्रमुख माना जाता है।
- फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का त्योहार खुशियां और उत्साह लेकर आता है। रंगों के इस उत्सव के बारे में माना जाता है कि इस त्योहार पर सभी मनमुटाव दूर हो जाते हैं। वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि इस त्योहार से जुड़ी छोटी-छोटी बातों का ध्यान में रखा जाए तो अपने जीवन में खुशियों के नए रंग बिखेर सकते हैं।होली पर अपने घर या प्रतिष्ठान की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। होली के दिन घर के मुख्य द्वार पर भगवान श्रीगणेश की मूर्ति लगाएं और घर की पूर्व दिशा में उगते हुए सूरज का चित्र लगाएं। घर की दक्षिण दिशा में दौड़ते हुए घोड़ों का चित्र लगाएं। होली के अवसर पर घर में श्रीयंत्र लाएं और इसे अपने घर या दुकान में स्थापित करें। होली पर मोती शंख को घर में लाएं। अपने घर के मुख्य द्वार पर द्विमुखी दीपक जलाएं। होली पर किसी विरोधी द्वारा दी गई, लौंग या इलायची का सेवन न करें। अगर घर में लगी ध्वजा पुरानी हो गई है या उसका रंग फीका हो गया है तो होली पर इस ध्वजा को बदल दें। होलिका दहन घर के भीतर नहीं करना चाहिए। होलिका की राख को घर के चारों ओर छिड़कने से घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश नहीं होता है।होली पर काले रंग का प्रयोग न करें। होली के दिन गहरे रंग के कपड़े न पहनें। सफेद रंग सबसे अच्छा माना जाता है। यह रंग चंद्रमा का प्रतीक है और विन्रमता दर्शाता है। होली का रंग सबसे पहले अपने इष्टदेव और पितृगणों को लगाएं। त्योहार के दिन अपने घर के दरवाजे को अशोक की पत्तियों से बने तोरण से सजाएं। होली के दिन अपने घर के मुख्य द्वार पर गुलाल अवश्य छिड़कें। वास्तु के अनुसार होली पर रंग खेलने से स्वास्थ्य और यश में वृद्धि होती है।होली पर श्रीराधा-कृष्ण की सुंदर तस्वीर लाकर घर के मुख्य द्वार पर लकड़ी की चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर रखें। होली खेलने से पहले गुलाबी रंग का गुलाल लेकर सबसे पहले राधा-कृष्ण को अर्पित करें। गुलाल के पैकेट में चांदी का सिक्का रखें, फिर उसे लाल कपड़े में रखकर कलावे से बांध दें। इससे धन लाभ होगा और रुका हुआ धन भी प्राप्त हो सकेगा। होली पर घर में आने वाले सभी मेहमानों को कुछ ना कुछ अवश्य ही खिलाकर वापस भेजें। ऐसा करने से भाग्य प्रबल होता है। होली के दिन हनुमान जी को चोला चढ़ाएं। शाम के समय हनुमान जी को केवड़े का इत्र एवं गुलाब की माला अर्पित करें।
- जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और तरक्की पाने के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार होना बहुत ही आवश्यक होता है। वास्तु में घर के निर्माण के बारे में तो विस्तृत जानकारी दी ही गई है। इसके साथ ही दैनिक जीवन में प्रयोग की जानें वाली वस्तुओं को किस प्रकार से रखा जाए इस बारे में भी नियम बताए गए हैं। वास्तु शास्त्र में सुख-समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार कुछ चीजों को जमीन पर रखने के लिए मना किया गया है। यदि आप इन चीजों को जमीन पर ऐसे ही रख देते हैं तो आपको अपने जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।शालिग्राम या शिवलिंगमंदिर आदि की सफाई करते समय कभी-कभी हम कुछ चीजों को जमीन पर रख देते हैं, लेकिन जानें-अनजानें की गई ये भूल जीवन में समस्याएं उत्पन्न कर सकती है। यदि मंदिर की साफ-सफाई कर रहे हैं तो कभी भूलवश भी शालीग्राम और शिवलिंग को सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। इन्हें किसी कपड़े में रखकर सही प्रकार से उचित स्थान पर रख दें।शंख, तुलसीदल, कपूर, चंदनवास्तु में पूजा-पाठ से जुड़ी चीजों का बहुत महत्व माना जाता है। कई बार हम पूजा करते समय ध्यान नहीं देते हैं और पूजा से जुड़े सामान को ऐसे ही जमीन पर रख देते हैं परंतु वास्तु के अनुसार शंख, दीप, धूप, यंत्र, पुष्प, तुलसीदल, कपूर, चंदन, जपमाला आदि किसी भी पूजा की चीज को सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए।बहुमूल्य रत्नवास्तु के अनुसार कभी भी बहूमूल्य रत्न और धातु मोती, हीरा और सोना जैसी चीजों को कभी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। धातुओं और रत्नों का संबंध ग्रहों से होता है, यदि आप सीधे इन्हें जमीन पर रखते हैं तो आपको समस्याएं हो सकती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी आभूषण आदि को जमीन पर रखना शुभ नहीं माना जाता है।सीप और कौडिय़ांमां लक्ष्मी की पूजा में सीप और कौडिय़ों का विशेष महत्व माना गया है। यदि घर में ये दोनों चीजें हैं तो इन्हें कभी भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए। माना जाता है कि इससे धन संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
- भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। 64 कलाओं में दक्ष श्रीकृष्ण ने हर क्षेत्र में अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ी है। वैसे तो भगवान श्रीकृष्ण के सैकड़ों रूप और रंग हैं, लेकिन आज हम उनके 13 रूपों की की चर्चा कर रहे हैं।1. बाल कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर हजारों किताबें लिखी जा चुकी हैं। श्रीमद्भागवत पुराण में उनकी बाल लीलाओं का वर्णन मिलता है। श्रीकृष्ण का बचपन गोकुल और वृंदावन में बीता। श्रीकृष्ण ने ताड़का, पूतना, शकटासुर आदि का बचपन में ही वध कर डाला था। बाल कृष्ण को 'माखन चोर' , बाल गोपाल, लड्डू गोपाल भी कहा जाता है।2. गोपाल कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण एक ग्वाले थे और वे गाय चराने जाते थे इसीलिए उन्हें 'गोपाल' भी कहा जाता है। ग्वाले को गोप और गवालन को गोपी कहा जाता है। हालांकि यह शब्द अनेकार्थी है। पुराणों में गोपी-कृष्ण लीला का वर्णन मिलता है। इसमें श्रीकृष्ण और गोपिकाओं के महारास का अद्भुत चित्रण है।3. रक्षक कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण ने किशोरावस्था में ही चाणूर और मुष्टिक जैसे खतरनाक मल्लों का वध किया था। उन्होंने इंद्र के प्रकोप से वृंदावन आदि ब्रज क्षेत्र के वासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत अपनी अंगुली पर उठाया और सभी ग्रामवासियों की रक्षा की थी।4. शिष्य कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनी थे। उनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था। श्रीकृष्ण गुरु दीक्षा में सांदीपनी के मृत पुत्र को यमराज से मुक्त कराकर ले आए थे।5. सखा कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण के हजारों सखा थे। श्रीकृष्ण के सखा के रूप में सुदामा, श्रीदामा, मधुमंगल, सुबाहु, सुबल, भद्र, सुभद्र, मणिभद्र, भोज, तोककृष्ण, वरूथप, मधुकंड, विशाल, रसाल, मकरन्द, सदानन्द, चन्द्रहास, बकुल, शारद, बुद्धिप्रकाश, अर्जुन आदि का वर्णन मिलता है। श्रीकृष्ण की सखियां भी हजारों थीं। इनमें राधा, ललिता आदि 8 सखियोंं का वर्णन ज्यादा मिलता है।ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार इन 8 सखियों के नाम इस प्रकार हैं- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा। कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी। कुछ जगह पर ललिता, विशाखा, चम्पकलता, चित्रादेवी, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और कृत्रिमा (मनेली)। इनमें से कुछ नामों में अंतर है। इसके अलावा भौमासुर से मुक्त कराई गईं सभी महिलाएं कृष्ण की सखियां थीं। पंचाली यानी द्रौपदी भी श्रीकृष्ण की सखी थीं।6. पुराणों में गोपी-कृष्ण- : कृष्ण को चाहने वाली अनेक गोपियां और प्रेमिकाएं थीं। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रांगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता, लेकिन पुराणों में मिलता है। उनकी प्रेमिका राधा, रुक्मिणी और ललिता की ज्यादा चर्चा होती है।7. कर्मयोगी कृष्ण : गीता में कर्मयोग का बहुत महत्व है। कृष्ण ने जो भी कार्य किया, उसे अपना कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण जीते थे और पूरी जिम्मेदारी के साथ उसका पालन करते थे।8. धर्मयोगी कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण ने ऋषि वेदव्यास के साथ मिलकर धर्म के लिए बहुत कार्य किया। भगवत गीता में उन्होंने कहा भी है कि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब मैं अवतार लूंगा।