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नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हर साल बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम से होता है। गणतंत्र दिवस समारोह के जश्न की शुरुआत जहां परेड से होती है वहीं समापन बीटिंग द रिट्रीट के बाद होता है। इसेे गणतंत्र दिवस के ठीक तीन बाद आयोजित किया जाता है। इस कार्यक्रम में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बैंड पारंपरिक धुन के साथ मार्च करते हैं। यह सेना की बैरक वापसी का प्रतीक है। हर साल 29 जनवरी की शाम यानी गणतंत्र के तीसरे दिन बीटिंग रिट्रीट का आयोजन होता है।
यह कार्यक्रम राष्ट्रपति भवन रायसीना हिल्स में किया जाता है, जिसके मुख्य अतिथि राष्ट्रपति होते हैं। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है। इसमें तीन सेनाओं के बैंड देश के राष्ट्रपति के सामने बैंड बजाते हैं। इस दौरान ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। इसके अलावा ड्रमर्स की ओर से एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गांधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों की ओर से चाइम्स बजाई जाती हैं, जो काफी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्य बनता है।यह कार्यक्रम राष्ट्रपति भवन और संसद के पास विजय चौक पर आयोजित किया जाता है। बैंड वादन के बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्टर राष्ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। इसका मतलब ये होता है कि 26 जनवरी का समारोह पूरा हो गया है और बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहां से अच्छा बजाते हैं। शाम 6 बजे तीनों भारतीय सेनाओं के बैंड धुन बजाते हैं और राष्ट्रीय ध्वज को उतार लिया जाता है। इसके साथ ही राष्ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता है।1950 में भारत के गणतंत्र बनने के बाद बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम को अब तक दो बार रद्द किया गया था। 27 जनवरी 2009 को भारत के 8वें राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमण का लंबी बीमारी के बाद निधन हो जाने के कारण बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम रद्द कर दिया गया था। इससे पहले 26 जनवरी 2001 को गुजरात में आए भूकंप के कारण बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया था।--- -
नई दिल्ली: गूगल अपने टेक्नोलॉजी को दिन ब दिन और बेहतर करने की कोशिश में लगा हुआ है. हाल ही में कैंसर जैसे घातक बीमारी की सटीक पहचान से सुर्खियों में आने वाले गूगल अब एक और तकनीक लाने की तैयारी में जुटा है. कंपनी ने दावा किया है कि मौसम को लेकर आपको 6 घंटे पहले बिलकुल सटीक जानकारी दे दिया जाएगा. इसके लिए अब तक सभी शोध बेहद आशाजनक साबित हुए हैं. हाल ही में गूगल ने इस सप्ताह के एक ब्लॉग पोस्ट में नए शोध को साझा किया. इस रिसर्च के अनुसार गूगल की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गूगल मशीन लर्निंग की मदद से मौसम का पूर्वानुमान लगाने में बेहद सटीक साबित हो रहा है. शोधकर्ताओ ने बताया कि किस तरह उन्होंने कुछ ही मिनटों की कैलकुलेशन के बाद ही 6 घंटे में होने वाली बारिश की आशंका जताई थी. जो बाद में बेहद ही सटीक और सही निकली.
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साल का पहला चंद्रग्रहण आज
रायपुर। वर्ष 2020 का पहला चंद्र ग्रहण धार्मिक दृष्टि से बेअसर रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अधिकांश पंचांगों ने इसका उल्लेख नहीं किया है। जिसमें उल्लेख किया गया, उसमें इसे धार्मिक दृष्टि से महत्वहीन बताया गया है। इसके चलते चंद्रग्रहण के सूतक के साथ यम-निमय लागू नहीं होंगे। यह देशभर में नजर आएगा। चंद्र ग्रहण 10 जनवरी शुक्रवार को होगा। रात 10:38 पर इसका स्पर्श काल, मध्य काल 12:40 और मोक्ष रात 2:42 बजे होगा। रात 12.40 बजे ग्रहण चरम पर रहेगा, जिसमें चंद्रमा का 85 प्रतिशत भाग उप छाया से ढंक जाएगा।
काली मंदिर खजराना के ज्योतिष विद पं. शिवप्रसाद तिवारी ने बताया कि ग्रहण यूनाइटेड स्टेट, ब्राजील, अर्जेंटीना को छोड़कर भारत सहित दुनियाभर में दिखाई देगा। ज्योतिष विद विजय अड़ीचवाल ने बताया कि इस चंद्र ग्रहण का उल्लेख अधिकांश पंचांगों में नहीं किया गया है। धार्मिक दृष्टि से यह महत्वहीन है।
ज्योतिषियों के अनुसार मंद पडऩे की क्रिया को मान्ध कहा जाता है। मान्ध चंद्र ग्रहण होने से यह चंद्रमा को धुंधला ही कर पाएगा और चंद्रमा की कला में कोई कमी नहीं आएगी। इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी की उपछाया से होकर गुजरेगा। साथ ही यह एक खगोलीय घटना के रूप में ही मान्य रहेगा। इस ग्रहण में चंद्रमा की कला कम नहीं होने से दान-पुण्य और सूतक की आवश्यकता नहीं रहेगी। ग्रहण से पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद प्रदूषण की मात्रा का पता लगाया जाएगा।
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नील नदी अफ्रीका की ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे लंबी नदी है। यह नदी मिस्र और सूडान के निवासियों को एक प्रकार से जीवन प्रदान करती है। यह 6 हजार 648 किलोमीटर लंबी है। यह तांदानीका के पहाड़ों से निकल कर अफ्रीका से होती हुई भूमध्य सागर में गिरती है।
मिस्र में जमीन की उर्वरता इस नदी में हर साल आने वाली बाढ़ पर निर्भर करती है। जमीन की इसी उपजाऊपन के कारण मिस्र के प्राचीन निवासी समृद्ध थे और इसी कारण वे हर संकट के बाद भी जीवित रह सके। उनका प्राचीन धर्म भी नील की ही देन था और उस समय वे मिस्र निवासियों के जीवन का केन्द्र यही नील नदी थी।जहां से यह नदी शुरु होती है, वहां तीन प्रसिद्ध विशाल झीलें हैं, - विक्टोरिया, एलबर्ट और एडवर्ड । ये भूमध्य रेखा के दक्षिण में उष्ण प्रदेश में स्थित हैं। यहां अधिकांश बरसात सर्दियों में होती है। बरसात का पानी इन विशाल झीलों में भर जाता है और यही पानी पूरे साल इस नदी में बहता रहता है। इस क्षेत्र में बाढ़ नीली नील और अटबरा नदियोंं के कारण आती है। ये नदियां गर्मी की बारिशों का पानी लेकर इथियोपिया के पहाड़ों से इतनी तेज गति से उतरती हैं कि बहुत सारी मिट्टïी और पौधों की खाद भी अपने साथ घसीट लाती है। यही खाद और मिट्टïी नील के किनारों पर फैल जाती है और वह भूमि जिसे रेगिस्तान रहना चाहिए था, वह मरुद्यान में बदल जाती है। नील नदी के महत्व का अनुमान इसी बात से लगाया जाता है कि पूरे मिस्र की 95 फीसदी आबादी इसी नदी के किनारे बसी हुई है और यह क्षेत्र पूरे देश का तीसवां हिस्सा है।ऩील नदी का प्रमुख स्रोत कांगों है, जहां से होती हुई कंगेरा नदी विक्टोरिया झील तक बहती है। सेबत और अन्य नदियां नील में ही गिरती हैं। इस तरह ये इसके विस्तार को बढ़ाती हैं। इस जगह से आगे इस नदी को सफेद नील के नाम से पुकारा जाता है।