- Home
- सेहत
- कुछ लोगों के लिए कार, बस या पहाड़ी रास्तों पर सफर करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। गाड़ी में बैठते ही जी मिचलाना, चक्कर आना, पसीना आना और उल्टी जैसा महसूस होना मोशन सिकनेस के सामान्य लक्षण हैं। यह समस्या तब होती है जब आंखों, कानों और मस्तिष्क को शरीर की गति के बारे में अलग-अलग संकेत मिलते हैं।बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कुछ संवेदनशील लोगों में यह परेशानी अधिक देखने को मिलती है। हालांकि यह कोई गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन सफर का पूरा मजा खराब कर सकती है। अच्छी बात यह है कि कुछ आसान घरेलू उपाय और छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक राहत पाई जा सकती है।अगर आप भी गाड़ी में बैठते ही उल्टी या जी मिचलाने की समस्या से परेशान रहते हैं, तो यहां बताए गए उपाय आपके अगले सफर को आरामदायक और आसान बना सकते हैं।अदरक का सेवन करेंअदरक को प्राकृतिक एंटी-नॉजिया माना जाता है। सफर शुरू करने से पहले अदरक का छोटा टुकड़ा चबाना या अदरक की चाय पीना जी मिचलाने और उल्टी की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। आप चाहें तो अदरक वाली कैंडी भी साथ रख सकते हैं।हल्का भोजन करेंखाली पेट सफर करने से भी कुछ लोगों को उल्टी की समस्या हो सकती है, वहीं बहुत ज्यादा तला-भुना या मसालेदार खाना खाने से भी परेशानी बढ़ सकती है। सफर से पहले हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन करना बेहतर रहता है।आगे की सीट पर बैठेंअगर कार से यात्रा कर रहे हैं तो आगे की सीट पर बैठने की कोशिश करें। इससे सड़क साफ दिखाई देती है और शरीर को गति का बेहतर एहसास होता है, जिससे मोशन सिकनेस की संभावना कम हो सकती है।नींबू और पुदीना इस्तेमाल करेंनींबू की खुशबू या पुदीने की चाय और पुदीने की टॉफी कई लोगों में मतली कम करने में मदद कर सकती है। सफर के दौरान इन्हें साथ रखना फायदेमंद हो सकता है।जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेंअगर हर बार यात्रा के दौरान तेज उल्टी, चक्कर या अत्यधिक परेशानी होती है, तो डॉक्टर से सलाह लें। जरूरत पड़ने पर वे मोशन सिकनेस की दवा लेने की सलाह दे सकते हैं।सफर के दौरान इन बातों का रखें ध्यान--00 तेज खुशबू वाले परफ्यूम या भोजन से दूरी रखें।00 लंबी यात्रा में बीच-बीच में ब्रेक लें।00 पर्याप्त नींद लेकर ही यात्रा करें।00 आरामदायक कपड़े पहनें।00 गहरी और धीमी सांस लेने की कोशिश करें।
- नहाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे व्यक्ति अपने शरीर को साफ करने के लिए फॉलो करता है। दिनभर बाहर रहने की वजह से शरीर पर धूल, पसीना और गंदगी चिपक जाती है, जिसे साफ करने के लिए रोजाना नहाना जरूरी होता है। जब आप रोजाना नहाते हैं तो त्वचा साफ रहती है और संक्रमण का खतरा कम हो सकता है। वैसे तो अधिकतर लोग सुबह काम पर जाने से पहले नहाते हैं, लेकिन क्या वाकई सुबह के समय नहाना सही है? यहां जानिए सुबह, दोपहर या शाम में से नहाने का बेस्ट समय कौन सा है।पौराणिक और आयुर्वेद की मान्यतापुराने ग्रंथों की मानें तो नहाने को केवल शरीर की सफाई का काम नहीं बल्कि शुद्धि की एक प्रक्रिया माना गया है। आयुर्वेद सुबह जल्दी, खासकर ब्रह्ममुहूर्त में नहाने की सलाह देता है। ब्रह्ममुहूर्त सूरज उगने से लगभग 48 मिनट पहले होते है। कहा जाता है कि इस समय पर नहाने से इंद्रियां जागृत होती हैं। इससे सुबह की नींद खुलने में भी मदद मिलती है।आयुर्वेद की सलाहआयुर्वेद में हैवी खाने के तुरंत बाद नहाने से मना किया जाता है। कहते हैं ऐसा करने से पेट से खून का बहाव दूसरी तरफ चला जाता है, जिससे पाचन धीमा हो जाता है। हमेशा खाना खाने से पहले नहाना चाहिए या खाने के बाद कम से कम दो घंटे का इंतजार करना चाहिए। नहाने का समय अपने शरीर की प्रकृति के हिसाब से तय करना चाहिए। माना जाता है कि सुबह नहाने से कफ दोष के कारण होने वाली सुस्ती दूर होती है, जबकि शाम को गर्म पानी से नहाना वात प्रकृति वाले लोगों के लिए बहुत फायदेमंद और संतुलित बनाने वाला होता है।क्या कहता है साइंससाइंस में सुबह नहाने की सलाह दी जाती है क्योंकि रात भर हमारे शरीर से पसीना निकलता है और स्किन सेल्स झड़ते हैं। सुबह नहाने से सोते समय जमा हुए बैक्टीरिया हट जाते हैं और आप लंबे समय तक फ्रेश महसूस करते हैं।सुबह नहाने के फायदे:-सुबह ठंडे पानी से नहाने से नर्वस सिस्टम रीसेट हो जाता है- नहाते ही अलर्ट हो सकते हैं।- ब्लड सर्कुलेशन और मूड बेहतर होता है।नहाने का सबसे हेल्दी समय कौन सा है?नहाने का कोई हेल्दी समय नहीं है। हालांकि, बेहतर नींद के लिए सोने से डेढ़ घंटे पहले नहाने से शरीर का तापमान कम होता है और गहरी नींद आती है। इसके अलावा स्किन साफ करने के लिए भी रात के समय को बेस्ट माना जाता है। वहीं सुबह नहाने से रात भर का तेल और पसीना साफ हो जाता है और शरीर में फुर्ती आती है।नहाते हुए
- शरीर में अगर विटामिन की कमी होगी तो अलग-अलग तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ये लक्षण शरीर के अंदर या बाहरी तौर पर दिखाई दे सकते हैं। विटामिन B12 एक जरूरी विटामिन है जो शरीर में रेड ब्लड सेल्स के निर्माण, तंत्रिका तंत्र के सही कामकाज और डीएनए बनाने में जरूरी होता है। वहीं डी3 शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है, जिससे हड्डियां, दांत और मांसपेशियां मजबूत रहती हैं। आजकल ज्यादातर लोग विटामिन बी12 और डी3 की कमी से परेशान हैं। यहां 10 ऐसे साइन बता रहे हैं जो विटामिन बी 12 और डी3 की कमी के कारण शरीर में दिखाई दे सकते हैं।विटामिन बी 12 और डी3 की कमी के साइन--1) पिन और सुई चुभना- विटामिन बी 12 की कमी होने पर हाथ और जोड़ों में अचानक सुई जैसी चुभन हो सकती है।2) चिकनी जीभ- जीभ का बिलकुल चिकना, लाल और दर्दनक हो जाना या फिर टेस्ट बड्स गायब होने जैसा लगना बी12 की कमी के कारण होता है।3) कोल्ड स्वेट्स- बिना गर्मी के सिर्फ सर पर बहुत ज्यादा पसीना आना डी3 की कमी के कारण होता है। बिना किसी कारण के अचानक बहुत ज्यादा पसीना आना विटामिन की कमी के कारण हो सकता है।4) ब्रेन फॉग- ये बी 12 की कमी का लक्षण है। यह मानसिक थकान, तनाव या नींद की कमी के कारण दिमाग में 'धुंधलापन' महसूस होने की स्थिति है।5) मुंह के छाले- मुंह के छालों को अक्सर कब्ज से जोड़ा जाता है। लेकिन ये बी12 की कमी का लक्षण हो सकता है। बार-बार मुंह में छाले होना जो जल्दी ठीक ही नहीं होते वह विटामिन बी 12 की कमी के कारण हो सकता है।6) अचानक मूड में बदलाव- विटामिन डी3 और बी12 की वजह से बिना वजह चिंता, चिड़चिड़ापन या लो फील महसूस हो सकता है।7) चक्कर आना या वर्टिगो- विटामिन बी12 का एक लक्षण अचानक खड़े होने पर चक्कर आना या बैलेंस खोना है।8) मसूड़ों से खून आना- बिना किसी दांतों की समस्या के ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आना विटामिन बी12 की कमी का लक्षण है।9) बेवजह बाल झड़ना- विटामिन डी3 की कमी होने पर हेयरफॉल हो सकता है। जब जड़ों को डी3 नहीं मिल रहा होता तब बाल झड़ने की समस्या हो सकती है।10) बार-बार मांसपेशियों में ऐंठन- विटामिन डी3 की कमी से हो मांसपेशियों में ऐंठन हो सकती है।नोट- विटामिन बी12 के लिए दूध, दही, पनीर, अंडे, मछली, मांस और B12 के लिए डॉक्टर की सलाह पर सप्लीमेंट्स लें। इसके अलावा डी3 के लिए सुबह की धूप लगभग 10-20 मिनट लें।
- क्या आपके हाथों या पैरों में बार-बार झुनझुनी होती है? क्या कभी ऐसा महसूस होता है कि उंगलियां सुन्न हो रही हैं, पैरों में जलन हो रही है या जमीन पर चलते समय पैरों में कुछ अजीब लगता है? कई लोग इन लक्षणों को थकान, कमजोरी या सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन अगर झुनझुनी लगातार बनी रहती है या बार-बार वापस आती है, तो यह शरीर में नसों से जुड़ी किसी समस्या का संकेत भी हो सकती है। ऐसी ही एक स्थिति है पेरिफेरल न्यूरोपैथी, जिसमें शरीर की बाहरी नसें प्रभावित होने लगती हैं।पेरिफेरल न्यूरोपैथी का संकेतमारे शरीर में मौजूद पेरिफेरल नर्व्स (Peripheral Nerves) दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड से संदेशों को हाथों, पैरों और अन्य अंगों तक पहुंचाने का काम करती हैं। जब ये नसें किसी कारण से डैमेज या कमजोर हो जाती हैं, तो इसे पेरिफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है। इसकी वजह से व्यक्ति को झुनझुनी, सुन्नपन, जलन, चुभन या सेंसिटिविटी में बदलाव महसूस हो सकता है। कई मामलों में यह समस्या धीरे-धीरे विकसित होती है और शुरुआती लक्षणों को लोग सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।यदि झुनझुनी केवल कुछ मिनटों के लिए होती है और फिर ठीक हो जाती है, तो यह हमेशा गंभीर नहीं होती लेकिन यदि यह रोजाना होने लगे, रात में बढ़ जाए या हाथों और पैरों में लगातार बनी रहे, तो यह नसों के प्रभावित होने का संकेत हो सकता है। पेरिफेरल न्यूरोपैथी में शुरुआत अक्सर पैरों की उंगलियों से होती है और धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ सकती है। यदि झुनझुनी के साथ पैरों या हाथों में सुन्नपन, जलन, तेज दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी, बैलेंस बिगड़ना या चलने में कठिनाई महसूस हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कुछ मामलों में मरीजों को गर्म और ठंडे तापमान का सही अंदाजा लगाने में भी परेशानी हो सकती है। यह संकेत देते हैं कि नसों का काम प्रभावित हो रहा है और हेल्थ चेकअप की जरूरत है।साल 2026 में JAMA Journals में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, पेरीफेरल न्यूरोपैथी दुनिया भर में लगभग 1% वयस्कों को प्रभावित करती है। इसकी वजह से शरीर में सुन्नपन, दर्द, कमजोरी और अंदरूनी अंगों में दिक्कतें आ सकती हैं। पश्चिमी देशों में इसका सबसे मुख्य कारण डायबिटीज है। अगर समय पर ध्यान दिया जाए, तो इस समस्या और इसके दर्द को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।पेरिफेरल न्यूरोपैथी के प्रमुख कारणडायबिटीज पेरिफेरल न्यूरोपैथी का सबसे आम कारण है। लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर नसों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा विटामिन B12 की कमी, किडनी रोग, थायराइड डिजीज, ज्यादा शराब का सेवन, कुछ इंफेक्शन, ऑटोइम्यून बीमारियां और कुछ दवाओं के नुकसान भी इस समस्या का कारण बन सकते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर रिजल्ट निकालने के बजाय कारण की पहचान करना जरूरी होता है।निष्कर्षहाथों या पैरों में लगातार होने वाली झुनझुनी को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। यह कई बार पेरिफेरल न्यूरोपैथी जैसी स्थिति का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिसमें नसें प्रभावित होने लगती हैं। यदि झुनझुनी बार-बार हो रही है, लंबे समय तक बनी रहती है या इसके साथ सुन्नपन, कमजोरी और शरीर के बैलेंस संबंधी समस्याएं भी हैं, तो जल्द से जल्द एक्सपर्ट डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से नसों को होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है।