9. वीर कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में युद्ध नहीं लड़ा था। वे अर्जुन के सारथी थे। लेकिन उन्होंने कम से कम 10 युद्धों में भाग लिया था। उन्होंने चाणूर, मुष्टिक, कंस, जरासंध, कालयवन, अर्जुन, शंकर, नरकासुर, पौंड्रक और जाम्बवंत से भयंकर युद्ध किया था और विजयी हुए थे। महाभारत के युद्ध में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस युद्ध में वे अर्जुन के सारथी थे। हालांकि उन्हें 'रणछोड़ कृष्ण' भी कहा जाता है। इसलिए कि वे अपने सभी बंधु-बांधवों की रक्षा के लिए मथुरा छोड़कर द्वारिका चले गए थे। वे नहीं चाहते थे कि जरासंध से उनकी शत्रुता के कारण उनके कुल के लोग भी व्यर्थ का युद्ध करें।10. योगेश्वर कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण एक महायोगी थे। उनका शरीर बहुत ही लचीला था लेकिन वे अपनी इच्छानुसार उसे वज्र के समान बना लेते थे, साथ ही उनमें कई तरह की यौगिक शक्तियां थीं। कहा जाता है कि योग के बल पर ही उन्होंने मृत्युपर्यंत तक खुद को जवान बनाए रखा था।11. अवतारी कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उन्हें पूर्णावतार माना जाता है। महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन को उन्होंने अपना विराट स्वरूप दिखाकर यह सिद्ध कर दिया था कि वे ही परमेश्वर हैं।12. राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण ने अपने संपूर्ण जीवन में कूटनीति के बल पर परिस्थितियों को अपने अनुसार ढालकर भविष्य का निर्माण किया था। उन्होंने महाभारत के युद्ध के दौरान वीर कर्ण के कवच और कुंडल दान में दिलवा दिए, वहीं उन्होंने दुर्योधन के संपूर्ण शरीर को वज्र के समान होने से रोक दिया। सबसे शक्तिशाली बर्बरीक का शीश मांग लिया तो दूसरी ओर उन्होंने घटोत्कच को सही समय पर युद्ध में उतारा। ऐसी सैकड़ों बातें हैं जिससे पता चलता है कि कूटनीति से उन्होंने संपूर्ण महाभारत की रचना की और पांडवों को जीत दिलाई।13. रिश्तों में खरे श्री कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण की प्रमुख 8 पत्नियां थीं- रुक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी। इसमें से उन्होंने रुक्मिणी को पटरानी का दर्जा दिया था। इन 8 पत्नियों से श्रीकृष्ण को लगभग 80 पुत्र हुए थे। कृष्ण की 3 बहनें थीं- एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं), सुभद्रा और द्रौपदी (मानस भगिनी)। कृष्ण के भाइयों में नेमिनाथ, बलराम और गद थे। सुभद्रा का विवाह कृष्ण ने अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था। उसी तरह श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र साम्ब का विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से किया था।
-
जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 229
साधक का प्रश्न ::: ये जो बड़े-बड़े महापुरुषों का इतिहास मिलता है, तुलसीदास हैं, सूरदास हैं, मीरा हैं, कि इतने आसक्त संसार में सूरदास, इतने आसक्त तुलसीदास, और एक सेकिण्ड में एबाउट टर्न हो गये। ये कैसे ?
जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा उत्तर ::: ऐसा नहीं। तमाम जन्मों से साधना कर रखा था। थोड़ी सी कमी रह गई थी तो इस जन्म में वो पूरी हो गई। जिसकी पहले कमाई अधिक है उसका जल्दी आकर्षण हो जाता है भगवान् में, महापुरुष में। जिसका मन गन्दा है, पाप अधिक है वो देर में खिंचता है। बस इतना सा अन्तर है।
एक चुम्बक रख दो बीच में और चारों तरफ सुइयाँ खड़ी कर दो। एक सुई क्लीन, केवल लोहे की है। वो तुरन्त खिंच जाएगी। चुम्बक में आकर तुरन्त चिपक जायेगी। दूसरे में टेन पर्सेन्ट मिलावट है वो धीरे-धीरे चलेगी, एक में फिफ्टी पर्सेन्ट मिलावट है वो और धीरे-धीरे चलेगी। एक में नाइन्टी पर्सेन्ट मिलावट है वो अपनी जगह हिलेगी, चलेगी नहीं। ऐसे ही भगवान् और महापुरुष को देख कर, पाकर जो शुद्ध अन्तःकरण है, तुरन्त चिपक जाता है। शरणागत हो जाता है। जिसमें जितनी गन्दगी है वो उतनी ही देर में आकृष्ट होता है। लेकिन होना तो सबको है। अभ्यास करो। प्रैक्टिस करो। करना तो पड़ेगा। उसके बिना छुट्टी नहीं मिलना है।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 228
साधक का प्रश्न ::: क्या भक्तिमार्गी वर्णाश्रम-धर्म का त्याग कर सकता है?
जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा उत्तर ::: भागवत कहती है,
आज्ञायैवं गुणान्दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्।धर्मान्सन्त्यज्य यः सर्वान्मां भजेत्स च सत्तमः।।(भागवत 11वाँ स्कंध)
अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि वर्णाश्रम व्यवस्था का विधि-निषेधात्मक विधान मेरा ही बनाया हुआ है, किन्तु जो उसे छोड़कर एकमात्र मेरा ही भजन करता है, उसे कार्यों के परित्याग का दोष नहीं लगता, एवं वह मेरा अत्यन्त प्रिय हो जाता है।
किन्तु यह स्मरण रहे कि यदि भगवदाराधना भी नहीं करता, एवं उन विधिनिषेधात्मक भगवद्विधान का भी परित्याग कर देता है, तो वह विधान के अनुसार ही दंडनीय होगा। यह नियम तो एक विशेष नियम है कि भगवान् के निमित्त उसने समस्त धर्मों का परित्याग किया है, अतएव यह सर्वथा क्षम्य एवं भगवत्प्रिय है। भागवत कहती है,
देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।सर्वात्मनाः यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहत्य कर्तम्।।(भागवत 11वाँ स्कंध)
अर्थात् जो विधिनिषेधात्मक धर्मों का परित्याग करके सर्वभाव से मेरी ही शरण हो जाता है, उसके लिए देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण, एवं अन्य भूतऋण, वेदऋण, मनुष्यऋणादि के बंधनों से छूटने का आवश्यक नियम लागू नहीं होता। वो इन ऋणों का दास नहीं माना जाता। यह भी एक विशेष नियम है किन्तु जो उच्छृंखलतावश शरणागत न होते हुये भी विधिनिषेधात्मक विधान का परित्याग करेगा, वह विधान के अनुसार ही दंडनीय होगा।
यदि साधक भक्त, जो एकमात्र श्रीकृष्ण के शरणागत है, कदाचित् कुछ पापकर्म कर भी जाता है तो अकारण करुण भगवान् श्रीकृष्ण उसके हृदय में प्रविष्ट होकर उस विकार को नष्ट कर देते हैं, एवं उसको फिर उठा लेते हैं।
किन्तु यदि सम्पूर्ण-भाव से शरणागत नहीं है, नाटकीय रूप से ही शरणागति का स्वांग रचता है, तब योगक्षेम वहन करने का विधान लागू नहीं होता।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - पेड़-पौधों का जीवन में बहुत महत्व है। पेड़ पौधों से ही पृथ्वी के समस्त जीवों को प्राणवायु प्राप्त होती है। वृक्ष के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। धार्मिक मान्यताओं और वास्तु में भी पेड़-पौधों को बहुत ही खास और महत्वपूर्ण माना गया है। सनातन धर्म में तुलसी और अन्य कई पेड़ों की पूजा भी की जाती है। वास्तु में कई ऐसे पौधों के बारे में बताया गया है जिन्हें घर में लगाना बहुत ही शुभ रहता है, लेकिन इन पौधों की भलि प्रकार से देखभाल करना बहुत आवश्यक होता है। तुलसी का पौधा मुरझाना या सूखना तो धन के लिए अच्छा नहीं ही माना जाता है। इसके अलावा भी कई पौधे हैं, जिनका सूखना भी हानि की ओर संकेत करता है।शमी का वृक्षशनि की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए शमी का पेड़ लगाना बहुत अच्छा माना जाता है। इसके साथ ही यह पेड़ भगवान शिव का भी प्रिय माना गया है। माना जाता है कि शमी का पेड़ सूखना या मुरझाना शनि की खराब स्थिति की ओर इशारा करता है। इससे आपको धन और कार्य संंबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यदि यह पौधा सूखने लगे तो इसे हटाकर दूसरा पौधा रोप देना चाहिए।मनीप्लांट का सूखनावास्तु में मनी प्लांट को धन वृद्धि करने वाला पौधा माना गया है। यह पौधा बेल की तरह बढ़ता है। माना जाता है कि यदि किसी के घर में मनीप्लांट खूब हरा-भरा रहता है तो उसके घर में धन, वैभव और समृद्धि बनी रहती है। मनीप्लांट की वृद्धि की तरह धन की भी वृद्धि होती है। मनी प्लांट का मुरझाना या सूखना धन के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। मान्यता है कि देखभाल करने पर भी यदि मनीप्लांट सूखने लगे तो यह आपके घर में धन की तंगी का संकेत देता है। इसके साथ ही मनी प्लांट लगाते समय ध्यान रखना चाहिए की उसकी बेल हमेशा ऊपर की ओर बढऩी चाहिए।अशोक का पेड़वास्तु में अशोक के पेड़ को सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देने वाला माना गया है। अशोक का पेड़ घर के मुख्य दरवाजे पर लगाना बहुत शुभ रहता है। इसके अलावा इसके पत्ते मंदिर में रखना और तोरण बनाकर द्वार पर लगाना भी बहुत शुभ रहता है। अशोक का वृक्ष बहुत ही शुभ और मंगलकारी माना गया है। यदि अशोक का वृक्ष अचानक से सूखने लगे तो यह अच्छा नहीं माना जाता है। इससे आपके घर की सुख-शांति में बाधा आ सकती है।
- जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 227
(भूमिका ::: 'भगवान' से प्यार करने का तरीका रसिकों ने बताया है, क्योंकि भगवान को भगवान मानकर कोई प्यार कर नहीं सकता। ऐसा क्यों है, जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साधक-समुदाय को समझा रहे हैं...)