नीली नदी इस नदी की सबसे लंबी सहायक नदी है। इसका स्रोत इथियोपिया की टाना झील है। खारतूम में नीली और सफेद नील मिल जाती ैऔर यहां से लेकर समद्र तक छह ऐसे जलप्रपात हैं, जिनमें कोई जहाज या नाव नहीं चल सकती। सूडान में जलप्रपातों से भारी मात्रा मेें बिजली पैदा की जाती है। इन स्थानों के चारों ओर पानी को रोककर बहाया जाता है। नील नदी पर दो बहुत बड़े बांध बने हुए हैं। ये बांध और जलप्रपात बिजली उत्पादन करके मिस्र की अधिकांश बिजली की जरूरतों को पूरा करते हैं। - धुंडिराज गोविन्द फालके उपाख्य दादासाहब फालके (जन्म 30 अप्रैल 1870 - निधन 16 फऱवरी 1944) को भारतीय फिल्म उद्योग का पितामह कहा जाता है।दादा साहब फालके, सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से प्रशिक्षित सृजनशील कलाकार थे। वह मंच के अनुभवी अभिनेता थ और शौकिया जादूगर थे। कला भवन बड़ौदा से फोटोग्राफी का एक पाठ्यक्रम भी किया था। उन्होंने फोटो केमिकल प्रिंटिंग की प्रक्रिया में भी प्रयोग किये थे। उन्होंने क्रिसमस के अवसर पर 'ईसामसीहÓ पर बनी एक फिल्म देखी। फिल्म देखने के दौरान ही फालके ने निर्णय कर लिया कि उनकी जिंदगी का मकसद फिल्मकार बनना है। उन्हें लगा कि रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक महाकाव्यों से फिल्मों के लिए अच्छी कहानियां मिलेंगी। उनके पास सभी तरह का हुनर था। वह नए-नए प्रयोग करते थे। अत: प्रशिक्षण का लाभ उठाकर और अपनी स्वभावगत प्रकृति के चलते प्रथम भारतीय चलचित्र बनाने का असंभव कार्य करनेवाले वह पहले व्यक्ति बने।उन्होंने 5 पौंड में एक सस्ता कैमरा खरीदा और शहर के सभी सिनेमाघरों में जाकर फिल्मों का अध्ययन और विश्लेषण किया। फिर दिन में 20 घंटे लगकर प्रयोग किये। ऐसे उन्माद से काम करने का प्रभाव उनकी सेहत पर पड़ा। उनकी एक आंख जाती रही। उस समय उनकी पत्नी सरस्वती बाई ने उनका साथ दिया। सामाजिक निष्कासन और सामाजिक गुस्से को चुनौती देते हुए उन्होंने अपने जेवर गिरवी रख दिए। उनके अपने मित्र ही उनके पहले आलोचक थे। अत: अपनी कार्यकुशलता को सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक बर्तन में मटर बोई। फिर इसके बढऩे की प्रक्रिया को एक समय में एक फ्रेम खींचकर साधारण कैमरे से उतारा। इसके लिए उन्होंने टाइमैप्स फोटोग्राफी की तकनीक इस्तेमाल की। इस तरह से बनी अपनी पत्नी की जीवन बीमा पॉलिसी गिरवी रखकर, ऊंची ब्याज दर पर ऋण प्राप्त करने में वह सफल रहे।फरवरी 1912 में, फिल्म प्रोडक्शन में एक क्रैश-कोर्स करने के लिए वह इंग्लैण्ड गए और एक सप्ताह तक सेसिल हेपवर्थ के अधीन काम सीखा। कैबाउर्न ने विलियमसन कैमरा, एक फिल्म परफोरेटर, प्रोसेसिंग और प्रिंटिंग मशीन जैसे यंत्रों तथा कच्चा माल का चुनाव करने में मदद की। उन्होंने 'राजा हरिशचंद्रÓ बनायी। चूंकि उस दौर में उनके सामने कोई और मानक नहीं थे, अत: सब कामचलाऊ व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी पड़ी। अभिनय करना सिखाना पड़ा, दृश्य लिखने पड़े, फोटोग्राफी करनी पड़ी और फिल्म प्रोजेक्शन के काम भी करने पड़े। महिला कलाकार उपलब्ध न होने के कारण उनकी सभी नायिकाएं पुरुष कलाकार थे । होटल का एक पुरुष रसोइया सालुंके ने भारतीय फिल्म की पहली नायिका की भूमिका की। शुरू में शूटिंग दादर के एक स्टूडियो में सेट बनाकर की गई। सभी शूटिंग दिन की रोशनी में की गई क्योंकि वह एक्सपोज्ड फुटेज को रात में अपनी पत्नी की सहायता से डेवलप करते थे और प्रिंट करते थे । छह माह में 3700 फीट की लंबी फिल्म तैयार हुई। 21 अप्रैल 1913 को ओलम्पिया सिनेमा हॉल में यह रिलीज की गई। यह फिल्म जबरदस्त हिट रही।दादा साहब फाल्के पुरस्कार सबसे पहले किसे मिलादादा साहब फाल्के के ही सम्मान में दादा साहब फाल्के पुरस्कार हर साल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी किसी हस्ती को भारतीय सिनेमा में उसके आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है। इस पुरस्कार का प्रारम्भ दादा साहब फाल्के के जन्म शताब्दि-वर्ष 1969 से हुआ। उस वर्ष राष्ट्रीय फि़ल्म पुरस्कार के लिए आयोजित 17वें समारोह में पहली बार यह सम्मान अभिनेत्री देविका रानी को प्रदान किया गया। तब से अब तक यह पुरस्कार वर्ष के अंत में अथवा अगले वर्ष के आरम्भ में राष्ट्रीय फि़ल्म पुरस्कार के लिए आयोजित समारोह में प्रदान किया जाता है। वर्तमान में इस पुरस्कार में 10 लाख रुपये और स्वर्ण कमल दिये जाते हैं। (साभार- विकिपीडिया)
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11 नवंबर को होने जा रही है दुर्लभ खगोलीय घटना
नई दिल्ली। किसी शायर ने लिखा है- तुमने अपने चेहरे पर जो ये तिल सजा रखा है, अब पता चला हुस्न पर पहरा बिठा रखा है। तिल किसी की भी खूबसूरती पर चार चांद लगा देता है। मगर, दुनिया को जीवन देने वाले सूर्य पर किसी की नजर न लगे, इस वजह से हर सौ साल में 13 बार बुध ग्रह सूर्य के सामने से निकलते हुए उसके चेहरे का तिल बन जाता है। यह दुर्लभ घटना इस साल 11 नवंबर को होने जा रही है, जिसे देखने के लिए दुनियाभर के खगोलविद तैयारियां कर रहे हैं।
अगली बार यह घटना साल 2032 में ही देखने को मिलेगी। बुध का गोचर इसलिए होता है क्योंकि यह हमारे सौर मंडल के दो ग्रहों में से एकलौता है, जो धरती की तुलना में सूर्य के ज्यादा करीब चक्कर लगाता है। ऐसा करने वाला दूसरा ग्रह शुक्र है, जिसे भारतीय ज्योतिष में भोग-विलास, पत्नी, भौतिक सुखों का कारक माना जाता है। बुध की कई कक्षाओं में धरती से देखने पर बुध या तो सूर्य के ऊपर से या नीचे से गुजरते हुए दिखता है।
कभी-कभी धरती और बुध की कक्षाएं इस तरह से सामने आ जाती हैं कि बुध धरती और सूर्य के बीच से होता हुआ गुजरता है। जब ऐसा होता है, तो धरती से देखने पर बुध ग्रह तिल की तरह एक छोटे बिंदु के जैसा दिखता है। इसका व्यास सूर्य के व्यास की तुलना में 0.5 फीसद होता है।
नासा की ऐसी सलाह
नासा ने कहा कि धरती पर हमारे नजरिये से हम सिर्फ बुध और शुक्र को सूर्य के सामने से गुजरते हुए देख सकते हैं लिहाजा यह दुर्लभ घटना है, जिसे कोई भी देखने से चूकना नहीं चाहेगा। सही सुरक्षा उपकरणों के साथ धरती के किसी भी हिस्से पर मौजूद लोग सूर्य के आगे से एक छोटे से बिंदु को धीरे-धीरे गुजरते हुए देख सकेंगे। नासा ने इसके साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि सूर्य को नग्न आंखों से देखने पर यह टेलिस्कोप में बिना सुरक्षा व्यवस्था किए देखने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। हो सकता है कि इसकी वजह से किसी की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जाए। लिहाजा, सोलर फिल्टर का इस्तेमाल करना न भूलें।