- ओआरएस हर घर में रखना क्यों जरूरी है इसके प्रति जागरूकता लाने के लिए 29 जुलाई को वर्ल्ड ओआरएस डे मनाया जाता है। इस खास मौके पर हम बात करेंगे ORS कोई बीमारी वाली दवा नहीं है। ये एक लाइफ-सेविंग घोल है जो हर घर के फर्स्ट-एड बॉक्स में होना ही चाहिए। WHO की रिपोर्ट 2023 के अनुसार, ORS के इस्तेमाल से दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की दस्त से होने वाली मौत 93% तक कम हो गई है।ORS है क्या?ORS का फुल फॉर्म है Oral Rehydration Solution यानी मौखिक पुनर्जलीकरण घोल। WHO और UNICEF ने इसे मिलकर बनाया था। किसी भी ORS के फॉर्मूले में 4 चीजों को शामिल किया जाता है- सोडियम, पोटैशियम, सिट्रेट और ग्लूकोज। एकदम सही मात्रा में। डॉ. वी.के. पॉल, नीति आयोग के सदस्य और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं, ORS दुनिया का सबसे सस्ता और सबसे असरदार आविष्कार है। इसने करोड़ों बच्चों की जान बचाई है।ORS के 5 बड़े फायदेनई दिल्ली के मॉडल टाउन स्थित यथार्थ हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन के हेड डॉ. संजय गुप्ता कहते हैं कि ओआरएस का पैकेट हर घर में होना जरूरी है, ताकि उल्टी, दस्त जैसी बीमारी में तुरंत इसे इस्तेमाल किया जा सके। आइए आगे जानते हैं ORS के 5 बड़े फायदों के बारे में-1. डिहाइड्रेशन का तुरंत इलाजडॉक्टर बताते हैं कि दस्त या उल्टी होने पर शरीर से पानी के साथ-साथ नमक भी निकल जाता है। सिर्फ पानी पीने से वो नमक वापस नहीं आता है। ORS का कमाल ये है कि इसमें मौजूद ग्लूकोज और नमक एक साथ मिलकर आंतों से पानी को 3 गुना तेजी से खून में पहुंचते हैं। इससे उल्टी, दस्त के कारण होने वाले डिहाइड्रेशन से तुरंत राहत मिलती है।2. लू और गर्मी से बचावपसीने से शरीर का सारा नमक निकल जाता है। इसके कारण सिरदर्द, चक्कर, कमजोरी की परेशानी होती है। ऐसे में ORS पीते ही 15 मिनट में एनर्जी वापस आ जाती है। खिलाड़ी, मजदूर, बच्चे, बुजुर्ग समेत हर उम्र के लोगों के लिए ORS पीना फायदेमंद होता है।3. बुखार और वायरल में बॉडी को सपोर्टडॉक्टर कहते हैं कि 100 बुखार में शरीर 24 घंटे में 1 लीटर एक्स्ट्रा पानी मांगता है। अगर पानी नहीं मिला तो चक्कर और कमजोरी महसूस होने लगती है। ऐसे में ORS बुखार में खोए हुए फ्लूइड और इलेक्ट्रोलाइट दोनों की भरपाई कर देता है। द4. बच्चों और बुजुर्गों के लिए रामबाणछोटे बच्चों को दस्त लग जाए तो 2 घंटे में हालत खराब हो जाती है। ठीक इसी तरह बुजुर्गों में डिहाइड्रेशन से BP गिर जाता है। ऐसे में बच्चों और बुजुर्गों को ओआरएस देने से डिहाइड्रेशन की समस्या कम होती है।5. फूड पॉइजनिंग और पेट खराब में फायदेमंदमानसून के मौसम में बाहर खाना या बासी खाने के बाद अक्सर लोगों को पेट में खराबी और फूड पॉइजनिंग की समस्या होती है। ऐसे में ओआरएस पीना पेट के लिहाज से फायदेमंद होता है। ओआरएस का सोडियम और नमक शरीर को हाइड्रेट करके फूड पॉइजनिंग की समस्या से बचाता है।ORS बनाने का सही तरीका क्या है?-1 पैकेट ORS को 1 लीटर साफ पानी में घोलें।-पानी में ORS को डालने के बाद चम्मच से 2 मिनट हिलाएं।-घोल बनने के 24 घंटे के अंदर इस्तेमाल कर लें।-अगर 24 घंटे के बाद आपके पास ORS बचा हुआ तो उसे फेंक दें।ORS को कितनी मात्रा में पीना चाहिए?ORS की मात्रा उम्र और जरूरत के हिसाब से तय होती है। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैः-बच्चे: हर दस्त के बाद आधा से 1 कपवयस्क: हर उल्टी/दस्त के बाद 1-2 गिलास। दिन में 3-4 लीटर तकडॉक्टर कहते हैं कि अगर 24 घंटे में ORS पीने के बाद भी उल्टी रुक नहीं रही, खून आ रहा है या बहुत कमजोरी है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। ORS इलाज की जगह नहीं लेता, पर उसे सपोर्ट करता है।
- प्रोटीन शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन इसकी जरूरत से ज्यादा मात्रा लेना शरीर पर बुरा असर डाल सकता है। ज्यादा मात्रा में प्रोटीन का सेवन शरीर में कई समस्याओं को बढ़ा सकता है, जिसमें थकान, कब्ज, सुस्ती आदि परेशानियां शामिल हैं। आइए इस लेख में जानते हैं कि ज्यादा प्रोटीन खाने पर शरीर क्या संकेत देता हैज्यादा प्रोटीन लेने के 5 संकेतन्यूट्रिशनिस्ट रक्षिता मेहरा का कहना है कि ज्यादा मात्रा में प्रोटीन लेने पर स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं हो सकती हैं, क्योंकि किसी भी चीज को बहुत कम या ज्यादा मात्रा में लेना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।1. बार-बार पेशाब आनाअगर आपको नॉर्मल से ज्यादा बार पेशाब जाने की जरूरत महसूस होती है तो यह ज्यादा प्रोटीन लेने का संकेत हो सकता है। जब शरीर प्रोटीन को पचाता है तो नाइट्रोजन वाले टॉक्सिक पदार्थ बनते हैं, जिन्हें किडनी पेशाब के जरिए बाहर निकालती है। ज्यादा मात्रा में प्रोटीन लेने पर किडनी को ज्यादा काम करना पड़ सकता है, जिससे पेशाब की मात्रा बढ़ सकती है। अगर इसके साथ आपको ज्यादा प्यास लगने की समस्या होती है तो यह शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है। इसलिए, हाई प्रोटीन डाइट लेने वालों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बहुत जरूरी है।2. हर समय सुस्ती महसूस होनाप्रोटीन हमारे शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन अगर आप जरूरत से ज्यादा प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट बहुत कम लेते हैं तो शरीर में एनर्जी की कमी हो सकती है। कार्बोहाइड्रेटेड फूड्स आपके शरीर को एनर्जी देने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में प्रोटीन ज्यादा लेने पर शरीर में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो जाती है, जिससे लोगों में थकान, सुस्ती और काम में मन न लगने जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। अगर आप हाई प्रोटीन डाइट शुरू करने के बाद लगातार एनर्जी की कमी महसूस कर रहे हैं तो अपनी डाइट का संतुलन जरूर चेक करें।3. कब्ज की समस्या होनाकई हाई-प्रोटीन डाइट में फाइबर की मात्रा कम हो जाती है, खासकर जब लोग दालों, साबुत अनाज, फल और सब्जियों की जगह सिर्फ एनिमल-बेस्ड प्रोटीन पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। फाइबर की कमी से पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है और कब्ज, ब्लोटिंग और मल त्याग करने में मुश्किल जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर आपकी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ गई है तो इसके साथ पर्याप्त मात्रा में फाइबर का सेवन और भरपूर मात्रा में पानी पीना जरूरी है।4. वजन बढ़नाअक्सर लोगों को लगता है कि ज्यादा मात्रा में प्रोटीन खाने से सिर्फ वजन कम होगा, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है। अगर आप शरीर की जरूरत से ज्यादा कैलोरी ले रहे हैं, फिर चाहे वो प्रोटीन से ही क्यों न आए तो ज्यादा एनर्जी शरीर में फैट के रूप में जमा हो सकती है। इसके अलावा, कई प्रोटीन बार, शेक और सप्लीमेंट्स में ज्यादा चीनी और कैलोरी भी होती है, जो वजन बढ़ाने का कारण बन सकती है। इसलिए, सिर्फ हाई-प्रोटीन फूड के लेबल वाले प्रोडक्ट को अपनी डाइट में शामिल करने से बचें, बल्कि उसमें कैलोरी भी चेक करें।5. हर समय थकान महसूस होनाअगर पर्याप्त नींद लेने के बाद भी आपको लगातार थकान की समस्या महसूस होती है तो इसका एक कारण असंतुलित डाइट भी हो सकती है। ज्यादा प्रोटीन और कम कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट लेने से शरीर की एनर्जी पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक डिहाइड्रेशन के कारण भी थकान की समस्या बनी रह सकती है। हालांकि, लगातार थकान के पीछे एनीमिया, थायराइड की समस्या, विटामिन की कमी या अन्य स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए, यह लक्षण लंबे समय तक बना रहे तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।कितनी प्रोटीन की जरूरत होती है?प्रोटीन की जरूरत हर व्यक्ति के शरीर के लिए अलग-अलग होती है। यह उम्र, वजन, शारीरिक गतिविधियों और स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। इसलिए, जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज करते हैं या एथलीट हैं, उन्हें नॉर्मल लोगों की तुलना में ज्यादा प्रोटीन की जरूरत हो सकती है। वहीं, किडनी से जुड़ी कुछ बीमारियों से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार प्रोटीन की मात्रा का ध्यान रखना चाहिए और संतुलित मात्रा में ही इसे लेना चाहिए।निष्कर्षप्रोटीन शरीर के लिए एक जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन इसका ज्यादा मात्रा में सेवन शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। बार-बार पेशाब आना, लगातार सुस्ती होना, कब्ज होना, वजन बढ़ना और हर समय थकान महसूस होना, शरीर में नजर आने वाले ऐसे संकेत हो सकते हैं कि आपकी डाइट में प्रोटीन जरूरत से ज्यादा है या उसका संतुलन सही नहीं है। हेल्दी रहने का सबसे अच्छा तरीका किसी एक पोषक तत्व पर ज्यादा निर्भर होना नहीं है, बल्कि इसके स्थान पर संतुलित आहार लेना है, जिसमें प्रोटीन के साथ कार्बोहाइड्रेट, हेल्दी फैट, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स भी पर्याप्त मात्रा में शामिल हों।