..धनवान, बुद्धिवान, ऐसे ही भगवान्। प्रत्यय होकर के भगवान् शब्द बनता है, अर्थात् 'भग' वाला। और 'भग' किसे कहते हैं?
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः।ऐश्वर्यस्य ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥(विष्णु पुराण 6-5-74)
छहों ऐश्वर्य अनन्त मात्रा के जिसमें हों, लिमिटेड नहीं। प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक शक्ति अनन्त मात्रा की जिसमें हों, उसका नाम भगवान्। संसार में आप लोगों के पास भी शक्तियाँ हैं, बहुत छोटी। बहुत कम पॉवर की। आप लोगों से बहुत अधिक शक्ति देवताओं की है। जैसे; सुन्दरता में कामदेव, ऐश्वर्य में इन्द्र, धन में कुबेर, सम्मान में गणेश। इन लोगों के पास बड़ी-बड़ी लिमिट की चीज है लेकिन है सब सीमित और भगवान् के पास ये सब असीम मात्रा की होती हैं, अनन्त मात्रा की। उसको भगवान् कहते हैं।
तो भगवान् से प्यार करने जब हम लोग चलेंगे, तो डर लगेगा न। अरे! कहाँ भगवान्, कहाँ हम? हम संसार में भी किसी से प्यार करते हैं तो पहले हैसियत देख लेते हैं कि हम एक भिखारी की लड़की हैं और एक प्राइम मिनिस्टर के लड़के से ब्याह करने की सोच रहे हैं, ये मूर्खता है। ये असम्भव है। फिर एक साधारण जीव, सर्वशक्तिमान् भगवान् से प्यार करने की बात कैसे सोचे? इसलिए भगवान् ने कहा देखो, तुम हमको भगवान् मत मानो। हमसे चार नाते मानो।
पहला नाता भगवान् स्वामी, हम उनके दास। बस। वो भगवान् नहीं। जैसे संसार में हम किसी के सर्वेन्ट हो जाते हैं तो वो हमारा स्वामी होता है, हम उनके दास होते हैं। ये सबसे नीचे वाला भाव है। इसमें दूरी बहुत है क्योंकि दास तो मर्यादा में रहेगा, स्वामी के बराबर बैठ भी नहीं सकता। इससे ऊँचा भाव है सख्य भाव। भगवान् मेरे सखा हैं, फ्रैण्ड हैं, दोस्त हैं, मित्र हैं, इसमें बराबरी आ गई। हम उनके बराबर हैं। अब सखा लोग भगवान् के कन्धे पर बैठ जाते हैं, खेल में हारने पर घोड़ा बना लेते हैं उनको। बड़ा अधिकार हो गया उनको। लेकिन, अब भी पूरा अधिकार नहीं।
तो सख्य भाव से बड़ा है वात्सल्य भाव। यानी भगवान् को अपना बेटा मानना, अपने को माँ-बाप मानना। ये वात्सल्य भाव। और सबसे ऊँचा भाव है भगवान् हमारे प्रियतम हैं, हम उनकी प्रेयसी हैं। ये प्रियतम और प्रेयसी के भाव में सब भाव अण्डरस्टुड हैं। जब चाहो उनको पति मान लो, जब चाहो बेटा मान लो, जब चाहो सखा मान लो और जब चाहो स्वामी मान लो। चारों भाव माधुर्य भाव में अंतर्निहित होते हैं। संसार में ऐसा नहीं होता कि कोई पति को कहे ओ बेटा! इधर आओ। हाँ, झगड़ा हो जाय, मुसीबत हो जाय। कोई बेटे को नहीं कहता प्रियतम! इधर आओ। पाप कहते हैं उसको, पाप लग जायेगा, ऐसा नहीं बोलो, ऐसा नहीं सोचो। बेटा अपनी जगह, बाप अपनी जगह, पति अपनी जगह। लेकिन भगवान् के यहाँ ऐसा नहीं है।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। ..... त्वमेव सर्वं मम देव देव।
भगवान् ही हमारा सब कुछ है। तो सब भावों में हम जा सकें स्वतंत्रता पूर्वक, ये माधुर्य भाव है। यानी प्रियतम का भाव। वह हमारे प्रियतम, हम उनकी प्रेयसी। इसलिए गोपियों ने खूब डाँट लगाई, अपमान किया श्यामसुन्दर का, फिर भी वो विभोर होते रहे। ये माधुर्य भाव है।
तो ये भक्त कह रहा है कि मैं आपको भगवान् वगवान् नहीं मानता। भगवान् मानने पर अर्जुन डर गया। गांडीवधारी अर्जुन!! उसने श्रीकृष्ण को भगवान् माना और कहा हमको अपना स्वरूप दिखाइए। जब श्रीकृष्ण ने अपना भगवान् का रूप दिखाया तो काँपने लगा, डर के मारे पसीना-पसीना हो गया। चक्कर आ गया। उसने कहा महाराज! ये रूप नहीं चाहिए। हमारे तुम सखा बने रहो बस।
तो इसलिए भगवान् अपनी जगह पर रहें भगवान्, ठीक है। लेकिन वे हमारे स्वामी हैं, हमारे सखा हैं, हमारे पुत्र हैं, हमारे प्रियतम हैं, एक से एक ऊँचे। इन चारों भावों से ही भक्ति करने की आज्ञा दिया है शास्त्रों ने, वेदों ने।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - जब हम गहरी नींद में होते हैं तो हमें सपने आते हैं लेकिन ज्यादातर सपने ऐसे होते हैं जिनका कोई खास अर्थ नहीं होता और सुबह उठने के बाद वे सपने हमें याद भी नहीं रहते. स्वप्न शास्त्र में सपनों के बारे में विस्तार से बताया गया है जिसके मुताबिक सपने व्यक्ति को आने वाली घटनाओं का संकेत देते हैं जो अच्छे भी होते हैं और बुरे भी.------हम आपको सपनों में दिखने वाली कुछ ऐसी चीजों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें सपने में देखना अशुभ माना जाता है.अशुभ माने जाते हैं ऐसे सपने---------------कौआ, उल्लू या सांप का दिखना- यदि किसी रात सपने में आपको कौआ नजर आता है तो यह किसी अशुभ घटना की ओर संकेत करता है. तो वहीं सपने में अगर उल्लू दिख जाए तो किसी अपशगुन, बीमारी या दुखद समाचार मिलने की ओर इशारा करता है. इसके अलावा सपने में सांप दिखना भी अशुभ माना गया है. कहते हैं कि इससे व्यक्ति को मृत्यु के समान कष्ट मिल सकता है.पेड़ कटते हुए देखना- अगर किसी को सपने में पेड़ कटते हुए दिखाई दें तो इसका मतलब है कि उस व्यक्ति को रुपये पैसों का नुकसान होने वाला है. साथ ही इस तरह के सपने को स्वास्थ्य हानि का भी संकेत माना जाता है.झाड़ू का दिखना- वैसे तो झाड़ू को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है और धनतेरस के दिन अधिकतर लोग नई झाड़ू खरीदते हैं, लेकिन सपने में झाड़ू का दिखना अशुभ माना जाता है. स्वप्नशास्त्र की मानें तो सपने में झाड़ू दिखना बताता है कि आपको निकट भविष्य में धन की हानि होने वाली है.खुद को गिरते हुए देखना- सपने में खुद को पहाड़ से, किसी ऊंची बिल्डिंग से या किसी भी ऊंची जगह से गिरते देखना भी अशुभ माना जाता है. इस तरह का सपना आने का मतलब है कि भविष्य में आपकी सेहत खराब हो सकती है और आपके मान-सम्मान में कमी आ सकती है.रेगिस्तान में चलना- अगर किसी रात आप सपने में खुद को रेगिस्तान में चलते हुए देखें तो इसका मतलब है कि आपको भविष्य में किसी शत्रु की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.
