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सायनाइड के बारे में तो आपने सुना ही होगा, जिसे बेहद ही खतरनाक जहर माना जाता है। इसी की तरह ही एक और खतरनाक जहर है, जिसे पोलोनियम 210 कहा जाता है। हालांकि इसके बारे में बहुत कम ही लोगों को पता है। माना जाता है कि इसका सिर्फ एक ग्राम ही हजारों लोगों को मौत की नींद सुला सकता है। इस वजह से इसे दुनिया का सबसे खतरनाक जहर कहें तो गलत नहीं होगा। दरअसल पोलोनियम 210 एक रेडियोएक्टिव तत्व है, जिससे निकलने वाला रेडिएशन इंसानी शरीर के अंदरूनी अंगों के साथ-साथ डीएनए और इम्यून सिस्टम को भी तेजी से तबाह कर सकता है। मृत शरीर में इसकी मौजूदगी का पता लगाना भी बेहद ही मुश्किल काम होता है। वैसे भारत में तो इस जहर की जांच मुमकिन ही नहीं है। पोलोनियम-210 की खोज मशहूर भौतिकविद और रसायनशास्त्री मैरी क्यूरी ने साल 1898 में की थी। उन्हें रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रेडियम के शुद्धीकरण (आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम) के लिए रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी मिला था। इसके अलावा उन्हें रेडियोएक्टिविटी की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला था। वैसे पोलोनियम का नाम पहले रेडियम एफ रखा गया था, लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पोलोनियम-210 अगर नमक के छोटे कण जितना भी इंसान के शरीर में चला जाए तो पल भर में उसकी मौत हो सकती है। इसे पहचानना बहुत मुश्किल है, क्योंकि अगर इसे खाने में मिला दिया जाए तो इसके स्वाद का पता ही नहीं चल पाता। कहते हैं कि पोलोनियम जहर की पहली शिकार इसकी खोजकर्ता मैरी क्यूरी की बेटी ईरीन ज्यूलियट क्यूरी थी, जिसने इसका एक छोटा सा कण खा लिया था। इसकी वजह से उनकी तुरंत ही मौत हो गई थी। इसके अलावा माना जाता है कि इस्त्रायल के सबसे बड़े दुश्मन माने जाने वाले फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात की मौत भी इसी जहर से हुई थी। इसकी जांच के लिए उनके शव को दफनाने के कई साल बाद कब्र से निकाला गया था। स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया कि उनके शव के अवशेषों में रेडियोधर्मी पोलोनियम-210 मिला था।
- भारतीय घरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाली हल्दी का लैटिन नाम है- करकुमा लौंगा। वहीं अंग्रेजी में इसे टरमरिक कहते हैं। इसका वानस्पतिक पारिवारिक नाम हैं-जिन्जिबरऐसे।हल्दी भारतीय वनस्पति है। यह अदरक की प्रजाति का 5-6 फुट तक बढऩे वाला पौधा है जिसमें जड़ की गाठों में हल्दी मिलती है। हल्दी पाचन तन्त्र की समस्याओं, गठिया, रक्त-प्रवाह की समस्याओं, कैंसर, जीवाणुओं (बैक्टीरिया) के संक्रमण, उच्च रक्तचाप और एलडीएल कोलेस्ट्रॉल की समस्या और शरीर की कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत में लाभकारी है। आयुर्वेद में हल्दी को एक महत्वपूर्ण औषधि कहा गया है। भारतीय परिवारों में धार्मिक रूप से इसको बहुत शुभ समझा जाता है। उच्च तापमान पर पकाने से भी हल्दी के औषधीय गुणों का नाश नहीं होता।भारत विश्व में हल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, क्योंकि विश्व में हल्दी के उत्पादन का 80 प्रतिशत से अधिक उत्पादन भारत में ही होता है। क्षेत्रफल के हिसाब से देश के मसाला उत्पादन क्षेत्र के तहत 60 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में हल्दी उगाई जाती है। हल्दी की खेती श्रीलंका, बंगला देश, पाकिस्तान, थाईलैंड, चीन, ताइवान तथा हैती, जमैका और पेरू में भी बड़े पैमाने पर होती है। भोजन को स्वाद, सुगंध और रंगत देने के अतिरिक्त, मसालों में पाचक गुण भी होता है और इनमें गठिया, दमा, (ब्रांकियल अस्थमा) घाव भरने, अपच तथा हृदय और मानसिक रोगों जैसी पुरानी बीमारियों के उपचार के गुण भी होते हैं। मसालों तथा पौधों में पादप रसायन (फाइटो केमिकल्स) जैसे तत्व होते हैं, जो मूलत: पौधों की सुरक्षा करते हैं, लेकिन अब उन्हें विटामिन के बराबर माना जाता है। और इसे, इंसानों के लिए काफी उपयोगी भी समझा जाता है। इन रसायनों के कारण ही मसाले अब दादी मां के घरेलू नुस्खों की पोटली से बाहर निकलकर, आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में पहुंच गए हैं। इस प्राचीन पदार्थों यानी मसालों के बारे में नए-नए औषधीय अनुसंधान किए जा रहे हैं और नई जानकारियां दी रही हैं। मसालों के औषधीय गुणों को अब वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिये बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। खाद्य पदार्थों, पौष्टिकता और पुराने रोगों के बारे में किए गए हाल के अध्ययनों से पता चला है कि आहार और आहार संबंधी आदतों को बदलने से अधिकतम पौष्टिकता प्राप्त की जा सकती है और पौधों से मिलने वाले पोषक तत्वों से (फाइटोन्यूट्रीएंटस) पुरानी बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है। हल्दी में अनिवार्य तेल, वसीय तेल, कम मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्व और हल्दी को रंग देने वाला पदार्थ करक्यूपिन होता है। करक्यूमिन में कई औषधीय गुण होते हैं।हल्दी के कुछ अन्य औषधीय गुणों की वैज्ञानिक रूप से जांच की गई है। इनमें कैंसर उत्पन्न करने वाले तत्वों के असर को कम करना, इसके एंटी आक्सीडेंट होना और डीएनए को होने वाले नुकसान को ठीक करने की इसकी क्षमता शामिल है। एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि चूहों में गैलेक्टोज से होने वाला मोतियाबिन्द करकुकिन से विलम्बित हो जाता है, जिससे मोतियाबिन्द के विकास की प्रक्रिया रूक जाती है। यह भी पाया गया कि हल्दी और करकुकिन से आंव (इंटेस्टोइनक मुकोसा) में विषरोधी एंजाइम बढ़ते हैं तथा पशुओं में होने वाले परिवर्तन और टयूमर बनना कम होता है।---
- भिक्षुकोपनिषद एक प्रकार का शुक्ल यजुर्वेदीय उपनिषद है। इस उपनिषद में आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण हेतु भिक्षा द्वारा जीवन-यापन करने वाले संन्यासियों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। इस उपनिषद में कुल पांच मंत्र हैं। इस उपनिषद में बताया गया है कि मोक्ष की कामना रखने वाले भिक्षुओं की चार श्रेणियां होती हैं- कुटीचक्र, बहूदक, हंस और परमहंस।कुटीचक्र- इस श्रेणी के भिक्षु गौतम, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि के समान आठ ग्रास भोजन लेकर योगमार्ग से मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हैं। इसमें मात्र शरीर की रक्षा के लिए न्यूनतक भोजन ग्रहण करने का विधान है।बहूदक-इस श्रेणी के भिक्षु त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिखा, यज्ञोपवीत और काषाय वस्त्र धारण करते हैं। मधु-मांस आदि का पूर्णत: त्याग करते हैं। किसी सदाचारी व्यक्ति के घर से भिक्षा द्वारा आठ ग्रास भोजन ग्रहण करके योगमार्ग द्वारा मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होते हैं।हंस- इस श्रेणी के भिक्षु किसी गांव में एक रात्रि, नगर में पांच रात्रि, तीर्थक्षेत्र में सात रात्रि से अधिक निवास नहीं करते। वे गोमूत्र और गोबर का आहार ग्रहण करते हुए नित्य चान्द्रायण व्रत का पालन करके योगमार्ग से मोक्ष की खोज करते हैं।परमहंस- इस श्रेणी के भिक्षु संवर्तक, आरूणि, श्वेतकेतु, जड़भरत, दत्तात्रेय, शुकदेव, वामदेव और हारीतक आदि की भांति आठ ग्रास भोजन ग्रहण करके योगमार्ग में विचरण करते हुए मोक्ष-प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इनका निवास किसी वृक्ष के नीचे, किसी शून्य गृह में या फिर श्मशान में होता है। उनके लिए द्वैत भाव का कोई अभिमत नहीं होता। मिट्टी और सोने में कोई भेद नहीं होता। वे सभी वर्णों में समान भाव से भिक्षावृत्ति करते हैं और सभी जीवों में अपनी आत्मा के दर्शन करते हैं। वे शुद्ध मन से परमहंस वृत्ति का पालन करते हुए शरीर का त्याग करते हैं।------