- लहसुन भी ऐसी ही एक सब्जी है, जो हमारे देश में आमतौर पर मिल जाती है और हम अक्सर रोजाना के खानपान में इसका सेवन करते हैं। लेकिन जब बात इसके गुणों की आती है, तो यह किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं होता क्योंकि स्वास्थ्य के लिए अनेक गुण पाए जाते हैं। इस लेख में आज हम लहसुन के बारे में जानेंगे कि लहसुन स्वास्थ्य के लिए कितना फायदेमंद है और कितनी मात्रा में इसका सेवन किया जाना चाहिए। भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में भी लहसुन का उल्लेख मिलता है जिसमें बताया गया है कि लहसुन सिरदर्द, निमोनिया, गले की समस्याओं और पाचन संबंधी विकारों जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में मदद करता है।लहसुन में पाए जाने वाले खास पोषक तत्वभले ही लहसुन दिखने में एक बेहद छोटी सी सब्जी हो और खाने के फ्लेवर देने के लिए एक मसाले की तरह इसका सेवन किया जाता है, लेकिन इसमें कई अलग-अलग तरह के खास तत्व पाए जाते हैं। जिनके बारे में आपको इस लेख में हम बताने वाले हैं।1 एलिन (Alliin) -यह सिर्फ कच्चे लहसुन में पाया जाता है। जब लहसुन को काटते या कुचलते हैं तो यह एलिसिन में बदल जाता है।2 एलिसिन (Allicin)- लहसुन में तेज गंध इसी की होती है और इसमें एंटीमाइक्रोबियल और एंटीऑक्सीडेंट प्रोपर्टीज पाई जाती हैं।3 एजोइनी (Ajoene) -यह एलिसिन से बनता है और ब्लड क्लॉट बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करने और इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करता है।4 डायलिल सल्फाइड (Diallyl Sulfide)- यह शरीर में एंटीऑक्सीडेंट एक्टिविटी को बढ़ाने और कुछ प्रोटेक्टिव एंजाइम्स को एक्टिवेट करने में मदद कर सकता है।5 डायलिल डिसल्फाइड (Diallyl Disulfide)- यह एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-ऑक्सीडेंट इफेक्ट्स के रूप की तरह काम करता है, जो सूजन ल लालिमा कम करता है।6 डायलिल ट्राइसल्फाइड -लहसुन का एक शक्तिशाली सल्फर कंपाउंड है, जो हार्ट के लिए अच्छा माना जाता है।7 एस-एलिल सिस्टीन (S-allyl Cysteine) -यह एक तरह का एज रिलेटेड एक्सट्रेक्ट है, जो कि एक स्टेबल एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड होता है।8 एस-एलिल मेरकैप्टोसिस्टीन (S-allyl Mercaptocysteine)- यह खासतौर पर पुराने लहसुन में पाया जाता है, जो एक खास तरह का एंटीऑक्सीडेंट है और लिवर को हेल्दी रखने में मदद करता है।9 मिथाइल एलिल सल्फाइड (Methyl Allyl Sulfide) -यह भी लहसुन पाने जाने वाला एक खास तरह का तत्व होता है, जो लहसुन को उसकी गंध प्रदान करता है।डायबिटीज कंट्रोल करने में मदद -स्टडी में यह पाया गया है कि एक निश्चित मात्रा में लहसुन का सेवन करने से Fasting Blood Glucose में कुछ हद तक कमी देखी गई और HbA1c लेवल में भी 0.53% प्रतिशत कमी देखी गई। हालांकि, कमी का आंकड़ा बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इससे यह साबित होता है कि डायबिटीज के मरीजों के लिए लहसुन पूरी तरह से सेफ है और कहीं न कहीं ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में ही मदद करता है।कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद -PubMed द्वारा पब्लिश की गई एक रिपोर्ट में यह साबित हुआ कि लहसुन का सही और निश्चित सेवन करना शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करने में मदद करता है। रिसर्च में पाया गया कि लहसुन बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और कुछ लोगों में गुल कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है। यहां तक कि कुछ हद तक लहसुन का सेवन करना ट्राइग्लिसराइड्स लेवल को कम करने में भी मदद कर सकता है।हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने में मदद -Online Library की रिपोर्ट के अनुसार मेटा एनालिसिस के आधार पर एक रिसर्च की गई, यानी पहले की गई रिसर्चों के आधार पर एक फिर से रिसर्च कई गई। इसमें पाया गया कि हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए लहसुन अच्छा विकल्प है, जो कुछ हद तक ब्लड प्रेशर लेवल को कम करने में मदद कर सकता है। ऑनलाइन लाइब्रेरी के शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि बीपी के मरीजों के लिए लहसुन का सेवन करना अच्छा विकल्प हो सकता है।इन्फेक्शन से बचाव करने में मदद -दुनिया की सबसे भरोसेमंद मेडिकल रिसर्च संस्थाओं में से एक Cochrane द्वारा कई गई एक स्टडी में यह पाया गया है कि लहसुन का सेवन करना सर्दी-खांसी और जुकाम जैसी समस्याओं का इलाज करने में मदद करता है। इस रिसर्च में 146 स्वस्थ लोगों को 12 सप्ताह तक रोजाना या तो एलिसिन (Allicin) युक्त लहसुन का सप्लीमेंट दिया गया या फिर प्लेसीबो (डमी कैप्सूल) दिया गया। इसके बाद रिसर्च में यह पाया गया है कि जिन समूह को लहसुन दिया गया था उसमें सर्दी-जुकाम के 24 मामले आए जबकि जिन्हें डमी कैप्सूल दिए गए थे उनमें सर्दी-जुकाम के मामले 65 दर्ज किए गए। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि यह एक अध्ययन सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं में लहसुन के इस्तेमाल से मिलने वाले फायदों की ओर संकेत करता है।लेकिन क्या ज्यादा लहसुन का सेवन करना सेफ है?इसमें कोई शक है कि लहसुन हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है और इससे हेल्थ को अनेक फायदे मिलते हैं। इसका उपयोग सदियों से खाने के स्वाद और प्राकृतिक इलाज के लिए किया जाता रहा है। यह हमारी इम्यूनिटी को बढ़ाता है और दिल को स्वस्थ रखता है। लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा सेवन करना स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है जो इस प्रकार हैं --पाचन की समस्या - कुछ लोग लहसुन को कच्चा खा लेते हैं और जरूर से ज्यादा कच्चा लहसुन खाना सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।-खून बहने का खतरा - लहसुन प्राकृतिक रूप से खून को पतला करता है। ज्यादा लहसुन खाने से खून पतला करने वाली दवाइयों का असर प्रभावित हो सकता है और सर्जरी के दौरान या बाद में खून बहने का रिस्क बढ़ जाता है।-पेट के मरीजों को परेशानी - लहसुन में कार्बोहाइड्रेट का एक खास प्रकार पाया जाता है, जिससे संवेदनशील पेट वाले लोगों या IBS के मरीजों को पेट फूलने और दर्द की समस्या हो सकती है।सांस और शरीर की बदबू - सल्फर के तत्व खून में मिलकर सांसों और पसीने के जरिए बाहर निकलते हैं, जिससे मुंह और शरीर से काफी देर तक बदबू आ सकती है।कितनी मात्रा में करें लहसुन का सेवनस्वास्थ्य के लिए कोई कितनी भी हेल्दी चीज क्यों न हो वह सिर्फ तब तक ही फायदेमंद होती है, जब तक उसका सेवन सही मात्रा में किया जाए। किसी भी हेल्दी समझी जाने वाली चीज का सेवन अगर जरूरत से ज्यादा मात्रा किया जा रहा है और लंबे समय से ऐसा हो रहा है, तो काफी संभावना हो सकती है कि उससे हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकती है। लहसुन के मामले में भी ठीक ऐसे ही होता है, यह सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है लेकिन अगर आप इसका जरूरत से ज्यादा मात्रा में सेवन करते हैं तो इससे स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है जिसके बारे में हमने आपको ऊपर भी बताया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर लहसुन का सही सेवन कितना होना चाहिए, जो इस प्रकार है-ताजा लहसुन - 1 से 2 कली (लगभग 3 से 6 ग्राम)-लहसुन का पाउडर - 0.4 से 1.2 ग्रामलहसुन खून को पतला कैसे करता है?लहसुन का जो सबसे बड़ा गुण होता है और वही कई बार हेल्थ को नुकसान भी पहुंचा सकता है और वह है लहसुन का ब्लड थाइनिंग वाला गुण। लहसुन में खास तरह के गुण होते है, जो खून को पतला करने का काम करते हैं। अगर जरूरत से ज्यादा खून पतला हो रहा है तो उससे स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं जो इस प्रकार हैं। हालांकि, Pubmed द्वारा पब्लिश की गई एक रिपोर्ट में यह तो पाया गया कि लहसुन में एंटीप्लेटलेट तत्व होते हैं, लेकिन इसका प्रभाव बहुत हम होता है और यह किसी ब्लड थिनर दवा के जितना खून पतला नहीं कर पाता है। हालांकि, लहसुन का प्रभाव हर व्यक्ति के शरीर के अनुसार अलग-अलग हो सकता है और यह भी जानना भी महत्वपूर्ण है कि अगर कोई व्यक्ति पहले से ही किसी कारण से ब्लड थिनर दवाएं ले रहा है तो ऐसे में लहसुन का सेवन करना खून पतला करने में और ज्यादा समस्याएं पैदा कर सकता है।
- क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी से बातचीत कर रहे हों और अचानक एक बेहद आसान शब्द याद ही न आए? वह शब्द आपकी जुबान पर तो होता है, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी कुछ सेकंड या मिनट तक याद नहीं आता। बाद में अचानक वही शब्द अपने आप याद आ जाता है। जब कोई शब्द दिमाग में मौजूद होता है लेकिन उसे बोलने के लिए तुरंत याद नहीं किया जा सकता, तो इसे "टिप ऑफ द टंग" कहा जाता है। यह एक बेहद सामान्य स्थिति है और लगभग हर व्यक्ति ने अपने जीवन में इसका अनुभव किया होता है। इस दौरान व्यक्ति को महसूस होता है कि शब्द उसे पता है, लेकिन वह उसे व्यक्त नहीं कर पा रहा। कुछ सेकंड या मिनट बाद वही शब्द अचानक याद भी आ जाता है।''कई बार दिमाग में जानकारी मौजूद होने के बावजूद उसे बाहर लाने की प्रोसेस थोड़ी धीमी हो जाती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। ज्यादा तनाव, चिंता, मानसिक दबाव, पर्याप्त नींद न लेना या लगातार कई काम एक साथ करना दिमाग की शब्दों को याद करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। जब मस्तिष्क पर ज्यादा दबाव होता है, तो जानकारी को खोजने और सही समय पर उपयोग करने में थोड़ी देर लग सकती है। यही वजह है कि बिजी या तनावपूर्ण दिनों में लोग ज्यादा बार शब्द भूलते हुए नजर आते हैं।'' उम्र बढ़ने के साथ दिमाग के फंक्शन में कुछ नेचुरल बदलाव आते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि याददाश्त कमजोर हो रही है, बल्कि दिमाग को कुछ शब्दों तक पहुंचने में पहले की तुलना में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है।