- हिंदू धर्म के पंचांग के अनुसार, जब गुरु की राशि मीन या धनु में भगवान सूर्य गोचर करते हैं तो उसे खरमास कहते हैं। खरमास को मलमास या अधिक मास भी कहा जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार रविवार 14 मार्च से खरमास शुरू हो चुका है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस मास में कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है। ऐसा करने से भक्त पर सूर्य देव की कृपा होती है। इसके अलावा सुख-समृद्धि भी मिलती है.... तो जानिए खरमास में कौन से काम करने चाहिए और कौन नहीं।खरमास में भूलकर भी न करें ये काम----- खरमास में वैवाहिक कार्य, भूमि पूजन, गृह प्रवेश, तिलकोत्सव और मुंडन आदि मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं.। ऐसा करना अशुभ होता है।- खरमास में बेड पर नहीं सोना चाहिए। इस महीने जमीन पर सोना सही बताया गया है। ऐसा करने से भगवान सूर्य की कृपा होती है।- खरमास में पत्तल पर खाना खाने को बहुत शुभ माना गया है। इस महीने थाली में खाना नहीं खाना चाहिए।- खरमास में भूलकर भी झूठ नहीं बोलना चाहिए. इसके अलावा लड़ाई-झगड़े से भी दूर रहना चाहिए।- खरमास में मांस और शराब का सेवन भी वर्जित है।खरमास में ये काम जरूर करें------- खरमास में विधि-विधान से सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए. इससे भगवान सूर्य की कृपा मिलती है।- खरमास में भगवान विष्णु की पूजा करना फलदायी होता है. ऐसा करने से घर में धन की देवी लक्ष्मी जी का वास होता है।- खरमास में सेवा करने का बहुत महत्व है। इस दौरान ब्राह्मण, गुरु, गरीब, गाय और साधुओं की सेवा करने से भगवान प्रसन्न होते हैं।- खरमास में सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए. सुबह नहाने के बाद भगवान की उपासना करनी चाहिए। सूर्य देव को अघ्र्य भी देना चाहिए. ऐसा करने से सुख-समृद्धि मिलती है।- खरमास में तुलसी की आराधना भी करनी चाहिए। शाम को तुलसी के पौधे के नीचे देसी घी का दीपक जलाना चाहिए।
- नई दिल्ली: वैसे तो देशभर में भगवान गणेश (Lord Ganesha) के कई अनोखे मंदिर मौजूद हैं और सभी का अपना-अपना अलग और खास महत्व भी है. लेकिन आज विनायक चतुर्थी (Vinayak Chaturthi) के खास मौके पर हम आपको भगवान गणेश के उस मंदिर के बारे में बता रहे हैं जहां पर त्रिनेत्री यानी तीन नेत्रों वाले गणपति के दर्शन होते हैं. इस मंदिर में भगवान गणेश की प्रतिमा के 3 नेत्र हैं. इसके अलावा इस मंदिर में ईश्वर के प्रति भक्तों की आस्था का एक और अनोखा उदाहरण देखने को मिलता है. इस मंदिर में लाखों की संख्या में भक्तजन चिट्ठियां भेजते हैं (Sending Letters) ताकि वे प्रथम पूज्य भगवान गणेश को अपने मन की बात बता सकें. कहां है ये अनोखा मंदिर और मंदिर की स्थापना के पीछे की कहानी क्या है,स्वंयभू है त्रिनेत्र गणेश मंदिर की प्रतिमात्रिनेत्र भगवान गणेश (Trinetra Ganesha) का यह मंदिर राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में विश्व धरोहर में शामिल रणथंभौर के किले (Ranthambhore Fort) में स्थित है. देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर से सैकड़ों लोग इस मंदिर में तीन नेत्रों वाले भगवान गणेश के दर्शन करने के लिए आते हैं. इसके अलावा मांगलिक कार्य के दौरान गणेश जी को आमंत्रित करने के लिए देशभर से हजारों की तादाद में निमंत्रण पत्र भी गणेश जी के इस मंदिर में आता है. ऐसी मान्यता है कि त्रिनेत्र गणेश मंदिर की यह प्रतिमा स्वयंभू है, यानी यह खुद ही प्रकट हुई है. इस मंदिर में स्थित भगवान गणेश की प्रतिमा का तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. इस अनोखे मंदिर में भगवान गणेश अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं. मंदिर में गणेश जी की दो पत्नियां- रिद्दि, सिद्दि और दो पुत्र शुभ और लाभ भी हैं. गणेश जी का वाहन मूषक भी यहां पर है.भगवान के सामने पढ़ी जाती हैं चिट्ठियांइस मंदिर में भगवान गणेश को आने वाले निमंत्रण पत्रों और चिट्ठियों पर भगवान गणेश का पता श्री गणेश जी, रणथंभौर का किला, जिला- सवाई माधौपुर (राजस्थान) लिखा जाता है. डाकिया इन चिट्ठियों और निमंत्रण पत्रों को पूरी श्रद्धा के साथ यहां मंदिर में पहुंचाते हैं और मंदिर के पुजारी इन चिट्ठियों और निमंत्रण पत्रों को भगवान त्रिनेत्र गणेश जी महाराज को पढ़कर सुनाते हैं.किसने की मंदिर की स्थापना?गणपति जी के इस मंदिर की स्थापना रणथंभौर के राजा हमीर ने 10वीं सदी में की थी. ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी के साथ युद्ध के समय गणेश जी राजा के सपने में आए और उन्हें आशीर्वाद दिया और राजा युद्ध में विजयी हुए. इसके बाद राजा ने अपने किले में गणेश जी के मंदिर का निर्माण करवाया
- वास्तु शास्त्र में तुलसी के पौधे को सुखी जीवन एवं कल्याण का प्रतीक माना गया है। तुलसी का पौधा तमाम दोषों को दूर करता है। तुलसी का पौधा देवताओं की कृपा दिलाने में सहायक माना जाता है। तुलसी मां को राधा रानी का अवतार माना गया है। वास्तु में तुलसी से जुड़े कुछ उपाय बताए गए हैं, आइए जानते हैं इनके बारे में।तुलसी के पौधे को घर की छत पर न रखें। इससे आर्थिक हानि की आशंका रहती है। तुलसी की पत्तियों को चबाने के बजाए, जीभ पर रखकर चूसना सही तरीका है। दही में तुलसी के कुछ पत्तों को मिलाकर खाने से स्वास्थ्य से जुड़ी कई परेशानियों से राहत मिलती है और दिनभर शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। तुलसी के पौधे की रोजाना पूजा करने से घर के सदस्यों में चल रहे मनमुटाव दूर हो जाते हैं। तुलसी का पौधा रसोईघर के पास रखने से घर के सदस्यों में सामंजस्य बढ़ता है। यदि तुलसी की पत्तियों की बहुत जरूरत पड़ जाए तो तोड़ने से पहले पौधे को हिलाना न भूलें। तुलसी के पौधे का सूख जाना या फिर मुरझा जाना अशुभ माना जाता है।तुलसी का स्वास्थ्य के साथ धार्मिक महत्व भी है। सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, एकादशी, संक्रांति, द्वादशी व शाम के समय तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। रविवार और मंगलवार को भी तुलसी के पत्ते तोड़ने की मनाही है। बिना नहाए कभी भी तुलसी के पत्ते न तोड़ें। घर के आंगन में तुलसी सौभाग्य को बढ़ाती है। घर में यह पवित्र पौधा सभी दोष दूर करता है और वातावरण में सकारात्मकता बनाए रखता है। तुलसी का पौधा घर में लगाने से परिवार के सदस्यों की स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। तुलसी के पौधे के सम्मुख शाम को दीया जलाने से सुख-समृद्धि आती है। इस पवित्र पौधे के आसपास पवित्रता बनाए रखना बहुत जरूरी है।
- विनायक चतुर्थी के दिन भगवान श्रीगणेश की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चतुर्थी के दिन श्रीगणेश की पूजा करने और व्रत रखने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। इस महीने विनायक चतुर्थी 17 मार्च (बुधवार) को है। हर महीने दो चतुर्थी पड़ती हैं- पहली शुक्ल पक्ष और दूसरी कृष्ण पक्ष में। शुक्ल पक्ष में पडऩे वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं और कृष्ण पक्ष में पडऩे वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।कहा जाता है कि विनायक चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता की पूजा के दौरान भगवान श्री गणेश की कथा को सुनना या पढऩा चाहिए। मान्यता है कि विनायक चतुर्थी की कथा सुनने या पढऩे से भक्तों के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।पढ़ें विनायक चतुर्थी की कथा-एक दिन भगवान भोलेनाथ स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगवती गए। महादेव के प्रस्थान करने के बाद मां पार्वती ने स्नान प्रारंभ किया । स्नान करते हुए अपने उबटन के मैल से एक पुतला बनाकर और उस पुतले में जान डालकर उसको जीवित कर दिया। पुतले में जान आने के बाद देवी पार्वती ने पुतले का नाम गणेश रखा। पार्वती जी ने बालक गणेश को स्नान करते जाते वक्त मुख्य द्वार पर पहरा देने के लिए कहा। माता पार्वती ने कहा कि जब तक मैं स्नान करके न आ जाऊं किसी को भी अंदर नहीं आने देना।उधर भोगवती में स्नान कर जब भगवान शिव घर के अंदर आने लगे तो बाल स्वरूप गणेश ने उनको द्वार पर रोक दिया। भगवान शिव की लाख कोशिश के बाद भी गणेश ने उनको अंदर नहीं जाने दिया। गणेश द्वारा रोकने को भगवान शिव ने अपना अपमान समझा और बालक गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया और घर के अंदर प्रवेश कर गए। शिवजी जब घर के अंदर गए तो बहुत क्रोधित अवस्था में थे। ऐसे में देवी पार्वती ने सोचा कि भोजन में देरी की वजह से वो नाराज हैं, इसलिए उन्होंने दो थालियों में भोजन परोसकर उनसे भोजन करने का निवेदन किया।शिवजी ने लगाया था हाथी के बच्चे का सिरदो थालियां लगी देखकर शिवजी ने उनसे पूछा कि दूसरी थाली किसके लिए है? तब माता पार्वती ने जवाब दिया कि दूसरी थाली पुत्र गणेश के लिए है, जो द्वार पर पहरा दे रहा है। तब भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि उसका सिर मैंने क्रोधित होकर धड़ से अलग कर दिया। इतना सुनकर पार्वतीजी दुखी हो गई और विलाप करने लगी। उन्होंने भोलेनाथ से पुत्र गणेश का सिर जोड़कर जीवित करने का आग्रह किया। तब महादेव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर श्रीगणेश के धड़ से जोड़ दिया और उसे जीवित कर दिया। अपने पुत्र को फिर से जीवित पाकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुई। कहा जाता है कि जिस तरह भगवान शिव ने श्रीगणेश को नया जीवन दिया था, उसी तरह भगवान गणेश भी नया जीवन अर्थात आरम्भ के देवता माने जाते हैं। इसलिए उनकी सबसे पहले पूजा की जाती है।
- जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 226
(अपना उत्थान-पतन स्वयं अपने हाथ में है, संसार का यह दृष्टांत आध्यात्मिक उत्थान के लिये सहायक होगा, आइये जानें वह क्या है?..)
