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- मानसून के मौसम में कई लोगों को सर्दी-झुकाम होने की परेशानी होने लगती है। यह मौसम जितना सुहावना होता है, उतना ही यह हेल्थ के लिए भी चुनौतीपूर्ण भी होता है। इस दौरान हवा में नमी बढ़ जाती है, जिससे बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं। यही वजह है कि सर्दी-जुकाम, गले में खराश, खांसी और वायरल इंफेक्शन के मामले बढ़ जाते हैं। ऐसे में प्राकृतिक घरेलू उपायों का महत्व और भी बढ़ जाता है, जिनमें अदरक और तुलसी की चाय सबसे प्रभावी मानी जाती है।अदरक और तुलसी की चाय कैसे है असरदार?यह एक आयुर्वेदिक ड्रिंक है, जो फ्रेश अदरक और तुलसी की पत्तियों को पानी या चाय में उबालकर बनाया जाता है। इसे सदियों से इम्यूनिटी बढ़ाने और मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।अदरक के क्या फायदे हैं?NIH की रिपोर्ट के मुताबिक, अदरक में प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। यह शरीर में गर्माहट बनाए रखने में मदद करता है और गले की सूजन, खांसी तथा जुकाम में राहत देता है। अदरक पाचन तंत्र को भी मजबूत करता है और मतली या अपच जैसी समस्याओं को कम करता है।तुलसी के क्या हैं फायदे?NCBI की रिपोर्ट में पाया गया है कि तुलसी को आयुर्वेद में काफी महत्वपूर्ण औषधि मानी जाती है। इसमें एंटी-वायरल, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को मजबूत करती है और श्वसन तंत्र को साफ रखने में मदद करती है। तुलसी का नियमित सेवन मौसमी संक्रमण से बचाव में काफी उपयोगी माना जाता है।मानसून में कैसे फायदेमंद है तुलसी और अदरक चाय?मानसून में वातावरण में नमी बढ़ने के कारण वायरस और बैक्टीरिया तेजी से फैलते हैं। ऐसे में अदरक और तुलसी की चाय शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को मजबूत करती है। यह गले को आराम देती है, बंद नाक खोलती है और शरीर में ऊर्जा बनाए रखती है।कैसे बनाएं अदरक और तुलसी की चाय?मानसून में तुलसी और अदरक की चाय काफी फायदेमंद होती है। इसे आप काफी आसान तरीके से बना सकते हैं, जैसे-आवश्यक सामाग्रीपानी - 1 कपतुलसी - 4–5 पत्तियांअदरक - 1 छोटा टुकड़ा कद्दूकस किया हुआविधिसबसे पहले एक पैन लें, इसमें पानी, तुलसी की पत्तियां और अदरक को कद्दूकस डालकर अच्छी तरह से उबाल लें। इसके बाद स्वाद के लिए हल्का शहद या नींबू मिला सकते हैं। इसे दिन में 1 से 2 बार पिएं। मुख्य रूप से सुबह या शाम के समय पीना फायदेमंद हो सकता है।ध्यान रखें कि अदरक और तुलकी की चाय सेहत के लिए सुरक्षित है, लेकिन काफी ज्यादा मात्रा में सेवन से बचना चाहिए। लो ब्लड प्रेशर या किसी गंभीर बीमारी के मरीज डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसका नियमित उपयोग करें।
- जब हम बहुत देर चलकर आते हैं उस दिन पैरों में सूजन दिखती है जो अगले दिन तक उतर जाती है। ट्रैवल के दौरान भी ज्यादा देर बैठना पड़ता है या काम के दौरान ज्यादा देर बैठने से भी पैरों में सूजन हो जाती है, जो एक या दो दिन में ठीक हो जाती है, लेकिन जब सूजन कम न हो और समय के साथ बढ़ने लगे, तो यह चिंता की बात हो सकती है। जब हार्ट ठीक से काम नहीं करता है, तो ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है, इससे ब्लड नसों में जमा होने लगता है जिसके कारण टिशूज में फ्लूइड भर जाता है। जानें हार्ट की किन कंडीशन में पैरों में सूजन दिख सकती है?पैरों में सूजन के पीछे कई कारण हो सकते हैं जिनमें से एक हार्ट डिजीज भी है। हालांकि, पैर में सूजन होना हार्ट डिजीज का लक्षण नहीं है। हालांकि, जब हार्ट कमजोर होता है और ब्लड को ठीक से पंप नहीं कर पाता है तब हार्ट फेलियर की कंडीशन देखने को मिलती है जिसके कारण पैर, टखनों या पंजों में फ्लूइड भर जाता है और इसे ही लेग एडिमा या सूजन कहा जाता है। सूजन के अलावा सांस लेने में तकलीफ, वेट गेन या जल्दी थक जाने जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं। ऐसा नहीं है कि केवल हार्ट डिजीज के कारण ही पैरों में सूजन होती है। इसके पीछे अन्य कारण हो सकते हैं जैसे ब्लड क्लॉट, लिवर डिजीज, ज्यादा समय तक खड़ा रहने की आदत वगैरह। British Heart Foundation के मुताबिक, अगर पैर या टखनों में सूजन बनी रहे या अचानक से तेज हो जाए, तो यह हार्ट फेलियर का संकेत हो सकता है।कैसे पता करें सूजन की वजह हार्ट डिजीज है या नहीं?पैरों में सूजन का कारण हार्ट डिजीज है या नहीं, इसका कारण पता लगाने के लिए डॉक्टर ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, इकोकार्डियोग्राम, ब्लड टेस्ट, नसों का अल्ट्रासाउंड करा सकते हैं। इन जांच की मदद से यह पता चलता है कि पैरों में सूजन का कारण हार्ट डिजीज है या नहीं। साल 2016 में Circulation: Heart Failure में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, 4196 प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिन्हें पहले से कोई हार्ट डिजीज नहीं था। स्टडी के मुताबिक, पैरों की लगातार सूजन के साथ अगर सांस फूलना, सांस की परेशानी या थकान जैसे लक्षण नजर आएं, तो हार्ट हेल्थ की जांच होनी चाहिए।पैर में सूजन कब चिंता की बात है?-हल्की सूजन सामान्य बात है, लेकिन अगर सूजन लंबे समय तक बनी रहे, तो यह चिंता की बात है।-अगर दर्द अचानक शुरू हो जाए।-केवल एक पैर में सूजन हो रही हो।-पैर में गर्माहट या रेडनेस महसूस हो।-सांस लेने में तकलीफ या सीने में दर्द हो।-पैरों की सूजन के साथ वजन तेजी से बढ़ना या शरीर में पानी जमा होने के अन्य संकेत दिखाई दें।-त्वचा में बदलाव, जैसे रंग बदलना, घाव होना या नसों का ज्यादा उभरना दिखाई दे।-किडनी, लिवर, हार्ट या नसों से जुड़ी पहले से कोई बीमारी हो और पैरों में नई सूजन शुरू हो जाए।डॉक्टर से सलाह कब लें?-क्रॉनिक सूजन होने पर या सूजन के बढ़ने पर डॉक्टर से संपर्क करें।-सीने में दर्द या हार्ट डिजीज के लक्षण नजर आने पर लापरवाही न करें।-सांस लेने में तकलीफ होने पर या अनियमित हार्टबीट होने पर डॉक्टर से संपर्क करें।किसी भी असामान्य लक्षण नजर आने पर डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है क्योंकि फ्लूइड अगर फेफड़ों में भर जाए, तो उसे पल्मोनरी एडिमा कहा जाता है। यह जानलेवा हो सकता है इसलिए डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।निष्कर्ष:पैरों में सूजन हार्ट डिजीज का लक्षण नहीं है, लेकिन हार्ट फेलियर की कंडीशन में पैरों में सूजन हो सकती है। ब्लड टेस्ट, ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, इकोकार्डियोग्राम जैसी जांच की मदद से यह पता लगाया जाता है कि पैरों में सूजन के पीछे हार्ट डिजीज है या नहीं। अगर सीने में दर्द हो, सांस की तकलीफ हो, सूजन लगातार बढ़ रही हो, ताे डॉक्टर से संपर्क करना न भूलें।
- जामुन एक मौसमी फल है, जिसे लंबे समय से स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। कई लोग मानते हैं कि डायबिटीज को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है, लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? आइए इस बारे में जानें इसके फायदे, नुकसान और सावधानियों के बारे में।डायबिटीज में जामुन खाना फायदेमंद है?आयुर्वेद के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों के लिए जामुन का सेवन करने फायदेमंद होता है। इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होता है, साथ ही, इनमें अच्छी मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम, विटामिन ए और विटामिन सी जैसे बहुत से पोषक तत्व होते हैं और एंटीऑक्सीडेंट्स के गुण होते हैं, जिससे इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करने में मदद मिलती है। ध्यान रहे, ब्लड शुगर में जामुन का सेवन करना फायदेमंद हो सकता है, लेकिन यह इसका इलाज नहीं है। सिर्फ जामुन खाने से ब्लड शुगर को मैनेज नहीं किया जा सकता है। इसके लिए हेल्दी लाइफस्टाइल को फॉलो करना और बैलेंस डाइट लेना भी जरूरी है। जामुन में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, साथ ही, कई पोषक तत्व होते हैं। इसका सेवन करने से स्वास्थ्य को कई लाभ मिलती है।साल 2022 में molecules में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, जामुन के छिलके, गुदे और बीज में अच्छी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, पॉलीफेनोल्स, विटामिन्स और मिनरल्स जैसे कई जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इनको खाने से मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियां और टाइप-2 डायबिटीज जैसी गंभीर समस्याओं (मेटाबॉलिक सिंड्रोम) से लड़ने में मदद करता है।ब्लड शुगर को कंट्रोल करेजामुन में अच्छी मात्रा में फाइबर और लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है। इसका सेवन करने से पाचन की स्पीड स्लो हो जाती है, जिससे ब्लड में ग्लूकोज धीरे-धीरे पहुंचता है। इससे ब्लड शुगर के स्तर को अचानक से बढ़ने से रोकने में मदद मिलती है।इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करेंजामुन में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जिससे इसका सेवन करने से इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करने और इंसुलिन के कार्यों को बेहतर तरीके से करने में मदद मिलती है।पाचन में सुधार करेजामुन में अच्छी मात्रा में फाइबर होता है। इसका सेवन करने से पेट को लंबे समय तक भरा रखने, पाचन में सुधार करने और मेटाबॉलिज्म में सुधार करने में मदद मिलती है, जिससे क्रेविंग्स को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है।बार-बार पेशाब आने की समस्या से दे राहतडायबिटीज की समस्या में ज्यादातर लोग बार-बार पेशाब आने की समस्या से परेशान रहते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से इस समस्या से राहत देने और नींद की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिलती है।वजन को कंट्रोल करेजामुन में अच्छी मात्रा में फाइबर और लो कैलोरीज होती है। इसका सेवन करने से वजन को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। वजन को कम करने से ब्लड शुगर को मैनेज करने में भी मदद मिलती है।डायबिटीज में जामुन खाने के नुकसान?जामुन का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है और इसका खाना सेफ माना जाता है, लेकिन सीमित मात्रा में। इसके अलावा, कुछ स्वास्थ्य स्थितियों को खाने से बचना चाहिए। इसके अलावा, इनका ज्यादा सेवन करने के कारण भी स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है।लो ब्लड शुगरकई लोगों को लो ब्लड शुगर की समस्या होती है। ऐसे में इन लोगों को जामुन का सेवन करने से बचना चाहिए। इसका अधिक सेवन करने से ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा कम हो सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए परेशानी का कारण हो सकता है।पाचन से जुड़ी समस्याएंजामुन का जरूरत से ज्यादा सेवन करने से पेट से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसका ज्यादा सेवन करने से व्यक्ति को कब्ज, गैस, ब्लोटिंग और पेट में दर्द होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।एलर्जी होनेकुछ लोगों को जामुन से एलर्जी की समस्या हो सकती है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को इससे एलर्जी होती है, तो इसका सेवन करने से बचें।डायबिटीज में जामुन खाते समय किन बातों का ध्यान रखें?डायबिटीज में जामुन का सेवन सीमित मात्रा में ही करें, ताजा जामुन खाएं, ज्यादा नमक और मसाला लगाकर खाने से बचें, ब्लड शुगर की दवाइयों का सेवन करने के दौरान इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।सावधानियांध्यान रहे, जामुन से किसी भी तरह की एलर्जी, लो ब्लड शुगर या परेशानी होने पर इसका सेवन करने से बचें। इसके अलावा, दवाइयों का सेवन करने या मेडिकल कंडीशन की स्थिति में इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें, साथ ही, ब्रेस्टफीडिंग या प्रेग्नेंट महिलाओं को इसका सेवन करने से डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।निष्कर्षडायबिटीज में जामुन का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। इसका सेवन करने से ब्लड शुगर को कंट्रोल करने, बार-बार यूरिन आने, इंसुलिन सेंसिटिव में सुधार करने, पाचन में सुधार करने, बार-बार पेशाब करने और वजन को कंट्रोल करने में मदद मिलती है, लेकिन ध्यान रहे, लो ब्लड शुगर, इससे एलर्जी होने या पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में इसका सेवन सीमित मात्रा में करें और डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