- हिंदू धर्म में राम को विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे - इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे। मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र, रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुंची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार हैब्रह्माजी से मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के पुत्र विवस्वान थे। विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण हुए। बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु हुए। पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुंधुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनश्व के पुत्र मान्धाता हुए। मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए-धु्रवसन्धि एवं प्रसेनजित। धु्रवसन्धि के पुत्र भरत हुए। भरत के पुत्र असित हुए। असित के पुत्र सगर हुए। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान हुए। अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतरा था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे। ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे। शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए। शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे। प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति हुए। ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए।दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए। इस प्रकार ब्रम्हा की उन्चालिसवी पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ। राम के पुत्र लव कुश को सभी जानते हैं। वहीं लक्ष्मण के पुत्र चन्द्रकेतु तथा चित्रांगद हुए। भरत के पुत्रों के नाम पुष्कल और मणिभद्र थे। शत्रुघन के पुत्र सुबाहु तथा भद्रसेन कहलाए।-------------
- वाइन का नाम सुनते हैं तो अंगूर ही याद आता है। हरे अंगूर से व्हाइट वाइन और काले अंगूर से रेड वाइन, लेकिन और भी कई फल हैं जिनका इस्तेमाल वाइन बनाने के लिए किया जाता है और इन्हें फ्रूट वाइन कहा जाता है।अंगूरयूरोप में वाइन का मतलब अंगूर की वाइन से ही होता है, लेकिन भारत समेत बहुत से एशियाई देशों में तरह- तरह की फ्रूट वाइन प्रचलित हैं जिन्हें लोग घरों में भी बनाते हैं।आलूबुखाराचीन, जापान और कोरिया में प्लम वाइन काफी लोकप्रिय है। इसके अलावा आलूबुखारे से यहां प्लम लिकर भी बनाया जाता है जिसमें अल्कोहल की मात्रा काफी ज्यादा होती है।अनारइजरायल में अनार से वाइन बनाई जाती है और इसे रिमोन कहा जाता है। यह खास किस्म के अनार से बनती है जो सामान्य अनार से काफी ज्यादा मीठे होते हैंषकेलासोचने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन केले से भी वाइन तैयार की जा सकती है क्योंकि बाकी फलों की तुलना में इनमें चीनी की मात्रा काफी ज्यादा होती है। भारत की बनाना वाइन दुनिया भर में जानी जाती हैषलीचीचीन में लीची से बनी वाइन काफी पी जाती है। इसमें 10 से 18 फीसदी अल्कोहल होता है। सुनहरे रंग की इस वाइन को परंपरागत चीनी खाने के साथ पिया जाता है।संतरावैसे तो अंगूर से बनी एक खास किस्म की वाइन को भी ऑरेंज या ऐम्बर वाइन के नाम से जाना जाता है लेकिन संतरों से बनी ऑरेंज वाइन बनाना बहुत ही मुश्किल होता है. इसमें साफ सफाई का बहुत ख्याल रखना होता है।अनानासथाईलैंड और अन्य दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में अनानास के रस से बनी वाइन काफी चाव से पी जाती है। इसमें करीब 10 प्रतिशत अल्कोहल होता है. मेक्सिको और कुछ अफ्रीकी देशों में भी यह प्रचलित है।चेरीपिछले कुछ सालों में डेनमार्क और क्रोएशिया में चेरी वाइन का चलन चला है। चीन में भी चेरी की खूब पैदावार होती है, इसलिए वहां भी इसे अच्छी मात्रा में बनाया जाने लगा है।बेरीब्लैकबरी, ब्लूबेरी, क्रैनबेरी, गूजबेरी, सीबेरी और रसबेरी समेत कई तरह के फलों से वाइन बनाई जा सकती है। अमेरिका, पूर्वी अफ्रीका, फिलीपींस और भारत में इनका इस्तेमाल किया जाता है।और भी कई फल- भारत के मेघालय में नाशपाती, स्ट्रॉबेरी, अमरूद, तरबूज, टमाटर, काजू और कटहल से भी वाइन बनाई जाती है। भारत सरकार ने घरों में बनने वाली इन वाइनों को कानूनी वैधता प्रदान की है। भारत के कुछ इलाकों में इलायची से बनी वाइन की काफी मांग रहती है।----
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1. आंध्रप्रदेश- आंध्रप्रदेश अधिनियम 1953 द्वारा आंध्र राज्य बनाया गया जिसमें मद्रास राज्य के कुछ हिस्से रखे गए। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा इसका आंध्र प्रदेश नाम दिया गया।
2. केरल- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा मूल संविधान के भाग ख राज्य, ट्रावनकोर-कोचीन के स्थान पर राज्य बनाया गया।
3. गुजरात- मुम्बई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 द्वारा मुम्बई राज्य को गुजरात और महाराष्टï्र दो राज्यों में विभाजित कर दिया गया।
4. महाराष्ट्र- मुम्बई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 द्वारा मुम्बई राज्य से महाराष्ट्र बनाया गया।
5. नागालैण्ड- असम राज्य से नागा हिल्स-ल्युएन्सांग क्षेत्र को निकालकर नागालैण्ड राज्य अधिनियम, 1962 द्वारा इस राज्य की पृथक राज्य के रूप में स्थापना की गई।
6. हरियाणा- पंजाब पुनगर्ठन अधिनियम 1956 द्वारा पंजाब राज्य के राज्य क्षेत्र के एक भाग को काटकर भारत संघ का 17वां राज्य हरियाणा की स्थापना की गई।
7. कर्नाटक- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा मूलत: भाग ख के मैसूर राज्य से मैसूर राज्य निर्मित कर 1973 में इसे कर्नाटक नाम दिया गया।
8. हिमाचल प्रदेश- हिमाचल प्रदेश को सबसे पहले हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 अधिनियम करके राज्य की सूची में 18वां राज्य बनाया गया. संविधान की पहली अनुसूची के भाग ग के राज्यक्षेत्रों की सूची से इसे हटा दिया गया।
9. मणिपुर और त्रिपुरा- मणिपुर और त्रिपुरा को जो मूलत: भाग ग राज्य थे, पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 द्वारा केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति से उन्नतकर पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।
10. मेघालय- संविधान के 23वें संशोधन अधिनियम, 1969 द्वारा अनुच्छेद 241 और 371 क जोड़कर पहले मेघालय को असम राज्य के स्वायत्त रूज्य के रूप की संज्ञा दी गई तथा बाद में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया और पूर्वोत्तर क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम, 1971 द्वारा पहली अनुसूची में 21वें राज्य के रूप में स्थान दिया गया।
11. सिक्किम- भारत के एक रक्षित राज्य अर्थात सिक्किम को संविधान के 35वें संशोधन अधिनियम, 1974 द्वारा सहयुक्त राज्य का दर्जा दिया गया तथा बाद में संविधान के 36वें संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा इसे संविधान की पहली अनुसूची में 22वें राज्य के रूप में स्थान दिया गया।
12. मिजोरम- मिजोरम राज्य अधिनियम, 1986 द्वारा मिजोरम को केंद्रशासित प्रदेश के दर्जे से बढ़ाते हुए संविदान की पहली अनुसूची के 23वें राज्य के रूप में स्थान दिया गया।
13. अरुणाचल प्रदेश- संविधान संशोधन के माध्यम से अरुणाचल प्रदेश अधिनियम, 1986 को अधिनियमित करके इसे केंद्रशासित प्रदेश से पूर्ण राज्य के रूप में नामित किया गया।