..आलस्य, लापरवाही, दूसरे में दोष देखना, परनिन्दा सुनना - ये सब गड़बड़ी जो हम करते हैं, इसको बन्द करके कमाने-कमाने (आध्यात्मिक कमाई) की बात सोचो।
सावधान होकर के कमाई पर ध्यान दो। गँवाना न पड़े। बचे रहो। कम से कम खर्चा करो तब लखपति, करोड़पति बनोगे। कम से कम संसार में व्यवहार करो और गलत व्यवहार तो होने ही मत दो। अहंकार बढ़ेगा, दीनता छिन जायेगी, भक्ति समाप्त हो जायेगी, मन गन्दा हो जायेगा। क्या करेगा गुरु? भगवान् अन्दर बैठे हैं। क्या करेंगे? जब हम ही नहीं सँभलेंगे तो कोई क्या करेगा? अतः आप लोगों को स्वयं समझ लेना चाहिये हमारा उत्थान-पतन कहाँ है? और आगे के लिये भी सावधान रहना चाहिये।
कथावाचक लोग कहते हैं एक सेठ जी रात को हिसाब कर रहे थे दिन भर की कमाई का तो वो हिसाब बैठ नहीं रहा था, उसमें देर हो गई। तो बार-बार खाना खाने के लिये नौकरानी जाये कि सेठानी जी बैठी हैं खाने के लिये, चलो सेठजी खाना खा लो। अरे चलते हैं भई! हिसाब नहीं बैठ रहा है। फिर हिसाब करें, फिर हिसाब करें, बस बारह बज गये। तो सेठानी ने कहा ऐसा करो कि थोड़ी सी खीर ले जाओ, मुँह में लगा दो उनके। फिर जब मीठा लगेगा तब याद आयेगी खाना खाना चाहिये। तो नौकर गया उसने सेठ के मुँह में थोड़ी सी खीर लगा दिया, उन्होंने चाटा खीर को और जाकर हाथ धो लिया, मतलब खा चुके। जाओ जाओ, तुम लोग जाओ, हमारा हिसाब नहीं ठीक हो रहा है। ऐसे वो लोभी व्यक्ति लखपति, करोड़पति बनता है।
ऐसे ही क्षण-क्षण हरि गुरु का चिन्तन करना है। उनके लिये तन-मन-धन से सेवा करने की प्लानिंग प्रैक्टिस ये असली कमाई है।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 225
(भक्तिमार्ग यद्यपि अति सरल है तथापि इसमें कुछ पड़ाव अथवा शर्तें हैं, जिनका पालन करने से ही साधक की भक्ति सुदृढ़ रह सकती है अन्यथा अनेक प्रकार की अड़चनें भक्तिपथ में रुकावट डाल सकती है. जानते हैं जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज इस संबंध में क्या निर्देश कर रहे हैं....)
अब हम तुम्हें भक्ति के चौंसठ अंगों में से कुछ प्रमुख अंगों को कतिपय उदाहरणों द्वारा समझाते हैं।
सद्गुरु शरणागति - सर्वप्रथम श्रद्धा-युक्त होकर जिज्ञासु शिष्य को गुरु की शरणागति ग्रहण करनी चाहिये, किन्तु गुरु ऐसा होना चाहिये, जो शिष्य को भगवत्तत्त्व का बोध भी करा सके, एवं स्वयं अनुभूत भी हो।
विश्वास-पूर्वक गुरु की सेवा - भगवान् कहते हैं कि अपने गुरु को मेरा ही रूप समझो। कभी भी, भूल कर भी, अपमान न करो, न तो मनुष्य की बुद्धि से ही गुरु को नापो, क्योंकि गुरु मनुष्य नहीं है, उसके हृदय में तो भगवान् स्वयं निवास करते हैं, अतएव गुरु सर्वदेवमय होता है।
श्रीकृष्ण-विमुख-संग-त्याग - धधकती हुई आग की ज्वाला-युक्त पिंजड़े में जलना ठीक है, किन्तु भगवद्विमुख के संग, महान् से महान् इन्द्रादि लोकों में रहना ठीक नहीं, तथा भयंकर सांपों, सिंहों, एवं जोंकों से लिपट जाना अच्छा है, किन्तु अनंतानंत देवताओं से भी सेवित भगवद्विमुखों का संग करना ठीक नहीं है।
बहु-शिष्यादि करने का निषेध - अधिकारी, अनधिकारी का विचार न करते हुये साम्प्रदायिकता में आकर अनेकानेक शिष्य न करना चाहिये । वस्तुतस्तु भगवत्प्राप्ति के पूर्व, शिष्य समुदाय जोड़ना, अपने आप को पतन के गर्त में डालना है।
सांसारिक सुखों या दुखों के आने पर भी साधना न छोड़ना - खान, पान, कपड़े आदि सांसारिक व्यावहारिक वस्तुओं के पाने एवं न पाने दोनों ही अवस्थाओं में असावधान या खिन्न न होते हुये निरन्तर भगवान् का ही स्मरण करना चाहिये।
ब्रह्मादिकों का अपमान न करना - श्रीकृष्ण, समस्त देवताओं के ईश्वर के भी ईश्वर हैं। ऐसा समझ कर उपासना तो एकमात्र उन्हीं की करनी चाहिये, किन्तु साथ ही ब्रह्मा, शंकर आदि का अपमान भी न करना चाहिये। अन्यथा नामापराध-रूप अमिट पाप हो जायगा।
हरि एवं हरिजन की निंदा न सुनना - भगवान् एवं उनके भक्तों की निंदा कभी भूल कर भी न सुननी चाहिये, अन्यथा साधक का पतन हो जायगा, तथा उसकी सत्प्रवृत्तियाँ भी नष्ट हो जायँगी। प्रायः अल्पज्ञ-साधक किसी महापुरुष की निंदा सुनने में बड़ा ही शौक रखता है, वह यह नहीं सोचता कि निंदा करने वाला स्वयं निंदनीय है, या महापुरुष है। संत-निंदा सुनना नामापराध है। स्मरण रहे, कि हज़ारों वर्षों की साधना मिल कर भी जीव को जितनी मात्रा में उठाने में समर्थ नहीं, उतनी मात्रा में एक क्षण की भी कुसंगति पतन कराने में समर्थ है।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 224
साधक का प्रश्न ::: कर्मयोग की साधना और कर्मसंन्यास की साधना इन दोनों में उत्तम कौन सी है ?
जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा उत्तर ::: उत्तम तो कर्मयोग बताया है;
संन्यास: कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।(गीता 5-2)
दोनों कल्याणकृत हैं। किंतु इन दोनों में कर्मयोग विशेष अच्छा है, इसलिए कि अगर कर्मयोग कोई महापुरुष करेगा तो उसकी नकल करने वाले भक्ति की नकल तो कर नहीं सकेगें, तो कम से कम कर्म की नकल करेंगे तो विकर्मी नहीं बनेंगे। और यदि कर्मसंन्यास का महापुरुष है, तो उसकी नकल करेंगे तो कर्म को छोड़ देंगे और भक्ति को बड़ा मुश्किल है करना, वह करेंगे नहीं। इसलिए अर्जुन को कहा; तू कर्मयोगी बन, क्योंकि कर्म की नकल तो लोग करेंगे कम से कम विकर्मी तो नहीं बनेंगे। बाकी फल में कोई अंतर नहीं है। साधना में बड़ा अंतर है। कर्मयोगी की साधना बड़ी कठिन है क्योंकि संसार का संपर्क होता है। संसारी एटमॉस्फीयर (वातावरण) में रहना पड़ता है, उसका असर पड़ता है तो साधना की गति तेज नहीं हो पाती। अगर पहले साधना कर ले, कर्मसंन्यास करके और पक्का हो जाए फिर कर्मयोग करे, जैसे ध्रुव, प्रहलाद वगैरह ने करोड़ों वर्ष राज्य किया। तो फिर संसार उनके ऊपर हावी नहीं हो सकता। पहले दूध को जमा ले, दही बना दे, एकान्त में - ये कर्म संन्यास। फिर उसको मथ के मक्खन निकाल ले, फिर उसको पानी में छोड़ दे। कोई डर नहीं, वो तैरता रहेगा मक्खन। ऐसे ही, विशेष साधना द्वारा, कुछ भगवद् विषय प्राप्त कर ले, फिर कर्म करे तो कर्म में आसक्ति नहीं होगी।
तो साधना की दृष्टि से तो कर्मसंन्यास श्रेष्ठ है लेकिन लोक-कल्याण की दृष्टि से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी *महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - सर्वार्थसिद्धि योग के साथ ही इस दिन अमृतसिद्धि योग का भी रहेगा संयोगहिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होली का त्योहार मनाया जाता है। इससे एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। वहीं जिस दिन रंग खेला जाता है, उसे कहीं कहीं धुलेंडी भी कहा जाता है। ऐसे में इस बार हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार होली 29 मार्च 2021 को फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को पड़ रही है।इस दिन ध्रुव योग का भी निर्माण हो रहा है। इसके अलावा 03 मार्च, सन् 1521 के बाद यानि 499 साल बाद, इस बार एक विशेष दुलर्भ योग भी पड़ रहा है। आइए जानते हैं इस बार होली व होलाकाष्टक से जुड़ी खास बातों के साथ ही इस बार के पड़ रहे दुर्लभ योग के अलावा होली का समय, होलिका दहन तिथि, होली 2021 डेट व शुभ मुहूर्तइस बार दो दुलर्भ योगइस बार बन रहे दुलर्भ योगों में से पहले के अनुसार 29 मार्च को होली में चंद्रमा, कन्या राशि में विराजमान रहेंगे, जबकि गुरु और शनि ग्रह अपनी ही राशियों में रहेंगे। इन दोनों ग्रहों का ऐसा संयोग इससे पहले 3 मार्च, सन् 1521 में बना था। वहीं दूसरा योग भी दुर्लभ योग है जो दशकों बाद पड़ रहा है, इसके अनुसार इस बार होली पर सूर्य, ब्रह्मा और अर्यमा की साक्षी भी रहेगी।ऐसे समझें होलाष्टकहोली से 8 दिन पहले हिंदू धर्म के अनुसार होलाष्टक लग जाता है। इस दौरान किसी भी शुभ कार्य को वर्जित माना गया है। इसी कारण इस समय शादी, गृह प्रवेश समेत अन्य मांगलिक कार्य इस दौरान नहीं किए जाते हैं।होलाष्टक की तिथिहोलाष्टक आरंभ तिथि: 22 मार्च से लगेगाहोलाष्टक समाप्ति तिथि: 28 मार्च तकहोलिका दहन : जानें इसकी कथापौराणिक मान्यताओं के अनुसार विष्णु भक्त प्रहलाद को राक्षस हिरण्यकश्यप की आज्ञा पर जब उसकी बहन और प्रहलाद की बुआ होलिका आग पर बिठाकर मारने की कोशिश करती है तो वह खुद जल जाती है और प्रहलाद बच जाता है। इसके नाम पर ही होलिका दहन की परंपरा है। जानकारों की मानें तो होलिका का अर्थ समाज के बुराई को जलाने के प्रतिक के तौर पर मनाया जा जाता है।होलिका दहन रविवार, 28 मार्च 2021होलिका दहन मुहूर्त – 18:36:38 से 20:56:23 तककुल अवधि – 02 घंटे 19 मिनट 45 सैकेंडहोली 2021 की तिथि और शुभ मुहूर्तपूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: मार्च 28, 2021 को 03:27 बजेपूर्णिमा तिथि समाप्त: मार्च 29, 2021 को 00:17 बजे
- भारतीय संस्कृति की पहचान बने स्वस्तिक चिह्न को दरअसल गूढ़ रहस्यों से जुड़ा हुआ माना जाता है। ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिक:’ अर्थात कल्याण करने वाला प्रतीक है स्वस्तिक। हिंदु धर्म की हर पूजा-अर्चना में पवित्र स्वस्तिक जरूर उपस्थित होता है। ऋग्वेद में इसे सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धांत सार ग्रंथ में इसे विश्व ब्रह्मांड का प्रतीक चित्र माना गया है। इसकी चार भुजाएं ब्रह्मांड की ऊर्जा के फैलाव की दिशा बताती हैं। सिद्धांत सार ग्रंथ में स्वस्तिक को ब्रह्मांड का प्रतीक चित्र माना गया है। इसकी चार भुजाएं ब्रह्मांड की ऊर्जा के फैलाव की दिशा बताती हैं। अन्य ग्रन्थों में चार युगों से भी इसे जोड़ा गया है। इसे गणपति का चिह्न कहा जाता है।अन्य ग्रन्थों में चार युगों से भी इसे जोड़ा गया है। इसे गणपति का चिह्न कहा जाता है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा गणेश जी की शक्ति का स्थान माना जाता है, जिसका बीज मन्त्र ‘गं’ होता है। इसमें जो चार बिंदियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कच्छप और अनंत देवताओं का वास बताया जाता है। इसे बनाते समय भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि दो सीधी रेखाएं एक-दूसरे को काटते हुए आगे चलकर जब अपने दायीं ओर मुड़ें तो ही इसका स्वरूप कल्याणकारी बनता है। इसे बायीं ओर मोड़ कर बनाना कार्य-अनुष्ठान के लिए अशुभ हो जाता है।आजकल भले ही यह सजावटी चीजों में भी बनाया जाने लगा हो, लेकिन यह अति पवित्र और कल्याणकारी ऊर्जा लिए मंगल चिह्न है, जो घर, कार्यालय या किसी भी महत्व की चीज में देवों के पूजन के प्रतीक रूप में बनाया जाना चाहिए। वास्तु में भी माना जाता है कि किसी भी स्थान की नकारात्मकता दूर करने के लिए स्वस्तिक बना देना उस स्थल की ऊर्जा के लिए कल्याणकारी होता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार, जिस मनुष्य के शरीर में रेखाएं स्वस्तिक का चिह्न बनाती हैं, वह परम भाग्यशाली माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा मनुष्य जहां भी जाता है, उसका अनुकूल प्रभाव दूसरों पर पड़ता है, जिससे दूसरे लाभान्वित होते हैं। हिंदू धर्म में ही नहीं, कई अन्य धर्मों में भी इसका उल्लेख मिलता है। बौद्ध मान्यता में इसे वानस्पतिक संपदा का प्रतीक माना गया है। इसे बनाने का भी विधान है। धार्मिक कार्यों में सदैव रोली, हल्दी या सिंदूर से स्वस्तिक बनाना चाहिए
-
गायत्री शक्ति पीठ के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के प्रवचनों की कड़ी में आज;