- एक कहावत है कि जब किसी भी चीज की अधिकता हो जाए, तो वह फायदे की जगह नुकसान पहुंचाने लगती है। कैल्शियम के साथ भी कुछ ऐसा ही है। हम बचपन से दादी-नानी से सुनते आए हैं कि दूध पिओ, पनीर खाओ। इससे शरीर को कैल्शियम मिलेगा और हड्डियां मजबूत होंगी। एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। खासकर बच्चों के शरीर के लिए। सही समय पर इसकी पहचान न हो, तो यह गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। ब्लड में कैल्शियम की अधिकता को मेडिकल भाषा में हाइपरकैल्सीमिया (Hypercalcemia) कहा जाता है।कैल्शियम लेवल को कंट्रोल करते हैं ये दो हार्मोनहमारा शरीर कई चीजों को कंट्रोल करता है जिसमें से एक है ब्लड में कैल्शियम लेवल को बनाए रखना। दो ऐसे हार्मोन हैं जो ब्लड और हड्डियों में कैल्शियम लेवल को कंट्रोल करने का काम करते हैं। पहला है पैराथायराइड हार्मोन (Parathyroid Hormone) और दूसरा है कैल्सीटोनिन (Calcitonin Hormone)। हालांकि, हाइपरकैल्सीमिया जैसी मेडिकल कंडीशन की वजह से ब्लड में कैल्शियम का लेवल ज्यादा हो जाता है। सामान्य व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लेवल को एब्जॉर्ब कराने में विटामिन डी भी अहम भूमिका निभाता है।बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने के क्या कारण हो सकते हैं?-गंभीर डिहाइड्रेशन।-विटामिन डी की अधिक मात्रा। ऐसा बच्चों में विटामिन डी सप्लीमेंट का अधिक सेवन करने की वजह से भी होता है।-पैराथायराइड हार्मोन का ज्यादा बनना।-दुर्लभ जेनेटिक रोग।-लंबे समय तक खाई जाने वाली कुछ दवाएं।-किडनी डिजीज या अन्य गंभीर बीमारी।-साल 2025 में Endokrynologia Polska (Polish Journal Of Endocrinology) में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने के पीछे कई फैक्टर्स हो सकते हैं जैसे उम्र, पैराथायराइड हार्मोन, विटामिन डी का लेवल, आनुवंशिक कारक वगैरह।किन बच्चों को हाइपरकैल्सीमिया का खतरा ज्यादा होता है?-पैराथायराइड ग्रंथि की बीमारी वाले बच्चे-किडनी की समस्या से जूझ रहे बच्चे-लंबे समय तक दवाएं लेने वाले बच्चे-जरूरत से ज्यादा विटामिन डी या कैल्शियम सप्लीमेंट लेने वाले बच्चे-जेनेटिक कंडीशन से पीड़ित बच्चेबच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने पर कौन से लक्षण नजर आते हैं?हाइपरकैल्सीमिया के लक्षण, बच्चों की उम्र और कैल्शियम की मात्रा पर निर्भर करते हैं। जरूरी नहीं है कि शुरू में कोई लक्षण नजर आए, लेकिन जैसे-जैसे कैल्शियम का लेवल ज्यादा होगा ये लक्षण नजर आ सकते हैं--थकान और कमजोरी होना।-बच्चे का सुस्त हो जाना।-भूख न लगना।-कब्ज की शिकायत होना।-उल्टी होना या जी मिचलाना।-हड्डियों में दर्द और मांसपेशियों में कमजोरी होना।-पेट दर्द होना।-ज्यादा सोना।साल 2010 में Current Opinion In Pediatrics में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, गंभीर हाइपरकैल्सीमिया होने पर बच्चे की किडनी को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, कब्ज, उल्टी, दस्त जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।बच्चों के शरीर में कैल्शियम का नॉर्मल लेवल क्या है?बच्चों और शिशुओं के शरीर में कैल्शियम का नॉर्मल लेवल 8.5 से 10.5 mg/dL के बीच हो सकता है।अगर शरीर में कैल्शियम का लेवल 10.5 mg/dL से ज्यादा है, तो यह हाइपरकैल्सीमिया का संकेत हो सकता है।बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया किस उम्र में होता है?किसी भी उम्र के बच्चे को हाइपरकैल्सीमिया हो सकता है। नवजात शिशुओं, 1 साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों और किशोरों में भी यह कंडीशन दिख सकती है।
- अधिकांश लोग तब तक आंखों के डॉक्टर के पास नहीं जाते, जब तक उन्हें धुंधला दिखाई देना या कोई बड़ी परेशानी महसूस न हो। लेकिन नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि यह सोच खतरनाक साबित हो सकती है। आंखों की कई गंभीर बीमारियां शुरुआती दौर में बिना दर्द और बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होती रहती हैं। ऐसे में नियमित नेत्र जांच आंखों की रोशनी बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर लोग पूछते हैं, “मुझे तो सब ठीक दिखाई देता है, फिर आंखों की जांच कराने की क्या जरूरत है?” जबकि हकीकत यह है कि जब तक नजर कमजोर होने का एहसास होता है, तब तक कई बार बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।नेत्र विशेषज्ञों के मुताबिक, आंखों की नियमित जांच सिर्फ चश्मे का नंबर बदलने के लिए नहीं होती। इसके जरिए ग्लूकोमा (काला मोतियाबिंद), मोतियाबिंद, डायबिटिक रेटिनोपैथी, रेटिना की बीमारियों और मधुमेह व उच्च रक्तचाप का आंखों पर पड़ने वाला असर भी शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है। समय रहते बीमारी का पता चलने पर इलाज आसान हो जाता है और आंखों की रोशनी लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है। आज के डिजिटल दौर में ड्राई आई (Dry Eye) की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर स्क्रीन का इस्तेमाल, एयर कंडीशनर वाले माहौल में लगातार काम करना और कम पलकें झपकाना इसके प्रमुख कारण हैं।ड्राई आई के शुरुआती लक्षणों में आंखों में जलन, चुभन, सूखापन, लालपन, बार-बार पानी आना और कभी-कभी धुंधला दिखाई देना शामिल हैं। कई लोग इन्हें सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, यदि समय पर इलाज न कराया जाए, तो गंभीर मामलों में यह कॉर्निया को नुकसान पहुंचा सकती है, संक्रमण का खतरा बढ़ा सकती है और देखने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्क्रीन का उपयोग करते समय 20-20-20 नियम अपनाएं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें। इसके अलावा पर्याप्त पानी पिएं, नियमित रूप से पलकें झपकाएं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें। यदि आपकी उम्र 40 वर्ष से अधिक है, या आपको मधुमेह, उच्च रक्तचाप है अथवा परिवार में आंखों की बीमारी का इतिहास रहा है, तो नियमित नेत्र जांच को अपनी स्वास्थ्य दिनचर्या का हिस्सा जरूर बनाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार आंखें पूरी तरह सामान्य लगती हैं, लेकिन एक साधारण जांच भविष्य में होने वाली गंभीर समस्याओं को समय रहते पकड़ सकती है। इसलिए हर व्यक्ति को हर 6 से 12 महीने में एक बार आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए।
- विटामिन डी के लिए धूप में बैठना जरूरी माना जाता है। इसलिए कई हेल्थ एक्सपर्ट आपको धूप में बैठने की सलाह लेते हैं। ऐसे में की लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर कितनी देर धूर में बैठना शरीर के लिए पर्याप्त होता है? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है, खासकर उन लोगों के लिए जो दिनभर घर या ऑफिस के अंदर रहते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सिर्फ 10 मिनट धूप में बैठने से शरीर को पर्याप्त रूप से विटामिन डी मिल जाता है। लेकिन क्या सच में सिर्फ 10 मिनट धूप में रहने से आपको पर्याप्त विटामिन डी मिल जाता है। हम सभी जानते हैं कि धूप शरीर में विटामिन D बनाने का सबसे प्राकृतिक स्रोत है। विटामिन D हड्डियों को मजबूत रखने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और मांसपेशियों के बेहतर कामकाज के लिए जरूरी होता है। लेकिन क्या हर व्यक्ति के लिए 10 मिनट की धूप पर्याप्त है? इसका जवाब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है।डॉक्टर का कहना है कि रोजाना 10 मिनट धूप लेना कई लोगों के लिए पर्याप्त हो सकता है, लेकिन यह व्यक्ति की स्किन का रंग, दिन का समय, मौसम, भौगोलिक स्थान और शरीर का कितना हिस्सा धूप के संपर्क में आ रहा है, इन सभी बातों पर निर्भर करता है।किन लोगों के लिए 10 मिनट धूप काफी हो सकती है?अगर आपकी स्किन हल्के रंग की है, आप ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां धूप अच्छी आती है और सुबह या देर सुबह के समय हाथ, चेहरा या बाजुओं पर सीधी धूप पड़ती है, तो लगभग 10 मिनट का नियमित सन एक्सपोजर विटामिन D बनने में मदद कर सकता है। हालांकि, यह कोई तय नियम नहीं है।किन लोगों को अधिक समय तक धूप की जरूरत पड़ सकती है?गहरे रंग की स्किन वाले लोगों में मेलेनिन अधिक होता है, जिससे शरीर में विटामिन D बनने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। ऐसे लोगों को हल्की स्किन वालों की तुलना में अधिक समय तक धूप में रहने की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, सर्दियों के मौसम, प्रदूषण, लंबे समय तक घर के अंदर रहने या पूरे शरीर को कपड़ों से ढककर रखने की स्थिति में भी सिर्फ 10 मिनट धूप पर्याप्त नहीं हो सकती।धूप लेने का सही तरीका क्या है?डॉक्टर का कहना है कि कम समय के लिए नियमित रूप से धूप लेना, कभी-कभार लंबे समय तक धूप में रहने से बेहतर माना जाता है। दोपहर के समय पराबैंगनी किरणें काफी तेज होती हैं, इसलिए बहुत देर तक बिना सुरक्षा के धूप में रहने से त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए संतुलित और सीमित समय तक धूप लेना बेहतर है।क्या सिर्फ धूप ही काफी है?अगर किसी व्यक्ति में पहले से विटामिन D की कमी है, वह बहुत कम बाहर निकलता है या उसे कोई ऐसी बीमारी है जो विटामिन D के स्तर को प्रभावित करती है, तो सिर्फ धूप पर्याप्त नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह पर विटामिन D युक्त आहार या सप्लीमेंट की जरूरत पड़ सकती है। दूध, अंडे की जर्दी, फैटी फिश और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ भी विटामिन D के अच्छे स्रोत हैं।