14. गोवा- गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 द्वारा इस संघ राज्यक्षेत्र में से गोवा राज्य को अलग करके उसे राज्य बना दिया गया तथा दमन और दीव को केंद्रशासित प्रदेश रहने दिया गया।
15. छत्तीसगढ़- मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के अनुसार मध्यप्रदेश के राज्यक्षेत्र से कुछ राज्य क्षेत्र अलग करके 26वें प्रदेश के रूप में इस राज्य की स्थापना की गई।
16. उत्तरांचल- उत्तरप्रदेश- उत्तरप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के द्वारा 27 वें प्रदेश के रूप में इस राज्य का गठन किया गया। अब इस राज्य का नाम उत्तराखंड रख दिया है।
17. झारखंड- बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के द्वारा बिहार के राज्यक्षेत्र से कुछ राज्यक्षेत्र निकालकर 28वें प्रदेश के रूप में इस राज्य का गठन किया गया।
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- महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति के इतिहास वर्ग में आता है। कभी कभी इसे केवल भारत कहा जाता है। यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ हैं। इसी में अक्षौहिणी सेना का उल्लेख मिलता है। दरअसल अक्षौहिणी प्राचीन भारत में सेना का माप हुआ करता था। ये संस्कृत का शब्द है। विभिन्न स्रोतों से इसकी संख्या में कुछ कुछ अंतर मिलते हैं। प्राचीन भारत में सेना के चार अंग होते थे-हाथी, घोड़े, रथ और पैदल। जिस सेना में ये चारों अंग होते थे, वह चतुरंगिणी सेना कहलाती थी। महाभारत के युद्घ में अठारह अक्षौहिणी सेना नष्ट होने का उल्लेख मिलता है। आइये जानें कैसी होती थी यह अक्षौहिणी सेना .......महाभारत के अनुसार-एक अक्षौहिणी में 21 हजार 870 हाथी, 21 हजार 870 रथ, 65 हजार 610 घोड़े और 1 लाख 9 हजार 350 पैदल सैनिक होते थे। महाभारत के युद्ध में इस प्रकार की 18 अक्षौहिणी सेना ने भाग लिया था और सभी नष्ट हो गई थी।महाभारत के आदिपर्व और सभापर्व में सेना का उल्लेख इस प्रकार है--एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सैनिक और तीन घोड़े-बस, इन्हीं को सेना के मर्मज्ञ विद्वानों ने पत्ति कहा है।-इस पत्ति की तिगुनी संख्या को विद्वान पुरुष सेनामुख कहते हैं। तीन सेनामुखो को एक गुल्म कहा जाता है।- तीन गुल्म का एक गण होता है, तीन गण की एक वाहिनी होती है और तीन वाहिनियों को सेना का रहस्य जानने वाले विद्वानों ने पृतना कहा है।- तीन पृतना की एक चमू तीन चमू की एक अनीकिनी और दस अनीकिनी की एक 'अक्षौहिणी' होती है।- एक अक्षौहिणी सेना में रथों की संख्या 21 हज़ार 870 बताई गई है। हाथियों की संख्या भी इतनी ही कहनी चाहिये।- एक अक्षौहिणी में पैदल मनुष्यों की संख्या एक लाख 9350 होती है।-इसी तरह एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की ठीक-ठीक संख्या 65 हजार 610 कही गयी है।
फ़ारसी विद्वान लेखक, वैज्ञानिक, धर्मज्ञ तथा विचारक अलबरुनी के अनुसारअलबरुनी ने अक्षौहिणी की परिमाण-संबंधी व्याख्या इस प्रकार की है--एक अक्षौहिणी में 10 अंतकिनियां होती हैं।-एक अंतकिनी में 3 चमू होते हैं।-एक चमू में 3 पृतना होते हैं।-एक पृतना में 3 वाहिनियां होती हैं।-एक वाहिनी में 3 गण होते हैं।-एक गण में 3 गुल्म होते हैं।-एक गुल्म में 3 सेनामुख होते हैं।-एक सेनामुख में 3 पंक्ति होती हैं।-एक पंक्ति में 1 रथ होता है।शतरंज के हाथी को रूख कहते हैं जबकि यूनानी इसे युद्ध-रथ कहते हैं। इसका आविष्कार एथेंस में मनकालुस'(मिर्तिलोस) ने किया था और एथेंसवासियों का कहना है कि सबसे पहले युद्ध के रथों पर वे ही सवार हुए थे। लेकिन उस समय के पहले उनका आविष्कार एफ्रोडिसियास (एवमेव) हिन्दू कर चुका था, जब महाप्रलय के लगभग 900 वर्ष बाद मिस्त्र पर उसका राज्य था। उन रथों को दो घोड़े खींचते थे। रथ में एक हाथी, तीन सवार और पांच प्यादे होते हैं।- हर रथ में चार घोड़े और उनका सारथी होता है जो बाणों से सुसज्जित होता है, उसके दो साथियों के पास भाले होते हैं और एक रक्षक होता है जो पीछे से सारथी की रक्षा करता है और एक गाड़ीवान होता है।- हर हाथी पर उसका हाथीवान बैठता है और उसके पीछे उसका सहायक जो कुर्सी के पीछे से हाथी को अंकुश लगाता है; कुर्सी में उसका मालिक धनुष-बाण से सज्जित होता है और उसके साथ उसके दो साथी होते हैं जो भाले फेंकते हैं और उसका विदूषक हौहवा होता है जो युद्ध से इतर अवसरों पर उसके आगे चलता है।- तदनुसार जो लोग रथों और हाथियों पर सवार होते हैं उनकी संख्या 2 लाख 84 हजार 323 होती है (एवमेव के अनुसार)। जो लोग घुड़सवार होते हैं उनकी संख्या 87 हजार 480 होती है। एक अक्षौहिणी में हाथियों की संख्या 21 हजार 870 होती है, रथों की संख्या भी 21 हजार 870 होती है, घोड़ों की संख्या 1 लाख 53 हजार 90 और मनुष्यों की संख्या 4 लाख 59 हजार 283 होती है।एक अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों- हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल संख्या 6 लाख 34 हजार 243 होती है। अठारह अक्षौहिणीयों के लिए यही संख्या एक करोड़ 14 लाख 16 हजार 374 हो जाती है अर्थात 3 लाख 93 हजार 660 हाथी, 27 लाख 55 हजार 620 घोड़े, 82 लाख 67 हजार 94 मनुष्य हो जाती है।------ - मदनघंटी एक औषधीय पौधा है जो रक्तशोधक होता है। इसकी जड़ों का इस्तेमाल विभिन्न रोगों के इलाज में किया जाता है। इसकी जड़े पौष्टिक, रक्त शोधक (खून को सोखने वाली) गुणों की वजह से सार्सपरिला या अन्नतमूल की जगह पर उपयोग में ली जाती हैं। इसके बीज को कॉफी की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसे घास की जगह पर भैंस को खिलाने से भैंस का दूध बढ़ता है।हिन्दी में इसे मदनघंटी, गुजराती में मधुर जड़ी, शर सर शेख लो, तमिल में नक्टेचुरी, तेलुगू में मदन ग्रंथि, लैटिन में स्परमेकोसी हिस्पिडा, बोरेरिया हिस्पिड कहा जाता है।
- उपनिषद्- उपनिषद् शब्द का अर्थ है वह शास्त्र या विद्या जो गुरु के निकट बैठकर एकांत में सीखी जाती है। उपनिषद् ज्ञान पर बल देता है एवं ब्रह्म एवं आत्मा के संबंधों को निरूपित करता है। उपनिषदों की रचना की परंपरा मध्य काल तक चलती रही। माना जाता है कि अल्लोपनिषद् अकबर के युग में लिखा गया। इसलिए उपनिषदों की संख्या बहुत बड़ी है। मुक्तिका उपनिषद् के अनुसार कुल 108 उपनिषद् हैं।शंकराचार्य ने 11 उपनिषदों पर टीकाएं लिखी हैं। 13 उपनिषद् बहुत महत्वपूर्ण है इसमें से दो ऐतरेय एवं कौषतिकी उपनिषद् ऋग्वेद से संबंधित है। दो अन्य छांदोग्य एवं केन उपनिषद् सामवेद से संबंधित हैं। चार, तैत्तिरीय, कठ, श्वेताश्वतर तथा मैत्रायिणी का संबंध कृष्ण यजुर्वेद से है, तो वृहदारण्यक तथा इश उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से। मुंडक, मांडुक्य एवं प्रश्न उपनिषद् अथर्ववेद से संबंधित हैं। उपनिषद् को वेदान्त कहा गया है। कठ, श्वेताश्वर, ईश तथा मुडक उपनिषद् छदोबद्ध है। केन और प्रश्न उपनिषद् के कुछ भाग छंद एवं कुछ भाग गद्य है। शेष सात गद्य हैं। तत्त्वमसि तुम अर्थात् पुत्र के प्रति कथित शब्द उपनिषदों का प्रधान प्रसंग है।पी.एल. भार्गव नामक इतिहासकार ने उपनिषदों की क्रमावली बनायी है:मूल रूप में ब्रह्म सिद्धांत उल्लेख करने वाले वृहदाराण्यक, तैत्तिरीय, ऐतरेय, कौषितकी, केन तथा ईश उपनिषद् सबसे प्राचीन हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् से संकेत मिलता है कि प्राचीनकाल के बुद्धिमान मनुष्य संतान नहीं चाहते थे।सांख्य शब्दों की जानकारी तथा विष्णु के प्रति झुकाव के कारण कठ उपनिषद् उसके बाद का है। कठोपनिषद् में आत्मा को पुरूष कहा गया है। वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद बड़ा रोचक है। उसी प्रकार कठोपनिषद् का यम-नचिकेता संवाद उल्लेखनीय है। मुण्डकोपनिषद् में यह घोषित किया गया कि सत्यमेव जयते।श्वेताश्वतर उपनिषद् में परमात्मा को रूद्र कहा गया है, इस आधार पर इसे कठ उपनिषद् के बाद का माना जाता है।मैत्रायिणी उपनिषद् में त्रिमूर्ति तथा चार आश्रमों के सिद्धांत का उल्लेख है। साथ ही इसमें पहली बार निराशावाद के तत्व मिलते हैं। अत: इसे सबसे बाद का उपनिषद् माना जाता है। नृसिंहपूर्वतापनी उपनिषद् संभवत: सबसे प्राचीन उपनिषद् था। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार, धर्म के तीन स्कंध होते हैं- 1. यज्ञ, अध्ययन और दान , 2. तप और 3. गुरू के आश्रम में ब्रह्मचारी के रूप में रहना।छांदोग्य उपनिषद् में सर्वखल्विदं ब्रह्म अर्थात बह्म ही सब कुछ है कहकर अद्वैतवाद की प्रतिष्ठा की गई है।---