इसी कारण उम्रदराज लोगों में "टिप ऑफ द टंग" की घटनाएं ज्यादा देखने को मिलती हैं। अगर यह कभी-कभार हो रहा है और व्यक्ति सामान्य रूप से बातचीत कर पा रहा है, तो आमतौर पर चिंता की जरूरत नहीं होती।National Institute on Aging में प्रकाशित आर्टिकल से यह साफ है कि भूलने की बीमारी का कारण हमेशा बुढ़ापा या डिमेंशिया ही नहीं होता। तनाव, खराब लाइफस्टाइल, नींद की कमी, पोषण की कमी और डिप्रेशन जैसी मानसिक या मेडिकल परेशानियां भी हमारी याददाश्त पर गहरा असर डालती हैं। अच्छी बात यह है कि सही इलाज, बैलेंस खान-पान और तनावमुक्त जीवन जीने से इन समस्याओं को ठीक किया जा सकता है। इसलिए, यदि आप या आपका कोई करीबी लगातार याददाश्त में कमजोरी महसूस कर रहा है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है ताकि समय पर सही कदम उठाया जा सके।क्या यह गंभीर समस्या का संकेत है?कभी-कभी शब्द भूलना सामान्य है, लेकिन यदि यह समस्या बार-बार होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को लगातार सही शब्द खोजने में कठिनाई हो रही है, बातचीत प्रभावित होने लगी है या दूसरों की बात समझने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। इसके अलावा पढ़ने, लिखने या भाषा को समझने में अचानक कठिनाई महसूस होना भी चेतावनी का संकेत हो सकता है। ऐसे मामलों में समस्या सिर्फ सामान्य भूलने की नहीं, बल्कि किसी न्यूरोलॉजिकल स्थिति से जुड़ी हो सकती है। कुछ मामलों में शब्द याद न आना अफेजिया (Aphasia) नामक स्थिति का संकेत हो सकता है। यह तब होता है जब दिमाग के वे हिस्से प्रभावित हो जाते हैं जो भाषा को कंट्रोल करते हैं। स्ट्रोक इसके सबसे सामान्य कारणों में से एक है।अफेजिया का एक प्रकार एनॉमिक अफेजिया (Anomic Aphasia) भी होता है।इसमें व्यक्ति को पूरी तरह पता होता है कि वह क्या कहना चाहता है, लेकिन सही शब्द याद नहीं आता। यह समस्या सामान्य भूलने की तुलना में ज्यादा गंभीर मानी जाती है और हेल्थ चेकअप की जरूरत होती है।अफेजिया का पता कैसे लगाया जाता है?National Institute on Deafness and Other Communication Disorders की रिपोर्ट के अनुसार, अफेजिया की पहचान केवल लक्षण देखकर नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए डॉक्टर और स्पीच-लैंग्वेज एक्सपर्ट द्वारा जांच की जाती है। सबसे पहले डॉक्टर मरीज की बोलने, समझने, पढ़ने और लिखने की क्षमता का आंकलन करते हैं। जरूरत पड़ने पर ब्रेन स्कैन जैसे CT या MRI के जरिए यह देखा जाता है कि मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है। यदि डॉक्टर को अफेजिया का संदेह होता है, तो मरीज को स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट के पास भेजा जाता है, जो भाषा और संवाद से जुड़ी क्षमताओं की विस्तार से जांच करते हैं।अगर किसी व्यक्ति को अचानक बोलने में परेशानी, सही शब्द याद न आना, दूसरों की बात समझने में कठिनाई या स्ट्रोक जैसे अन्य लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और मरीज की संवाद करने की क्षमता में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।यदि शब्द भूलने के साथ अचानक शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, सुन्नपन, बोलने में दिक्कत, चेहरे का टेढ़ा होना, बैलेंस बिगड़ना या समझने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए। ये स्ट्रोक जैसी गंभीर डिजीज के संकेत हो सकते हैं और समय पर इलाज बेहद जरूरी होता है।निष्कर्षबातचीत के दौरान कभी-कभार कोई आसान शब्द भूल जाना आमतौर पर "टिप ऑफ द टंग" फिनोमेनन का हिस्सा होता है और यह तनाव, थकान, नींद की कमी या बढ़ती उम्र के कारण हो सकता है लेकिन यदि यह समस्या बार-बार होने लगे, भाषा समझने या बोलने में कठिनाई आने लगे या इसके साथ अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। समय रहते जांच कराने से किसी गंभीर समस्या का पता लगाया जा सकता है और उचित उपचार शुरू किया जा सकता है।
- कभी लंबे समय तक एक ही जगह बैठने के कारण दर्द होता है, तो कभी गलत पॉश्चर के कारण गर्दन का दर्द परेशान करता है। यहां तक कि स्ट्रेस भी गर्दन में दर्द का कारण बन सकता है, लेकिन दर्द जब कुछ देर में या आराम करके ठीक हो जाए, तो चिंता की बात नहीं है। समय के साथ तीव्र होने वाला दर्द अक्सर किसी अंदरूनी समस्या का संकेत होता है। Mayo Clinic के मुताबिक, एक स्टडी में पाया गया है कि जो लोग दिन में छह घंटे से ज्यादा समय तक एक ही जगह बैठे रहते हैं, उन्हें गर्दन में दर्द होने की संभावना ज्यादा होती है। अगर लैपटॉप या स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हुए पूरे दिन बैठे रहेंगे, तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है।गर्दन में दर्द के रेड फ्लैग लक्षणसाल 2022 में मेडिकल जर्नल Global Spine Journal में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, हाथ-पैर में कमजोरी, सुन्नपन, पेशाब या मल पर नियंत्रण खोना वगैरह, गर्दन में दर्द के रेड फ्लैग लक्षण हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। स्टडी में यह भी बताया गया है कि गर्दन में दर्द के पीछे स्पाइनल स्टेनोसिस, हर्नियेटेड (स्लिप) डिस्क, डिजेनेरेटिव डिस्क डिजीज, स्पोंडिलोलिस्थीसिस (रीढ़ की एक वर्टिब्रा का खिसक जाना) जैसे कारण हो सकते हैं।गर्दन का हर दर्द गंभीर नहीं होताज्यादातर मामलों में गर्दन में दर्द इतना चिंता का विषय नहीं है। अगर गर्दन में हल्का दर्द है, तो लक्षण कुछ दिनों में चले जाते हैं। बॉडी पॉश्चर में सुधार करके या लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव करके जैसे झुककर मोबाइल न चलाना या गर्दन आगे चलकर लैपटॉप न इस्तेमाल करना वगैरह से दर्द को काबू किया जा सकता है।'' सामान्य मामलों में गर्दन के दर्द के पीछे मांसपेशियों में खिंचाव, गलत तकिए पर सोना या गलत ढंग से तकिया लगाना, सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस जैसे कारण हो सकते हैं।गर्दन दर्द के पीछे हो सकती हैं ये गंभीर बीमारियांसाल 2023 में मेडिकल जर्नल Neurologic Clinics में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी, सर्वाइकल मायलोपैथी, इंफेक्शन, ट्यूमर और अन्य गंभीर बीमारियों में भी गर्दन में दर्द होता है। जानें अन्य कारण--इंफेक्शन, इंफ्लेमेटरी डिजीज, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का संकेत-अगर गर्दन के दर्द के साथ बुखार।-बिना किसी वजह के वजन कम होना।-लगातार सिरदर्द।-निगलने में परेशानी।-ब्लैडर या बॉवेल कंट्रोल में बदलाव।ये लक्षण नजर आने पर डॉक्टर से संपर्क जरूर करना चाहिए क्योंकि इसके पीछे इंफेक्शन, इंफ्लेमेटरी डिजीज, न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हो सकती हैं। दुर्घटना या गिरने के बाद रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर या गंभीर चोट लगने से भी ये लक्षण नजर आ सकते हैं।स्पाइनल इंफेक्शनअगर बुखार और लगातार दर्द हो, तो इसका कारण स्पाइनल इंफेक्शन हो सकता है। इसका इलाज एंटीबायोटिक या एंटीफंगल दवाओं के साथ किया जाता है।स्पाइनल ट्यूमर या कैंसरस्पाइनल ट्यूमर होने पर कमर या गर्दन में दर्द, रात में दर्द बढ़ना, हाथ-पैर में कमजोरी या सुन्नपन महसूस हो सकता है। दुर्लभ मामलों में कैंसर हो सकता है। इसमें सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी की मदद ली जाती है।मेनिन्जाइटिसमेनिन्जाइटिस दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड को ढकने वाली झिल्लियों (मेनिंजीज) में होने वाली सूजन। इसमें गर्दन में अकड़न, उल्टी, तेज बुखार जैसे लक्षण नजर आते हैं। कारण के मुताबिक, एंटीबायोटिक, एंटीवायरल या एंटीफंगल दवाओं की मदद ली जाती है।गर्दन के दर्द से बचने के लिए ये सावधानियां बरतें-गर्दन को ज्यादा देर तक नीचे न झुकाएं।-लंबे समय तक ड्राइविंग न करें।-स्ट्रेस और वजन घटाने की कोशिश करें।-बैठते समय रीढ़ और गर्दन को सीधा रखें।-काम के दौरान स्क्रीन को आंखों के लेवल पर रखें।-बहुत ऊंचा सा सख्त तकिया लगाने से बचें।-रोजाना एक्सरसाइज करें ताकि गर्दन की मांसपेशियां मजबूत रहें।-भारी सामान को उठाते समय दोनों कंधों पर बराबर वजन रखें।-गर्दन को एक ही दिशा में मोड़कर न रखें।-पर्याप्त नींद लें ताकि गर्दन की मांसपेशियों को रिकवरी मिले।-किन लोगों के लिए गर्दन का दर्द खतरनाक हो सकता है?जो लोग लंबे समय से स्टेरॉइड का इस्तेमाल कर रहे हों।जिन लोगों को ऑस्टियोपोरोसिस हो।जिन्हें पहले कैंसर हो चुका हो।स्पाइनल सर्जरी कब की जाती है?American Association of Neurological Surgeons के मुताबिक, जब गर्दन के दर्द के लिए सामान्य इलाज से आराम नहीं मिलता, तो सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। सर्जरी तभी की जाती है जब दर्द के कारण मरीज के काम करने की क्षमता कम हो रही हो। अन्य कारण भी होते हैं जैसे--मरीज के हाथों या पैरों में सुन्नपन या कमजोरी तेजी से बढ़ रही हो।-लगातार दर्द की वजह से मरीज की काम करने की क्षमता कम हो रही हो।-मरीज को संतुलन बनाने में मुश्किल हो।-मरीज को चलने-फिरने में मुश्किल हो रही हो।साल 2023 में मेडिकल जर्नल Clinical Rehabilitation में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, अगर चलने में परेशानी या स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव के संकेत हों, तो भी सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। स्टडी में यह भी बताया गया है कि गर्दन दर्द में फिजियोथेरेपी, एक्सरसाइज और मांसपेशियों को मजबूत करने वाली तकनीकें लंबे समय में काम आ सकती हैं।-डॉक्टर से संपर्क कब करें?अगर गिरने या चोट लगने के बाद आपको बहुत ज्यादा या बढ़ता हुआ दर्द महसूस हो, या आपके हाथों या पैरों में सुन्नपन, कमजोरी या झुनझुनी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से मदद लें। समय पर इलाज करके गर्दन के दर्द को दूर किया जा सकता है।निष्कर्ष:इंफेक्शन, इंफ्लेमेटरी डिजीज, न्यूरोलॉजिकल समस्याएं, स्पाइनल इंफेक्शन, स्पाइनल ट्यूमर या कैंसर, मेनिन्जाइटिस गर्दन दर्द के कुछ गंभीर कारण हैं। सामान्य मामलों में मांसपेशियों में खिंचाव, गलत तकिए पर सोना या गलत ढंग से तकिया लगाना, सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस जैसे कारण भी हो सकते हैं। दर्द अधिक हो और समय के साथ बढ़ता जाए, तो डॉक्टर से संपर्क करें। मरीज के हाथों या पैरों में सुन्नपन या कमजोरी तेजी से बढ़ रही हो या लगातार दर्द की वजह से मरीज की काम करने की क्षमता कम हो रही हो, तो इन केस में स्पाइनल सर्जरी की जाती है।