- बच्चों में कान में इंफेक्शन होने की समस्या बहुत आम है और कई बार पेरेंट्स एंटीबायोटिक दवाएं देकर इसे ठीक करने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि कान में इंफेक्शन के कारण बच्चों को बुखार तक भी हो जाता है। अगर किसी बच्चे को बार-बार कान में इंफेक्शन हो रहा है, तो इसकी पहचान करके डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।Cureus में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बार-बार इंफेक्शन 6 से दो साल के बच्चों में ज्यादा होता है, क्योंकि उनमें इम्यूनिटी कमजोर होती है और साथ ही कान की यूस्टेशियन ट्यूब की बनावट वयस्कों की तुलना में ज्यादा सीधी होती है और इस वजह से गले का इंफेक्शन आसानी से कान में पहुंच जाता है। अगर कान का इंफेक्शन ज्यादा समय के लिए रह जाए, तो बच्चा ठीक से सुन नहीं पाता, तो इससे उसके बोलने और भाषा सीखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। “बच्चों में बार यूस्टेशियन ट्यूब कान को नाक और गले से जोड़ती है। छोटे बच्चों में यह ट्यूब छोटी, संकरी और सीधी होती है। इस वजह से तरल पदार्थ मिडिल ईयर में फंस जाता है। जब तरल बाहर नहीं निकल पाता, तो इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।”ज्यादातर मामलों में मिडिल ईयर इंफेक्शन की शुरुआत सर्दी-जुकाम से होती है और फिर धीरे-धीरे नाक बंद होना और गले में इंफेक्शन से यूस्टेशियन ट्यूब बंद हो सकती है। इससे कान के अंदर हवा का दबाव बदल जाता है और पर्दे के पीछे तरल जमा होने लगता है। अगर यही कंडीशन लगातार बनी रही है, तो बैक्टीरिया पैदा हो सकते हैं।” कुछ बच्चों में कान में इंफेक्शन होने का खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि उनकी न सिर्फ इम्यूनिटी कमजोर होती है, बल्कि इसके कई फैक्टर्स होते हैं। जो बच्चे डे-केयर या स्कूल जाते हैं, उन्हें वायरल इंफेक्शन होने की संभावना ज्यादा होती है। इसके अलावा, अगर घर में कोई स्मोक करता है, धूल, एलर्जी या बार-बार सर्दी-जुकाम होता है, तो उन्हें कान में इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ सकता है। अगर मां शिशु को लिटाकर दूध पिलाती है, तो यह आदत भी कान में इंफेक्शन का कारण हो सकती है।पेरेंट्स को किन लक्षणों को इग्नोर नहीं करना चाहिए?-छोटे बच्चे अपनी समस्या नहीं बता पाते, इसलिए पेरेंट्स को उनका बिहेवियर देखना चाहिए।-अगर बच्चा बार-बार कान पकड़कर खींच रहा हो, तो यह कान में इंफेक्शन होने का कारण हो सकता है।-बच्चे का ठीक से न सो पाना, दूध या खाना कम लेना भी कान में इंफेक्शन की वजह हो सकता है।-अगर बच्चे को बार-बार बुखार हो रहा हो, तो इसका कारण कान में इंफेक्शन हो सकता है।-अगर बच्चा एक बार में समझ न पाए, तो सुनने की क्षमता भी कम हो सकती है।-कान से मवाद या पानी निकलने पर बच्चे को तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।-कान के इंफेक्शन को डायग्नोज करने के लिए क्या चेकअप होते है?बच्चे के कान के पर्दे की जांच के लिए ओटोस्कोप या माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया जाता है। अगर डॉक्टर को लगता है कि बच्चे को कम सुनाई दे रहा है, तो उसका टाइम्पेनोमेट्री या हियरिंग टेस्ट भी कराया जा सकता है। कई बार यह भी चेक किया जाता है कि बच्चे को एडेनॉइड, एलर्जी या यूस्टेशियन ट्यूब से जुड़ी समस्या तो नहीं है। पेरेंट्स को अपने बच्चों को बार-बार एंटीबायोटिक नहीं देना चाहिए। सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही दवा दें। इसके अलावा, कुछ लोग कान की समस्या को मौसमी वायरल या इंफेक्शन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन पेरेंट्स को ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर बच्चे को कान में दर्द है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं, क्योंकि देरी करने से बच्चे के सुनने की क्षमता भी कम हो सकती है, जो उसके सीखने और समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
- बारिश के मौसम में अक्सर लोगों की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है। वहीं, इस मौसम में इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ जाता है, जिसके कारण लोग जल्दी बीमारी पड़ते हैं। ऐसे में अक्सर लोगों को इम्यूनिटी बूस्ट करने वाले और पोषक तत्वों से युक्त फूड्स को डाइट में शामिल करने की सलाह दी जाती है। अक्सर लोग शरीर के अच्छे स्वास्थ्य के लिए दालों और सब्जियों से बने सूप का सेवन करने की सलाह देते हैं। इनका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है।मॉनसून में कौन से सूप का सेवन करें?1. मूंग दाल का सूप पिएंमूंग दाल का सूप हल्का, आसानी से पचने वाला और टेस्टी सूप होता है। बारिश के मौसम में अक्सर लोगों की पाचन क्षमता कमजोर हो सकती है। ऐसे में मूंग दाल सूप का सेवन करना एक अच्छा ऑप्शन है। मूंग दाल में भरपूर मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, कई अन्य पोषक तत्व, एंटीऑक्सीडेंट्स और एंटी इंफ्लेमेटरी के गुण पाए जाते हैं, जो शरीर को एनर्जी देने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद करते हैं।कैसे बनाएं मूंग दाल सूप?इसको बनाने के लिए कुकर में अच्छे से धोकर 1 कटोरी मूंग दाल, अदरक का एक छोटा टुकड़, छोटी चम्मच हल्दी, स्वादानुसार, नमक, 2-3 लौंग और पानी को डालकर अच्छे से उबाल लें। अब इसको अच्छे से ब्लैंड कर लें। इसके बाद 1 कढ़ाई में आधा छोटी चम्मच में घी डालकर इसमें चुटकीभर हींग, 2-3 मोरिंगा के पत्ते, 3-4 कप पानी, आधा छोटी चम्मच लहसुन और काली मिर्च के पाउडर डालें और फिर इसमें दाल को मिलाकर अच्छे से उबालें। अब इसमें नींबू का रस मिलाकर इसका सेवन करें।मूंग दाल के सूप के फायदे-पाचन में सुधार करे-प्रोटीन की कमी होती है दूर-पेट को भरा रखने में मिलती है मदद-इम्यूनिटी बूस्ट करे-सर्दी-जुकाम से बचाव करेसाल 2020 में Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, मूंग दाल में अच्छी मात्रा में प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटी माइक्रोबियल और एंटी डायबिटीक जैसे कई पोषक तत्व होते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करने, पाचन को दुरुस्त करने, वजन कम करने, हार्ट को हेल्दी रखने, इम्यूनिटी को बेहतर करने, पोषक तत्वों की कमी को दूर करने और ब्लड शुगर को मैनेज करने में मदद मिलती है।2. मोरिंगा का सूप पिएंमोरिंगा यानी सहजन के सूप में विटामिन्स और मिनरल्स में भरपूर पोषक तत्व होते हैं। बारिश के मौसम में इसके सूप का सेवन करने से स्वास्थ्य को दुरुस्त करने और इम्यूनिटी को बूस्ट करने में मदद मिलती है।कैसे बनाए मोरिंगा सूप?मोरिंगा सूप बनाने के लिए 3-4 सहजन को टमाटर और नमक के साथ कुकर में 2-3 सीटी देकर उबाल लें। उबलने के बाद पानी को बचाकर रखें और फलियों का सारा पल्प चम्मच से निकाल लें। अब एक पैन में थोड़ा सा मक्खन गरम करके जीरा, बारीक कटा लहसुन, अदरक और प्याज भून लें। अब इसमें मोरिंगा का पल्प, बचाया हुआ पानी, हल्दी, काली मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाकर 5 मिनट तक उबालें। इसके बाद इसका सेवन करें।मोरिंगा सूप के फायदे-पोषक तत्वों की कमी दूर करे-इम्यूनिटी बूस्ट करे-हड्डियों को मजबूती देने-पाचन में सुधार करने-स्किन को हेल्दी रखने में मदद मिलती है।साल 2020 में Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, सहजन (मोरिंगा ओलिफेरा) में बायोफिनोल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें सूजन को कम करने (एंटी-इंफ्लेमेटरी), शरीर की सेल्स को नुकसान से बचाने (एंटीऑक्सीडेंट) और हमारी इम्यूनिटी को मजबूत करने (इम्यूनो-मॉड्यूलेटरी) के बेहतरीन गुण होते हैं।3. टमाटर का सूप पिएंटमाटर का सूप में अच्छी मात्रा में फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, बीटा कैरोटिन और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व होते हैं। बारिश के मौसम में गर्म टमाटर का सूप पीने से फ्रेश महसूस करने, इम्यूनिटी को मजबूत करने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद मिलती है।कैसे बनाए टमाटर का सूप?टमाटर का सूप बनाने के लिए कुकर में 4-5 कटे हुए टमाटर, 1 छोटा प्याज, 2-3 लहसुन की कलियां, आधा इंच अदरक और एक छोटा टुकड़ा चुकंदर को आधा कप पानी के साथ 2 सीटी आने तक उबाल लें। ठंडा होने पर इसे मिक्सी में पीसकर छान लें ताकि बीज और छिलके निकल जाएं। अब एक पैन में थोड़ा मक्खन गरम करें, उसमें यह छना हुआ टमाटर का मिश्रण, थोड़ा पानी, स्वादानुसार नमक और काली मिर्च पाउडर डालकर 5 मिनट तक उबालें। इसके बाद इसका सेवन करें।साल 2022 में biology में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, टमाटर से भरपूर डाइट लेने से सेहत को कई तरह के बड़े फायदे मिलते हैं। टमाटर में बहुत से बायोएक्टिव कंपाउड होते हैं। यह कैंसर से बचाने में मदद करता है, साथ ही दिल की बीमारियों, दिमाग से जुड़ी समस्याओं (जैसे भूलने की बीमारी) व आंतों की बीमारियों के खतरे को कम करता है, स्किन हेल्दी रहती है और इम्यून सिस्टम भी मजबूत होती है।टमाटर सूप के फायदे-इम्यूनिटी को बूस्ट करे-शरीर को एनर्जी दे-पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर करे-पाचन में सुधार करे-स्किन को हेल्दी बनाएसाल 2013 में Indian Journal of Clinical Biochemistry में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, विटामिन सी सर्दी-जुकाम से बचाव करने में मदद मिलती है, साथ ही, इससे इम्यूनिटी को बूस्ट करने में मदद मिलती है। विटामिन-सी हमारे इम्यून सिस्टम को जरूरत से ज्यादा एक्टिव होने से भी रोकता है, ताकि शरीर के अंगों या टिश्यूज को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे।4. अदरक, लहसुन और सब्जियों का सूप पिएंअदरक, लहसुन और सब्जियों के सूप में अच्छी मात्रा में फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स, एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी के गुण होते हैं। इसका सेवन करने से शरीर की इम्यूनिटी को बूस्ट करने, इंफेक्शन या बीमारियों से बचाव करने में मदद मिलती है।कैसे बनाएं अदरक, लहसुन और सब्जियों का सूप?अदरक, लहसुन और सब्जियों के सूप को बनाने के लिए एक पैन में 1 चम्मच तेल डालें और फिर इसको गरम करके 1-1 चम्मच बारीक कटा हुआ अदरक और लहसुन डालकर हल्का सा भून लें। अब इसमें अपनी पसंद के अनुसार बारीक कटी सब्जियां (जैसे गाजर, बीन्स, पत्तागोभी और शिमला मिर्च) डालकर 2 मिनट तेज आंच पर पकाएं। इसके बाद 3-4 कप पानी, स्वादानुसार नमक और आधा चम्मच काली मिर्च पाउडर मिलाकर सूप को ढककर 8-10 मिनट तक उबलने दें। अब अगर आप सूप को हल्का गाढ़ा करना चाहते हैं, तो इसमें कॉर्नफ्लोर का घोल (ऑप्शन्ल) मिलाएं और फिर 2 मिनट तक पकाएं। इसके बाद इसका सेवन करें।अदरक, लहसुन और सब्जियों का सूप के फायदे-इम्यूनिटी को बूस्ट करने-सर्दी-खांसी से बचाव करे-पाचन में सुधार करे-वजन कम करे-सूजन कम करेसाल 2024 में BIOINFORMATION में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, अदरक और लहसुन दोनों के अर्क में फिनोलिक नाम के फायदेमंद तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा, इनमें एंटी ऑक्सीडेंट्स होा है। इनका सेवन करने से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने और शरीर की इम्यूनिटी बेहतर करने में मदद मिलती है।बारिश में क्या खाना चाहिए?बारिश में अदरक-तुलसी की चाय पिएं, मूंग दाल की खिचड़ी खाएं, मौसमी फल खाएं और गर्म सूप पिएं। इन फूड्स से शरीर की इम्यूनिटी को बूस्ट करने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद मिलती है।सूप पीने के क्या फायदे हैं?