- अकबर और बीरबल की कहांनियां तो खूब सुनी होंगी आपने बचपन में, लेकिन क्या आपने बीरबल के छत्ते की कहानी सुनी है? नहीं सुनी तो अब हम आपको सुनाते हैं। बीरबल का छत्ता हरियाणा और राजस्थान के बीच एक जगह, नारनौल में है जो जिला महेंद्रगढ़ के अंदर आता है। क्योंकि बीरबल का छत्ता राय बालमुकुंद ने बनवाया था इसलिए इसका नाम पहले बालमुकुन्द था, लेकिन बाद में इसका नाम बदल कर बीरबल का छत्ता रख दिया गया।इससे पहले कि हम आपको इसका नाम बदलने का कारण बताएं, पहले इसके बदले हुए नाम का मतलब जान लेते हैं। छत्ता मतलब घर, तो इस हिसाब से बीरबल का छत्ते का अर्थ है बीरबल का घर। दरअसल ऐसा कहा जाता है कि अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल, राजकाज के सिलसिले में यहां आते थे और इस छत्ते में रहते थे। इसलिए इसका नाम बीरबल का छत्ता पड़ गया। वैसे तो ये जगह बहुत खूबसूरत है, लेकिन जब बात बीरबल के छत्ते की आती है तो युवाओं में रोमांच और बुजगऱ्ों में भय दौडऩे लगता है। बीरबल के छत्ते का रहस्य दरअसल बीरबल के छत्ते को रहस्यमयी माना जाता है।बुज़ुर्गों का मानना है कि ये एक भूतीया जगह है। कहते हैं कि यहां एक सुरंग है, जिसके रास्ते दो तरफ खुलते हैं, एक दिल्ली की ओर और दूसरा जयपुर की ओर। अमूमन तौर पर इस सुरंग में किसी का भी जाना निषेध है क्योंकि कहा जाता है कि इस सुरंग में जाना वाला कभी लौट कर वापस नहीं आ पाया। इतना ही नहीं यहां रह रहे बुज़ुर्गों की मानें तो सालों पहले इस सुरंग से एक बारात दिल्ली की ओर जाने को रवाना हुई , लेकिन पहुंची नहीं और हैरानी की बात तो ये कि बारात का उस सुरंग या आस-पास की किसी जगह पर कोई नामो निशान भी नहीं मिला। ऐसी कई घटनाएं घटने के बाद प्रशासन ने सुरंग को बंद कर दिया। बीरबल के छत्ते का इतिहास पानीपत कि दूसरी लड़ाई के बाद नारनौल की बागडोर अकबर के हाथों में आ गई और अकबर ने सम्राट हेमू को पकडऩे के लिए बतौर इनाम नारनौल को शाह कुली खान को सौंप दिया। इस तरह शाह कुली खान यहां की जागीर का मालिक बन गया। अकबर के शासनकाल में यहां राय बालमुकुन्द के छत्ते का निर्माण हुआ जिसे बीरबल का छत्ता के नाम से जाना जाता है। ये दो मंजिला भवन बनावट में किले और महल जैसा दिखता है, लेकिन सही ढंग से देख-रेख नहीं होने की वजह से ये धीरे धीरे नष्ट हो रहा है।
- पुराणों, वेदों में भारत की कई नदियों का वर्णन मिलता है। इसी में से एक है सरयू नदी, जिसे घाघरा नदी भी कहते हैं। घाघरा नदी का उद्गम दक्षिणी तिब्बत के मापचाचुंग ग्लेशियर से हुआ है, जहां इसे गोग्रा एवं कर्णाली के नाम से जाना जाता है। इसे सरयू नदी , सरजू, शारदा, आदि नामों से भी जाना जाता है। सरयू नदी वैदिक कालीन नदी है जिसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। सरयू नदी को बौद्ध ग्रंथों में सरभ के नाम से पुकारा गया है। इतिहासविद् कनिंघम ने अपने एक मानचित्र पर इसे मेगस्थनीज द्वारा वर्णित सोलोमत्तिस नदी के रूप में चिन्हित किया है और ज्यादातर विद्वान टालेमी द्वारा वर्णित सरोबेस नदी के रूप में मानते हैं।पुराणों में वर्णित है कि सरयू नदी भगवान विष्णु के नेत्रों से प्रकट हुई है। आनंद रामायण में उल्लेख है कि प्राचीन काल में शंकासुर दैत्य ने वेद को चुरा कर समुद्र में डाल दिया और स्वयं वहां छिप गया था। तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर दैत्य का वध किया था और ब्रह्मा को वेद सौंप कर अपना वास्तविक स्वरूप धारण किया। उस समय हर्ष के कारण भगवान विष्णु की आंखों से प्रेमाश्रु टपक पड़े। ब्रह्मा ने उस प्रेमाश्रु को मानसरोवर में डाल कर उसे सुरक्षित कर लिया। इस जल को महापराक्रमी वैवस्वत महाराज ने बाण के प्रहार से मानसरोवर से बाहर निकाला। यही जलधारा सरयू नदी कहलाई।रामायण में वर्णित है कि सरयू अयोध्या से होकर बहती है। रामचरित मानस में तुलसीदास ने इस नदी का गुणगान किया है। मत्स्य पुराण के अध्याय 121 और वाल्मीकि रामायण के 24वें सर्ग में इस नदी का वर्णन है। वामन पुराण के 13वें अध्याय, ब्रह्म पुराण के 19वें अध्याय और वायु पुराण के 45वें अध्याय में गंगा, यमुना, गोमती, सरयू और शारदा, आदि नदियों का हिमालय से प्रवाहित होना बताया गया है। रामायण के अनुसार इसी नदी में भगवान राम ने जलसमाधि ली थी।जहां तक घाघना नाम की बात है, तो घाघरा नाम संस्कृत शब्द घग्घर से लिया गया है। घग्घर शब्द का अर्थ है जल की गडग़ड़ाहट की आवाज। वास्तव में इस नदी के जल प्रवाह से इसी प्रकार की आवाज सुनाई देती है, जिसके कारण इस नदी का नाम घाघरा पड़ा। यह नदी हिमालय से निकलकर बलिया और छपरा के बीच में गंगा में मिल जाती है।अपने ऊपरी भाग में, जहां इसे काली नदी के नाम से जाना जाता है, यह काफ़ी दूरी तक भारत (उत्तराखण्ड राज्य) और नेपाल के बीच सीमा बनाती है। घाघरा रामायण काल में सरयू कोसल जनपद की प्रमुख नदी थी-सरयू नदी का ऋग्वेद में उल्लेख है और यह कहा गया है कि यदु और तुर्वसस ने इसे पार किया था। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में सरयू का नामोल्लेख किया है। पद्मपुराण के उत्तरखंड में भी सरयू नदी का माहात्म्य वर्णित है। सरयू नदी अयोध्यावासियों की बड़ी प्रिय नदी थी।----
- सत्यानाशी एक प्रकार का औषधीय पौधा है। शरीर में रोगों का नाश करने के अद्भुत गुण के कारण ही इसका नाम सत्यानाशी पड़ा। इस वनस्पति का उद्गम अमेरिका से माना जाता है लेकिन अब यह सम्पूर्ण भारतवर्ष में समुद्रतल से 1500 मीटर तक कि उंचाई तक मिल जाती है। पर्वतीय क्षेत्र में भी ढलानों पर इस कंटीली वनस्पति को देखा जा सकता है। इसे स्वर्णक्षीरी,भड-भाड़, फिरंगी धतूरा जैसे नामों से जाना जाता है ।इस वनस्पति का लेटीन नाम आरगेमोन मेक्सिकाना है जिसे अंग्रेजी में मेक्सिकन पोपी के नाम से भी जाना जाता है । इसके 2 से 4 फुट की झाड़ी में छोटे-छोटे कांटेदार पत्तियां इसकी खास पहचान है। यह वनस्पति कुमांऊं एवं गढ़वाल (जौनसार) के हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली लुप्त होने के खतरे का सामना कर रही इथनो-मेडिसिनल वनस्पतियों के अंतर्गत आती है। मेक्सिको में इसे सुखाकर औधषीय बनाई जाती है और इसका इस्तेमाल रीनल-कोलिक (किडनी में होनेवाले दर्द ) एवं प्रसव वेदना को कम करने के लिए किया जाता रहा है । स्पेनिश लोगों द्वारा भी इसका कारडोसानटो नाम से मदहोश एवं वेदना कम करने वाली चाय को बनाने में प्रयोग किया जाता रहा है । इसके बीज विषैले होते हंै इसलिए खाने योग्य नहीं होते हैं । सरसों के तेल में इसके बीजों की मिलावट के कारण ही वर्ष 1998 में भारत देश में ड्राप्सी हुआ था।यह रेचक गुणों के साथ-साथ तिक्त,भेदन एवं उत्क्लेश करने वाली औषधि है ,जिसका प्रयोग पेट के कीड़ों से लेकर, खुजली, विष, आनाह, कफ़-पित्त एवं त्वचा रोगों में किया जा सकता है । इसके अलावा कई रोगों के उपचार में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