'संकल्प शक्ति जगायें और अपना उत्थान करें'सृष्टि का कुछ ऐसा विलक्षण नियम है, कि पतन स्वाभाविक है और उत्थान कष्टसाध्य बनाया गया है। पानी को आप छोड़ दीजिए, नीचे बहता हुआ चला जायेगा। इसके लिये और आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। नीचे गिरने में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती है और कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है। ऐसा ही संसार का कुछ विलक्षण नियम है। पतन के लिये, बुरे कर्मों के लिये आपको ढेरों के ढेरों साधन मिल जायेंगे, सहकारी मिल जायेंगे, किताबें मिल जायेंगी और कोई नहीं मिलेगा तो आपके पिछले जन्म- जन्मांतरों के संग्रह किये हुए कुसंस्कार ही इस मामले में आपकी बहुत मदद करेंगे। वो आपको गिराने के लिये बराबर प्रोत्साहित करते रहेंगे। पाप- पंक में घसीटने के लिये बराबर आपका मन चलता रहेगा। इसके लिये न किसी अध्यापक की जरूरत है, न किसी और की कोई सहायता की जरूरत है। ये तो अपनी नेचर जैसी हो गई है, पीछे की तरफ गिराने वाली कोशिश इस संसार में इतनी भरी हुई पड़ी है, जिससे बचाव अगर आप न करें, उसका विरोध आप न करें, उसका मुकाबला आप न करें तो आप विश्वास रखिए, आप निरन्तर गिरेंगे, पतन की ओर गिरेंगे। सारा समाज इसी तरफ चल रहा है।आप निगाह उठा के देखिए। आपको कहाँ ऐसे आदमी मिलेंगे जो सिद्धान्तों को ग्रहण करते हों और आदर्शों को अपनाते हों। आप जिन्हें भी देखिए। अधिकांश लोगों में से कई बुराई की ओर चलते हुए दिखाई पड़ेंगे आपको। पाप और पतन के रास्ते पर उनका चिंतन और मनन काम कर रहा हुआ होगा। उनका चरित्र भी गिरावट की ओर और उनका चिंतन भी गिरावट की ओर। फिर आपको क्या करना चाहिए? अगर आपको ऊँचा उठना है तो आपको भीतर से हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। क्या हिम्मत करें? ये हिम्मत करें कि ऊँचे उठने वाले जिस तरीके से संकल्प बल का सहारा लेते रहे और हिम्मत से काम लेते रहे, व्रतशील बनते रहे, आपको उस तरीके से व्रतशील बनना चाहिए। देखा है न आपने। जब जमीन पे से ऊपर की तरफ चढ़ना होता है तो जीने का इन्तजाम करते हैं, सीढ़ी का इन्तजाम करते हैं। तब मुश्किल से धीरे- धीरे चढ़ते हैं। गिरने में क्या देर लगेगी? अंतरिक्ष में उल्काएँ अपने आप गिरती रहती हैं। जब जमीन से रॉकेट अन्तरिक्ष की ओर उछालने पड़ते हैं, तब करोड़ों-अरबों रुपया खर्च करते हैं, तब एक रॉकेट का ऊपर अंतरिक्ष में उछालना सम्भव होता है। तो क्या करना चाहिए? आपको यही करना पड़ेगा कि चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए जो कुसंस्कार ढेरों के ढेरों इकट्ठे कर लिये हैं, अब इन कुसंस्कारों के खिलाफ बगावत शुरू कर दीजिए। कैसे करें? अपने को मजबूत बनाइये। मजबूत नहीं बनायेंगे तब। तब फिर आपके पुराने कुसंस्कार फिर आ जायेंगे। मन को समझायें। जरा सी देर में समझ जायेगा, फिर उसी रास्ते पर आ जायेगा। क्या करना चाहिए?‘संकल्प शक्ति’ का विकास करना चाहिए। ‘संकल्प शक्ति’ किसे कहते हैं? ‘संकल्प शक्ति’ उसे कहते हैं, जिसमें कि ये फैसला कर लिया जाता है कि हमको ये तो करना ही है। ये हर हाल में करना है। करेंगे या मरेंगे। इस तरीके से संकल्प अगर आप किसी बात का कर लें तो आप विश्वास रखिए, फिर आपका जो मानसिक निश्चय है, वो आपको आगे बढ़ा देगा। अगर आपका मनोबल नहीं है और निश्चय बल नहीं है, ऐसे ही ख्वाब देखते रहते हैं कि ‘ये करेंगे’, विद्या पढ़ेंगे, व्यायाम करना शुरू करेंगे, फलाना काम करेंगे। आप कल्पना करते रहिए। कभी कुछ नहीं कर सकते। कल्पनाएँ आज तक किसी की सफल नहीं हुईं और संकल्प किसी के असफल नहीं हुए।इसीलिये आपको संकल्प शक्ति का सहारा लेने के लिये व्रतशील बनना चाहिए। आप व्रतशील बनिए। श्रेष्ठ काम करने के लिये, उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने के लिये आपको कोई न कोई संकल्प मन में लेना चाहिए कि ये काम करेंगे।काम करने तक के लिये कई आदमी ऐसा कर लेते हैं कि जब तक ये अच्छा काम न कर लेंगे, ये काम नहीं करेंगे। जैसे नमक नहीं खायेंगे, घी नहीं खायेंगे वगैरह- वगैरह। ये क्या है? इसको देखने में तो कोई खास बात नहीं है। आपको अमुक काम करने से नमक का क्या ताल्लुक और आपने घी खाना बन्द कर दिया तो कौन- सी ऐसी बड़ी बात हो गई जिससे कि आपको काम में सफलता मिल जायेगी। इन चीजों में तो नहीं है दम। लेकिन दम इस बात में है कि आपने इतना कठोर निश्चय कर लिया है और आपने सुनिश्चित योजना बना ली है कि हमको ये करना ही करना है। तब फिर आप विश्वास रखिये, आपका काम पूरा हो करके रहेगा। चाणक्य ने निश्चय कर लिया था कि जब तक मैं नन्द वंश का नाश न कर लूँगा, तब तक बाल नहीं बाधूँगा। ये अपना व्रत और प्रतिज्ञा को याद रखने का एक प्रतीक है, सिम्बल है। प्रतिज्ञाएँ तो भूल जाते हैं, लेकिन अगर कोई ऐसा बहिरंग अनुशासन भीतर लगा लें तो आदमी भूलता नहीं है।आदमी का संकल्प मजबूत होना चाहिए। अध्यात्म का प्राण ही वह संकल्प है। संकल्प बल न हो तब। हिम्मत न हो तब। तब फिर आदमी बेपेंदी के लोटे के तरीके से इधर- उधर भटकता रहता है। संकल्प कर लेने के बाद तो आदमी की आधी मंजिल पूरी हो जाती है।संकल्प बल एक लाठी के तरीके से है। जो आपको गिरने से बचा लेता है और आपको ऊँचा चलने के लिये, आगे बढ़ने के लिये हिम्मत प्रदान करता है। आपको भी अपने मनोबल की वृद्धि के लिये आत्मानुशासन स्थापित करना चाहिए। ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में, खान- पान के सम्बन्ध में, समयदान और अंशदान के सम्बन्ध में आपको कोई न कोई, कोई न कोई काम ऐसे जरूर करने चाहिए, जिसमें कि ये प्रतीत होता हो कि आपने छोटा- सा संकल्प लिया है, उसे पूरा करने में सफल रहे हैं। ये मनोबल बढ़ाने का तरीका है। संकल्प शक्ति, मनोबल से ज्यादा बढ़ कर के आदमी के व्यक्तित्व को उभारने वाली, प्रतिभा को उभारने वाली, उसके चरित्र को उभारने वाली और कोई वस्तु है ही नहीं और ये संकल्प बल की वृद्धि के लिये ये आवश्यक है कि आप छोटे- छोटे, छोटे- छोटे ऐसे कुछ नियम लिया कीजिए थोड़े समय के लिये। ये काम न कर लेंगे, तब तक हम ये नहीं करेंगे। मसलन शाम को इतने किताब के पन्ने न पढ़ लेंगे, सोयेंगे नहीं। मसलन हम सबेरे का भजन जब तक पूरा न कर लेंगे, खायेंगे नहीं। ये क्या है? ये व्रतशीलता के साथ में जुड़ा हुआ अनुशासन है।व्रत और संकल्प आदमी की जिन्दगी के लिये बहुत बड़ी कीमती वस्तु है। आप ऐसे ही किया कीजिए।(पं. श्रीराम शर्मा जी के विचार)० साभार - गायत्री शक्ति पीठ साहित्य० प्रस्तुति - अतुल कुमार 'श्रीधर' - जगदगुरु कृपालु भक्तियोग तत्वदर्शन - भाग 223
साधक का प्रश्न ::: महापुरुष माया के कार्य करते हुए भी माया से दूर कैसे रहते हैं?
जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा उत्तर ::: भगवान् और महापुरुष, योगमाया से कार्य करते हैं इसलिए माया का कार्य करते हुये भी माया से परे रहते हैं। एक, दो, चार नहीं, करोड़ों मर्डर किया अर्जुन ने, करोड़ों मर्डर किया हनुमानजी ने, ब्राह्मणों की हत्या की। और की कौन कहे। लेकिन उनका ओरिजिनल रूप क्या था ?