- पेट में कीड़े होना एक आम समस्या मानी जाती है। यह समस्या बच्चों में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन बड़े भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। गंदा खाना, दूषित पानी, साफ-सफाई की कमी और बिना हाथ धोए खाना खाने से पेट में कीड़े पहुंच सकते हैं। ये कीड़े आंतों में जाकर शरीर से पोषण लेने लगते हैं, जिससे कमजोरी और कई दूसरी परेशानियां हो सकती हैं।पेट में कीड़े होने के आम लक्षणपेट दर्द और मरोड़: अगर बार-बार पेट में दर्द या मरोड़ हो रही हो, तो यह पेट में कीड़ों का संकेत हो सकता है। कुछ लोगों को पेट में भारीपन भी महसूस हो सकता है।भूख कम या ज्यादा लगना: पेट में कीड़े होने पर कुछ लोगों की भूख कम हो जाती है, जबकि कुछ लोगों को बार-बार भूख लग सकती है।वजन कम होना: अगर सही खाना खाने के बाद भी वजन घट रहा हो, तो यह भी पेट में कीड़ों की वजह से हो सकता है। क्योंकि कीड़े शरीर का पोषण खुद लेने लगते हैं।कमजोरी और थकान: शरीर में जरूरी पोषण की कमी होने लगती है, जिससे कमजोरी और हर समय थकान महसूस हो सकती है।गुदा के आसपास खुजली: खासतौर पर रात के समय गुदा के आसपास खुजली होना पेट में कीड़ों का एक सामान्य संकेत माना जाता है।पेट फूलना और गैस: कुछ लोगों को गैस, पेट फूलना और अपच जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।बच्चों में दिख सकते हैं ये संकेतचिड़चिड़ापनपढ़ाई में ध्यान कम लगनाबार-बार बीमार पड़नाकमजोरीपेट में कीड़े होने के कारणगंदा या दूषित खाना: साफ-सफाई का ध्यान न रखने से कीड़े शरीर में पहुंच सकते हैं।बिना हाथ धोए खाना खाना: खाना खाने से पहले हाथ साफ न करने पर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।दूषित पानी पीना: गंदा पानी पीने से पेट में कीड़े पहुंच सकते हैं।बाहर का खुला खाना: सड़क किनारे खुले में रखा खाना खाने से भी यह समस्या हो सकती है।बच्चों की सफाई पर खास ध्यान देंबच्चे अक्सर मिट्टी में खेलते हैं और बिना हाथ धोए चीजें खा लेते हैं। इसलिए उनकी सफाई का खास ध्यान रखना जरूरी माना जाता है।क्या घरेलू उपाय मदद कर सकते हैं?कुछ लोग घरेलू उपाय भी अपनाते हैं, लेकिन किसी भी उपाय को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर माना जाता है।इन चीजों से बचेंबाहर का खुला खाना कम खाएंसाफ पानी पिएंशौचालय इस्तेमाल के बाद हाथ धोएंबच्चों को साफ-सफाई की आदत सिखाएंकब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए?पेट में कीड़े होने की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर तेज पेट दर्द हो, उल्टी हो रही हो, मल में कीड़े दिखाई दें या फिर बहुत ज्यादा कमजोरी हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी माना जाता है।
- दालचीनी का इस्तेमाल भारतीय रसोई का एक अहम हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल खाने का स्वाद बढ़ाने, अचार, चाय, काढ़ा, मिठाइयां आदि तरीकों में इस्तेमाल किया जाता है। दालचीनी में मौजूद सिनामाल्डिहाइड, पॉलीफेनॉल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे गुण पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। दालचीनी का सेवन सीमित मात्रा में करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। हालांकि, ज्यादा मात्रा में इसका सेवन आपकी सेहत के लिए हानिकारक भी हो सकता है।ज्यादा दालचीनी खाने से क्या नुकसान हो सकते हैं?दालचीनी का ज्यादा सेवन सेहत के लिए कई तरह से नुकसानदायक साबित हो सकता है। कैसिया दालचीनी में मौजूद कूमारिन नामक का कंपाउंड लिवर पर बुरा असर डाल सकता है, जिसके कारण सीलोन दालचीनी के सेवन की सलाह दी जाती है। साल 2019 में Euroasian Journal Of Hepato-Gastroenterology में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, दालचीनी का ज्यादा मात्रा में सेवन लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि इसमें कूमरिन नाम का टॉक्सिक तत्व होता है, जो लिवर के लिए हानिकारक माना गया है। इसके ज्यादा सेवन से लिवर का अनियमित रूप से सिकुड़ना और फिर से बढ़ना शामिल है। इसके लक्षणों की बात करें तो पीलिया, गहरे रंग का पेशाब, भूख में कमी और पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं।ज्यादा मात्रा में दालचीनी का सेवन ब्लड शुगर लेवल पर भी असर डाल सकता है। इसलिए, डायबिटीज के मरीजों को दवा के साथ इसका सेवन करने से बचना चाहिए। इसमें मौजूद सिनामाल्डिहाइड के कारण सेंसिटिव लोगों को मुंह में छाले, जीभ और गले में जलन या एलर्जी की समस्या हो सकती है। इतना ही नहीं, ज्यादा मात्रा में दालचीनी का सेवन ब्लड थिनर, डायबिटीज और लिवर की दवाओं के असर को भी प्रभावित कर सकता है।आयुर्वेद के अनुसार ज्यादा दालचीनी के नुकसानज्यादा दालचीनी का सेवन सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। दालचीनी वैसे तो खून को पतला करती है और आयुर्वेद में इसे ठंडी तासीर का माना जाता है, लेकिन अगर आप इसे बहुत ज्यादा मात्रा में खाएंगे तो यह पेट में गर्मी को बढ़ा देगी। फिर यह शरीर को गर्म करने लगती है। लोग अक्सर इसे पानी में मिलाकर पीना पसंद करते हैं, लेकिन फिर भी बहुत ज्यादा लेने से शरीर में पित्त बढ़ सकता है, जिससे पेट की गर्मी और एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए इसके इस्तेमाल के दौरान मात्रा का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।-दालचीनी की चाय: दिन में 1 से 2 कप दालचीनी की चाय ज्यादातर हेल्दी लोगों के लिए ठीक मानी जाती है, लेकिन इसमें ज्यादा दालचीनी की मात्रा बढ़ाने से यह सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।-पाउडर: ज्यादा मात्रा में रोजाना दालचीनी का पाउडर खाने से सेहत के लिए इसका जोखिम बढ़ सकता है।-मसाले के रूप में: भोजन में सीमित मात्रा में दालचीनी का इस्तेमाल सेहत के लिए फायदेमंद और सुरक्षित माना जाता है।दालचीनी की कितनी मात्रा सुरक्षित मानी जाती है?दालचीनी का सेवन करने की कोई तय सीमा नहीं है क्योंकि यह उसकी किस्म और आपके खाने के कारण पर निर्भर करती है। हालांकि, अगर आप इसे अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं तो कोशिश करें कि पूरे दिन में 3 से 4 ग्राम से ज्यादा दालचीनी अपनी डाइट में बिल्कुल शामिल न करें, क्योंकि इससे ज्यादा मात्रा शरीर में बहुत तेज गर्मी पैदा हो सकती है। इसलिए, आप ध्यान रखें कि रोजाना बड़ी मात्रा में दालचीनी पाउडर लंबे समय तक न लें। अगर स्वास्थ्य फायदों के लिए आप इसका नियमित सेवन कर रहे हैं तो सेवन के तरीके और मात्रा के लिए आयुर्वेदिक डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह जरूर लें।निष्कर्षदालचीनी एक फायदेमंद मसाला है, लेकिन इसका ज्यादा सेवन सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। चाहे आप इसे काढ़े, चाय, पाउडर या मसाले के रूप में लें, ध्यान रखें कि आपको इसे संतुलित और सीमित मात्रा में ही लेना है। सही मात्रा और इसके सेवन का तरीका आपके सेहत पर इसके प्रभाव निर्भर करता है।
- हम में से बहुत से लोग अपनी स्किन और बालों को हेल्दी रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि जितना हानिकारक केमिकल्स का इस्तेमाल होगा, उतना ही त्वचा और बालों को नुकसान होगा। ऐसे में हम सभी के मन में एक ही ख्याल आता है कि “आखिर इन्हें हेल्दी रखें तो कैसे रखें?”- रोजाना सुबह खाली पेट करी पत्तियां चबाएं ।करी पत्ता हेल्दी बालों और पाचन को बेहतर बनाने के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें नेचुरल आयरन, एंटीऑक्सीडेंट और प्लांट कंपाउंड होते हैं जो बॉडी को अंदर से पोषण देते हैं।करी पत्ता स्किन और हेयर के लिए कैसे फायदेमंद है?-यह बालों के नेचुरल रंग यानी कि पिगमेंटेशन को बनाए रखने में मदद कर सकता है।एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है, जिससे स्किन सेल्स को प्रोटेक्शन मिलती है।-पाचन में मदद कर सकता है, जिसे आयुर्वेद साफ स्किन से जोड़ता है।-नोट- 5–7 ताजी करी पत्तियों को अच्छी तरह धो लें और एक गिलास पानी के साथ चबाएं। अगर ताजी पत्तियां न मिलें, तो उन्हें अपने नाश्ते में शामिल करें।चेहरे पर खस वाले पानी का इस्तेमालसादे पानी से चेहरा धोने के बजाय, रात भर खस की जड़ों को पीनी में भिगोकर रखें और फिर उस पानी का इस्तेमाल करें। आयुर्वेद में, खस अपनी नेचुरल ठंडक देने और आराम पहुंचाने वाली खूबियों के लिए जाना जाता है। इसे इस्तेमाल करने के कई फायदे हैं। जैसे--डल स्किन को फ्रेश और ग्लोइंग बना सकता है।-गर्मी से होने वाली स्किन की जलन को शांत करने में मदद कर सकता है।-चेहरे को नेचुरली हाइड्रेटेड रखने में मददगार हो सकता है।-बता दें कि इसे इस्तेमाल करने के लिए आप साफ खस की जड़ों को पीने के पानी में रात भर भिगो दें। सुबह चेहरा धोने के लिए उस छने हुए पानी का इस्तेमाल करें।फिंगर टिप से स्कैल्प की मासज करेंबहुत से लोग सोचते हैं कि स्कैल्प की मालिश सिर्फ तेल से ही होती है। लेकिन आयुर्वेद में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाने के लिए उंगलियों की टिप से बिना तेल के मसाज करने की सलाह दी जाती है। ऐसा करने से हेयर फॉलिकल्स तक ब्लड फ्लो बढ़ता है, स्कैल्प के कड़ेपन को कम करने में मदद मिलती है और बालों की जड़ों तक पोषक तत्वों को पहुंचाने में सुधार होता है।एक चम्मच भुने हुए तिल खाएंतिल को आयुर्वेद में हड्डियों, बालों और स्किन के लिए सबसे ज़्यादा पोषण देने वाले खाद्य पदार्थों में से एक माना जाता है। इसमें कैल्शियम, जिंक, हेल्दी फैट्स और विटामिन E भरपूर मात्रा में होते हैं। यह रूखी त्वचा को पोषण देने में मदद कर सकता है। साथ ही बालों को अंदर से मजबूत बनाता है। आप सुबह एक चम्मच भुने हुए काले या सफेद तिल खाएं या उन्हें अपने नाश्ते पर छिड़कें। ये दोनों ही तरीके आपके बालों और स्किन के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।गुलाब जल का इस्तेमाल करेंसिर्फ गुलाब जल स्प्रे करने के बजाय, ठंडे प्योर गुलाब जल में कॉटन पैड भिगोकर अपनी बंद आंखों और गालों के ऊपरी हिस्से पर रखें। ऐसा करने से सूजी हुई आंखों को ताजगी मिलती है, चेहरे को आराम मिलता है, गर्मी में स्किन को ठंडक पहुंचाता है और ऑयल सीक्रेशन कम होता है, जिससे थकी हुई त्वचा को आराम मिलता है और वह फ्रेश नजर आती है। आप सबसे अच्छे नतीजों के लिए बिना खुशबू या अल्कोहल वाला शुद्ध गुलाबजल चुनें।