- बोरोबुदुर अथवा बरबुदुर इंडोनेशिया के मध्य जावा प्रान्त के मगेलांग नगर में स्थित 9वीं सदी का महायान बौद्ध मन्दिर है। यह छ: वर्गाकार चबूतरों पर बना हुआ है जिसमें से तीन का ऊपरी भाग वृत्ताकार है। यह 2,672 उच्चावचो और 504 बुद्ध प्रतिमाओं से सुसज्जित है। इसके केन्द्र में स्थित प्रमुख गुंबद के चारों और स्तूप वाली 72 बुद्ध प्रतिमाएं हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा और विश्व के महानतम बौद्ध मंदिरों में से एक है।इसका निर्माण 9वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ। मंदिर की बनावट जावाई बुद्ध स्थापत्यकला के अनुरूप है जो इंडोनेशियाई स्थानीय पंथ की पूर्वज पूजा और बौद्ध अवधारणा निर्वाण का मिश्रित रूप है। मंदिर में गुप्त कला का प्रभाव भी दिखाई देता है जो इसमें भारत के क्षेत्रिय प्रभाव को दर्शाता है मगर मंदिर में स्थानीय कला के दृश्य और तत्व पर्याप्त मात्रा में सम्मिलित हैं जो बोरोबुदुर को अद्वितीय रूप से इंडोनेशियाई निगमित करते हैं। स्मारक गौतम बुद्ध का एक पूजास्थल और बौद्ध तीर्थस्थल है। तीर्थस्थल की यात्रा इस स्मारक के नीचे से आरम्भ होती है और स्मारक के चारों ओर बौद्ध ब्रह्माडिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तरों कामधातु (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) से होते हुये शीर्ष पर पहुंचता है। स्मारक में सीढिय़ों की विस्तृत व्यवस्था और गलियारों के साथ 1460 कथा उच्चावचों और स्तम्भवेष्टनों से तीर्थयात्रियों का मार्गदर्शन होता है। बोरोबुदुर विश्व में बौद्ध कला का सबसे विशाल और पूर्ण स्थापत्य कलाओं में से एक है।साक्ष्यों के अनुसार बोरोबुदुर का निर्माण कार्य 9वीं सदी में आरम्भ हुआ और 14वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश के पतन और जावाई लोगों द्वारा इस्लाम अपनाने के बाद इसका निर्माण कार्य बंद हुआ। इसके अस्तित्व का विश्वस्तर पर ज्ञान 1814 में सर थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स द्वारा लाया गया और इसके इसके बाद जावा के ब्रितानी शासक ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। बोरोबुदुर को उसके बाद कई बार मरम्मत करके संरक्षित रखा गया। इसकी सबसे अधिक मरम्मत, यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध करने के बाद 1975 से 1982 के मध्य इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को द्वारा की गई।बोरोबुदुर अभी भी तीर्थयात्रियों के लिए खुला है और वर्ष में एक बार वैशाख पूर्णिमा के दिन इंडोनेशिया में बौद्ध धर्मावलम्बी स्मारक में उत्सव मनाते हैं। बोरोबुदुर इंडोनेशिया का सबसे अधिक दौरा किया जाने वाला पर्यटन स्थल है।---
- राजस्थान, एक बेहद ही खूबसूरत राज्य है। अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाने वाला ये राज्य हमेशा सबको "पधारो म्हारे देश" के नारे के साथ अपनी खूबसूरती दिखाने के लिए न्यौता देता है। आदर-सत्कार और परंपराओं को मानने वाले इस राज्य को देखना दुनिया भर के पर्यटक आते हैं। राजस्थान की खूबसूरती अतुल्य है, इसका कोई मेल नहीं। राजस्थान में बहुत कुछ है देखने, समझने के लिए। इसमें से एक जयपुर के पास ही सांभर नाम की एक झील भी है। जो समुद्र तल से 1,200 फुट की ऊंचाई पर है। भरे रहने पर इसका क्षेत्रफल 90 वर्ग मील में फैला रहता है। सांभर झील में तीन नदियां आकर गिरती हैं। इस झील की दिलचस्प बात ये है कि इससेे बड़े पैमाने पर नमक का उत्पादन किया जाता है।विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस नमक का स्रोत, अरावली के शिष्ट और नाइस के गर्तों में भरा हुआ गाद है। इस गाद में घुलने वाला सोडियम बारिश के पानी में घुसकर नदियों के रास्ते झील में आता है और नमक के रूप में रह जाता है। सांभर झील की पौराणिक मान्यताएं महाभारत के अनुसार सांभर झील वाला क्षेत्र असुर राज वृषपर्वा के साम्राज्य का एक हिस्सा था और यहां असुरों के कुलगुरु शुक्राचार्य रहते थे। इसी जगह पर शुक्राचार्य की बेटी देवयानी का विवाह नरेश ययाति के साथ हुआ था। झील के पास ही एक मंदिर भी है जो देवयानी को समर्पित है।एक हिंदू मान्यता के की मुताबिक, चौहान राजपूतों की रक्षक शाकम्भरी देवी ने यहां के एक वन को कीमती धातुओं के मैदान में बदल दिया था। लोग इस प्रॉपर्टी को लेकर होने वाले झगड़ों से परेशान हो गए और सांबर झील को एक वरदान की जगह अभिषाप समझने लगे। इतना ही नहीं, लोगों का कहना है कि उन्होंने देवी से अपना वरदान वापस लेने की प्रार्थना की तो देवी ने सारी चांदी को नमक में बदल दिया। यहां एक मंदिर भी है जो शाकंभरी देवी को समर्पित है। सांभर झील जाने के लिए अक्टूबर से मार्च तक के महीने सबसे बढिय़ा हैं। क्योंकि सांभर राजस्थान में है, और राजस्थान एक गर्म वातावरण वाला राज्य है, इसलिेए मई, जून का समय यहां घूमने के लिए बिल्कुल सही नहीं है। इसके अलावा, जुलाई से सितंबर में भी जाने का कोई लाभ नहीं क्योंकि ये मानसून का मौसम होता है और बरसात में आपको नमक की खेती देखने को नहीं मिलेगी।राजस्थान की सांभर झील पर्यटकों के साथ-साथ बॉलीवुड इंडस्ट्री के लोगों को भी खूब पसंद आ रही है। फिल्म निर्देेशक राजकुमार हिरानी की सुपर हिट फिल्म पीके के कुछ सीन यहां फिल्माए गए थे। इसके अलावा राकेश ओमप्रकाश की फिल्म दिल्ली 6, संजयलीला भंसाली की रामलीला और संजय दत्त पर फिल्माई गई फिल्म शेर जैसी अन्य फिल्मों की शूटिंग यहीं पर हुई है। झील के पास की जमीन का एक बड़ा हिस्सा सूखा है। इस हिस्से का फायदा फिल्म निर्माताओं को होता है क्योंकि वो यहां अपनी फिल्म के लड़ाई के सीन शूट कर सकते हैं। शाकम्भरी माता मंदिर के पास खुले मैदान में जोधा अकबर, द्रोणा और वीर जैसी कई बॉलीवुड की फिल्मों के लड़ाई वाले सीन शूट किए हैं। इसके अलावा फिल्म रामलीला के भी कुछ सीन देवयानी मंदिर के पास फिल्माए गए थे।
- यदि आपसे पूछा जाए कि क्या आप सार्वजनिक जगहों पर ऐसे टॉयलेट का इस्तेमाल करना पसंद करेंगे जिसकी दीवारें पारदर्शी कांच की बनी हों , तो आपका जवाब ना ही होगा। लेकिन जापान में ऐसे टॉयलेट लोग बिना किसी डर और झिझक के इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि ये पब्लिक टॉयलेट एक ऐसी तकनीक से बनाए गए हैं, कि इस्तेमाल करते समय यह पारदर्शी नहीं रहते, यानी बाहर से अंदर का कुछ भी नहीं दिखता है।जापान में लोग ऐसे टॉयलट का यूज आसानी से कर रहे हैं और उनकी निजता पर इसका कोई असर भी नहीं पड़ रहा है। अपनी पावरफुल और एडवांस तकनीक के लिए पूरी दुनिया में मशहूर जापान ने एक ऐसा टॉयलेट बनाया है जिसके बारे में जानकर आपको हैरानी होगी। पारदर्शी होने से बाहर से ही यह पता चल जाता है कि कोई इसमें छिपा तो नहीं बैठा है और साफ-सफाई भी बाहर से ही पता लग जाती है।जापान की राजधानी टोक्यो स्थित पार्कों में ट्रांसपेरेंट पब्लिक टॉयलेट इंस्टॉल किए गए हैं ताकि इसका इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को बाहर से ही इसकी साफ-सफाई और उपलब्धता का पता चल सके। एक नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए शिगेरु बैन आर्किटेक्ट्स ने इन शौचालयों की बाहरी दीवारों को कांच का बनाया है जो इस्तेमाल करते समय पारदर्शी नहीं रहते हैं।कांच के बने ये ट्रांसपेरेंट शौचालय, प्रित्जकर पुरस्कार विजेता वास्तुकार शिगेरू बान और एक दर्जन से अधिक अन्य प्रमुख डिजाइनरों ने बनाए हैं। इनमें इस्तेमाल किए गए कांच को स्मार्ट ग्लास कहते हैं जो क्यूबिकल में होने पर अपारदर्शी बन जाते हैं। ये शौचालय गैर-लाभकारी निप्पॉन फाउंडेशन द्वारा आयोजित टोक्यो टॉयलेट प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में हाल के महीने में राजधानी के शिबुया इलाके के पांच जगहों पर खुले हैं। हालांकि ये शौचालय जोखिम भरा लग सकता है, लेकिन इनका उद्देश्य सार्वजनिक शौचालयों के बारे में लोगों की धारणाओं को बदलना है।ॉ----