- आजकल हार्ट अटैक के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। हार्ट अटैक किसी को भी आ सकता है, लेकिन कुछ लोगों में हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा हो सकता है। सीने में तेज दर्द, सीने में दबाव महसूस होना, गर्दन या जबड़े में दर्द होना, ज्यादा पसीना आना आदि हार्ट अटैक के आम लक्षण हो सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति में हार्ट अटैक के संकेत अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ साल पहले हार्ट अटैक ज्यादा बढ़ती उम्र के लोगों या बुजुर्गों में ही देखने को मिलता है। लेकिन, पिछले कुछ सालों से हार्ट अटैक के मामले युवाओं में भी सामने आ रहे हैं। लेकिन, कुछ लोगों में हार्ट अटैक का जोखिम ज्यादा हो सकता है।1. हाई बीपी के रोगियों मेंCenters for Disease Control and Prevention के अनुसार, हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों में हार्ट अटैक का खतरा काफी ज्यादा रहता है। हाई बीपी को हृदय रोग का एक प्रमुख कारण माना जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें धमनियों और रक्त वाहिकाओं में बहने वाले रक्त का दबाव सामान्य से अधिक हो जाता है। अगर हाई बीपी को नियंत्रित न किया जाए, तो इससे हृदय को नुकसान पहुंचने लगता है और गंभीर स्थिति में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, शुरुआत में इसके लक्षण महसूस नहीं होते हैं, इसलिए इसे साइलेंट किलर कहा जाता है। अगर आपका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ रहता है, तो बैलेंस और पौष्टिक आहार लेना बहुत जरूरी है। नमक का सेवन कम करें और धूम्रपान-शराब से पूरी तरह परहेज करें।2. हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल वाले लोगों मेंबैड कोलेस्ट्रॉल का बढ़ा हुआ स्तर भी दिल की सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। आपको बता दें कि कोलेस्ट्रॉल एक मोम जैसा पदार्थ है, जो हमारे लिवर द्वारा बनाया जाता है। हालांकि, कुछ खाद्य पदार्थों में भी कोलेस्ट्रॉल पाया जाता है। आमतौर पर लिवर शरीर की जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल बनाता है, लेकिन जब भोजन के जरिए जरूरत से ज्यादा कोलेस्ट्रॉल लिया जाता है तो इससे स्तर बढ़ सकता है। जब शरीर में जरूरत से ज्यादा कोलेस्ट्रॉल जमा होता है, तो धमनियों की दीवारों पर प्लाक बना सकता है। इससे धमनियां संकरी और सख्त होने लगती हैं। इस स्थिति में हार्ट अटैक, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।3. डायबिटीज रोगियों मेंडायबिटीज रोगियों में हार्ट अटैक का खतरा काफी ज्यादा रहता है। दरअसल, जब शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता या इंसुलिन का सही से उपयोग नहीं कर पाता है, तो ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। जब लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा हुआ रहता है, तो हृदय स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है। डायबिटीज की वजह से हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रण में रखना बहुत जरूरी है।4. मोटापे से परेशान लोगों मेंमोटापा या ज्यादा वजन भी हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ाता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाता है। मोटापा कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। मोटापे की वजह से बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ सकता है और गुड कोलेस्ट्रॉल कम हो सकता है। अगर मोटापे को लंबे समय तक कम न किया जाए, तो इससे हृदय रोग, डायबिटीज और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए वजन को नियंत्रण में रखना बहुत जरूरी है।5. अस्वस्थ खान-पान और खराब जीवनशैलीजो लोग सैचुरेटेड फैट, ट्रांस फैट और कोलेस्ट्रॉल वाले फूड्स का सेवन ज्यादा करते हैं, उनमें हृदय रोगों का खतरा ज्यादा रहता है। वहीं, ज्यादा नमक खाने से भी हाई बीपी और हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा हो सकता है। वहीं, अगर आप शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं तो भी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। दरअसल, अस्वस्थ खान-पान और खराब जीवनशैली की वजह से हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर, हाई शुगर जैसी समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक भी आ सकता है।
- मानसून के मौसम में कई लोगों को सर्दी-झुकाम होने की परेशानी होने लगती है। यह मौसम जितना सुहावना होता है, उतना ही यह हेल्थ के लिए भी चुनौतीपूर्ण भी होता है। इस दौरान हवा में नमी बढ़ जाती है, जिससे बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं। यही वजह है कि सर्दी-जुकाम, गले में खराश, खांसी और वायरल इंफेक्शन के मामले बढ़ जाते हैं। ऐसे में प्राकृतिक घरेलू उपायों का महत्व और भी बढ़ जाता है, जिनमें अदरक और तुलसी की चाय सबसे प्रभावी मानी जाती है।अदरक और तुलसी की चाय कैसे है असरदार?यह एक आयुर्वेदिक ड्रिंक है, जो फ्रेश अदरक और तुलसी की पत्तियों को पानी या चाय में उबालकर बनाया जाता है। इसे सदियों से इम्यूनिटी बढ़ाने और मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।अदरक के क्या फायदे हैं?NIH की रिपोर्ट के मुताबिक, अदरक में प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। यह शरीर में गर्माहट बनाए रखने में मदद करता है और गले की सूजन, खांसी तथा जुकाम में राहत देता है। अदरक पाचन तंत्र को भी मजबूत करता है और मतली या अपच जैसी समस्याओं को कम करता है।तुलसी के क्या हैं फायदे?NCBI की रिपोर्ट में पाया गया है कि तुलसी को आयुर्वेद में काफी महत्वपूर्ण औषधि मानी जाती है। इसमें एंटी-वायरल, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को मजबूत करती है और श्वसन तंत्र को साफ रखने में मदद करती है। तुलसी का नियमित सेवन मौसमी संक्रमण से बचाव में काफी उपयोगी माना जाता है।मानसून में कैसे फायदेमंद है तुलसी और अदरक चाय?मानसून में वातावरण में नमी बढ़ने के कारण वायरस और बैक्टीरिया तेजी से फैलते हैं। ऐसे में अदरक और तुलसी की चाय शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को मजबूत करती है। यह गले को आराम देती है, बंद नाक खोलती है और शरीर में ऊर्जा बनाए रखती है।कैसे बनाएं अदरक और तुलसी की चाय?मानसून में तुलसी और अदरक की चाय काफी फायदेमंद होती है। इसे आप काफी आसान तरीके से बना सकते हैं, जैसे-आवश्यक सामाग्रीपानी - 1 कपतुलसी - 4–5 पत्तियांअदरक - 1 छोटा टुकड़ा कद्दूकस किया हुआविधिसबसे पहले एक पैन लें, इसमें पानी, तुलसी की पत्तियां और अदरक को कद्दूकस डालकर अच्छी तरह से उबाल लें। इसके बाद स्वाद के लिए हल्का शहद या नींबू मिला सकते हैं। इसे दिन में 1 से 2 बार पिएं। मुख्य रूप से सुबह या शाम के समय पीना फायदेमंद हो सकता है।ध्यान रखें कि अदरक और तुलकी की चाय सेहत के लिए सुरक्षित है, लेकिन काफी ज्यादा मात्रा में सेवन से बचना चाहिए। लो ब्लड प्रेशर या किसी गंभीर बीमारी के मरीज डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसका नियमित उपयोग करें।
- जब हम बहुत देर चलकर आते हैं उस दिन पैरों में सूजन दिखती है जो अगले दिन तक उतर जाती है। ट्रैवल के दौरान भी ज्यादा देर बैठना पड़ता है या काम के दौरान ज्यादा देर बैठने से भी पैरों में सूजन हो जाती है, जो एक या दो दिन में ठीक हो जाती है, लेकिन जब सूजन कम न हो और समय के साथ बढ़ने लगे, तो यह चिंता की बात हो सकती है। जब हार्ट ठीक से काम नहीं करता है, तो ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है, इससे ब्लड नसों में जमा होने लगता है जिसके कारण टिशूज में फ्लूइड भर जाता है। जानें हार्ट की किन कंडीशन में पैरों में सूजन दिख सकती है?पैरों में सूजन के पीछे कई कारण हो सकते हैं जिनमें से एक हार्ट डिजीज भी है। हालांकि, पैर में सूजन होना हार्ट डिजीज का लक्षण नहीं है। हालांकि, जब हार्ट कमजोर होता है और ब्लड को ठीक से पंप नहीं कर पाता है तब हार्ट फेलियर की कंडीशन देखने को मिलती है जिसके कारण पैर, टखनों या पंजों में फ्लूइड भर जाता है और इसे ही लेग एडिमा या सूजन कहा जाता है। सूजन के अलावा सांस लेने में तकलीफ, वेट गेन या जल्दी थक जाने जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं। ऐसा नहीं है कि केवल हार्ट डिजीज के कारण ही पैरों में सूजन होती है। इसके पीछे अन्य कारण हो सकते हैं जैसे ब्लड क्लॉट, लिवर डिजीज, ज्यादा समय तक खड़ा रहने की आदत वगैरह। British Heart Foundation के मुताबिक, अगर पैर या टखनों में सूजन बनी रहे या अचानक से तेज हो जाए, तो यह हार्ट फेलियर का संकेत हो सकता है।कैसे पता करें सूजन की वजह हार्ट डिजीज है या नहीं?पैरों में सूजन का कारण हार्ट डिजीज है या नहीं, इसका कारण पता लगाने के लिए डॉक्टर ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, इकोकार्डियोग्राम, ब्लड टेस्ट, नसों का अल्ट्रासाउंड करा सकते हैं। इन जांच की मदद से यह पता चलता है कि पैरों में सूजन का कारण हार्ट डिजीज है या नहीं। साल 2016 में Circulation: Heart Failure में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, 4196 प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिन्हें पहले से कोई हार्ट डिजीज नहीं था। स्टडी के मुताबिक, पैरों की लगातार सूजन के साथ अगर सांस फूलना, सांस की परेशानी या थकान जैसे लक्षण नजर आएं, तो हार्ट हेल्थ की जांच होनी चाहिए।पैर में सूजन कब चिंता की बात है?-हल्की सूजन सामान्य बात है, लेकिन अगर सूजन लंबे समय तक बनी रहे, तो यह चिंता की बात है।-अगर दर्द अचानक शुरू हो जाए।-केवल एक पैर में सूजन हो रही हो।-पैर में गर्माहट या रेडनेस महसूस हो।-सांस लेने में तकलीफ या सीने में दर्द हो।-पैरों की सूजन के साथ वजन तेजी से बढ़ना या शरीर में पानी जमा होने के अन्य संकेत दिखाई दें।-त्वचा में बदलाव, जैसे रंग बदलना, घाव होना या नसों का ज्यादा उभरना दिखाई दे।-किडनी, लिवर, हार्ट या नसों से जुड़ी पहले से कोई बीमारी हो और पैरों में नई सूजन शुरू हो जाए।डॉक्टर से सलाह कब लें?-क्रॉनिक सूजन होने पर या सूजन के बढ़ने पर डॉक्टर से संपर्क करें।-सीने में दर्द या हार्ट डिजीज के लक्षण नजर आने पर लापरवाही न करें।-सांस लेने में तकलीफ होने पर या अनियमित हार्टबीट होने पर डॉक्टर से संपर्क करें।किसी भी असामान्य लक्षण नजर आने पर डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है क्योंकि फ्लूइड अगर फेफड़ों में भर जाए, तो उसे पल्मोनरी एडिमा कहा जाता है। यह जानलेवा हो सकता है इसलिए डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।निष्कर्ष:पैरों में सूजन हार्ट डिजीज का लक्षण नहीं है, लेकिन हार्ट फेलियर की कंडीशन में पैरों में सूजन हो सकती है। ब्लड टेस्ट, ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, इकोकार्डियोग्राम जैसी जांच की मदद से यह पता लगाया जाता है कि पैरों में सूजन के पीछे हार्ट डिजीज है या नहीं। अगर सीने में दर्द हो, सांस की तकलीफ हो, सूजन लगातार बढ़ रही हो, ताे डॉक्टर से संपर्क करना न भूलें।