- बस अपनाएं डॉक्टर का बताया रूलऑफिस के काम के लिए लोगों को घंटों तक एक ही जगह पर बैठना पड़ता है। हालांकि, लगातार बैठे रहना हमारे शरीर के लिए एक ‘साइलेंट किलर’ की तरह काम करता है। जब हम लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठे रहते हैं, तो शरीर के कई हिस्सों पर असर होता है। खासतौर से पैरों को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में वैस्कुलर सर्जन डॉ. सुमित कपाड़िया (वैरिकोज वेन स्पेशलिस्ट) ने 30-60-5 रूल शेयर किया है। जिसे अपनाकर पैरों की समस्या से बचा जा सकता है। जानिए क्या है ये रूल।ज्यादा देर बैठने पर जम जाता है खून30 मिनट तक बैठने पर खून जमा होने लगता है। आपकी पिंडली की पंपिंग बंद हो जाती है। नस के वॉल्व खुल जाते हैं। खून का बहाव धीमा हो जाता है। नुकसान चुपचाप शुरू हो जाता है।क्या है 5 मिनट के लिए पिंडली व्यायाम?घंटों तक एक जगह पर बैठने से जब पैर जाम हो जाते हैं तो 5 मिनट की एक्सरसाइज आराम दे सकती है। इस एक्सरसाइज में अपनी पिंडलियों को स्क्वीज करें। ऐसा करने से खून 30 से 40 एमएल ऊपर की तरफ जाता है। 5 बार स्क्वीज करने पर आपके पैरों से 150-200 ml डीऑक्सीजनेटेड ब्लड (ऑक्सीजन-रहित रक्त) पैरों से हटाया जा सकता है।क्या है रूल?हर 30 मिनट के बाद कम से कम 60 सेकेंड के लिए खड़े रहें। 5 काफ रेजेज करें। 60 सेकेंड के लिए खड़े रहना और 5 मिनट की मूवमेंट से ब्लड फ्लो फिर से रिस्टार्ट हो सकता है।क्या होता है जब आप ऐसा नहीं करते?ऑफिस के काम के लिए जब आप लगातार 8 घंटे के लिए बैठते हैं या फिर 6 से ज्यादा घंटे के लिए बैठते हैं तो खून जमना शुरू हो जाता है। ऐसा ना करने पर एक महीने में नसे थकना शुरू हो जाती हैं। 6 महीने में वेरिकोज वेंस दिखने लगती हैं। 2 साल में स्किन डैमेज होने लगती है और रंगत खराब होने लगती है। 5 साल बाद अल्सर और डीवीटी रिस्क की समस्या हो सकती है।ये ट्रिक आएगी कामकाम में व्यस्त हो जाने के बाद हो सकता है कि आप खड़े होना और एक्सरसाइज करना भूल जाएं। इसलिए सबसे अच्छा है कि आप अलार्म सेट करें। हर 30 मिनट बाद का एक अलार्म लगाएं। ये भले ही एक छोटी आदत है लेकिन इसका असर बड़ा दिखाई देगा।ऐसा करने पर-ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होगासूजन और थकान कम होगीदिल और नसों को सपोर्ट मिलता हैएनर्जी और फोकस बढ़ता है।
- शरीर में विटामिन्स, प्रोटीन की कमी होने पर कई गंभीर बीमारियां घेर सकती हैं, जिसमें ज्यादातर लोगों में Vitamin B12 की कमी पाई जाती है। विटामिन B12 खासतौर पर लीवर, खून, हड्डियों के भीतर बोन मैरो और शरीर की कोशिकाओं में पाया जाता है। शरीर में विटामिन B12 की कमी होने पर गुड ब्लड सेल्स कम बनने लगती हैं, जिससे कमजोरी, थकान और सांस फूलने जैसी दिक्कत हो सकती है। इससे हाथ-पैर में झनझनाहट, सुन्नपन, जलन या संतुलन बिगड़ना। वैसे तो विटामिन B12 की कमी को पूरा करने के लिए सप्लीमेंट्स आते हैं लेकिन डाइट में कुछ चीजों को शामिल करने से भी बी12 की कमी को पूरा करने में सपोर्ट मिल सकता है। कुछ ऐसी हरी सब्जियां हैं, जिन्हें हर किसी को अपनी प्लेट में शामिल करना चाहिए।कौन सी हैं 5 सब्जियां-1- पालकपालक में फोलेट, आयरन और क्लोरोफिल होते हैं, जो रेड ब्लड सेल्स को बनाने में मददगार होते हैं। इसे खाने से शरीर में एनर्जी बनी रहती है, थकान कम लगती है और विटामिन B12 की कमी को पूरा करने में सपोर्ट भी मिलता है। पालक की सब्जी या फिर दाल आप डाइट में शामिल कर सकते हैं।2- सहजन के पत्तेसहजन की फली के साथ उसके पत्ते भी पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। सहजन की पत्तियों में विटामिन, कैल्शियम, आयरन, फोलेट जैसे तत्व होते हैं। इसे खाने से शरीर में एनर्जी आती है और कमजोरी दूर होती है। साथ ही विटामिन B12 की कमी पूरी करने में भी ये मददगार होते हैं। इसमें मौजूद फोलेट रेड ब्लड सेल्स को बनाने में हेल्प करता है।3- चुकंदरचुकंदर अगर आप सलाद में खाते हैं, तो समझ लीजिए आपके शरीर में खून की कमी नहीं होगी। चुकंदर में फोलेट, मैंगनीज, नैचुरल नाइट्रेट्स होते हैं, जो शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। साथ ही स्टैमिना भी बढ़ाते हैं। Vitamin B12 की कमी पूरा करने में भी चुकंदर सपोर्ट करता है।4- मेथी के पत्तेमेथी के पत्तेमेथी के पत्ते की भी सब्जी बनाकर लोग खूब खाते हैं और ये सेहत के लिए फायदेमंद भी होती है। इसे खाने से पाचन तंत्र अच्छा रहेगा, मेटाबॉलिज्म बढ़ेगा, विटामिन B12 की कमी पूरा करने में मदद मिलेगी। इसमें आयरन, फोलेट, मैग्नीशियम जैसे जरूर पोषक तत्व होते हैं।5- ग्वार फलीग्वार फलीग्वार फली थोड़ी सेम की तरह दिखती है और ये सब्जी भी लोग सूखी बनाकर खाना पसंद करते हैं। ग्वार फली में फोलेट, फाइबर, मिनरल्स, विटामिन्स का अच्छा स्रोत होता है। ग्वार फली खाने से पाचन बेहतर रहेगा, ब्लड शुगर कंट्रोल रहता है, इम्यूनिटी मजबूत होगी और B12 की कमी को भी सपोर्ट मिलेगा।
- सुबह वाली नींद हर किसी को प्यारी होती है और यही कारण है कि हम अलार्म को बार-बार बंद करते रहते हैं। सुबह कहीं जाना हो तब भले ही हम जल्दी उठ जाए लेकिन वैसे अलार्म को 5 मिनट बढ़ाते हुए करीब 1-2 घंटे और सो लेते हैं। आजकल की लाइफस्टाइल में सुबह देर से उठना काफी नॉर्मल हो चुका है लेकिन पहले लोग सुबह 4-5 बजे उठना सही मानते थे। सुबह जल्दी उठने पर दिमाग फ्रेश रहता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है। साथ ही कई प्रोडक्टिव काम भी कर सकते हैं। अगर आप किसी सफल व्यक्ति के बारे में जानें तो पाएंगे कि वह सभी लोग सुबह जल्दी उठते हैं। आप भी जल्दी उठने की कोशिश रोजाना करते हैं लेकिन उठ नहीं पाते तो आज हम आपको जल्दी उठने के 3 सरल तरीके बताने जा रहे हैं। सात्विक मूवमेंट यूट्यूब चैनल पर वीडियो में इसके बारे में जानकारी दी गई है। उन्होंने सुबह जल्दी उठने और मॉर्निंग रूटीन के बारे में सलाह दी है।क्यों नहीं खुलती नींदआजकल लोग देर से खाना खाते हैं और फिर बिस्तर पर लेटने के बाद मोबाइल चलाने लगते हैं। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी नींद के हार्मोन मेलाटोनिन के निर्माण को रोकती है और यही कारण है कि नींद देर से आती है। फिर सुबह कई अलार्म बजने के बाद भी आंख नहीं खुलती। रील्स, फिल्म या किसी से देर रात तक बातें करने से दिमाग सक्रिय रहता है, जिससे नींद पूरी नहीं होती और सुबह उठने पर भारीपन लगता है।जल्दी उठने के 3 तरीके क्या है1- रात से ही कर लो तैयारसात्विक मूवमेंट के अनुसार, अगर आपको सुबह जल्दी उठना है तो रात से ही तैयारी करनी होगी। सुबह के 10 अलार्म लगाने के बजाय रात के 9-10 बजे का अलार्म सेट करें। जैसे ही रात में ये अलार्म बजे, आप अपने बिस्तर पर सोने के लिए चले जाए। अगर आप देर रात तक जगेंगे तो सुबह नींद खुलना नामुमकिन है। ऐसे में जरूरी है कि आप रात को जल्दी सोएं, जिससे दिमाग शांत रहे और नींद पूरी हो जाए। अगर आप 9 बजे नहीं सो सकते तो 10 बजे तक जरूर सोने की कोशिश करें।रात की अच्छी नींद2- सुबह का प्लान बनाएंअगली सुबह अगर आपको कहीं बाहर जाने के लिए ट्रेन-फ्लाइट पकड़ना हो, ऑफिस की जरूरी मीटिंग अटेंड करनी हो तो आपकी नींद खुद ही खुल जाती है। अलार्म बाद में बजता है लेकिन रोजाना ऐसा नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है कि जब आपके दिमाग में पहले से कोई प्लान होता है, तो सब-कॉन्शियस माइंड में वह चलता रहता है और इसी वजह से सुबह नींद जल्दी खुल जाती है। इसिलए सुबह के लिए प्रोडक्टिव प्लान बनाकर सोएं- जैसे सुबह एक्सरसाइज करनी है, बुक पढ़नी है, टहलने जाना है या जो भी आपके लिस्ट में हो।3- डिनर को बनाइये हल्काअगर आपका डिनर हैवी रहेगा, तो पेट को उसे पचाने के लिए करीब 5-6 घंटे की मेहनत लगेगी। ऐसे में नींद भी भरपूर आएगी और आप सुबह नहीं उठ पाएंगे। साइंस भी कहता है कि दिन में हैवी लंच करो लेकिन डिनर हमेशा लाइट ही रखो। डिनर में अनाज कम खाएं और सलाद-सब्जियां ज्यादा खाएं। अगर आप डिनर में राजमा-चावल, दाल-चावल जैसी चीजें खाते हैं, तो सुबह नींद खुलना मुश्किल है। ध्यान रखें कि अगर 10 बजे सो रहे हैं, तो डिनर सोने से करीब 2 घंटे पहले यानी 8 बजे कर लें।हेल्दी सैलेड कैसे बनाएं3 M को करें फॉलोसुबह जल्दी उठना है तो आपको 3 M वाले नियम को जरूर फॉलो करना चाहिए। यही आपका मॉर्निंग रूटीन भी होना चाहिए, इसमें पहले M का मतलब है मेडिटेशन करना। सुबह उठने पर सबसे पहले योगा, एक्सरसाइज या फिर मेडिटेशन करें। दूसरे M का मतलब है कि मूवमेंट। उठने के बाद अपने शरीर को चलाएं, आप टहल सकते हैं या फिर कोई फिजिकल एक्टिविटी कर सकते हैं। तीसरे M का मतलब है मास्टरी। मतलब ऐसा काम करें, जो आपके दिमाग को तेज करने में मददगार हो। जैसे कोई किताब पढ़ें, नई स्किल्स सीखें या फिर कोई क्रिएटिव काम करें।
- किशमिश एक ऐसा ड्राई फ्रूट है, जो ज्यादातर भारतीय घरों में आसानी से मिल जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग होते हैं, जो इन्हें रेगुलर बेसिस पर खाते हैं। ऐसा इसलिए क्यों छोटे से दिखने वाले इस ड्राई फ्रूट के फायदे ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं हैं। आमतौर पर हम बादाम-अखरोट को तो फायदेमंद समझते हैं, लेकिन किशमिश ज्यादातर लोग सिर्फ मिठाई या खीर-हलवे में डालने को ही यूज करते हैं।. ज्यादातर भारतीय किशमिश के फायदे जानते नहीं हैं। अगर वो इसे रोजाना अपनी डाइट में शामिल कर लें तो बहुत से लोगों की कब्ज की समस्या दूर हो जाए। आइए जानते हैं किशमिश के फायदों के बारे में डॉक्टर का और क्या कहना है।कब्ज की समस्या में बहुत फायदेमंद है किशमिशभारत में बहुत से लोगों को कब्ज की समस्या बनी रहती है। इसपर डॉक्टर कहते हैं कि अगर लोग नियमित रूप से किशमिश खाना शुरू कर दे, तो आधे लोगों की ये समस्या ठीक हो सकती है। दरअसल किशमिश नेचुरली आपके गट के वाटर बैलेंस को इंप्रूव करने का काम करते हैं। इसमें 'सोर्बिटोल' नामक तत्व मौजूद होता है, जो मल में नमी बनाए रखने का काम करता है। किशमिश में मौजूद फाइबर मल को सॉफ्ट और आसानी से निकलने वाला बनाता है। डॉक्टर बताते हैं कि कब्ज में हमेशा किसी दवा की जरूरत नहीं होती है, कई मामलों में खानपान में छोटे-छोटे बदलाव भी काफी फायदेमंद हो सकते हैं।एसिडिटी और भारीपन को कम करने में सहायकडॉ शुभम कहते हैं कि किशमिश गट में मौजूद गुड बैक्टीरिया को पोषण देने का काम करती है। इससे एसिडिटी और पेट फूलना या भारीपन जैसी समस्याओं में भी मदद मिलती है। कब्ज की वजह से मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाने की समस्या कम होने पर पाइल्स (बवासीर) और एनल फिशर का रिस्क भी कम हो जाता है।हार्ट हेल्थ के लिए भी फायदेमंद है किशमिशकिशमिश सिर्फ आपके गट के लिए ही नहीं, बल्कि हार्ट हेल्थ के लिए भी काफी फायदेमंद है। डॉक्टर कहते हैं कि किशमिश में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स और पोटैशियम मौजूद होता है, जो हार्ट हेल्थ के लिए काफी फायदेमंद है। नियमित रूप से इनका सेवन आपकी ओवरऑल हार्ट हेल्थ और पाचन के लिए काफी अच्छा साबित हो सकता है।कब और कितनी मात्रा में किशमिश का सेवन करेंडॉक्टर कहते हैं कि आप रोजाना 8-10 किशमिश खा सकते हैं। इन्हें रातभर के लिए पानी में भिगोकर रख दें, फिर सुबह चबा चबाकर अच्छी तरह खा लें। अगर आप इन्हें लगातार एक हफ्ते तक कंज्यूम करें तो फर्क साफ महसूस किया जा सकता है।--