- खूबसूरत डांसर और स्ट्रिपर रहीं माता हारी का नाम डबल एजेंट्स की लिस्ट में बहुत ऊपर आता है। वे जर्मनी और फ्रांस के लिए जासूसी करती थीं। जर्मनी से आए एक टेलीग्राम के पकड़े जाने पर उनके लिए मुश्किलें पैदा हुईं. फ्रांस को उन पर शक हुआ. इसी शक के आधार पर 24 और 25 जुलाई, 1917 को पेरिस के बाहर किसी जगह बंद दरवाजों के पीछे आरोपों की सुनवाई हुई। दोषी पाए जाने पर उसी साल 15 अक्टूबर को माता हारी को गोली मार दी गई।माता हारी 1905 में पेरिस पहुंची थीं। नृत्य में अपने खास अंदाज की वजह से बहुत जल्दी लोकप्रियता मिली। फिर डांस की प्रस्तुतियों के लिए ही वह पूरे यूरोप में काफी यात्राएं करने लगीं। उनके जन्म के बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हुईं, जैसे कि माता हारी का जन्म किसी पवित्र भारतीय मंदिर में हुआ जहां कि पुजारिन ने उन्हें प्राचीन तरह का नृत्य सिखाया। कहानियों में यह भी बताया गया कि उनका प्रचलित नाम माता हारी भी उसी पुजारिन का दिया हुआ था। मलय भाषा में इस नाम का अर्थ होता है दिन की आंख। असल में उनका जन्म 1876 में नीदरलैंड्स में हुआ था और उनका असली नाम मार्गरेटा गैट्रुइडा सेले था।पहले विश्व युद्ध के समय तक माताहारी एक डांसर और स्ट्रिपर के रूप में मशहूर हो गई थीं। उनका कार्यक्रम देखने कई देशों के लोग और सेना के बड़े अधिकारी पहुंचा करते थे। इसी मेलजोल के दौरान गुप्त जानकारियां एक से दूसरे पक्ष को दी जाने लगीं। फरवरी 1917 में कुछ फ्रांसीसी अधिकारियों ने जासूसी के आरोप में माता हारी को गिरफ्तार करवाया। मुकदमे में उन पर गुप्त जानकारी दुश्मन पक्ष को देने का आरोप सिद्ध हुआ। 15 अक्टूबर 1917 को उनकी आंखों पर पट्टी बांध कर उन्हें गोली से उड़ाने की सजा दी गई, लेकिन मर कर भी वे जासूसी जगत में हमेशा के लिए अमर हो गईं।
- 21वीं सदी में चीजों के बारे में जानना बेहद आसान हो गया है, जैसे बारिश कब होगी, तूफान कब आएगा आदि। लेकिन अगर प्राचीन समय की बात की जाये तो मौसम की जानकारी जुटाना यकीनन काफी मुश्किल होता रहा होगा। लेकिन भारत में एक गांव ऐसा है , जहां के एक मंदिर से लोगों को मानसून का पूर्वानुमान हो जाता है।यकीनन सुनने में यह काफी अटपटा है, लेकिन आइये जानते हैं इस खास जगह के बारे में ...ये जगह उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर से करीबन 50 किमी की दूरी पर स्थित बेहटा गांव है। कहा जाता है कि, यहां मौजूद भगवान जगन्नाथ का मंदिर किसानों को मानसून के आने की सटीक सूचना प्रदान करता है। आप सोच रहे होंगे कैसे? कहा जाता है कि 5000 साल पुराने इस मंदिर में मानसून के आने से ठीक 15 पहले ही मंदिर की छत से पानी टपकना प्रारंभ हो जाता है। पानी के टपकने की गति से पता चलता है कि, गांव में इस बार कैसा मानसून रहेगा। बताया जाता है कि, इस मंदिर में पानी की बूंद तब तक टपकती रहती है जब तक गांव में मानसून की बारिश ना हो जाये। इतना ही नहीं , कहा जाता है कि, जितनी तीव्र गति से पत्थर से पानी टपकता है, बारिश भी हमेशा उतनी ही तेज होती है। मानसून के आते ही छत से पानी टपकना बंद हो जाता है। अगर बूंद छोटी हो तो सूखे की आशंका माना जाता है। बहुत से वैज्ञानिकों और पुरातत्व विशेषज्ञों ने मंदिर से गिरने वाली बूंदों की पड़ताल की, लेकिन सदियां बीत गई, इस रहस्य को कोई नहीं जान पाया। मंदिर एक विशाल पत्थर को काटकर बनाया गया है जिसकी छत भी पत्थर की ही है।आपको जानकर हैरानी होगी, कि मंदिर के आसपास पानी का कोई स्त्रोत मौजूद नहीं है फिर कड़कती धूप में इस मंदिर की छत से पानी टपकना अद्भुत है, कोई नहीं जानता कि पानी की यह बूंदे कैसे और कहां से आती है? इसी भविष्यवाणी पर आस-पास के 100 गांवों के किसान खेतों की बुआई की तैयारी शुरू करते हैं। फिलहाल, अब यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन यहां भव्य विशाल शोभा यात्रा निकाली जाती है।
- शुक्र ग्रह पर वैज्ञानिकों को जीवन के संकेत मिले हैं। शुक्र ग्रह के वातावरण में फॉस्फीन गैस की मौजूदगी से वैज्ञानिकों को लगता है कि वहां जीवन होने की संभावना हो सकती है।इस खोज के बाद धरती के बाहर जीवन के संकेत के बारे में वैज्ञानिक उत्साहित हैं। हालांकि शोधकर्ताओं ने शुक्र ग्रह पर वास्तविक जीवन के रूपों की खोज नहीं की है, लेकिन यह माना है कि पृथ्वी पर फॉस्फीन गैस तब बनती है जब बैक्टीरिया ऑक्सीजन की गैरमौजूदगी वाले वातावरण में उसे उत्सर्जित करते हैं।हवाई में जेम्स क्लार्क मैक्सवेल टेलीस्कोप की मदद से अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने सबसे पहले फॉस्फीन की खोज की और उसके बाद चिली में स्थित एटाकामा लार्ज मिलीमीटर/सब मिलीमीटर ऐरे रेडियो टेलीस्कोप की मदद से इसकी पुष्टि की। जर्नल नेचर एस्ट्रोनॉमी में छपे इस शोध के मुख्य लेखक और कार्डिफ यूनिवर्सिटी के खगोल विज्ञानी जेन ग्रीव्स कहते हैं, मैं बहुत ही आश्चर्यचकित था, वास्तव में मैं दंग रह गया।पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश वैज्ञानिक लंबे समय से कर रहे हैं और इसकी तलाश के लिए वैज्ञानिक खोज और टेलीस्कोप की मदद ले रहे हैं ताकि उन्हें बायो सिग्नेचर मिल सके, जो हमारे सौर मंडल और उससे आगे के अन्य ग्रहों और चांद पर जीवन के अप्रत्यक्ष संकेत दे।शोध की सह-लेखिका क्लारा साउसा-सिल्वा कहती हैं, हमें जो भी शुक्र के बारे में पता है, वह फॉस्फीन का सबसे मुमकिन स्पष्टीकरण है, जैसा कि काल्पनिक हो सकता है, यह जीवन है। साउसा-सिल्वा कहती है, यह महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर यह फॉस्फीन गैस है और जीवन है तो इसका मतलब है कि हम अकेले नहीं है। वे इस खोज के बारे में आगे कहती हैं, इसका मतलब है जीवन खुद बहुत सामान्य होना चाहिए और हो सकता है कि आकाशगंगा में कई और ग्रह हो सकते हैं जहां जीवन हो।ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक एलन डफी ने इस खोज पर खुशी का इजहार करते हुए कहा कि यह पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन की मौजूदगी होने का सबसे रोमांचक संकेत है. जिस तरह से मंगल ग्रह पर वैज्ञानिक जीवन की संभावनाओं को देख रहे हैं उस तरह से शुक्र ग्रह पर वे ध्यान नहीं देते आए हैं।फॉस्फीन-एक फास्फोरस का कण और तीन हाइड्रोजन के कणों से मिलकर बनता है, यह इंसान के लिए बहुत जहरीला होता है। शुक्र का वायुमंडल बहुत ही जहरीला है और वहां का तापमान 471 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, इतना गर्म की सीसा भी पिघल जाए।
- भारत की पवित्र नदियों की एक लंबी श्रंृखला है। इन्हीं में से एक है गोमती नदी, जो गंगा नदी की सहायक नदी है। पुराणों के अनुसार गोमती नदी को ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की पुत्री माना गया है। पुराणों में कहा गया है कि एकादशी को इस नदी में स्नान करने से मानव के संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार गोमती भारत की उन पवित्र नदियों में से है जो मोक्ष प्राप्ति का मार्ग हैं।पौराणिक मान्यता ये भी है कि रावण वध के पश्चात ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान श्री राम ने भी अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ के आदेशानुसार इसी पवित्र पावन आदि-गंगा गोमती नदी में स्नान किया था एवं अपने धनुष को भी यहीं पर धोया था और स्वयं को ब्राह्मण की हत्या के पाप से मुक्त किया था।गोमती के किनारे भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने अपने अपराध का प्रायश्चित किया था। भगवान बुद्ध ने इसके तटों पर विश्राम किया था और धम्म के उपदेश दिए होंगे। चीनी यात्री ह्वेनसांग इसके किनारों से होकर गुजरे थे। पृथ्वीराज चौहान के शत्रु बने राजा जयचंद ने मशहूर योद्धा बंधुओं आल्हा- ऊदल को पासी और भारशिवों का दमन करने के लिए यहां भेजा था। मुगल बादशाह अकबर ने यहीं पर वाजपेय यज्ञ कराने के लिए एक लाख रुपये ब्राह्मणों को दिये थे और तब गोमती का तट वैदिक ऋचाओं से गूंज उठा था। गोस्वामी तुलसीदास की प्रिय नदी यही धेनुमती तो थी। लोगों का मानना है कि जो भी व्यक्ति गंगा दशहरा के अवसर पर यहां स्नान करता है, उसके सभी पाप आदि गंगा गोमती नदी में धुल जाते हैं। गोमती नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से हुआ है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ इस नदी के किनारे बसी हुई है। यह वाराणसी के निकट सैदपुर के पास कैथी नामक स्थान पर गंगा में मिल जाती है।