पर्याप्त समय तक दिखेगा नजारा
यह घटना सोमवार को 11.35 मिनट जीएमटी पर शुरू होगी और करीब 5.5 घंटे तक चलेगी। लिहाजा, इसे देखने के लिए आपके पास पर्याप्त समय होगा। हालांकि, धरती के कुछ हिस्सों जैसे अमेरिका के पश्चिमी तटों पर मौजूद लोग इसे तब तक नहीं देख सकेंगे, जब तक कि सूर्य आकाश में दिखने नहीं लगेगा। शुक्र के गोचर से उलट बुध को ऐसी स्थिति में देखने के लिए आपको सन फिल्टर वाले टेलिस्कोप की जरूरत होगी क्योंकि यह बहुत छोटा ग्रह है। बताते चलें कि शुक्र सहित अन्य ग्रह पर्याप्त बड़े हैं कि उन्हें नग्न आंखों से देखा जा सके। -
नई दिल्ली। आज अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस है। उपराष्ट्रपति एम.वेंकैया नायडू ने विश्व समुदाय से महिलाओं को सशक्त बनाने में सर्वोच्च प्राथमिकता देने की अपील की है। उन्होंने ट्वीट संदेश में इसे वैश्विक एजेंडा बनाने और अधिक से अधिक महिलाओं को उद्यमिता तथा आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध किया। श्री नायडू ने कहा कि महिलाओं का सशक्तीकरण समग्र, समान और सतत विकास का केन्द्र है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि ग्रामीण उद्यमिता के लिए इको-प्रणाली शुरू करने के अलावा महिलाओं को रोजगार कौशल प्रदान करने की तत्काल आवश्यकता है।
कब से मनाया जा रहा है अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 अक्टूबर 2008 को पहला अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस मनाया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस को मनाकर ग्रामीण महिलाओं की भूमिका को सम्मानित करने का निर्णय लिया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस दिवस को मनाने की घोषणा 18 दिसंबर 2007 को की गई थी। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं और लड़कियां बहु-आयामी गरीबी से पीडि़त हैं।
अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस का मुख्य उद्देश्य कृषि विकास, ग्रामीण विकास, खाद्य सुरक्षा तथा ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में ग्रामीण महिलाओं के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करना है। इसके अलावा ग्रामीण महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका और उनके योगदान को सम्मानित करना भी इसका उद्देश्य है।
इस साल अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस 2019 का विषय है- Rural Women and Girls Building Climate Resilience । संयुक्त राष्ट्र (यूएन) महासचिव एंटोनियो गुतेरस ने ग्रामीण महिलाओं तथा लड़कियों के अधिकारों की रक्षा की अपील की है। उन्होंने सभी देशों के लिए समृद्ध, न्यायसंगत तथा शांतिपूर्ण भविष्य बनाने हेतु ग्रामीण महिलाओं और लड़कियों के सशक्तीकरण को जरूरी बताया है।
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कृष्णवट भारत के कुछ भागों में पाए जाने वाले एक विशेष प्रकार के बरगद के वृक्ष को कहा जाता है। इसके पत्ते मुड़े हुए होते हैं। ये देखने में दोने के आकार के होते हैं। कृष्णवट के पत्तों में दूध, दही, मक्खन आदि खाद्य पदार्थों का आसानी से सेवन किया जा सकता है।
इस वृक्ष के सम्बन्ध में यह मान्यता है कि भगवान कृष्ण बाल्यावस्था से ही गायों को चराने के लिए वन में जाया करते थे। जब गाय चर रही होती थीं, तब कृष्ण किसी वृक्ष पर बैठकर मधुर बांसुरी बजाया करते थे। बांसुरी की आवाज सुनते ही गोपियां सभी कार्य छोड़ कर उनके पास दौड़ी चली आती थीं। वे अपने साथ दही-मक्खन आदि भी ले आती थीं। कृष्ण जिस स्थान पर बैठकर बांसुरी बजाया करते थे, उसके पास ही बरगद का एक पेड़ था। वह बरगद के पत्ते तोड़ते और दोने बनाते और दही-मक्खन आदि रखकर गोपियों के साथ खाते।
कृष्ण को बरगद के पत्तों से दोने बनाने में बहुत समय लगता था और गोपियां भी बेचैनी अनुभव करने लगती थीं। कृष्ण गोपियों के मन की बात सच समझ गये। उन्होंने तुरंत ही अपनी माया से वृक्ष के सभी पत्तों को दोनों के आकार वाले पत्तों में बदल दिया। इस प्रकार बरगद की एक नई प्रजाति का जन्म हुआ। वर्तमान समय में भी दोने के आकार के पत्तों वाले बरगद के वृक्ष पाये जाते हैं। इनका आकार सामान्य बरगद से कुछ छोटा होता है। पश्चिम बंगाल में कृष्णवट कहीं-कहीं देखने को मिल जाता है। उत्तराखंड में देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान में भी कृष्णवट के कुछ वृक्ष हैं।
कृष्णवट पर कुछ विदेशी वनस्पति शास्त्रियों ने शोध भी किया है। 1901 में कैंडोल ने इसका अध्ययन करने के बाद इसे सामान्य बरगद से अलग एक विशिष्ट जाति का वृक्ष माना और इसे कृष्ण के नाम पर वैज्ञानिक नाम दिया- फ़ाइकस कृष्णीसी द कंदोल , किंतु विख्यात भारतीय वैज्ञानिक के. विश्वास इसका विरोध करते हैं। उनका मत है कि कृष्णवट एक अलग जाति का वृक्ष नहीं है। यह बरगद की ही एक प्रजाति है। -
आज भारत में महिलाओं का चिकित्सा के क्षेत्र में काम करना आम बात है,लेकिन आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले जब महिलाओं के लिए शिक्षा भी दूभर थी, ऐसे में भारत की एक महिला ने डॉक्टर की डिग्री हासिल कर महिलाओं के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत की। ये थी आनंदी गोपाल जोशी, जो भारत की पहली महिला चिकित्सक थी।
31 मार्च 1865 को उनका जन्म पुणे में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनका विवाह नौ साल की अल्पायु में उनसे करीब 20 साल बड़े गोपालराव से हो गया था। जब 14 साल की उम्र में वे मां बनीं और उनकी एकमात्र संतान की मृत्यु 10 दिनों में ही गई। इस हादसे से उन्हें बहुत बड़ा आघात लगा। अपनी संतान को खो देने के बाद उन्होंने प्रण किया कि वह एक दिन डॉक्टर बनेंगी और ऐसी असमय मौत को रोकने का प्रयास करेंगी। उनके पति गोपालराव ने भी उनको भरपूर सहयोग दिया ।
मराठी उपन्यासकार श्री. ज. जोशी ने अपने उपन्यास आनंदी गोपाल में लिखा है- गोपाल की जि़द थी कि वे अपनी पत्नी को ज़्यादा-से-ज़्यादा पढ़ाएं।ं उन्होंने ऐसा करते पुरातनपंथी ब्राह्मण-समाज का तिरस्कार झेला, पुरुषों के लिए भी निषिद्ध, सात समंदर पार अपनी पत्नी को अमेरिका भेजकर उसे पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनाने का इतिहास रचा।
उपन्यास में आगे लिखा है, गोपालराव की आनंदी से शादी की शर्त ही यही थी कि वे पढ़ाई करेंगी। आनंदी के मायके वाले भी उनकी पढ़ाई के खिलाफ थे। शादी के वक्त आनंदी को अक्षर ज्ञान भी नहीं था. गोपाल ने उन्हें क,ख,ग से पढ़ाया।