- शाम के समय चाय की चुस्कियों के साथ कुछ गरम और कुरकुरा खाने का मन हर किसी का होता है. अमूमन हमारे घरों में आलू के कटलेट, ब्रेड रोल या समोसे ही बनाए जाते हैं. स्वाद में लाजवाब होने के बावजूद ये स्नैक्स हैवी और हाई-कैलोरी होते हैं जिसके चलते फिटनेस का ध्यान रखने वाले लोग इनसे दूरी बना लेते हैं.अगर आप भी शाम की छोटी-मोटी भूख के लिए कोई ऐसा विकल्प ढूंढ रहे हैं जो जुबान को चटपटा स्वाद दे और शरीर को भरपूर प्रोटीन भी तो मूंग दाल के क्रिस्पी कटलेट्स आपके लिए बेस्ट चॉइस हैं. मूंग दाल न सिर्फ पचाने में आसान होती है बल्कि यह फाइबर और जरूरी विटामिन्स का पावरहाउस भी है. जब इसमें बारीक कटी सब्जियां और देसी मसालों का तड़का लगता है तो इसका क्रंच हर किसी को दीवाना बना देता है. आइए जानते हैं इसे बनाने का आसान तरीका.सामग्री ---मूंग दाल: 1 कप (3 घंटे पानी में भिगोई हुई)पोहा (बाइंडिंग के लिए): 1/2 कप (धोकर साफ किया हुआ) या 2 बड़े चम्मच सूजीबारीक कटी सब्जियां: 1/4 कप गाजर, 1/4 कप शिमला मिर्च, 1/4 कप प्याजबारीक कटी हरी मिर्च: 2अदरक का पेस्ट: 1 छोटा चम्मचबारीक कटा हरा धनिया: 1/2 कपमसाले: 1/2 छोटी चम्मच चाट मसाला, 1/2 छोटी चम्मच भुना जीरा पाउडर, 1/2 छोटी चम्मच कश्मीरी लाल मिर्च, 1/4 छोटी चम्मच हल्दी, एक चुटकी हींग.तेल/घी: कटलेट्स को शैलो-फ्राई या सेंकने के लिएनमक: स्वादानुसारबनाने का तरीका---भीगोई हुई मूंग दाल का पूरा पानी निकाल दें. अब इसे मिक्सी में बिना पानी डाले (या सिर्फ 1 चम्मच पानी के साथ) दरदरा पीस लें. ध्यान रहे कि इसका पेस्ट बिलकुल महीन नहीं होना चाहिए, थोड़ा दानेदार रहना चाहिए.इस दरदरी पिसी दाल को एक बड़े मिक्सिंग बाउल में निकालें. इसमें भीगा हुआ पोहा (या सूजी) डालकर अच्छी तरह मैश करें, यह बाइंडिंग का काम करेगा. अब इसमें बारीक कटी गाजर, शिमला मिर्च, प्याज, अदरक का पेस्ट, हरी मिर्च और हरा धनिया डालें.इस मिश्रण में चाट मसाला, भुना जीरा पाउडर, लाल मिर्च, हल्दी, हींग और स्वादानुसार नमक डालकर चम्मच या हाथों की मदद से एक स्मूथ डो तैयार कर लें.अपनी हथेलियों पर थोड़ा सा तेल लगाएं. मिश्रण का छोटा हिस्सा लें और उसे अपनी पसंद के अनुसार टिक्की, ओवल या हार्ट शेप में कटलेट तैयार कर लें.एक नॉन-स्टिक पैन या तवे पर 2 चम्मच तेल या घी गर्म करें. तैयार कटलेट्स को तवे पर रखें और धीमी से मध्यम आंच पर दोनों तरफ से अलट-पलट कर क्रिस्पी और गोल्डन ब्राउन होने तक शैलो-फ्राई कर लें. आपके गरमा-गरम, बाहर से कुरकुरे और अंदर से सॉफ्ट मूंग दाल कटलेट तैयार हैं. इन्हें पुदीने की तीखी चटनी और टोमैटो केचप के साथ सर्व करें.
- आजकल के समय में खराब स्लीप साइकिल काफी बड़ी समस्या बन चुका है. अक्सर माना जाता है कि जो जितनी लंबी और गहरी नींद सोएगा वह सुबह उतना ही फ्रेश महसूस करेगा. लेकिन हाल ही में नींद को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बेहद हैरान करने वाला खुलासा किया है. रिसर्च में कहा गया है कि महिलाएं पुरुषों से अधिक बेहतर और लंबी नींद लेती हैं फिर भी वे सुबह उठकर अनरेस्टेड यानी थकी हुई महसूस करती हैं. वहीं दूसरी तरफ पुरुष कम सोने के बावजूद अपनी नींद से अधिक संतुष्ट रहते हैं. ऐसा क्यों होता है, इसका कारण जान लीजिए.क्या कहती है जर्नल न्यूरोसाइंस की रिसर्च?स्लीप साइकिल को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने नींद की क्वालिटी और उसके समय का गहराई से एनालिसिस किया. जर्नल न्यूरोसाइंस में पब्लिश रिसर्च का कहना है, नींद की क्वालिटी सिर्फ इस बात पर डिपेंड नहीं करती कि आपने कितने घंटे की नींद ली या आपकी नींद कितनी गहरी थी. बल्कि इस बात पर तय होती है कि आपकी 'परसीव्ड क्वालिटी ऑफ स्लीप' यानी नींद को लेकर आपकी खुद की सोच कैसी है.स्लीप फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि क्लिनिकल इंसोम्निया (अनिद्रा) के दो-तिहाई मामलों में लोग भरपूर सोने के बाद भी यही शिकायत करते हैं कि उनकी नींद पूरी नहीं हुई. वैज्ञानिकों का कहना है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं रात में भले ही कम बार जागती हैं लेकिन जब भी उनकी आंख खुलती है वे पुरुषों से ज्यादा देर तक जागती रहती हैं.रात की यादें और पुरुषों का ओवरएस्टीमेशनइंटरनेशनल पब्लिकेशन द कन्वर्सेशन के डेटा के मुताबिक, अगर रात में किसी महिला की नींद टूटती है तो वह औसतन 9 मिनट तक जागती रहती है जबकि पुरुष सिर्फ 6 से 7 मिनट में दोबारा सो जाते हैं.मेडिकल साइंस कहता है कि यदि कोई व्यक्ति रात में 5 मिनट से ज्यादा समय तक जागता है तो उसके ब्रेन को वह घटना पूरी तरह याद रह जाती है. महिलाओं को रात में बार-बार जागने और देर तक जागने की यह बात सुबह तक याद रहती है जिससे उन्हें लगता है कि वे रातभर ठीक से सो नहीं पाईं.वहीं दूसरी ओर पुरुष अपनी रात की छोटी-मोटी जागने की आदतों को भूल जाते हैं और सुबह उठकर अपनी नींद को ओवरएस्टीमेट करते हैं यानी सोचते हैं कि वे बहुत अच्छी नींद सोए.हॉर्मोन्स और फिजिकल प्रॉब्लम्स भी वजहनींद के इस जेंडर गैप के पीछे सिर्फ मेंटल परसेप्शन ही नहीं बल्कि कई फिजिकल और बायोलॉजिकल कारण भी जिम्मेदार हैं. महिलाओं के शरीर में मेन्स्ट्रुअल साइकिल (पीरियड्स) के दौरान होने वाले हॉर्मोनल बदलाव, प्रेग्नेंसी के समय बैक पेन या यूरिन की समस्या और मेनोपॉज के दौरान हॉट फ्लैशेस जैसी दिक्कतें उनकी स्लीप क्वालिटी को बुरी तरह प्रभावित करती हैं.इन वजहों से उनकी स्लीप एफिशिएंसी कम हो जाती है. यही कारण है कि स्लीप ट्रैकर या गैजेट्स में भले ही महिलाओं का स्लीप टाइमिंग पुरुषों से ज्यादा दिखाई दे, लेकिन इंटरनल थकावट के चलते वे खुद को रीफ्रेश महसूस नहीं कर पाती हैं.--
- अगर लोगों को थोड़ा थका हुआ महसूस हो भी रहा है, तो वे चाय, कॉफी या एनर्जी ड्रिंक के रूप में कैफीन का सेवन कर रहे हैं। इससे टायर्डनेस तो कम होती ही है, साथ ही काम में फोकस बढ़ाने में भी मदद मिलती है। हालांकि सीमित मात्रा में कैफीन का सेवन सतर्कता और एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा शरीर के कई अंगों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। कैफीन एक तरह का नेचुरल स्टिमुलेंट है, जो दिमाग और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है। कुछ हद तक यह फायदेमंद है, लेकिन अगर आप ज्यादा मात्रा में कैफीन लेते हैं, तो सबसे पहले इसका असर आपकी नींद पर पड़ता है। इसलिए आपने देखा होगा कि पढ़ाई करने वाले बच्चे अक्सर रात को जागे रहने के लिए कॉफी पीते हैं। कैफीन हमारे शरीर को और किन तरीकों से नुकसान पहुंचाता है, आइए विस्तार से जानते हैं।हार्ट हेल्थ को करता है प्रभावितडॉक्टर बताती हैं कि ज्यादा कैफीन लेने से दिल की धड़कनें तेज हो सकती हैं, कुछ लोगों में ब्लड प्रेशर अस्थायी रूप से बढ़ सकता है। वहीं जिन लोगों को पहले से ही हार्ट से जुड़ी समस्याएं या हाई बी.पी है, उन्हें कैफीन कम मात्रा में लेना चाहिए।डाइजेशन पर असर डालता हैचाय, कॉफी या किसी भी रूप में लिया गया कैफीन पाचन तंत्र को भी प्रभावित कर सकता है। यहां तक कि अगर आप ज्यादा मात्रा में कैफीन का इनटेक कर लेते हैं तो पेट में एसिड बनने लगता है, जिससे एसिडिटी, सीने में जलन, गैस और इंडाइजेशन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कुछ लोगों में बार-बार कैफीन लेने से पेट खराब या दस्त की शिकायत भी हो सकती है।अधिक कैफीन से बढ़ सकती है घबराहट और बेचैनीभले ही कैफीन लेने से फोकस बढ़ता है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है। जैसे घबराहट, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, हाथ कांपना और एंग्जायटी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। वहीं सेंसिटिव लोगों में इससे पैनिक अटैक के लक्षण बढ़ने की संभावना हो सकती है। इसके अलावा शरीर धीरे-धीरे कैफीन का आदी हो सकता है।बार-बार पेशाब आने की समस्या हो सकती हैकैफीन शरीर में डाइयूरेटिक की तरह काम करता है, जिससे बार-बार पेशाब आ सकती है। अगर कैफीन लेने के बाद आप जरूरी मात्रा में पानी नहीं पीते हैं तो बॉडी में डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ सकता है। खासकर हम गर्भवती महिलाओं को कैफीन का सेवन सीमित रखने की सलाह देते हैं, क्योंकि अत्यधिक कैफीन भ्रूण के विकास पर प्रभाव डाल सकता है।कितना कैफीन लेना सुरक्षित है?हेल्दी वयस्कों के लिए रोजाना लगभग 400 मिलीग्राम तक कैफीन का सेवन आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है। आसान भाषा में समझें तो यह लगभग 3–4 कप कॉफी के बराबर हो सकता है। हालांकि हर किसी के लिए कैफीन की यह मात्रा व्यक्ति की उम्र और हेल्थ कंडीशन के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और हार्ट पेशेंट्स को सावधानी बरतनी चाहिए।
- प्रोटीन हमारे शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है। यह शरीर की वृद्धि, मांसपेशियों को मजबूत बनाने, टिश्यू को रिपेयर करने और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए बहुत जरूरी है। अक्सर यह माना जाता है कि सिर्फ अंडे, मांस या डेयरी प्रोडक्ट्स ही प्रोटीन का अच्छा सोर्स हैं, लेकिन शाकाहारी लोग भी सही फूड कॉम्बिनेशन अपनाकर अपनी डाइट में हाई क्वालिटी प्रोटीन शामिल कर सकते हैं। अनाज और दालों का सही मेल शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी करने के साथ जरूरी अमीनो एसिड देने में मदद करता है, जिसे कम्प्लीट प्रोटीन कहा जाता है। प्रोटीन अमीनो एसिड से मिलकर बनता है, जिनमें से कुछ खुद नहीं बनते हैं। इसलिए, इन्हें फूड्स से पाना जरूरी है। ज्यादातर दालें और अनाज अपने आप में सभी जरूर अमीनो एसिड पर्याप्त मात्रा में नहीं देते हैं, लेकिन जब इन्हें एक साथ खाया जाता है तो वे एक दूसरे की कमी पूरी कर सकते हैं।अनाज और दालों को एक साथ खाना क्यों फायदेमंद है?अनाज जैसे गेहूं, चावल, बाजरा और ज्वार में लाइसिन कम मात्रा में पाया जाता है, जबकि दालों में इसकी मात्रा काफी अच्छी पाई जाती है। वहीं दूसरी ओर, दालों में मेथियोनिन जरूरी मात्रा से कम होता है, जो अनाज में अच्छी मात्रा में पाया जाता है। इसलिए, इन दोनों का मिश्रण कम्प्लीट प्रोटीन माना जाता है।अनाज और दाल मिलाकर कम्प्लीट प्रोटीन कैसे बनाएं?भारत के फूड्स अनाज और दालों का बेहतरीन मेल होते हैं। यह कॉम्बिनेशन शरीर को जरूरी अमीनो एसिड का बेहतर संतुलन देने में मदद करता है। इसलिए, आप इन कॉम्बिनेशन को ट्राई कर सकते हैं-1. दाल और चावलदाल और चावल भारतीय घरों का सबसे आम और कंफर्टिंग फूड माना जाता है। चावल में लाइसिन की मात्रा कम होती है, जबकि दालें इसकी कमी को पूरा करने का काम करती हैं। वहीं, दालों में मेथियोनिन कम होता है, जो चावल से मिल जाता है। इसलिए, यह एक संतुलित प्रोटीन कॉम्बिनेशन माना जाता है।