- जामुन एक मौसमी फल है, जिसे लंबे समय से स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। कई लोग मानते हैं कि डायबिटीज को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है, लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? आइए इस बारे में जानें इसके फायदे, नुकसान और सावधानियों के बारे में।डायबिटीज में जामुन खाना फायदेमंद है?आयुर्वेद के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों के लिए जामुन का सेवन करने फायदेमंद होता है। इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होता है, साथ ही, इनमें अच्छी मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम, विटामिन ए और विटामिन सी जैसे बहुत से पोषक तत्व होते हैं और एंटीऑक्सीडेंट्स के गुण होते हैं, जिससे इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करने में मदद मिलती है। ध्यान रहे, ब्लड शुगर में जामुन का सेवन करना फायदेमंद हो सकता है, लेकिन यह इसका इलाज नहीं है। सिर्फ जामुन खाने से ब्लड शुगर को मैनेज नहीं किया जा सकता है। इसके लिए हेल्दी लाइफस्टाइल को फॉलो करना और बैलेंस डाइट लेना भी जरूरी है। जामुन में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, साथ ही, कई पोषक तत्व होते हैं। इसका सेवन करने से स्वास्थ्य को कई लाभ मिलती है।साल 2022 में molecules में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, जामुन के छिलके, गुदे और बीज में अच्छी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, पॉलीफेनोल्स, विटामिन्स और मिनरल्स जैसे कई जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इनको खाने से मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियां और टाइप-2 डायबिटीज जैसी गंभीर समस्याओं (मेटाबॉलिक सिंड्रोम) से लड़ने में मदद करता है।ब्लड शुगर को कंट्रोल करेजामुन में अच्छी मात्रा में फाइबर और लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है। इसका सेवन करने से पाचन की स्पीड स्लो हो जाती है, जिससे ब्लड में ग्लूकोज धीरे-धीरे पहुंचता है। इससे ब्लड शुगर के स्तर को अचानक से बढ़ने से रोकने में मदद मिलती है।इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करेंजामुन में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जिससे इसका सेवन करने से इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करने और इंसुलिन के कार्यों को बेहतर तरीके से करने में मदद मिलती है।पाचन में सुधार करेजामुन में अच्छी मात्रा में फाइबर होता है। इसका सेवन करने से पेट को लंबे समय तक भरा रखने, पाचन में सुधार करने और मेटाबॉलिज्म में सुधार करने में मदद मिलती है, जिससे क्रेविंग्स को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है।बार-बार पेशाब आने की समस्या से दे राहतडायबिटीज की समस्या में ज्यादातर लोग बार-बार पेशाब आने की समस्या से परेशान रहते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से इस समस्या से राहत देने और नींद की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिलती है।वजन को कंट्रोल करेजामुन में अच्छी मात्रा में फाइबर और लो कैलोरीज होती है। इसका सेवन करने से वजन को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। वजन को कम करने से ब्लड शुगर को मैनेज करने में भी मदद मिलती है।डायबिटीज में जामुन खाने के नुकसान?जामुन का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है और इसका खाना सेफ माना जाता है, लेकिन सीमित मात्रा में। इसके अलावा, कुछ स्वास्थ्य स्थितियों को खाने से बचना चाहिए। इसके अलावा, इनका ज्यादा सेवन करने के कारण भी स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है।लो ब्लड शुगरकई लोगों को लो ब्लड शुगर की समस्या होती है। ऐसे में इन लोगों को जामुन का सेवन करने से बचना चाहिए। इसका अधिक सेवन करने से ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा कम हो सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए परेशानी का कारण हो सकता है।पाचन से जुड़ी समस्याएंजामुन का जरूरत से ज्यादा सेवन करने से पेट से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसका ज्यादा सेवन करने से व्यक्ति को कब्ज, गैस, ब्लोटिंग और पेट में दर्द होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।एलर्जी होनेकुछ लोगों को जामुन से एलर्जी की समस्या हो सकती है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को इससे एलर्जी होती है, तो इसका सेवन करने से बचें।डायबिटीज में जामुन खाते समय किन बातों का ध्यान रखें?डायबिटीज में जामुन का सेवन सीमित मात्रा में ही करें, ताजा जामुन खाएं, ज्यादा नमक और मसाला लगाकर खाने से बचें, ब्लड शुगर की दवाइयों का सेवन करने के दौरान इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।सावधानियांध्यान रहे, जामुन से किसी भी तरह की एलर्जी, लो ब्लड शुगर या परेशानी होने पर इसका सेवन करने से बचें। इसके अलावा, दवाइयों का सेवन करने या मेडिकल कंडीशन की स्थिति में इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें, साथ ही, ब्रेस्टफीडिंग या प्रेग्नेंट महिलाओं को इसका सेवन करने से डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।निष्कर्षडायबिटीज में जामुन का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। इसका सेवन करने से ब्लड शुगर को कंट्रोल करने, बार-बार यूरिन आने, इंसुलिन सेंसिटिव में सुधार करने, पाचन में सुधार करने, बार-बार पेशाब करने और वजन को कंट्रोल करने में मदद मिलती है, लेकिन ध्यान रहे, लो ब्लड शुगर, इससे एलर्जी होने या पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में इसका सेवन सीमित मात्रा में करें और डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
- एक कहावत है कि जब किसी भी चीज की अधिकता हो जाए, तो वह फायदे की जगह नुकसान पहुंचाने लगती है। कैल्शियम के साथ भी कुछ ऐसा ही है। हम बचपन से दादी-नानी से सुनते आए हैं कि दूध पिओ, पनीर खाओ। इससे शरीर को कैल्शियम मिलेगा और हड्डियां मजबूत होंगी। एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। खासकर बच्चों के शरीर के लिए। सही समय पर इसकी पहचान न हो, तो यह गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। ब्लड में कैल्शियम की अधिकता को मेडिकल भाषा में हाइपरकैल्सीमिया (Hypercalcemia) कहा जाता है।कैल्शियम लेवल को कंट्रोल करते हैं ये दो हार्मोनहमारा शरीर कई चीजों को कंट्रोल करता है जिसमें से एक है ब्लड में कैल्शियम लेवल को बनाए रखना। दो ऐसे हार्मोन हैं जो ब्लड और हड्डियों में कैल्शियम लेवल को कंट्रोल करने का काम करते हैं। पहला है पैराथायराइड हार्मोन (Parathyroid Hormone) और दूसरा है कैल्सीटोनिन (Calcitonin Hormone)। हालांकि, हाइपरकैल्सीमिया जैसी मेडिकल कंडीशन की वजह से ब्लड में कैल्शियम का लेवल ज्यादा हो जाता है। सामान्य व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लेवल को एब्जॉर्ब कराने में विटामिन डी भी अहम भूमिका निभाता है।बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने के क्या कारण हो सकते हैं?-गंभीर डिहाइड्रेशन।-विटामिन डी की अधिक मात्रा। ऐसा बच्चों में विटामिन डी सप्लीमेंट का अधिक सेवन करने की वजह से भी होता है।-पैराथायराइड हार्मोन का ज्यादा बनना।-दुर्लभ जेनेटिक रोग।-लंबे समय तक खाई जाने वाली कुछ दवाएं।-किडनी डिजीज या अन्य गंभीर बीमारी।-साल 2025 में Endokrynologia Polska (Polish Journal Of Endocrinology) में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने के पीछे कई फैक्टर्स हो सकते हैं जैसे उम्र, पैराथायराइड हार्मोन, विटामिन डी का लेवल, आनुवंशिक कारक वगैरह।किन बच्चों को हाइपरकैल्सीमिया का खतरा ज्यादा होता है?-पैराथायराइड ग्रंथि की बीमारी वाले बच्चे-किडनी की समस्या से जूझ रहे बच्चे-लंबे समय तक दवाएं लेने वाले बच्चे-जरूरत से ज्यादा विटामिन डी या कैल्शियम सप्लीमेंट लेने वाले बच्चे-जेनेटिक कंडीशन से पीड़ित बच्चेबच्चों में हाइपरकैल्सीमिया होने पर कौन से लक्षण नजर आते हैं?हाइपरकैल्सीमिया के लक्षण, बच्चों की उम्र और कैल्शियम की मात्रा पर निर्भर करते हैं। जरूरी नहीं है कि शुरू में कोई लक्षण नजर आए, लेकिन जैसे-जैसे कैल्शियम का लेवल ज्यादा होगा ये लक्षण नजर आ सकते हैं--थकान और कमजोरी होना।-बच्चे का सुस्त हो जाना।-भूख न लगना।-कब्ज की शिकायत होना।-उल्टी होना या जी मिचलाना।-हड्डियों में दर्द और मांसपेशियों में कमजोरी होना।-पेट दर्द होना।-ज्यादा सोना।साल 2010 में Current Opinion In Pediatrics में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, गंभीर हाइपरकैल्सीमिया होने पर बच्चे की किडनी को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, कब्ज, उल्टी, दस्त जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।बच्चों के शरीर में कैल्शियम का नॉर्मल लेवल क्या है?बच्चों और शिशुओं के शरीर में कैल्शियम का नॉर्मल लेवल 8.5 से 10.5 mg/dL के बीच हो सकता है।अगर शरीर में कैल्शियम का लेवल 10.5 mg/dL से ज्यादा है, तो यह हाइपरकैल्सीमिया का संकेत हो सकता है।बच्चों में हाइपरकैल्सीमिया किस उम्र में होता है?किसी भी उम्र के बच्चे को हाइपरकैल्सीमिया हो सकता है। नवजात शिशुओं, 1 साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों और किशोरों में भी यह कंडीशन दिख सकती है।