नन्ही सी आनंदी को पढ़ाई से खास लगाव नहीं था। उस वक्त समाज में मिथक था कि जो औरत पढ़ती है उसका पति मर जाता है.। आनंदी को गोपाल डांट-डपट कर पढ़ाते। एक दफा उन्होंने आनंदी को डांटते हुए कहा, तुम नहीं पढ़ोगी तो मैं अपना मज़हब बदलकर क्रिस्तानी बन जाऊंगा। अक्षर ज्ञान के बाद गोपाल, आनंदी के लिए अगली कक्षा की किताबें लाए। फिर वे कुछ दिन के लिए शहर से बाहर चले गए। जब वापस लौटे तो देखा कि आनंदी घर में खेल रही थी। वे गुस्से से बोले कि तुम पढ़ नहीं रही हो। आनंदी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, जितनी किताबें थी उन्होंने सभी पढ़ लिया है।
उपन्यास आनंदी गोपालÓ मराठी साहित्य में क्लासिकÓ माना जाता है और इसका अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है। आनंदीबाई के जीवन पर कैरोलिन वेलस ने भी 1888 में बायोग्राफी लिखी। इस उपन्यास पर आधारित आनंदी गोपाल नाम से सीरियल भी बना और उसका प्रसारण दूरदर्शन पर किया गया था।
गोपालराव ने आनंदीबाई को डॉक्टरी का अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया। 1880 में उन्होंने एक प्रसिद्ध अमेरिकी मिशनरी रॉयल वाइल्डर को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने संयुक्त राज्य में औषधि अध्ययन में आनंदीबाई की रूचि के बारे में बताया और खुद के लिए अमेरिका में एक उपयुक्त पद के बारे में पूछताछ किया। वाइल्डर ने उनके प्रिंसटन की मिशनरी समीक्षा में पत्राचार प्रकाशित किया। थॉडिसीया कार्पेन्टर, जो रोज़ेल, न्यू जर्सी की निवासी थीं, ने अपने दंत चिकित्सक के लिए इंतजार करते वक्त यह पढ़ा। औषधि अध्ययन करने के लिए आनंदीबाई की इच्छा और पति गोपालराव के समर्थन से प्रभावित होकर उन्होंने अमेरिका में आनंदीबाई के लिए आवास की पेशकश की।
जब जोशी युगल कलकत्ता में थे, आनंदीबाई का स्वास्थ्य कमजोर हो रहा था। वह कमजोरी, निरंतर सिरदर्द, कभी-कभी बुखार और कभी-कभी सांस की वजह से पीडि़त थीं। थिओडिकिया ने बिना परिणाम के, अमेरिका से उसकी दवाएं भेजीं। वर्ष 1883 में गोपालराव को सेरामपुर में स्थानांतरित कर दिया गया था, और उन्होंने कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद मेडिकल अध्ययन के लिए आनंदीबाई को अमेरिका भेजने का फैसला किया और गोपालराव ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अन्य महिलाओं के लिए उदाहरण बनने के लिए कहा।
थॉर्बोर्न नामक एक चिकित्सक जोड़े ने आनंदीबाई को पेंसिल्वेनिया के महिला चिकित्सा महाविद्यालय में आवेदन का सुझाव दिया। पश्चिम में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए आनंदीबाई की योजनाओं के बारे में जानने पर, रूढि़वादी भारतीय समाज ने उन्हें बहुत दृढ़ता से दबा दिया।
आनंदीबाई ने सेरमपुर कॉलेज (पश्चिम बंगाल) हॉल में समुदाय को संबोधित किया, जिसमें अमेरिका जाने और मेडिकल डिग्री प्राप्त करने के फैसले को समझाया। उन्होंने भारत में महिला डॉक्टरों की जरूरत पर बल दिया और भारत में महिलाओं के लिए एक मेडिकल कॉलेज खोलने के अपने लक्ष्य के बारे में बात की (आनंदीबाई मेडिकल कॉलेज)। उनके भाषण ने प्रचार प्राप्त किया, और पूरे भारत में वित्तीय योगदान शुरू हो गए।
आनंदीबाई मेडिकल क्षेत्र में शिक्षा पाने के लिए अमेरिका गईं और साल 1886 में (19 साल की उम्र में) उन्होंने एमडी डिग्री हासिल कर ली। वे यह डिग्री पाने वाली और पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनीं। डिग्री लेने के बाद आनंदीबाई वापस देश लौटीं, लेकिन उस दौरान वे टीबी की शिकार हो गईं। दिन पर दिन सेहत में गिरावट के चलते 26 फरवरी 1887 को 22 वर्ष की कम उम्र में ही आनंदी का निधन हो गया।
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सरस्वती नदी का ऋग्वेद की चौथे पुस्तक छोड़कर सभी पुस्तकों में कई बार उल्लेख किया गया है। केवल यही ऐसी नदी है जिसके लिए ऋग्वेद की छन्द संख्या 6.61,7.95 और 7.96 में पूरी तरह से समर्पित भजन दिए गए हैं। वैदिक काल में सरस्वती की बड़ी महिमा थी और इसे परम पवित्र नदी माना जाता था, क्योंकि इसके तट के पास रहकर तथा इसी नदी के पानी का सेवन करते हुए ऋषियों ने वेदों को रचा और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया।
इसी कारण सरस्वती को विद्या और ज्ञान की देवी के रुप में भी पूजा जाने लगा। ऋग्वेद के नदी सूक्त में सरस्वती का इस प्रकार उल्लेेख है कि इमं में गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परूष्ण्या असिक्न्या मरूद्वधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमया । सरस्वती ऋग्वेद में केवल नदी देवी के रूप में वर्णित है (इसकी वंदना तीन सम्पूर्ण तथा अनेक प्रकीर्ण मंत्रों में की गई है), किंतु ब्राह्मण ग्रथों में इसे वाणी की देवी या वाच् के रूप में देखा गया, क्योंकि तब तक यह लुप्त हो चुकी थी परन्तु इसकी महिमा लुप्त नहीं हुई और उत्तर वैदिक काल में सरस्वती को मुख्यत:, वाणी के अतिरिक्त बुद्धि या विद्या की अधिष्ठात्री देवी भी माना गया है और ब्रह्मा की पत्नी के रूप में इसकी वंदना के गीत गाए गए हंै। ऋग्वेद में सरस्वती को नदीतमा की उपाधि दी गयी है। उसकी एक शाखा 2.41.16 में इसे सर्वश्रेष्ठ मां,सर्वश्रेष्ठ नदी,सर्वश्रेष्ठ देवी कहकर संबोधित किया गया है। यही प्रशंसा ऋग्वेद के अन्य छंदों 6.61,8.81,7.96 और 10.17 में भी की गयी है। नवेद के श्लोक 7.9.52 तथा अन्य जैसे 8.21.18 में सरस्वती नदी को दूध और घी से परिपूर्ण बताया गया है। ऋग्वेद के श्लोक 3.33.1 मे इसे गाय की तरह पालन करने वाली बताया गया है। ऋग्वेद के श्लोक 7.36.6 में सरस्वती को सप्तसिंधु नदियों की जननी बताया गया है।
ऋग्वेद के बाद के वैदिक साहित्यों में सरस्वती नदी के विलुप्त होने का उल्लेेख आता हैं ,इसके अतिरिक्त सरस्वती नदी के उद्गम स्थल की प्लक्ष प्रस्रवन के रुप में पहचान की गई है जो कि यमुनोत्री के पास ही स्थित है। यजुर्वेदयजुर्वेद की वाजस्नेयी संहिता 34.11 में कहा गया है कि पांच नदियां अपने पूरे प्रवाह के साथ सरस्वती नदी में प्रविष्ट होती हैं, यह पांच नदियां पंजाब की सतलुज, रावी, व्यास, चेनाव और दृष्टावती हो सकती हैं ।
वाल्मीकि रामायण में भरत के केकय देश से अयोध्या आने के प्रसंग में सरस्वती और गंगा को पार करने का वर्णन है- सरस्वती च गंगा च युग्मेन प्रतिपद्य च, उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारूण्डं प्राविशद्वनम्म। सरस्वती नदी के तटवर्ती सभी तीर्थों का वर्णन महाभारत में शल्यपर्व के 35 वें से 54 वें अध्याय तक सविस्तार दिया गया है। इन स्थानों की यात्रा बलराम ने की थी। जिस स्थान पर मरूभूमि में सरस्वती लुप्त हो गई थी उसे विनशन कहते थे। महाभारत में तो सरस्वती नदी का उल्लेख कई बार किया गया है। सबसे पहले तो यह बताया गया है कि कई राजाओं ने इसके तट के समीप कई यज्ञ किए थे। वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समान्तर खुदाई में 5500 - 4000 वर्ष पुराने शहर मिले हंै जिनमें कालीबंगा और लोथल भी है यहां कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले हंै जो महाभारत में कहे तथ्य को प्रमाणित करती है। महाभारत में यह भी वर्णन आता है कि निषादों और मलेच्छों से द्वेष होने के कारण सरस्वती नदी ने इनके प्रदेशों मे जाना बंद कर दिया जो इसके सूखने की प्रथम अवस्था को दर्शाती है, साथ ही यह भी वर्णन मिलता है कि सरस्वती नदी मरुस्थल में विनाशन नामक स्थान पर लुप्त हो फिर पुन किसी स्थान पर प्रकट होती है। -
