मेरा और तुम्हारा मन
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
फोन-9424132359
मौन अधर की बातें पढ़ता, सुन लेता है क्रंदन।
प्रीति-डोर में बँधा हुआ यह, मेरा और तुम्हारा मन।।
दीप-ज्योति सम अपना नाता, दूर करें मिल अँधियारा।
मलय-गंध ज्यों घुले पवन में, पावन है साथ हमारा।
दरस-परस पाकर प्रियता की, तन-मन होता मधुबन।।
प्रीति -डोर में बँधा हुआ यह, मेरा और तुम्हारा मन।।
नैन देखते सपन सुहाने, आनंदित भावी पल के।
मेरे मन में उपजी पीड़ा , तेरी आँखों में छलके।
तृषित हृदय की शुष्क धरा पर, बरसा है सुख का सावन ।।
प्रीति -डोर में बँधा हुआ यह, मेरा और तुम्हारा मन।।
जाति-वर्ग की छोड़ केंचुली, नया जन्म हमने पाया।
कलुष-कपट की दुनिया छोड़ी, प्रेम-मार्ग को अपनाया।
अग्नि-परीक्षा जग की देकर, दमका मन जैसे कुंदन ।।
प्रीति -डोर में बँधा हुआ यह, मेरा और तुम्हारा मन।।
ओस-बूँद ठहरी पातों पर, क्षणभंगुर जीवन पाए।
ठहर सके पा कड़ी चुनौती, बस प्रेम वही कहलाए।
घिस-घिस पाहन शिव हो जाए, माँजें यूँ अपना जीवन।।
प्रीति -डोर में बँधा हुआ यह, मेरा और तुम्हारा मन।।



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