- कोरोना महामारी शुरू होने के महीनों बाद भी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद पड़ी हैं। भारत और इन देशों के बीच कुछ सीमित उड़ानें चल रही हैं। सूची में और देशों को जोडऩे पर बात चल रही है। भारत ने 13 देशों के साथ एयर बबल बनाएं हैं। एयर बबल बनाने का मकसद किन्हीं दो देशों में अटके वहां के नागरिकों को सुरक्षित वापस लाना होता है। अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस के साथ जुलाई से ही भारत ने एयर बबल शुरू कर दिया था।कोरोना महामारी शुरू होने पर उन लोगों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा जिनका वीजा खत्म हो रहा था या जिन्हें नौकरी या पढ़ाई के लिए दूसरे देश में जाना था। शुरू में वंदे भारत मिशन के तहत भारत ने कुछ स्पेशल उड़ानें चलाईं और दुनिया भर से भारतीयों को देश वापस लाया गया। फिर धीरे- धीरे एयर बबल की शुरुआत हुई। वंदे भारत मिशन से अलग एयर बबल के तहत एक व्यक्ति किसी देश में जा कर वहां से लौट भी सकता है। इसके तहत नियमित रूप से उड़ानें चल रही हैं लेकिन यात्री को ठोस वजह देने के बाद ही सफर की अनुमति मिलती है। कोरोना काल में यूरोप के तीन छोटे छोटे बाल्टिक देशों - एस्टोनिया, लिथुआनिया और लातविया ने सबसे पहले एयर बबल बनाए थे। इसकी सफलता के बाद बाकी देशों ने भी ऐसा करना शुरू किया। अमेरिका, जापान, कनाडा, कतर, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, अफगानिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, इराक, नाइजीरिया, बहरीन, इन 13 देशों के साथ भारत ने एयर बबल समझौता किया है। जर्मनी की लुफ्थांसा एयरलाइंस ने भारत और जर्मनी के बीच उड़ान भरने से मना कर दिया है। उसका आरोप है कि उसे तय उड़ानें नहीं भरने दी जा रही हैं, जबकि भारत का कहना है कि एयर इंडिया की तीन से चार उड़ानों की तुलना में लुफ्थांसा हफ्ते में 20 उड़ानें भर रहा था। मौजूदा समझौते के तहत भारतीय नागरिक, ओसीआई कार्ड होल्डर और भारत का वीजा रखने वाले विदेशी भारत आ सकते हैं।इसी तरह भारत में रहने वाले विदेशी नागरिक या उस देश का वीजा रखने वाले भारतीय भी यात्रा कर सकते हैं। भारत पहुंचने पर यात्रियों को 14 दिन का क्वॉरंटीन करना अनिवार्य है। इसमें 7 दिन सरकार द्वारा निर्धारित जगह पर और 7 दिन घर में क्वॉरंटीन किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति ने यात्रा से 96 घंटे पहले तक अपना कोविड टेस्ट कराया हो, तो वह क्वॉरंटीन से बच सकता है। इस तरह की उड़ानों में एयर हॉस्टेस आपको खाना देने या सामान बेचने के लिए नहीं आती हैं। जहां जुलाई से अक्टूबर के बीच गर्मियों के मौसम में भारत से बड़ी संख्या में लोग यूरोप घूमने आया करते थे, वहीं इस साल टूरिज्म उद्योग बिलकुल ही ठप रहा। एयर बबल समझौते देशों के लिए व्यापार और कुछ हद तक टूरिज्म के दरवाजे भी खोलते हैं जिन पर कोरोना महामारी के कारण काफी बुरा असर हुआ है। इस वक्त कुल 13 देशों के साथ एयर बबल चल रहे हैं लेकिन 13 और देशों के साथ भी बात चल रही है। इनमें इटली, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, इस्राएल, कीनिया, फिलीपींस, रूस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड शामिल हैं।----
- वैज्ञानिकों ने एक नए ब्लैक होल का पता लगाया है जो अब तक का सबसे पुराना बताया जा रहा है। इसका भार हमारे सूरज के द्रव्यमान से करीब 142 गुना ज्यादा है।आमतौर पर माना जाता है कि ब्लैक होल इतने घने होते हैं कि इनके गुरुत्वाकर्षण बल से होकर प्रकाश की किरणें भी नहीं गुजर सकतीं। इस समझ के हिसाब से तो ब्लैकहोल के अस्तित्व पर ही सवाल उठ जाते हैं। दो दूसरे ब्लैकहोल के मिलने से बने इस ब्लैक होल को फिलहाल जीडब्ल्यू 190521 कहा जा रहा है। करीब 1500 वैज्ञानिकों के दो संघों ने इस बारे में कई रिसर्चों के बाद जानकारी दी है। रिसर्च रिपोर्ट के सहलेखक स्टारवरोस कात्सानेवास यूरोपियन ग्रैविटेशन ऑब्जर्वेटरी में खगोल भौतिकविज्ञानी हैं। उनका कहना है, इस घटना ने ब्लैक होल के बनने की खगोलीय प्रक्रिया पर से पर्दा उठाया है। यह एक पूरी नई दुनिया है।इस कथित स्टेलर क्लास ब्लैक होल का निर्माण तब होता है जब कोई बूढ़ा तारा मर जाता है और आकार में 3-10 सूरज के बराबर होता है। भारी द्रव्यमान वाले ब्लैक होल ज्यादातर गैलैक्सियों के केंद्र में पाए जाते हैं. इनमें मिल्की वे भी शामिल है। इनका भार करोड़ों से अरबों सौर द्रव्यमान के बराबर होता है।अब तक सूरज की तुलना में 100 से 1000 गुना ज्यादा मास वाले ब्लैक होल नहीं मिले हैं। रिसर्च रिपोर्ट की सहलेखिका मिषाएला यूनिवर्सिटी ऑफ पडोवा में खगोल भौतिकविज्ञानी हैं। उनका कहना है, इतने अधिक द्रव्यमान की रेंज वाला यह पहला ब्लैक होल है जिसके बारे में प्रमाण मिला है। यह ब्लैक होल के खगोल भौतिकविज्ञान में बड़ा बदलाव लाएगा। मिषाएला के मुताबिक इस खोज से इस विचार को समर्थन मिलता है कि विशालकाय ब्लैक होल का निर्माण मध्य आकार वाले ब्लैक होलों के बार बार आपस में जुडऩे से हो सकता है।ब्लैक होल और सितारे का मेलवास्तव में वैज्ञानिकों ने सात अरब साल से भी पहले की गुरुत्वाकर्षणीय तरंगों को देखा है। ये तरंगें सूरज से 85 और 65 गुना वजनी ब्लैक होल के आपस में मिलने से जीडब्ल्यू 190521 ब्लैक होल के निर्माण के दौरान पैदा हुईं थीं। जब ये ब्लैकहोल आपस में टकराए तो आठ सूरज के वजन जितनी ऊर्जा निकली। इसे ब्रह्मांड में बिग बैंग के बाद की सबसे बड़ी घटना माना जाता है। गुरुत्वीय तरंगों को सबसे पहले सितंबर 2015 में मापा गया था। दो साल बाद इसकी खोज करने वाले रिसर्चरों को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सापेक्षता के सिद्धांत में गुरुत्वीय तरंगों का अनुमान लगाया था। इस सिद्धांत के मुताबिक ब्रह्मांड में ये तरंगें प्रकाश की तेजी से फैल जाती हैं।ब्लैक होल की कहानी में नई चुनौतीजीडब्ल्यू 190521 की खोज 21 मई 2019 को तीन इंटरफेरोमीटरों के जरिए हुई थी। ये उपकरण पृथ्वी से गुजरने वाली गुरुत्वीय तरंगों में किसी परमाणु नाभिक से हजार गुना छोटे आकार के परिवर्तन को भी माप सकती हैं। मौजूदा जानकारी के मुताबिक किसी तारे के गुरुत्वीय विखंडन से सूरज के भार की तुलना में 60-120 गुना वजनी ब्लैक होल का निर्माण नहीं हो सकता। तारों के विखंडन के तुरंत बाद होने वाला सुपरनोवा विस्फोट इनके टुकड़े- टुकड़े कर देता है।ब्लैकहोल के बनने की अब तक की कहानी में इस घटना ने एक नई चुनौती पैदा कर दी ह। यह इस बात का भी संकेत है कि अब तक कितनी कम जानकारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रह्मांड का एक विशालकाय भाग अब भी हमारे लिए अज्ञात है। हालांकि वैज्ञानिक इस खोज से चकित हैं। नई जानकारी देने वाली दोनों रिसर्च रिपोर्टें फिजिकल रिव्यू लेटर्स और एस्ट्रो फिजिकल जर्नल लेटर्स में छापी गई हैं। रिपोर्ट तैयार करने वाले दो संघों में एक है लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी यानी लिगो। इसमें प्रमुख रूप से एमआईटी और कैलटेक के वैज्ञानिक हैं। दूसरा संघ है विर्गो कोलैबोरेशन जिसमें पूरे यूरोप के 500 वैज्ञानिक हैं।