मूली कृषक सभ्यता के सबसे प्राचीन आविष्कारों में से एक है। 3000 वर्षो से भी पहले के चीनी इतिहास में इसका उल्लेख मिलता है। अत्यंत प्राचीन चीन और यूनानी व्यंजनों में इसका प्रयोग होता था और इसे भूख बढ़ाने वाली समझा जाता था। यूरोप के अनेक देशों में भोजन से पहले इसको परोसने परंपरा का उल्लेख मिलता है। मूली शब्द संस्कृत के मूल शब्द से बना है। आयुर्वेद में इसे मूलक नाम से, स्वास्थ्य का मूल (अत्यंत महत्वपूर्ण) बताया गया है।
मूली में प्रोटीन, कैल्शियम, गन्धक, आयोडीन तथा लौह तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। इसमें सोडियम, फॉस्फोरस, क्लोरीन तथा मैग्नीशियम भी होता है। मूली में विटामिन ए भी होता है। विटामिन बी और सी भी इससे प्राप्त होते हैं। मूली धरती के नीचे पौधे की जड़ होती हैं। धरती के ऊपर रहने वाले पत्ते भी पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इसी प्रकार मूली के पौधे में आने वाली फलियां मोगर भी समान रूप से उपयोगी और स्वास्थ्यवर्धक है। स्वास्थ्य तथा उपचार की दृष्टि से छोटी, पतली और चरपरी मूली ही उपयोगी है। ऐसी मूली त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) नाशक है। इसके विपरीत मोटी और पकी मूली त्रिदोष कारक मानी जाती है।
100 ग्राम मूली में अनुमानित निम्न तत्व हैं -प्रोटीन - 0.7 ग्राम, वसा - 0.1 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट - 3.4 ग्राम, कैल्शियम - 35 मि.ग्रा., फॉस्फोरस - 22 मि.ग्रा, लोह तत्व - 0.4 मि.ग्रा., केरोटीन- 3 मा.ग्रा., थायेसिन - 0.06 मि.ग्रा., रिवोफ्लेविन - 0.02 मि.ग्रा., नियासिन - 0.5 मि.ग्रा., विटामिन सी - 15 मि.ग्रा.।
अनेक छोटी बड़ी व्याधियां मूली से ठीक की जा सकती हैं। मूली का रंग सफेद है, लेकिन यह शरीर को लालिमा प्रदान करती है। भोजन के साथ या भोजन के बाद मूली खाना विशेष रूप से लाभदायक है। मूली और इसके पत्ते भोजन को ठीक प्रकार से पचाने में सहायता करते हैं। वैसे तो मूली के पराठें, रायता, तरकारी, आचार तथा भुजिया जैसे अनेक स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं,मगर सबसे अधिक लाभकारी होती है कच्ची मूली। भोजन के साथ प्रतिदिन एक मूली खा लेने से व्यक्ति अनेक बीमारियों से मुक्त रह सकता है।
मूली में फॉलिक एसिड, विटामिन सी और एंथोकाइनिन की भरमार होती है। ये तत्व शरीर को कैंसर से लडऩे में मदद करते हैं। यह माना जाता है कि मुंह, पेट, आंत और किडनी के कैंसर से लडऩे में यह बहुत सहायक होती है।
मूली खाने से शरीर की विषैली गैस (कार्बन डाई ऑक्साइड) का निष्कासन होता है तथा जीवनदायी ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है। मूली खाने से दांत मंसूड़े मजबूत होते हैं, हड्डियों में मजबूती आती है। थकान मिटाने और नींद लाने में भी मूली सहायक है।
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मौसम विभाग समय - समय पर मौसम के हिसाब से रेड, आरेंज और यलो अलर्ट जारी करता है। यह मौसम विभाग का लोगों को मौसम के बारे में सचेत करने का अपना तरीका है। इसके लिए विभाग कुछ चुनिंदा रंगों का इस्तेमाल करता है, जैसे कि रेड, आरेंज और यलो और ग्रीन अलर्ट। मौसम विभाग के अनुसार अलर्ट जारी करने के लिए रंगों का चुनाव कुछ एजेंसियों के साथ मिलकर किया जाता है।
भीषण गर्मी, सर्द लहर, मानसून या फिर चक्रवाती तूफान आदि की सूचना देने के लिए ही इस प्रकार के रंगों का इस्तेमाल लिया जाता है। जैसे- जैसे मौसम अपने चरम पर पहुंचता है, यानी तेज गर्मी, ठंड या फिर बारिश, वैसे - वैसे अलर्ट का रंग गहरा लाल हो जाता है। किसी चक्रवाती तूफान की भीषणता की सूचना भी इन्हीं रंगों के माध्यम से दी जाती है। जितना भीषण तूफान होगा, उसकी सूचना के लिए उतने ही गहरे लाल रंग का इस्तेमाल किया जाएगा।
आइये जाने इस रंगों के अलर्ट का क्या अर्थ है-
1. ग्रीन अलर्ट- यानी कहीं से कोई खतरा नहीं है।
2. यलो अलर्ट-इस रंग का अर्थ है कि खतरे से सचेत रहे। मौसम विभाग इस रंग का इस्तेमाल लोगों को सचेत करने के लिए करता है।
3. आरेंज अलर्ट- इस रंग का अर्थ है खतरा, तैयार रहें। जैसे- जैसे मौसम और खराब होता जाता है, तो यलो अलर्ट को आरेंज अलर्ट कर दिया जाता है। इसके माध्यम से लोगों को यहां- वहां नहीं जाने और सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
4. रेड अलर्ट- इस रंग का अर्थ है खतरनाक स्थिति। जब मौसम अपने खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है और भारी नुकसान की आशंका रहती है, तब मौसम विभाग रेड अलर्ट जारी करता है। -
कद्दू का नाम सुनते ही अधिकांश लोग नाक-मुंह बनाने लगाते हैं। लेकिन इस पीले से फल में ढेर सारे गुण भरे हैं। इसमें खूब रेशा यानी की फाइबर होता है जिससे पेट हमेशा साफ रहता है। यह फ्री रैडिकल से भी बचाता है।
प्राचीन काल से भारत में इसके उपयोग सब्जी और हलवे के रूप में किया जा रहा है। भारत में यह बहुतायक में उगाया जाता है। आहार विशेषज्ञ भी इसके गुणों के कारण लोगों को इसे खाने की सलाह दे रहे हैं। अब तो बाजार में इसके भुने हुए बीज भी मिलने लगे हैं, जो अलसी की तरह खाए जाते हैं। कद्दू के बीज भी आयरन, जिंक, पोटेशियम और मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं।
दरअसल कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है। कद्दू और इसके बीज में विटामिन सी और ई, आयरन, कैलशियम, मैग्नीशियम, फॉसफोरस, पोटैशियम, जिंक, प्रोटीन और फाइबर आदि होते हैं। इसमें श्वेतसार, कुकुर्बिटान नामक क्षाराभ, प्रोटीन-मायोसिन, वाईटेलिन शर्करा क्षार आदि पाए जाते हैं।
कद्दू बलवर्धक होता है और रक्त तथा पेट साफ करता है, पित्त व वायु विकार दूर करता है और मस्तिष्क के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। कद्दू के छिलके में भी एंटीबैक्टीरिया तत्व होता है जो संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं से रक्षा करता है। शायद इन्हीं खूबियों के कारण कद्दू को प्राचीन काल से ही गुणों की खान माना जाता रहा है। यह खून में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में सहायक होता है और अग्नयाशय को भी सक्रिय करता है। इसी वजह से चिकित्सक मधुमेह के रोगियों को कद्दू के सेवन की सलाह देते हैं।