निज प्रभुमय देखहिं जगत, का सन करहिं विरोध।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। (गीता 8-7)
मन भगवान् में था और युद्ध हो रहा है। ये कैसे होता है जी! हाँ हाँ, जो उस क्लास में नहीं गया, वो नहीं समझ सकता। एक पाँच वर्ष का बच्चा कहता है कि मम्मी भी हमको बेटा कहती हैं और पापा भी बेटा कहते हैं, तो मैं दोनों का बेटा कैसे हूँ। सब बच्चे आपस में मीटिंग करते हैं पाँच वर्ष के क्योंजी...? हाँ जी! चलो हम लोग पूछेंगे आज मम्मी पापा से। मम्मी-पापा से पूछा तो उन्होंने कहा ऐसे ही है बेटा! बस याद कर ले, मम्मी के भी हम बेटे हैं, पापा के भी हैं। हूँ! कैसे याद कर लूँ? उनको आता ही नहीं जवाब, मम्मी-पापा को। हाँ। सबने मीटिंग करके, बच्चों ने, यही तय किया कि सबके मम्मी-पापा बेवकूफ हैं; वो जवाब ही नहीं देते सही-सही। हम दोनों के बेटे कैसे हैं? और अगर वो स्पष्ट रूप से कहें भी ये देखो, मम्मी का रज और डैडी का वीर्य मिल करके पेट में बच्चा बन जाता है। ये क्या है रज? क्या है वीर्य? क्या है पेट में बच्चा? ये क्या, ये तो हमको समझ में नहीं आता। अभी नहीं आएगा। जब वो कामयुक्त अवस्था तक उसकी उम्र होगी, वो प्रैक्टिकल उसको एक्सपीरियंस होगा, तब कहेगा, अरे! मम्मी-पापा ने ठीक बताया था। अब समझ में आया।
तो जैसे पाँच वर्ष के बच्चे को स्त्री-पति के मिलन का अनुभव न होने से बोध नहीं हो सकता ऐसे ही जब तक मायाबद्ध जीव है, वो माया के अंडर में है, तब तक वो ये नहीं मान सकता, समझ सकता कि काम का कार्य करते हुये, काम से परे हैं। क्रोध का कार्य करते हुये क्रोध से परे हैं। करोड़ों वर्ष राज्य करते हुये भी ध्रुव, प्रहलाद लोभ से परे हैं, मायातीत हैं। ये योगमाया का कार्य होता है।
०० प्रवचनकर्ता ::: जगदगुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज०० सन्दर्भ ::: जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज साहित्य०० सर्वाधिकार सुरक्षित ::: राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली के आधीन। - वास्तु में घर, कार्यस्थल हर जगह पर निर्माण और सामान रखने से संबंधित महत्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए गए हैं। वास्तु के अनुसार घर में किसी भी चीज का निर्माण करते समय दिशाओं का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है अन्यथा आपको समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह से सीढिय़ों को तरक्की से जोड़कर देखा जाता है। वास्तु के अनुसार यदि सीढिय़ों की दिशा सही नहीं है तो व्यापार में नुकसान, आर्थिक तंगी और तरक्की में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। गलत तरह और गलत दिशा में बनी हुआ सीढिय़ों का बुरा प्रभाव घर के मुखिया पर पड़ता है। सीढिय़ों का निर्माण यदि वास्तु की बातों को ध्यान में रखकर किया जाए तो तरक्की और आर्थिक समृद्धि पाई जा सकती है।सीढिय़ां बनाने की सही दिशावास्तु के अनुसार घर में सीढिय़ां हमेशा दक्षिण, पश्चिम या नैऋत्य कोण में बनाना चाहिए। वास्तु के अनुसार सीढिय़ों का निर्माण करने के लिए यह दिशाएं बहुत अच्छी रहती है।इस दिशा में बनी सीढिय़ां बन सकती है तरक्की में बाधकवास्तु में सीढिय़ों के निर्माण के लिए उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण को बिलकुल भी उचित नहीं माना गया है। घर के ईशान कोण में सीढिय़ां भूलकर भी नहीं बनानी चाहिए। इस दिशा में सीढिय़ों का निर्माण होने से वास्तु दोष लगता है जिसके कारण आर्थिक तंगी, नौकरी और व्यवसाय में हानि का सामना करना पड़ सकता है और उन्नति में बाधाएं आती हैं।इस तरह करें सीढिय़ों का वास्तु दोष दूरसीढ़ी में यदि किसी प्रकार का दोष है तो पिरामिड या फिर सीढिय़ां ईशान, उत्तर दिशा में बनी हुई हैं तो पिरामिड के द्वारा उसे संतुलित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए वास्तु विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लेनी चाहिए।सीढिय़ां बनवाते समय रखें इन बातों का ध्यानसीढिय़ां बनवाते समय ध्यान रखें कि वे हमेशा विषम संख्या यानि 2,7,9,11 आदि इस तरह से होनी चाहिए।आप सीढिय़ों का निर्माण करवा रहे हैं तो एक सीढ़ी से दूसरी के बीच नौ इंच का अंतर होना बहुत शुभ रहता है। सीढिय़ों का घुमाव हमेशा दक्षिणावर्ती यानि बाएं से दाएं ओर को होना चाहिए।
- ज्योतिषशास्त्र में बारह राशियों और नवग्रहों को विशेष महत्व है। वहीं नवग्रहों में प्रत्येक ग्रह का अपना महत्व है, लेकिन इन सभी ग्रहों में सूर्य का विशेष महत्व है और उसे ग्रहों के राजा या पिता कहा गया है। सूर्य को आत्मा कारक माना गया है। जिस जातक की कुंडली में सूर्य की अच्छी स्थिति होती है वे लोग आत्मविश्वास से भरपूर होते है। वहीं सूर्य की शुभ प्रभाव होने पर जात का भाग्य हमेशा चमकता रहता है। सूर्य को य़श प्रदान करने वाला भी कहा गया है इसलिए जिस जातक की कुंडली में सूर्य अच्छी स्थिति में होता है इसे राजनीति और सरकारी विभागों में यश, मान- सम्मान और उच्च पद प्राप्त होता है। वहीं जिनकी कुंडली में सूर्य की दशा चल रही होती है, उन जातकों में आत्मविश्वास की कमी बनी रहती है और उन्हें अपयश और आक्षेपों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ज्योतिष के अनुसार कमजोर सूर्य को मजबूत बनाने के लिए सूर्य मंत्र सबसे प्रबल उपाय है। इसकी नियमित पूजा करने से जीवन में नये आयाम प्राप्त हो सकते हैं।सूर्य यंत्र लाभसूर्य यंत्र के प्रभाव से जातक को कभी भी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता है।-सूर्य यंत्र को स्थापित करने से सरकारी कामकाज, नौकरी और व्यापार में भी विशेष लाभ प्राप्त होता है।-वहीं घर के पूजा स्थल में इस यंत्र को स्थापित करने से कोर्ट-कचहरी में चल रहे मामलों में जीत हासिल होती है।-जिन व्यक्तियों को सिरदर्द, बुखार, हृदय संबंधी समस्या और आंखों से जुड़ी समस्या आदि होती है उन्हें सूर्य यंत्र का पेंडेट धारण करना चाहिए।-जिन जातकों की अपने पिता से नहीं बनती है उन्हें सूर्य यंत्र को अपने घर में स्थापित करना चाहिए।-जिन जातकों को अपयश या अक्षेपों का सामना करना पड़ता है तो उनसे बचने के लिए उन्हें सूर्य यंत्र पेडेंट पहनना चाहिए।-यदि किसी की कुंडली में सूर्य खराब स्थिति में है तो बाकी सभी ग्रह भी अपन पूर्ण प्रभाव नहीं दिखा पाते हैं। ऐसे में सूर्य यंत्र लाभ प्रदान करता है।-इस यंत्र की मदद से आप अपने बॉस या उच्च अधिकारियों के साथ मधुर संबंध बनाने में सफल रहते हैं।-यदि आपको अत्यधिक गुस्सा आता है तो आपको सूर्य यंत्र पेडेंट अवश्य धारण करना चाहिए।-ध्यान रखने योग्य बातेंसूर्य यंत्र - को स्थापित करते वक्त इसके शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा जैसे महत्वपूर्ण चरण सम्मिलित होने चाहिए। प्राण प्रतिष्ठा करवाए बिना सूर्य यंत्र विशेष लाभ प्रदान नहीं करता है। इसलिए इस यंत्र को स्थापित करने से पहले सुनिश्चित करें कि यह विधिवत बनाया गया हो और इसकी प्राण प्रतिष्ठा हुई हो। सूर्य यंत्र खरीदने के पश्चात किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह लेकर उसे घर की सही दिशा में स्थापित करना चाहिए। अभ्यस्त और सक्रिय सूर्य यंत्र को रविवार के दिन स्थापित करना चाहिए।स्थापना विधिसूर्य यंत्र को स्थापित करने के लिए सबसे पहले प्रातकाल उठकर स्नानादि के बाद इस यंत्र को सामने रखकर 11 या 21 बार सूर्य के बीज मंत्र "? ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:" का जाप करें। तत्पश्चात यंत्र पर गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करें और सूर्यदेव से हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि वह अधिक से अधिक शुभ फल प्रदान करें। सूर्य यंत्र स्थापित करने के पश्चात इसे नियमित रूप से धोकर इसकी पूजा करें ताकि इसका प्रभाव कम ना हो। यदि आप इस यंत्र को बटुए या गले में धारण करते हैं तो स्नानादि के बाद अपने हाथ में यंत्र को लेकर उपरोक्त विधिपूर्वक इसका पूजन करें।सूर्य यंत्र मंत्र - ""ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:":"



