2. राजमा-चावलराजमा प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होते हैं, जबकि चावल इसके साथ मिलकरप प्रोटीन की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ लंबे समय तक पेट भरा रखने में भी काफी मददगार है।3. खिचड़ीमूंग दाल और चावल से बनी खिचड़ी हल्की, आसानी से पचने वाली औऱ पौष्टिक होती है। बीमारी के दौरान भी इसे खाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह शरीर को एनर्जी देने और प्रोटीन की कमी को दूर करने में मदद करती है।4. इडली और सांभरइडली और संभार हल्का और आसानी से पचने वाला फूड माना जाता है, जिसे अक्सर लोग ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर किसी भी समय अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं। यह कम्प्लीट प्रोटीन का अच्छा सोर्स है। इडली चावल और उड़द दाल से तैयार की जाती है, जबकि सांभर में भी दाल का इस्तेमाल होता है। यह मिश्रण प्रोटीन के साथ विटामिन, मिनरल्स और फाइबर से भरपूर होता है।5. रोटी और दालगेंहू की रोटी के साथ अरहर, मसूर, मूंग या चना दाल का सेवन उत्तर भारत का एक ट्रेडिशनल फूड है। यह न सिर्फ पेट को देर तक हुआ महसूस कराने में मदद करता है, बल्कि शरीर को जरूरी अमीनो एसिड का अच्छा संतुलन भी होता है।6. बाजरे या ज्वार की रोटी और दालबाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज फाइबर, आयरन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। जब इन्हें दाल के साथ मिलाकर खाया जाता है तो भोजन की प्रोटीन क्वालिटी और पोषक तत्व दोनों बढ़ जाते हैं।निष्कर्षनॉनवेज फूड्स के अलावा शाकाहारी भोजन से भी आप पर्याप्त मात्रा में और अच्छी क्वालिटी वाला प्रोटीन पा सकते हैं। अनाज और दालों का सही कॉम्बिनेशन शरीर को जरूरी अमीनो एसिड देने में मदद करता है और संतुलित पोषण देता है। दाल-चावल, खिचड़ी, राजमा-चावल, इडली-सांभर और रोटी-दाल जैसे फूड्स न सिर्फ स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि प्रोटीन की गुणवत्ता बढ़ाने का भी एक अच्छा सोर्स है।
- बदलते मौसम, वायरल इंफेक्शन और मौसमी संक्रमण के कारण बुखार होना एक आम समस्या है। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर घरेलू इलाज या खुद से दवाइयों के सहारे ठीक करने की कोशिश करते हैं। लेकिन हर बुखार साधारण नहीं होता, कुछ स्थितियों में यह गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है।बुखार तब खतरनाक हो जाता है जब यह लंबे समय तक बना रहे, बहुत अधिक तापमान तक पहुंच जाए या इसके साथ अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें। सही समय पर डॉक्टर से सलाह न लेने पर स्थिति बिगड़ सकती है और संक्रमण शरीर के अन्य अंगों तक फैल सकता है। इसलिए यह जानना बेहद जरूरी है कि बुखार कब सामान्य है और कब तुरंत अस्पताल जाने की आवश्यकता है। आइए समझते हैं ऐसे संकेत जिनमें देरी करना आपकी सेहत के लिए जोखिम भरा हो सकता है।3 दिन से ज्यादा बुखार रहनाअगर बुखार 2 से 3 दिनों में ठीक नहीं हो रहा है और लगातार बना हुआ है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।सामान्य वायरल बुखार अक्सर 2–3 दिनों में कम हो जाता है।अगर इससे ज्यादा समय तक बुखार बना रहे तो यह किसी बैक्टीरियल इंफेक्शन, डेंगू, मलेरिया या अन्य गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है।ऐसे में डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है ताकि सही कारण का पता चल सके और समय पर इलाज शुरू किया जा सके।बहुत तेज बुखार (102°F से ऊपर)जब शरीर का तापमान 102°F या उससे अधिक हो जाता है और दवाइयों के बाद भी कम नहीं होता, तो यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है।तेज बुखार शरीर के अंदर गंभीर संक्रमण का संकेत देता है।लगातार उच्च तापमान से शरीर में डिहाइड्रेशन और कमजोरी बढ़ सकती है, इसलिए तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी होता है।सांस लेने में दिक्कत--अगर बुखार के साथ सांस फूलने लगे, छाती में दर्द हो या सांस लेने में परेशानी हो, तो यह एक गंभीर संकेत हो सकता है।यह स्थिति फेफड़ों के संक्रमण या अन्य गंभीर बीमारियों की ओर इशारा कर सकती है।ऐसे लक्षण दिखने पर बिना देरी किए अस्पताल जाना चाहिए।लगातार कमजोरी और चक्कर--बुखार के दौरान हल्की कमजोरी सामान्य है, लेकिन अगर मरीज को लगातार चक्कर आ रहे हों, बहुत ज्यादा थकान हो या बेहोशी जैसा महसूस हो, तो यह खतरनाक हो सकता है।यह शरीर में पानी की कमी, लो ब्लड प्रेशर या गंभीर संक्रमण का संकेत हो सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।अस्पताल कब जाना चाहिए--बुखार 3 दिन से ज्यादा रहेदवा से आराम न मिलेबच्चे, बुजुर्ग या गर्भवती महिला को तेज बुखार होशरीर में रैश, दर्द या गंभीर लक्षण दिखेंमरीज की हालत तेजी से खराब हो रही हो
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बारिश के मौसम में कई बीमारियों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है। खासकर डाइजेस्टिव सिस्टम पर ज्यादा दबाव भी पड़ सकता है। कई बार तो लोग सुबह पेट से जुड़ी कई समस्याएं जैसे ब्लोटिंग, अपच और पेट साफ न होने और दर्द का सामना करते हैं। जिसका एक मुख्य कारण मौसमी बदलाव में गलत सब्जियां खाना है। आइए इन सब्जियों के बारे में जानते हैं।
हरी पालक, मेथी, सरसोंबारिश के इस मौसम में आपको पालक, सरसों, मेथी, चौलई आदि पत्तेदार सब्जियां अक्सर पसंद की जाती हैं और खाई जाती हैं। लेकिन इनमें मिट्टी, कीड़े और माइक्रोऑर्गेनिज्म के मिलने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए बहुत जरूरी है कि अगर आप इन्हें खा रहे हैं तो सही तरीके से साफ करते खाएं वरना संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं इन पत्तेदार सब्जियों को रात के समय खाने से कुछ लोगों का डाइजेशन स्लो हो सकता है।फूलगोभी खाने से बचेंवैसे तो फूलगोभी में फाइबर और कुछ जटिल कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं, जिन्हें पचाने में समय लग सकता है। ऐसे में अगर आप रात को इसका सेवन करते हैं तो खाने के बाद या सुबह तक आपको अपना पेट फूला-फूला सा, गैस और भारीपन सा महसूस हो सकता है। गोभी में कीड़े भी हो सकते हैं, इसलिए अगर आपको पहले से ही गैस या अपच की समस्या रहती है, तो इसे मानसून में रात के समय खाने से बचें और अगर खा रहे हैं तो थोड़ा सीमित मात्रा में लेना ही बेहतर है।पत्तागोभी खाने से हो सकती है ये समस्यापत्तागोभी भी गैस बनाने वाली सब्जियों में गिनी जाती है। इसमें रैफिनोज नाम का एक कार्बोहाइड्रेट और हाई फाइबर होता है, जिसे पचाने में हमारे पेट को थोड़ी दिक्कत हो सकती है। इसलिए कोशिश करें कि सुबह या दिन में ही पत्तागोभी की सब्जी खा लें और रात को खाने से बचें। थोड़ी सी भी चूक मानसून में आपको बीमार कर सकती है।सही तरीके से खाएं मशरूममशरूम बारिश के मौसम में अधिक होते हैं। नमी और उमस वाली जगहों पर पनपने के कारण यह जल्दी खराब भी हो जाते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि "यह पचाने के लिए यह थोड़े भारी होते हैं, जिन्हें पचाना हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए मुश्किल हो सकता है। इसलिए रात के समय मशरूम खाने से बचें और अलग खा रहे हैं तो अच्छे से साफ करके और पकाकर खाएं। उन्हें लंबे समय के लिए बचाकर न रखें। मार्केट के जब भी लाएं तो फ्रिज में स्टोर करके रखें, क्योंकि नॉर्मल टैम्प्रेटर में यह एक दिन में ही खराब हो जाते हैं।"कच्ची या आधी-पकी सब्जियां खाने से बचेंडॉक्टर मानसून में कच्ची सब्जियों और सलाद खाने को लेकर अधिक सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। नमी के कारण इन पर बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव पनप सकते हैं। ऐसे में रात के समय कच्ची या आधी पकी हुई सब्जियां खाना पेट खराब कर सकता है, दस्त या इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है और पेट में दर्द भी पैदा कर सकता है। इसलिए मानसून में अच्छी तरह पकी हुई सब्जियां अधिक सुरक्षित मानी जाती हैं।रात को खाने में क्या खाएं?मानसून में डिनर हमेशा हल्का और आसानी से पचने वाला होना चाहिए। जैसे लौकी, तोरी, टिंडा, कद्दू और परवल। ये वह सब्जियां हैं तो बाकी सब्जियों की तुलना में पचाने में आसान होती हैं और सेहत के लिए फायेदमंद भी होती है। इसके अलावा बरसात के इन नमी वाले मौसम में खूब पानी पिएं, देर रात हेवी मील लेने से बचें और खाने के तुरंत बाद सोने की बजाय कुछ समय टहलें। ताकि पाचन बेहतर बने। - आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कई लोग दोपहर में थोड़ी देर की झपकी लेना पसंद करते हैं। दोपहर की थोड़ी देर की नींद कुछ लोगों को इतनी पसंद होती है कि मौका मिलते ही वह झपकी ले लेते हैं। कई लोगों का मानना है कि दोपहर में थोड़ी देर की नैप सेहत के लिए काफी फायदेमंद होती है। आयुर्वेद में भी दोपहर में सोने को लेकर अलग राय देखने को मिलती है। आयुर्वेद के अनुसार दिन में सोना हर किसी के लिए सही नहीं होता है। यह व्यक्ति की प्रकृति, मौसम, स्वास्थ्य और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए, आइए जानते हैं कि आयुर्वेक के अनुसार दिन में सोना किसके लिए सही और किसे लिए नुकसानदायक है?आयुर्वेद के अनुसार कुछ परिस्थितियों में दिन के समय आराम करना या थोड़ी देर सोना शरीर के लिए फायदेमंद माना जाता है। गर्मी के मौसम में शरीर में ड्राईनेस और थकान बढ़ सकती है। ऐसे में सीमित समय की झपकी शरीर को एनर्जी देने और संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, जो लोग ज्यादा शारीरिक गतिविधियां करते हैं, नियमित रूप से सख्त एक्सरसाइज करते हैं या ट्रैवल के कारण थक जाते हैं, उनके लिए दिन में थोड़ी देर आराम करना फायदेमंद हो सकता है। बुजुर्ग, छोटे बच्चे, बीमारी से उबर रहे लोग और ज्यादा कमजोरी महसूस करने वाले लोग भी जरूरत पड़ने पर दोपहर में सोना सही माना जाता है। अगर किसी व्यक्ति की रात की नींद पूरी नहीं हुई हो तो भी सीमित समय के लिए दोपहर में झपकी लेना शरीर को आराम दिला सकता है।किन लोगों को दिन में सोने से बचना चाहिए?आयुर्वेदिक डॉ. श्रेय शर्मा का कहना है कि आयुर्वेद के अनुसार हेल्दी व्यक्ति को नॉर्मल स्थिति में दिन में सोने से बचना चाहिए, खासकर सर्दियों और वसंत के मौसम में। इस समय शरीर में कफ दोष बढ़ा रहता है। दिन में सोने से कफ और ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे आलस, भारीपन, सुस्ती और पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। जिन लोगों की कफ प्रकृति होती है या जिन्हें बार-बार सर्दी-जुकाम, वजन बढ़ना, सुस्ती या धीमा पाचन जैसी समस्याएं रहती हैं, उन्हें भी दिन में सोने से बचने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद के अनुसार दोपहर में भोजन करने के तुरंत बाद भी सोना सही नहीं माना जाता है, क्योंकि इससे पाचन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।