माना जाता है कि कद्दू की उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका में हुई होगी। इसके सबसे पुराने बीज 7 हजार से 5 हजार ईसा पूर्व के हैं। पश्चिमी एशिया में इसका इस्तेमाल मीठे व्यंजन बनाने में किया जाता है। अमेरिका, मेक्सिको, चीन और भारत इसके सबसे बड़े उत्पादक देश हैं। इसके साथ ही यह विश्व के अनेक देशों की संस्कृति के साथ जुड़ा है। उपवास के दिनों में फलाहार के रूप में भी इससे बने विशेष पकवानों का सेवन किया जाता है।
आयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति में कद्दू का इस्तेमाल कई रोगों के इलाज करने में प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में इसको काफीफल, कद्दू, रामकोहला, तथा संस्कृत में कुष्मांड, पुष्पफल, वृहत फल, वल्लीफल कहते हैं। इसका लेटिन नाम बेनिनकासा हिष्पिड़ा है। यह कोशातकी (कुकुर्बिटेसी) कुल का फल है। यह अंटार्कटिका को छोड़कर बाकी पूरी दुनिया में उगाया जाता है। -
हिंदू धर्म में जहां तैतीस करोड़ देवी- देवता हैं, वहीं अनेक सम्प्रदाय भी हैं। प्राचीनकाल में देव, नाग, किन्नर, असुर, गंधर्व, भल्ल, वराह, दानव, राक्षस, यक्ष, किरात, वानर, कूर्म, कमठ, कोल, यातुधान, पिशाच, बेताल, चारण आदि जातियां हुआ करती थीं। देव और असुरों के झगड़े के चलते धरती के अधिकतर मानव समूह दो भागों में बंट गए। पहले बृहस्पति और शुक्राचार्य की लड़ाई चली, फिर गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र की लड़ाई चली। इन लड़ाइयों के चलते समाज दो भागों में बंटता गया।
हजारों वर्षों तक इनके झगड़े के चलते ही पहले सुर और असुर नाम की दो धाराओं का धर्म प्रकट हुआ, यही आगे चलकर यही वैष्णव और शैव में बदल गए। लेकिन इस बीच वे लोग भी थे, जो वेदों के एकेश्वरवाद को मानते थे और जो ब्रह्मा और उनके पुत्रों की ओर से थे। इसके अलावा अनीश्वरवादी भी थे। कालांतर में वैदिक और चर्वाकवादियों की धारा भी भिन्न-भिन्न नाम और रूप धारण करती रही।
शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के झगड़े के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई जिसने दोनों ही संप्रदायों में समन्वय का काम किया। इसके पहले अत्रि पुत्र दत्तात्रेय ने तीनों धर्मों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव के धर्म) के समन्वय का कार्य भी किया। बाद में पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का संप्रदाय बना जिसे स्मार्त संप्रदाय कहते हैं।
इस तरह वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं- 1. वैष्णव, 2. शैव, 3. शाक्त, 4 स्मार्त और 5 वां वैदिक संप्रदाय। वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं, शैव जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं, शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं। अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं।
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भारत की नदियां देश की प्राचीन सभ्यताओं का एक महत्वपूर्ण अंग है। यहां नदियों की पूजा की जाती है। भारत की कई पुरानी सभ्यताओं का विकास इन नदियों के किनारे ही हुआ है। एक नजर भारत में बहने वाली प्रमुख नदियों पर।
गंगा- गंगा भारत की सबसे प्रमुख नदियों में से एक है। यह उत्तराखंड राज्य में हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है। करीब 2525 किलोमीटर लंबी यह नदी उत्तर प्रदेश, बिहार होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस नदी का इतिहास उतना ही पुराना माना जाता है, जितनी भारतीय सभ्यता। यह नदी भारत में पवित्र नदी भी मानी जाती है तथा इसकी उपासना मां तथा देवी के रूप में की जाती है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौन्दर्य और महत्त्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किये गये हैं। इस नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियां तो पायी जाती ही हैं, तथा मीठे पानी वाले दुर्लभ डॉलफिन भी पाई जाती है। यह कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बांध और नदी परियोजनाएं भारत की बिजली, पानी और कृषि से सम्बन्धित ज़रूरतों को पूरा करती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। इसलिए गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता है।
ब्रह्मपुत्र- ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत में हिमालय के अंगशी ग्लेशियर से निकलती है और यह भारत में अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। यहां इसे दिहांग के नाम से जाना जाता है जबकि असम में इसे ब्रह्मपुत्र कहा जाता है। इसके बाद यह नदी बांग्लादेश पहुंचती है। यहां इसे जमुना कहा जाता है। गंगा नदी के साथ मिलकर यह एक डेल्टा सुंदरबन का निर्माण करती है और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई करीब 2900 किलोमीटर है।
यमुना- यमुना नदी भारत के उत्तराखंड स्थित बंदरपूंछ के दक्षिणी ढाल पर स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है. इसकी लंबाई करीब 1,370 किलोमीटर है। मथुरा वृंदावन होते हुए यह नदी इलाहाबाद में गंगा नदी से मिल जाती है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि जो लोग इसके पानी में स्नान कर लेते हैं, उन्हें मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, लेकिन अब भारत की सबसे दूषित नदियों में से एक है।
यमुना- यमुना नदी भारत के उत्तराखंड स्थित बंदरपूंछ के दक्षिणी ढाल पर स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है। इसकी लंबाई करीब 1,370 किलोमीटर है। मथुरा वृंदावन होते हुए यह नदी इलाहाबाद में गंगा नदी से मिल जाती है. हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि जो लोग इसके पानी में स्नान कर लेते हैं, उन्हें मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, लेकिन अब भारत की सबसे दूषित नदियों में से एक है।
कावेरी- कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के पश्चिमी घाट में तलकावेरी से हुआ है। इसकी शुरुआत एक छोटे तालाब से होती है, जिसे कुंडीके तालाब के नाम से भी जाना जाता है। कर्नाटक और तमिलनाडु में करीब 760 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यह नदी बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
कृष्णा -कृष्णा नदी महाराष्ट्र के महाबालेश्वर के समीप पश्चिमी घाट से निकलती है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश होते हुए करीब 1,290 किलोमीटर की यात्रा के बाद यह बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है. हिंदू धर्म में इस नदी का काफी महत्व है। इस नदी पर दो बड़े बांध श्रीसैलम और नागार्जुन सागर बांध बने हैं।