- अधिकांश लोग तब तक आंखों के डॉक्टर के पास नहीं जाते, जब तक उन्हें धुंधला दिखाई देना या कोई बड़ी परेशानी महसूस न हो। लेकिन नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि यह सोच खतरनाक साबित हो सकती है। आंखों की कई गंभीर बीमारियां शुरुआती दौर में बिना दर्द और बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होती रहती हैं। ऐसे में नियमित नेत्र जांच आंखों की रोशनी बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर लोग पूछते हैं, “मुझे तो सब ठीक दिखाई देता है, फिर आंखों की जांच कराने की क्या जरूरत है?” जबकि हकीकत यह है कि जब तक नजर कमजोर होने का एहसास होता है, तब तक कई बार बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।नेत्र विशेषज्ञों के मुताबिक, आंखों की नियमित जांच सिर्फ चश्मे का नंबर बदलने के लिए नहीं होती। इसके जरिए ग्लूकोमा (काला मोतियाबिंद), मोतियाबिंद, डायबिटिक रेटिनोपैथी, रेटिना की बीमारियों और मधुमेह व उच्च रक्तचाप का आंखों पर पड़ने वाला असर भी शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है। समय रहते बीमारी का पता चलने पर इलाज आसान हो जाता है और आंखों की रोशनी लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है। आज के डिजिटल दौर में ड्राई आई (Dry Eye) की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर स्क्रीन का इस्तेमाल, एयर कंडीशनर वाले माहौल में लगातार काम करना और कम पलकें झपकाना इसके प्रमुख कारण हैं।ड्राई आई के शुरुआती लक्षणों में आंखों में जलन, चुभन, सूखापन, लालपन, बार-बार पानी आना और कभी-कभी धुंधला दिखाई देना शामिल हैं। कई लोग इन्हें सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, यदि समय पर इलाज न कराया जाए, तो गंभीर मामलों में यह कॉर्निया को नुकसान पहुंचा सकती है, संक्रमण का खतरा बढ़ा सकती है और देखने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्क्रीन का उपयोग करते समय 20-20-20 नियम अपनाएं। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें। इसके अलावा पर्याप्त पानी पिएं, नियमित रूप से पलकें झपकाएं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें। यदि आपकी उम्र 40 वर्ष से अधिक है, या आपको मधुमेह, उच्च रक्तचाप है अथवा परिवार में आंखों की बीमारी का इतिहास रहा है, तो नियमित नेत्र जांच को अपनी स्वास्थ्य दिनचर्या का हिस्सा जरूर बनाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार आंखें पूरी तरह सामान्य लगती हैं, लेकिन एक साधारण जांच भविष्य में होने वाली गंभीर समस्याओं को समय रहते पकड़ सकती है। इसलिए हर व्यक्ति को हर 6 से 12 महीने में एक बार आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए।
- विटामिन डी के लिए धूप में बैठना जरूरी माना जाता है। इसलिए कई हेल्थ एक्सपर्ट आपको धूप में बैठने की सलाह लेते हैं। ऐसे में की लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर कितनी देर धूर में बैठना शरीर के लिए पर्याप्त होता है? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है, खासकर उन लोगों के लिए जो दिनभर घर या ऑफिस के अंदर रहते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सिर्फ 10 मिनट धूप में बैठने से शरीर को पर्याप्त रूप से विटामिन डी मिल जाता है। लेकिन क्या सच में सिर्फ 10 मिनट धूप में रहने से आपको पर्याप्त विटामिन डी मिल जाता है। हम सभी जानते हैं कि धूप शरीर में विटामिन D बनाने का सबसे प्राकृतिक स्रोत है। विटामिन D हड्डियों को मजबूत रखने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और मांसपेशियों के बेहतर कामकाज के लिए जरूरी होता है। लेकिन क्या हर व्यक्ति के लिए 10 मिनट की धूप पर्याप्त है? इसका जवाब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है।डॉक्टर का कहना है कि रोजाना 10 मिनट धूप लेना कई लोगों के लिए पर्याप्त हो सकता है, लेकिन यह व्यक्ति की स्किन का रंग, दिन का समय, मौसम, भौगोलिक स्थान और शरीर का कितना हिस्सा धूप के संपर्क में आ रहा है, इन सभी बातों पर निर्भर करता है।किन लोगों के लिए 10 मिनट धूप काफी हो सकती है?अगर आपकी स्किन हल्के रंग की है, आप ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां धूप अच्छी आती है और सुबह या देर सुबह के समय हाथ, चेहरा या बाजुओं पर सीधी धूप पड़ती है, तो लगभग 10 मिनट का नियमित सन एक्सपोजर विटामिन D बनने में मदद कर सकता है। हालांकि, यह कोई तय नियम नहीं है।किन लोगों को अधिक समय तक धूप की जरूरत पड़ सकती है?गहरे रंग की स्किन वाले लोगों में मेलेनिन अधिक होता है, जिससे शरीर में विटामिन D बनने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। ऐसे लोगों को हल्की स्किन वालों की तुलना में अधिक समय तक धूप में रहने की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, सर्दियों के मौसम, प्रदूषण, लंबे समय तक घर के अंदर रहने या पूरे शरीर को कपड़ों से ढककर रखने की स्थिति में भी सिर्फ 10 मिनट धूप पर्याप्त नहीं हो सकती।धूप लेने का सही तरीका क्या है?डॉक्टर का कहना है कि कम समय के लिए नियमित रूप से धूप लेना, कभी-कभार लंबे समय तक धूप में रहने से बेहतर माना जाता है। दोपहर के समय पराबैंगनी किरणें काफी तेज होती हैं, इसलिए बहुत देर तक बिना सुरक्षा के धूप में रहने से त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए संतुलित और सीमित समय तक धूप लेना बेहतर है।क्या सिर्फ धूप ही काफी है?अगर किसी व्यक्ति में पहले से विटामिन D की कमी है, वह बहुत कम बाहर निकलता है या उसे कोई ऐसी बीमारी है जो विटामिन D के स्तर को प्रभावित करती है, तो सिर्फ धूप पर्याप्त नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह पर विटामिन D युक्त आहार या सप्लीमेंट की जरूरत पड़ सकती है। दूध, अंडे की जर्दी, फैटी फिश और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ भी विटामिन D के अच्छे स्रोत हैं।
- बच्चों में कान में इंफेक्शन होने की समस्या बहुत आम है और कई बार पेरेंट्स एंटीबायोटिक दवाएं देकर इसे ठीक करने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि कान में इंफेक्शन के कारण बच्चों को बुखार तक भी हो जाता है। अगर किसी बच्चे को बार-बार कान में इंफेक्शन हो रहा है, तो इसकी पहचान करके डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।Cureus में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बार-बार इंफेक्शन 6 से दो साल के बच्चों में ज्यादा होता है, क्योंकि उनमें इम्यूनिटी कमजोर होती है और साथ ही कान की यूस्टेशियन ट्यूब की बनावट वयस्कों की तुलना में ज्यादा सीधी होती है और इस वजह से गले का इंफेक्शन आसानी से कान में पहुंच जाता है। अगर कान का इंफेक्शन ज्यादा समय के लिए रह जाए, तो बच्चा ठीक से सुन नहीं पाता, तो इससे उसके बोलने और भाषा सीखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। “बच्चों में बार यूस्टेशियन ट्यूब कान को नाक और गले से जोड़ती है। छोटे बच्चों में यह ट्यूब छोटी, संकरी और सीधी होती है। इस वजह से तरल पदार्थ मिडिल ईयर में फंस जाता है। जब तरल बाहर नहीं निकल पाता, तो इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।”ज्यादातर मामलों में मिडिल ईयर इंफेक्शन की शुरुआत सर्दी-जुकाम से होती है और फिर धीरे-धीरे नाक बंद होना और गले में इंफेक्शन से यूस्टेशियन ट्यूब बंद हो सकती है। इससे कान के अंदर हवा का दबाव बदल जाता है और पर्दे के पीछे तरल जमा होने लगता है। अगर यही कंडीशन लगातार बनी रही है, तो बैक्टीरिया पैदा हो सकते हैं।” कुछ बच्चों में कान में इंफेक्शन होने का खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि उनकी न सिर्फ इम्यूनिटी कमजोर होती है, बल्कि इसके कई फैक्टर्स होते हैं। जो बच्चे डे-केयर या स्कूल जाते हैं, उन्हें वायरल इंफेक्शन होने की संभावना ज्यादा होती है। इसके अलावा, अगर घर में कोई स्मोक करता है, धूल, एलर्जी या बार-बार सर्दी-जुकाम होता है, तो उन्हें कान में इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ सकता है। अगर मां शिशु को लिटाकर दूध पिलाती है, तो यह आदत भी कान में इंफेक्शन का कारण हो सकती है।पेरेंट्स को किन लक्षणों को इग्नोर नहीं करना चाहिए?-छोटे बच्चे अपनी समस्या नहीं बता पाते, इसलिए पेरेंट्स को उनका बिहेवियर देखना चाहिए।-अगर बच्चा बार-बार कान पकड़कर खींच रहा हो, तो यह कान में इंफेक्शन होने का कारण हो सकता है।-बच्चे का ठीक से न सो पाना, दूध या खाना कम लेना भी कान में इंफेक्शन की वजह हो सकता है।-अगर बच्चे को बार-बार बुखार हो रहा हो, तो इसका कारण कान में इंफेक्शन हो सकता है।-अगर बच्चा एक बार में समझ न पाए, तो सुनने की क्षमता भी कम हो सकती है।-कान से मवाद या पानी निकलने पर बच्चे को तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।-कान के इंफेक्शन को डायग्नोज करने के लिए क्या चेकअप होते है?बच्चे के कान के पर्दे की जांच के लिए ओटोस्कोप या माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया जाता है। अगर डॉक्टर को लगता है कि बच्चे को कम सुनाई दे रहा है, तो उसका टाइम्पेनोमेट्री या हियरिंग टेस्ट भी कराया जा सकता है। कई बार यह भी चेक किया जाता है कि बच्चे को एडेनॉइड, एलर्जी या यूस्टेशियन ट्यूब से जुड़ी समस्या तो नहीं है। पेरेंट्स को अपने बच्चों को बार-बार एंटीबायोटिक नहीं देना चाहिए। सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही दवा दें। इसके अलावा, कुछ लोग कान की समस्या को मौसमी वायरल या इंफेक्शन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन पेरेंट्स को ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर बच्चे को कान में दर्द है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं, क्योंकि देरी करने से बच्चे के सुनने की क्षमता भी कम हो सकती है, जो उसके सीखने और समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