अगर दोपहर में सोना है तो किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?आयुर्वेदिक डॉ. श्रेय शर्मा ने बताया कि अगर दिन में आराम करना जरूरी हो तो झपकी बहुत लंबी नहीं होनी चाहिए। साथ ही, भोजन के तुरंत बाद सोने के स्थान पर कुछ समय का अंतर रखना बेहतर माना जाता है। अगर सिर्फ थकान महसूस हो रही है तो पूरी नींद लेने के बजाय कुछ देर योग निद्रा, मेडिटेशन या पैरों को दीवार पर टिकाकर आराम करने जैसे उपाय भी फायदेमंद हो सकते हैं। दोपहर में हल्की वॉक करने से भी शरीर में ताजगी महसूस हो सकती है।निष्कर्षआयुर्वेद के अनुसार दिन में सोना न तो पूरी तरह अच्छा है और न ही पूरी तरह बुरा माना जाता है। इसका फायदा या नुकसान व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति, मौसम, उम्र और हेल्थ पर निर्भर करता है। अगर आप हेल्दी हैं और आपकी रात की नींद पूरी होती है तो नियमित रूप से दिन में सोने से बचना बेहतर माना जाता है। वहीं, गर्मी के मौसम, बीमारी, कमजोरी या ज्यादा थकान की स्थिति में सीमित समय तक आराम करना फायदेमंद हो सकता है।दोपहर को कितने घंटे सोना चाहिए?दोपहर में 10 से 20 मिनट की छोटी झपकी लेना सबसे अच्छा माना जाता है। यह समय दिमाग को आराम देने और एनर्जी वापस पाने के लिए काफी है, जिससे आप तरोताजा महसूस करते हैं।दोपहर में ज्यादा देर सोने के क्या नुकसान हैं?दोपहर में ज्यादा देर सोने से रात की नींद खराब होती है, जागने पर सुस्ती या चिड़चिड़ापन महसूस होता है और लंबे समय तक मोटापा, डायबिटीज और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
- आज के समय में व्यस्त लाइफस्टाइल होने के कारण वजन कम करना किसी भी व्यक्ति के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। वजन घटाने के लिए पैदल चलना या वॉक करना सबसे आसान तरीका माना जाता है। किसी भी जिम में वर्कआउट करने या क्रैश डाइट फॉलो करने के मुकाबले रोज सुबह-शाम लोग टहलना ज्यादा पसंद करते हैं। हालांकि, फिटनेस की दुनिया में अक्सर यह बहस छिड़ी रहती है कि क्या सिर्फ कुछ किलोमीटर पैदल चलने से वजन कम किया जा सकता है। हां वजन कम करने के लिए रोजाना पैदल चलना जरूरी है, लेकिन सीमित मात्रा में। टहलना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है और वजन कम करने के लिए भी, लेकिन वजन घटाने के लिए इसे सही तरीके और सही उम्मीदों के साथ अपनाना जरूरी है।टहलना वजन घटाने में कैसे मदद करता है?रोजाना चलने से शरीर की कैलोरी बर्न होती है, जिससे धीरे-धीरे वजन कम करने में मदद मिलती है। हालांकि, यह कमी बहुत तेज नहीं होती है। रोजाना 30 मिनट की तेज वॉक करने से औसतन 150 कैलोरी बर्न होती है, शरीर का वजन जितना ज्यादा होगा, कैलोरी उतनी ही ज्यादा खर्च भी होती है और चलने की गति बढ़ाने से कैलोरी खर्च में भी बढ़ोतरी होती है। साल 2022 में NCBI में Nutrients में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, अगर आप रोज वॉक करने के साथ-साथ खाने में से 500 कैलोरी कम कर देते हैं, तो आप हर हफ्ते आधा किलो यानी महीने में 2 किलो तक सुरक्षित और परमानेंट वजन कम कर सकते हैं।क्या सिर्फ टहलना काफी है?ज्यादातर मामलों में सिर्फ टहलना पर्याप्त नहीं होता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका वजन काफी ज्यादा है। टहलना वजन बढ़ने को रोकने और वजन को स्थिर बनाए रखने में बहुत कारगर है, लेकिन बड़े स्तर पर वजन घटाने के लिए इसके साथ खानपान में बदलाव जरूरी है।- कुछ स्थितियों में टहलने का असर कम दिखता है, जैसे--ज्यादा मोटापे में शरीर एक्सरसाइज के दौरान कम कैलोरी खर्च करता है।-धीमी या हल्की चाल से चलने पर शरीर को पर्याप्त तीव्रता नहीं मिल पाती है।-खानपान में बदलाव न करने पर असर सीमित रह जाता है।-ऐसी स्थितियों में टहलने के साथ हल्का स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या एक्सरसाइज जोड़ने से मांसपेशियां बनी रहती हैं और मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है।टहलने के अन्य स्वास्थ्य फायदेचलने से सिर्फ वजन कम करने में मदद नहीं मिलती है, बल्कि ये हमारी संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। टहलने से ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल होता है, ब्लड शुगर लेवल बेहतर होती है, तनाव और एंग्जायटी कम होती है और नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है।टहलना सेहत के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन वजन कम करने के लिए इसे अकेला उपाय मानना सही नहीं होगा। तेज चाल, नियमितता, संतुलित खानपान और जरूरत पड़ने पर हल्के एक्सरसाइज को साथ करने से वजन कम करना आसान हो सकता है।
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फल खाना लगभग हर एक सीजन में फायदेमंद होता है, लेकिन क्या कटे हुए फलों का सेवन करना बारिश में सुरक्षित होता है? हम में से कई लोगों को कटे हुए फल को खरीदकर खाना काफी सुलभ लग सकता है, लेकिन सेहत के लिहाज से यह हमेशा सुरक्षित नहीं होता। दरअसल, बरसात के सीजन में मौसम में नमी और गर्म वातावरण के कारण बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के तेजी से बढ़ने की संभावना होती है। इसी वजह से इस मौसम में फूडबोर्न इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। जब फल काटा जाता है, तो उसकी बाहरी सुरक्षा परत यानि छिलके हट जाते हैं। ऐसे में इससे अंदर का हिस्सा सीधे हवा, धूल, हाथों और उपकरणों के संपर्क में आ जाता है। इस स्थिति में अगर साफ-सफाई का ध्यान न रखा जाए तो कई तरह के बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, असुरक्षित भोजन हर साल करोड़ों लोगों को बीमार करता है और इसका बड़ा हिस्सा खराब हैंडलिंग और स्टोरेज से जुड़ा होता है।
मानसून में खतरा क्यों बढ़ जाता बैक्टीरिया पनपने का खतरा?बरसात में अन्य मौसम की तुलना में कटे हुे फलों में बैक्टीरिया पनपने का खतरा ज्यादा रहता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे--हवा में नमी का ज्यादा होना।-तापमान 25–35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहना, यह तापमान बैक्टीरिया ग्रोथ के लिए अच्छा होता है।-खुले में रखे फल जल्दी खराब होते हैं-मच्छर और धूल का काफी ज्यादा बढ़ना-CDC की रिपोर्ट के मुताबिक, फूड बोर्न जर्म्स कमरे के तापमान पर तेजी से मल्टीप्लाई करते हैं और कुछ ही घंटों में संक्रमण का कारण बन सकते हैं।- कटे हुए फल तभी सुरक्षित हैं, जब आप कुछ बातों पर ध्यान देकर खाते हैं, जैसे--साफ पानी और सैनिटाइज टूल्स से तैयार किया गया हो।-ठंडे तापमान यानि 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे में फल रखा गया हो-खुले में लंबे समय तक न रखा गया हो-बिना हाथों के सीधे संपर्क के पैक किया गया हो।-अगर फल पर चिपचिपापन, बदबू या रंग बदलना दिखे, तो उसे तुरंत नहीं खाना चाहिए।-: मानसून में कटे हुए फल आपके काम को जरूर आसान बना देते हैं, लेकिन हाइजीन में थोड़ी भी लापरवाही हेल्थ रिस्क बढ़ा सकती है। इसलिए जब भी शक हो, पूरा और ताजा फल ही सबसे सुरक्षित विकल्प है। - जामुन एक ऐसा मौसमी फल है जिसे न केवल इसके स्वाद के लिए पसंद किया जाता है, बल्कि इसके औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में भी इसे खास स्थान प्राप्त है। यह फल गर्मियों और बरसात के मौसम में आसानी से उपलब्ध होता है और शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है। जामुन में फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो पाचन तंत्र यानी डाइजेस्टिव सिस्टम को मजबूत बनाने, ब्लड शुगर को कंट्रोल करने और शरीर को ठंडक प्रदान करने में मदद करते हैं। हालांकि, किसी भी हेल्दी फूड की तरह जामुन का सेवन भी सही मात्रा में करना बेहद जरूरी है।1 दिन में कितने जामुन खाने चाहिए?जामुन खाने की सही मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। यदि किसी व्यक्ति की पाचन शक्ति यानी अग्नि बहुत मजबूत है और वह शारीरिक रूप से भी स्वस्थ और एक्टिव है, तो वह एक बार में ज्यादा जामुन खा सकता है। ऐसे लोग लगभग 20 से 30 जामुन तक एक दिन में आराम से खा सकते हैं। वहीं, जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है या जिन्हें बार-बार गैस, अपच या भारीपन की समस्या रहती है, उन्हें सीमित मात्रा में जामुन खाना चाहिए। जामुन खाने की मात्रा केवल उम्र या ताकत पर ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल पर भी निर्भर करती है। जो लोग नियमित एक्सरसाइज करते हैं, समय पर भोजन लेते हैं और जिनकी दिनचर्या संतुलित होती है, उनकी पाचन क्षमता बेहतर होती है। ऐसे लोग ज्यादा जामुन खा सकते हैं। वहीं, अनियमित लाइफस्टाइल, कम फिजिकल एक्टिविटी और गलत खानपान वाले लोगों को जामुन सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए।कमजोर पाचन और अलग-अलग आयु वर्ग के लिए मात्राजिन लोगों की अग्नि कमजोर है, उनके लिए जामुन का सेवन 5 से 10 जामुन तक सीमित रखना चाहिए। यह मात्रा डाइजेस्टिव सिस्टम पर ज्यादा दबाव नहीं डालती और शरीर इसे आसानी से पचा सकता है। बच्चों के लिए 10 से 12 जामुन तक का सेवन सामान्य माना जाता है, जबकि बुजुर्गों के लिए भी लगभग यही सीमा उपयुक्त रहती है। वयस्क व्यक्ति, जिनका स्वास्थ्य सामान्य है, वे 20 जामुन तक खा सकते हैं, लेकिन यह संख्या भी उनकी दिनचर्या, व्यायाम और पाचन क्षमता पर निर्भर करती है।ज्यादा जामुन खाने के नुकसानजामुन सेहत के लिए फायदेमंद है, लेकिन इसका ज्यादा सेवन नुकसान भी पहुंचा सकता है। ज्यादा जामुन खाने से कुछ लोगों को पेट दर्द, गैस, अपच या भारीपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कमजोर पाचन वाले लोगों में यह समस्या और बढ़ सकती है। इसके अलावा ज्यादा मात्रा में सेवन करने से शरीर में असंतुलन भी हो सकता है, इसलिए संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है।आयुर्वेद के अनुसार जामुन का सेवन व्यक्ति की पाचन शक्ति, उम्र और जीवनशैली यानी लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है। मजबूत पाचन वाले लोग 20 से 30 जामुन तक खा सकते हैं, जबकि कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए 5 से 10 जामुन पर्याप्त हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी सीमित मात्रा सुरक्षित मानी जाती है। ज्यादा जामुन खाने से पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं, इसलिए इसका सेवन हमेशा संतुलित मात्रा में और शरीर की क्षमता के अनुसार करना चाहिए।

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