नर्मदा- नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के जिले अमरकंटक से निकलती है. पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली यह नदी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात होते हुए करीब 1289 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद अरब सागर में मिल जाती है। दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा सरदार सरोवर बांध नर्मदा नदी पर ही बना है।
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थेरगाथा, खुद्दक निकाय का आठवां ग्रंथ है। इसमें 264 थेरों के उदान संगृहित हैं। ग्रंथ 21 निपातों में है। पहले निपात में 12 वर्ग हैं, दूसरे निपात में 5 वर्ग हैं, और शेष निपातों में एक एक वर्ग है। गाथाओं की संख्या 1279 हैं।
थेरगाथा में परमपद को प्राप्त थेरों की उद्गारपूर्ण गाथाएं हैं। अधिकांश गाथाओं में सीधे निर्वाण के प्रति संकेत है। कुछ गाथाओं में साधकों की साधना को सफल बनाने में सहायक प्रेरणाओं का उल्लेख है। कुछ गाथाओं में परमपद को प्राप्त थेरों द्वारा ब्रह्मचारियों या जनसाधारण को दिए गए उपदेशों का भी उल्लेख है।
थेरगाथा में भगवान् बुद्ध द्वारा स्थापित संघ का एक सुंदर चित्र मिलता है। -
आज के मध्य अमेरिका के , मैक्सिको में स्थित चिचेन इत्जा एक मंदिर-नगरी है। यह मंदिर-नगरी पुरानी माया सभ्यता का अवशेष है। यह सभ्यता यहां पर 750 से 1200 सदी के बीच फली-फूली और यह शहर इनकी राजधानी और धर्मिक नगरी थी।
शहर के बीचों बीच कुकुलकन का मंदिर है , जो 79 फीट की ऊंचाई तक बना है। इसकी चार दिशाओं में 91 सीढिय़ां हैं, प्रत्येक सीढ़ी साल के एक दिन का प्रतीक है और 365 वां दिन ऊपर बना चबूतरा है। इस पुरातात्विक स्थल को यूनिस्को द्वारा विश्व विरासत की श्रेणी में शामिल किया गया है। इसके अलावा यह दुनिया के साथ आश्चर्यों में से एक है।
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नामीब रेगिस्तान नामीबिया में स्थित है। यह रेगिस्तान काफ़ी गर्म और शुष्क है। यह बोत्सवाना, पूर्वी नामीबिया तथा दक्षिण अफ्रीका का उत्तरी भाग है, जो 1 लाख 35 हजार वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में विस्तारित हैं। नामीब रेगिस्तान के विषय में यह माना जाता है कि यह संसार का सबसे पुराना रेगिस्तान है। यहाँ वर्षा बहुत कम मात्रा में होती है। यहां की चट्टानों में विभिन्न रंग के शैवाल उगते हैं। पृथ्वी के बड़े जीव हाथी सहित यहां अनेक प्रकार के जीव-जंतु भी निवास करते हैं। ॉ
नामीब मरुस्थल, अटलांटिक तट और कालाहारी के रेगिस्तान देखने हर साल 10 लाख से ज्यादा लोग आते हैं।
पिछले कऱीब 8 करोड़ वर्षों से यह रेगिस्तान शुष्क या अर्धशुष्क रहा है। इस रेगिस्तान की रचना दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका के तटीय किनारों के साथ बेगुंएला की ठंडी जल धाराओं द्वारा शुष्क वायु से ठंडा होने पर संभव हुई है। इस रेगिस्तान की चैड़ाई लगभग 160 कि.मी. तथा लंबाई 1300 कि.मी. है। यहां के बालू के टीले अस्थिर होते हैं। इस रेगिस्तान के बालू के कुल टीलों में से स्टार टिब्बा लगभग 10 प्रतिशत है। यहां वार्षिक वर्षा का औसत 15 मि.मी. से कम ही रहता है। नमी का मुख्य स्रोत तटीय क्षेत्र का कोहरा होता है।
नामीब रेगिस्तान लगभग ऊसर है, लेकिन फिर भी यहां वनस्पति तथा जीवों की अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। विश्व की एक दुर्लभ वनस्पति प्रजाति वेलविटचिअ मिरेबिलिस यहां उगती है। झाड़ी के प्रकार के ये पौधे काफ़ी लंबाई तक बढ़ते हैं। इन पौधों में चौड़ी-चौड़ी पत्तियां निकलती रहती हैं। यह पत्तियां बहुत लंबी हो जाती हैं तथा तेज हवा के कारण घुमावदार आकृति ग्रहण कर लेती हैं। यह पौधा विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है। यहां की वनस्पतियां तटीय क्षेत्र के कोहरे से नमी सोखने की क्षमता रखती हैं। नामीब रेगिस्तान की चट्टानों पर लाइकेन यानी शैवाल नामक रंग-बिरंगी वनस्पतियाँ बहुतायत में पाई जाती हैं। अफ्रीका के हाथी समेत यहां अनेक प्रकार के पशु निवास करते हैं।
इस रेगिस्तान में मानव का वास नहीं है तथा वहां पर पहुंचना बहुत कठिन है। हालांकि इस रेगिस्तान का सैसरीम क्षेत्र वर्ष भर आबाद रहता है। इस रेगिस्तान में खनिज सम्पदा प्रचुर मात्रा में मौजूद है। यहां से टंगस्टन, नमक तथा हीरा मुख्य रूप से निकाला जाता है। -
फ्रांसीसी क्रांति और उसके नारे स्वतंत्रता, समानता और उसके नारे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का भारतीय राष्टï्रवाद पर गहरा असर पड़ा। सन् 1830 में जब राजा राममोहन राय इंग्लैंड जा रहे थे, तो उन्हें एक फ्रांसीसी जहाज पर फ्रांस का झंडा लहराता दिखाई दिया। उसमें भी तीन रंग थे। 1857 की क्रांति ने भारतवासियों के दिल में आजादी के बीज बो दिए। बीसवीं शताब्दी में जब स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा तो एक राष्टï्रीय ध्वज की जरूरत महसूस हुई। स्वामी विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने सबसे पहले इसकी परिकल्पना की।
7 अगस्त 1906 को कोलकाता में बंगाल के विभाजन के विरोध में एक रैली हुई जिसमें पहली बार तिरंगा झंडा फहराया गया। समय के साथ इसमें परिवर्तन होते रहे लेकिन जब अंग्रेजों ने भारत छोडऩे का फैसला किया तो देश के नेताओं को राष्टï्रीय ध्वज की चिंता हुई। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की अध्यक्षता में एक ध्वज समिति का गठन किया गया और उसमें यह फैसला किया गया कि भारतीय राष्टï्रीय कांगे्रस के झंडे को कुछ परिवर्तनों के साथ राष्टï्र ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया जाए। ये तिरंगा हो और इसके बीच में अशोक चक्र हो।
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वर्ष 1929 लाहौर सत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज घोषणा, या भारत की आजादी की घोषणा का प्रचार किया और 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में घोषित किया। कांग्रेस ने भारत के लोगों से सविनय अवज्ञा करने के लिए स्वयं प्रतिज्ञा करने व पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति तक समय-समय पर जारी किए गए कांग्रेस के निर्देशों का पालन करने के लिए कहा।
इस तरह के स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन भारतीय नागरिकों के बीच राष्ट्रवादी भावना को मजबूत करने और स्वतंत्रता देने पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार को मजबूर करने के लिए भी किया गया। कांग्रेस ने 1930 और 1956 के बीच 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया। इसमें लोग मिलकर स्वतंत्रता की शपथ लेते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में इनका वर्णन किया है कि ऐसी बैठकें किसी भी भाषण या उपदेश के बिना, शांतिपूर्ण व गंभीर होती थीं। गांधी जी ने कहा कि बैठकों के अलावा, इस दिन को, कुछ रचनात्मक काम करने में खर्च किया जाएं जैसे कताई कातना या हिंदुओं और मुसलमानों का पुनर्मिलन या निषेध काम, या अछूतों सेवा । वर्ष 1947 में वास्तविक आजादी के बाद ,भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को प्रभाव में आया; तब के बाद से 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।