- -शुभि मिश्रामुगल सम्राट औरंगजेब के नाम पर महाराष्ट्र में एक शहर है-औरंगाबाद। औरंगाबाद शब्द का शाब्दिक अर्थ है सिंहासन द्वारा निर्मित । औरंगाबाद नगर मध्य-पश्चिम महाराष्ट्र राज्य के पश्चिमी भारत में कौम नदी के तट पर स्थित। यह खाड़की नाम से प्रसिद्ध है। औरंगाबाद नगर ने भारतीय इतिहास को कई करवटें लेते देखा है। इतिहास की परस्पर विरोधी धाराओं से टकराता हुआ औरंगाबाद अपने ख़ास व्यक्तित्व को लिए आज भी खड़ा है।यहां अतीत और वर्तमान के बीच सम्बन्ध सूत्र स्थापित हो गया है। पहले सातवाहनों और फिर वाकाटकों के हाथों में यहां की राजसत्ता आयी। इसके बाद यहां बादामी के चालुक्य वंश और राष्ट्रकूटों का शासन रहा। ऐश्वर्यशाली यादव वंश के उदय से पूर्व यहां कल्याणी के चालुक्य वंश का राज्य था।इस नगर की स्थापना 1610 ई. में मलिक अम्बर ने की थी। 1626 ई. में मलिक अम्बर के पुत्र फतेह ने इस नगर का नाम अपने नाम पर फतेहनगर रख दिया। कालांतर में मुग़ल शहंशाह औरंगज़ेब ने इसके समीप ही ताजमहल जैसा बीबी का मक़बरा बनवाया और नगर का नाम खाड़की से बदलकर औरंगाबाद कर दिया। बीबी का मकबरा आगरा स्थित ताजमहल की अनुकृति है। हैदराबाद की राजधानी बन जाने की वजह से, पहले स्वतन्त्र निज़ाम का मुख्यालय रह चुके इस शाहीनगर का विकास नहीं हो सका। 1947 में हैदराबाद के अधिमिलन के बाद यह भारतीय गणराज्य का अंग बन गया।इतिहास के अनुसार, सन् 1681 में औरंगजेब ने अपने अभियानों के लिए इस जगह को आधार बनाया था । मुगल साम्राज्य में भी इस जगह का इस्तेमाल किया गया था और छत्रपति शिवाजी पर जीत पाने के लिए यहां रणनीतियां भी बनाई जाती थी। भारत के केंद्र में होने की वजह से इस क्षेत्र को सबसे ज्यादा सुरक्षित माना जाता था क्योंकि इस इलाके में अफगानिस्तान और मध्य एशिया के हमलावरों से खतरा कम था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद यह शहर निजामों के अधीन हो गया। वर्ष 1956 में इस क्षेत्र को महाराष्ट्र राज्य में विलय कर लिया गया। इस शहर में मराठी और उर्दू मुख्य भाषाएं है। इस शहर को सिटी ऑफ गेटस भी कहा जाता है।इस शहर में बौद्ध धर्म का भी प्रभाव रहा। औरंगाबाद शहर से एक मील की दूरी पर सह्याद्रि की पहाडिय़ों पर औरंगाबाद की गुफाएं हैं। ये गुफाएं चालुक्य वंश के काल में छठी और सातवीं सदी ईस्वी के बीच बनायी गयीं। सभी गुफाएं बौद्ध धर्म से प्रेरित चैत्य एवं विहार हैं। परम्परा के अनुसार चैत्य गुफाएं धार्मिक पूजा-अर्चना और चिंतन-तपश्चर्या के लिए होती थी, तो विहार धर्मोपदेश के लिए सभागृह का काम करते थे।औरंगाबाद कलात्मक रेशमी वस्त्रों विशेषकर शॉल के लिए प्रसिद्ध है। मराठवाड़ा विश्वविद्यालय (1958) यहां का विख्यात शिक्षा केन्द्र है। जिससे अनेक महाविद्यालय संबद्ध हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घृष्णेश्वर मंदिर, जो महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में दौलताबाद से महज 11 किलोमीटर की दूरी पर है। ाराष्ट्र के दक्खन के पठार के मध्य में स्थित भारतीय इतिहास में ईसा पूर्व चौथी सदी से लेकर अठारहवीं सदी के बीच आये मोड़ों का प्रत्यक्ष साझीदार यह शहर आज तक अपने को सुरक्षित रख पाया है।
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दुनियाभर में लगभग 6,900 से भी ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से कई भाषा ऐसी हैं, जो हजारों साल पुरानी है। वहीं कई भाषा ऐसी भी हैं, जिनका अस्तित्व बहुत जल्द ही खत्म होने वाला है। क्योंकि इन भाषाओं को बोलने वाले मुश्किल से हजार लोग ही बचे हैं। कुछ इसी तरह की एक भाषा यघान है। अर्जेंटीना के एक द्वीप की ये मूल भाषा अब लगभग गायब हो चुकी है। यघान भाषा को लेकर हैरान करने वाली बात यह है कि इसे बोलने वाला एक ही शख्स जीवित है, जो एक महिला है।
यघान भाषा को अर्जेंटीना और चिली के बीच बसे टिएरा डेल फ्यूगो नामक द्वीप पर रहने वाले आदिवासी बोला करते थे। इस भाषा को संस्कृत से मिलता-जुलता माना जाता है। हालांकि, अब इसे बोलने वाली एकमात्र बुजुर्ग महिला है। इस भाषा को बोलने वाली इस महिला का नाम क्रिस्टिना काल्डेरॉन है। क्रिस्टिना को स्थानीय लोग अबुइला बुलाते हैं। अबुइला एक स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ दादी मां होता है। 14 पोते-पोतियों और ढेर सारे पड़पोते-पड़पोतियों के होने के बाद भी अब क्रिस्टिना के साथ उनकी मूल भाषा में बात करने वाला कोई नहीं। इसकी वजह ये है कि भाषा को जानने वाली उनकी बहनों की मौत हो चुकी हैं और परिवार के बाकी सदस्य स्पेनिश या अंग्रेजी जैसी भाषाएं बोलते हैं। हालांकि कई सदस्य भाषा समझते तो हैं लेकिन बोल नहीं पाते।यघान भाषा के अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए क्रिस्टिना को कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है। साल 2009 में चिली सरकार ने उन्हें लिविंग ह्यूमन ट्रेजर की उपाधि दी। यूनेस्को के तहत आने वाली ये उपाधि उन लोगों को मिलती है, जिन्होंने कल्चर को सहेजने में बेहद बड़ी भूमिका निभाई हो ।बंजारा समुदाय का भी था नामयघान एक भाषा ही नहीं बल्कि एक बंजारा समुदाय का नाम था, जो दक्षिणी अमेरिका से होते हुए चिली और अर्जेंटिना तक पहुंच आए। पुर्तगालियों ने सबसे पहले साल 1520 में इस कबीले के बारे में पता लगाया था। आज के समय में क्रिस्टिना यघान भाषा को सरकारी मदद से - जर्मनी में हर साल कद्दुओं यानी कुम्हड़े की प्रतियोगिता होती है जिसमें सबसे भारी कुम्हड़े के मालिक को इनाम दिया जाता है। इस साल का विजेता रहा 720.5 किलो का कद्दू।लुडविग्सबुर्ग पंपकिन फेस्टिवल के आयोजक इस साल के विजेता को देख कर हैरान हैं। 720.5 किलो के कद्दू ने यह प्रतियोगिता जीती है। आयोजक श्टेफान हिनेर का कहना था, कद्दू का आकार सच में हैरान करता है, खास कर जब आप देखते हैं कि यह भी उतने ही समय में उगा है जितने में छोटे कद्दू उगते हैं। दूसरे नंबर पर रहा 702.5 किलो के वजन वाला कद्दू और तीसरा स्थान मिला 617.5 किलो के कद्दू को। यह कद्दू जर्मनी के दक्षिणी प्रांत बवेरिया में उगा और इसके मालिक मिषाएल असम पिछले साल भी देश का सबसे भारी कद्दू उगा चुके हैं।आम तौर पर इस प्रतियोगिता के लिए एक बड़ा आयोजन किया जाता है, लेकिन इस साल कोरोना के चलते बिना दर्शकों के ही इसे आयोजित किया गया। जर्मनी में अब तक का सबसे भारी कद्दू रहा है 2018 का विजेता जिसका वजन था 916.5 किलो। दुनिया के सबसे भारी कद्दू का रिकॉर्ड बेल्जियम के कद्दू के नाम है जिसका वजन 1191.5 किलो था। गर्मियों के अंत में पहले कद्दुओं की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता होती है और फिर यूरोपीय स्तर की।
- अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है। आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं । इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। अग्रि को जो आहुति दी जाती है, वह स्वाहा के द्वारा देवताओं तक पहुंचती है। इसलिए किसी भी यज्ञ में स्वाहा शब्द का उच्चारण किया जाता है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियां प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूं, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।अग्निदेव की सात जिह्वाएं बतायी गयी हैं। उन जिह्वाओं के नाम हैं-- काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरूचि।पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या 49 है। भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।----


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