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भारत की संविधान सभा ने नई दिल्ली में संविधान हॉल में 14 अगस्त को 11 बजे अपने पांचवें सत्र की बैठक की। सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने की।
सभा के सदस्यों ने औपचारिक रूप से देश की सेवा करने की शपथ ली। महिलाओं के एक समूह ने भारत की महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया व औपचारिक रूप से विधानसभा को राष्ट्रीय ध्वज भेंट किया। आधिकारिक समारोह नई दिल्ली में हुए जिसके बाद भारत एक स्वतंत्र देश बन गया। नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पद ग्रहण किया, और वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने पहले गवर्नर जनरल के रूप में अपना पदभार संभाला। महात्मा गांधी के नाम के साथ लोगों ने इस अवसर को मनाया। गांधी ने हालांकि खुद आधिकारिक घटनाओं में कोई हिस्सा नहीं लिया। इसके बजाय, उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच शांति को प्रोत्साहित करने के लिए कलकत्ता में एक भीड़ से बात की, उस दौरान ये 24 घंटे उपवास पर रहे।
संविधान सभा के सत्र में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत की आजादी की घोषणा करते हुए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी नामक भाषण दिया। तत्कालीन स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (नियति के साथ वादा) नामक अपना प्रसिद्ध भाषण दिया-
कई सालों पहले, हमने नियति के साथ एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभायें, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभायें। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा। ऐसा क्षण आता है, मगर इतिहास में विरले ही आता है, जब हम पुराने से बाहर निकल नए युग में कदम रखते हैं, जब एक युग समाप्त हो जाता है, जब एक देश की लम्बे समय से दबी हुई आत्मा मुक्त होती है। यह संयोग ही है कि इस पवित्र अवसर पर हम भारत और उसके लोगों की सेवा करने के लिए तथा सबसे बढ़कर मानवता की सेवा करने के लिए समर्पित होने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।... आज हम दुर्भाग्य के एक युग को समाप्त कर रहे हैं और भारत पुन: स्वयं को खोज पा रहा है। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो केवल एक क़दम है, नए अवसरों के खुलने का। इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं। भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीडि़तों की सेवा करना। इसका अर्थ है निर्धनता, अज्ञानता, और अवसर की असमानता मिटाना। हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही इच्छा है कि हर आंख से आंसू मिटे। संभवत: ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों कि आंखों में आंसू हैं, तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा। आज एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र है। भविष्य हमें बुला रहा है। हमें कहां जाना चाहिए और हमें क्या करना चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम निर्धनता मिटा, एक समृद्ध, लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील देश बना सकें। हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं को बना सकें जो प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सके? कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हैं।
— ट्रिस्ट विद डेस्टिनी भाषण के अंश, जवाहरलाल नेहरू
इस भाषण को 20वीं सदी के महानतम भाषणों में से एक माना जाता है।
इसके बाद तिरंगा झण्डा फहराया गया और लाल कि़ले की प्राचीर से राष्ट्रीय गान गाया गया।
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जन गण मन संस्कृत मिश्रित बंगाली में लिखा गया भारत का राष्ट्रीय गीत है। ये ब्रह्म समाज की एक प्रार्थना के पहले पांच बन्द हैं जिनके रचियता नोबल पुरस्कार से सम्मानित रविन्द्रनाथ टैगोर हैं। सबसे पहले इसे 27 दिसम्बर 1911 को नेशनल कांग्रेस के कलकत्ता सम्मेलन में गाया गया। 1935 में इस गीत को दून स्कूल ने अपने विद्यालय के गीत के रूप में अपनाया। 24 जनवरी, 1950 को संविधान द्वारा इसे अधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया।
ऐसा माना जाता है कि इसकी वर्तमान धुन को राम सिंह ठाकुर जी के एक गीत से लिया गया है, लेकिन इस बारे में विवाद हैं। औपचारिक रूप से राष्ट्रीय गीत को गाने में 48-50 सैकेंड का समय लगता है लेकिन कभी-कभी इसे छोटा कर के सिर्फ इसकी प्रथम और अंतिम पंक्तियों को ही गाया जाता है जिसमें लगभग 20 सैकेंड का समय लगता है । -
हमारा राष्ट्रीय ध्वज हमारी शान और गौरव का प्रतीक है। हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराया जाता है। लेकिन 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराने में कुछ फर्क होता है।
15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस वाले दिन राष्ट्रीय ध्वज को ऊपर खींचा जाता है और फिर फहराया जाता है। इसे ध्वजारोहण कहा जाता है। वहीं 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस वाले दिन राष्ट्रीय ध्वज ऊपर बंधा रहता है। उसे खोलकर फहराया जाता है जिसे झंडा फहराना कहते हैं। अंग्रेजी में ध्वजारोहण के लिए (Flag Hoisting) और झंडा फहराने के लिए (Flag Unfurling) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
15 अगस्त को आयोजित होने वाले मुख्य कार्यक्रम में देश के प्रधानमंत्री शामिल होते हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री ही ध्वजारोहण करते हैं। 26 जनवरी को आयोजित होने वाले मुख्य कार्यक्रम में राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुख्य कार्यक्रम का आयोजन लाल किले पर होता है। वहीं प्रधानमंत्री ध्वजारोहण करते हैं। प्रधानमंत्री इस मौके पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हैं। वहीं गणतंत्र दिवस के मुख्य कार्यक्रम का आयोजन राजपथ पर होता है। गणतंत्र दिवस वाले दिन राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं।
प्रधानमंत्री देश के राजनीतिक प्रमुख होते हैं जबकि राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख। देश का संविधान 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ। उससे पहले न देश में संविधान था और न राष्ट्रपति। इसी वजह से हर साल 26 जनवरी को राष्ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं।
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