- बारिश के मौसम में अक्सर लोगों की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है। वहीं, इस मौसम में इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ जाता है, जिसके कारण लोग जल्दी बीमारी पड़ते हैं। ऐसे में अक्सर लोगों को इम्यूनिटी बूस्ट करने वाले और पोषक तत्वों से युक्त फूड्स को डाइट में शामिल करने की सलाह दी जाती है। अक्सर लोग शरीर के अच्छे स्वास्थ्य के लिए दालों और सब्जियों से बने सूप का सेवन करने की सलाह देते हैं। इनका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है।मॉनसून में कौन से सूप का सेवन करें?1. मूंग दाल का सूप पिएंमूंग दाल का सूप हल्का, आसानी से पचने वाला और टेस्टी सूप होता है। बारिश के मौसम में अक्सर लोगों की पाचन क्षमता कमजोर हो सकती है। ऐसे में मूंग दाल सूप का सेवन करना एक अच्छा ऑप्शन है। मूंग दाल में भरपूर मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, कई अन्य पोषक तत्व, एंटीऑक्सीडेंट्स और एंटी इंफ्लेमेटरी के गुण पाए जाते हैं, जो शरीर को एनर्जी देने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद करते हैं।कैसे बनाएं मूंग दाल सूप?इसको बनाने के लिए कुकर में अच्छे से धोकर 1 कटोरी मूंग दाल, अदरक का एक छोटा टुकड़, छोटी चम्मच हल्दी, स्वादानुसार, नमक, 2-3 लौंग और पानी को डालकर अच्छे से उबाल लें। अब इसको अच्छे से ब्लैंड कर लें। इसके बाद 1 कढ़ाई में आधा छोटी चम्मच में घी डालकर इसमें चुटकीभर हींग, 2-3 मोरिंगा के पत्ते, 3-4 कप पानी, आधा छोटी चम्मच लहसुन और काली मिर्च के पाउडर डालें और फिर इसमें दाल को मिलाकर अच्छे से उबालें। अब इसमें नींबू का रस मिलाकर इसका सेवन करें।मूंग दाल के सूप के फायदे-पाचन में सुधार करे-प्रोटीन की कमी होती है दूर-पेट को भरा रखने में मिलती है मदद-इम्यूनिटी बूस्ट करे-सर्दी-जुकाम से बचाव करेसाल 2020 में Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, मूंग दाल में अच्छी मात्रा में प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटी माइक्रोबियल और एंटी डायबिटीक जैसे कई पोषक तत्व होते हैं। ऐसे में इसका सेवन करने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करने, पाचन को दुरुस्त करने, वजन कम करने, हार्ट को हेल्दी रखने, इम्यूनिटी को बेहतर करने, पोषक तत्वों की कमी को दूर करने और ब्लड शुगर को मैनेज करने में मदद मिलती है।2. मोरिंगा का सूप पिएंमोरिंगा यानी सहजन के सूप में विटामिन्स और मिनरल्स में भरपूर पोषक तत्व होते हैं। बारिश के मौसम में इसके सूप का सेवन करने से स्वास्थ्य को दुरुस्त करने और इम्यूनिटी को बूस्ट करने में मदद मिलती है।कैसे बनाए मोरिंगा सूप?मोरिंगा सूप बनाने के लिए 3-4 सहजन को टमाटर और नमक के साथ कुकर में 2-3 सीटी देकर उबाल लें। उबलने के बाद पानी को बचाकर रखें और फलियों का सारा पल्प चम्मच से निकाल लें। अब एक पैन में थोड़ा सा मक्खन गरम करके जीरा, बारीक कटा लहसुन, अदरक और प्याज भून लें। अब इसमें मोरिंगा का पल्प, बचाया हुआ पानी, हल्दी, काली मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाकर 5 मिनट तक उबालें। इसके बाद इसका सेवन करें।मोरिंगा सूप के फायदे-पोषक तत्वों की कमी दूर करे-इम्यूनिटी बूस्ट करे-हड्डियों को मजबूती देने-पाचन में सुधार करने-स्किन को हेल्दी रखने में मदद मिलती है।साल 2020 में Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, सहजन (मोरिंगा ओलिफेरा) में बायोफिनोल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें सूजन को कम करने (एंटी-इंफ्लेमेटरी), शरीर की सेल्स को नुकसान से बचाने (एंटीऑक्सीडेंट) और हमारी इम्यूनिटी को मजबूत करने (इम्यूनो-मॉड्यूलेटरी) के बेहतरीन गुण होते हैं।3. टमाटर का सूप पिएंटमाटर का सूप में अच्छी मात्रा में फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, बीटा कैरोटिन और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व होते हैं। बारिश के मौसम में गर्म टमाटर का सूप पीने से फ्रेश महसूस करने, इम्यूनिटी को मजबूत करने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद मिलती है।कैसे बनाए टमाटर का सूप?टमाटर का सूप बनाने के लिए कुकर में 4-5 कटे हुए टमाटर, 1 छोटा प्याज, 2-3 लहसुन की कलियां, आधा इंच अदरक और एक छोटा टुकड़ा चुकंदर को आधा कप पानी के साथ 2 सीटी आने तक उबाल लें। ठंडा होने पर इसे मिक्सी में पीसकर छान लें ताकि बीज और छिलके निकल जाएं। अब एक पैन में थोड़ा मक्खन गरम करें, उसमें यह छना हुआ टमाटर का मिश्रण, थोड़ा पानी, स्वादानुसार नमक और काली मिर्च पाउडर डालकर 5 मिनट तक उबालें। इसके बाद इसका सेवन करें।साल 2022 में biology में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, टमाटर से भरपूर डाइट लेने से सेहत को कई तरह के बड़े फायदे मिलते हैं। टमाटर में बहुत से बायोएक्टिव कंपाउड होते हैं। यह कैंसर से बचाने में मदद करता है, साथ ही दिल की बीमारियों, दिमाग से जुड़ी समस्याओं (जैसे भूलने की बीमारी) व आंतों की बीमारियों के खतरे को कम करता है, स्किन हेल्दी रहती है और इम्यून सिस्टम भी मजबूत होती है।टमाटर सूप के फायदे-इम्यूनिटी को बूस्ट करे-शरीर को एनर्जी दे-पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर करे-पाचन में सुधार करे-स्किन को हेल्दी बनाएसाल 2013 में Indian Journal of Clinical Biochemistry में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, विटामिन सी सर्दी-जुकाम से बचाव करने में मदद मिलती है, साथ ही, इससे इम्यूनिटी को बूस्ट करने में मदद मिलती है। विटामिन-सी हमारे इम्यून सिस्टम को जरूरत से ज्यादा एक्टिव होने से भी रोकता है, ताकि शरीर के अंगों या टिश्यूज को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे।4. अदरक, लहसुन और सब्जियों का सूप पिएंअदरक, लहसुन और सब्जियों के सूप में अच्छी मात्रा में फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स, एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी के गुण होते हैं। इसका सेवन करने से शरीर की इम्यूनिटी को बूस्ट करने, इंफेक्शन या बीमारियों से बचाव करने में मदद मिलती है।कैसे बनाएं अदरक, लहसुन और सब्जियों का सूप?अदरक, लहसुन और सब्जियों के सूप को बनाने के लिए एक पैन में 1 चम्मच तेल डालें और फिर इसको गरम करके 1-1 चम्मच बारीक कटा हुआ अदरक और लहसुन डालकर हल्का सा भून लें। अब इसमें अपनी पसंद के अनुसार बारीक कटी सब्जियां (जैसे गाजर, बीन्स, पत्तागोभी और शिमला मिर्च) डालकर 2 मिनट तेज आंच पर पकाएं। इसके बाद 3-4 कप पानी, स्वादानुसार नमक और आधा चम्मच काली मिर्च पाउडर मिलाकर सूप को ढककर 8-10 मिनट तक उबलने दें। अब अगर आप सूप को हल्का गाढ़ा करना चाहते हैं, तो इसमें कॉर्नफ्लोर का घोल (ऑप्शन्ल) मिलाएं और फिर 2 मिनट तक पकाएं। इसके बाद इसका सेवन करें।अदरक, लहसुन और सब्जियों का सूप के फायदे-इम्यूनिटी को बूस्ट करने-सर्दी-खांसी से बचाव करे-पाचन में सुधार करे-वजन कम करे-सूजन कम करेसाल 2024 में BIOINFORMATION में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, अदरक और लहसुन दोनों के अर्क में फिनोलिक नाम के फायदेमंद तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा, इनमें एंटी ऑक्सीडेंट्स होा है। इनका सेवन करने से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने और शरीर की इम्यूनिटी बेहतर करने में मदद मिलती है।बारिश में क्या खाना चाहिए?बारिश में अदरक-तुलसी की चाय पिएं, मूंग दाल की खिचड़ी खाएं, मौसमी फल खाएं और गर्म सूप पिएं। इन फूड्स से शरीर की इम्यूनिटी को बूस्ट करने और स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में मदद मिलती है।सूप पीने के क्या फायदे हैं?
- पेट में कीड़े होना एक आम समस्या मानी जाती है। यह समस्या बच्चों में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन बड़े भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। गंदा खाना, दूषित पानी, साफ-सफाई की कमी और बिना हाथ धोए खाना खाने से पेट में कीड़े पहुंच सकते हैं। ये कीड़े आंतों में जाकर शरीर से पोषण लेने लगते हैं, जिससे कमजोरी और कई दूसरी परेशानियां हो सकती हैं।पेट में कीड़े होने के आम लक्षणपेट दर्द और मरोड़: अगर बार-बार पेट में दर्द या मरोड़ हो रही हो, तो यह पेट में कीड़ों का संकेत हो सकता है। कुछ लोगों को पेट में भारीपन भी महसूस हो सकता है।भूख कम या ज्यादा लगना: पेट में कीड़े होने पर कुछ लोगों की भूख कम हो जाती है, जबकि कुछ लोगों को बार-बार भूख लग सकती है।वजन कम होना: अगर सही खाना खाने के बाद भी वजन घट रहा हो, तो यह भी पेट में कीड़ों की वजह से हो सकता है। क्योंकि कीड़े शरीर का पोषण खुद लेने लगते हैं।कमजोरी और थकान: शरीर में जरूरी पोषण की कमी होने लगती है, जिससे कमजोरी और हर समय थकान महसूस हो सकती है।गुदा के आसपास खुजली: खासतौर पर रात के समय गुदा के आसपास खुजली होना पेट में कीड़ों का एक सामान्य संकेत माना जाता है।पेट फूलना और गैस: कुछ लोगों को गैस, पेट फूलना और अपच जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।बच्चों में दिख सकते हैं ये संकेतचिड़चिड़ापनपढ़ाई में ध्यान कम लगनाबार-बार बीमार पड़नाकमजोरीपेट में कीड़े होने के कारणगंदा या दूषित खाना: साफ-सफाई का ध्यान न रखने से कीड़े शरीर में पहुंच सकते हैं।बिना हाथ धोए खाना खाना: खाना खाने से पहले हाथ साफ न करने पर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।दूषित पानी पीना: गंदा पानी पीने से पेट में कीड़े पहुंच सकते हैं।बाहर का खुला खाना: सड़क किनारे खुले में रखा खाना खाने से भी यह समस्या हो सकती है।बच्चों की सफाई पर खास ध्यान देंबच्चे अक्सर मिट्टी में खेलते हैं और बिना हाथ धोए चीजें खा लेते हैं। इसलिए उनकी सफाई का खास ध्यान रखना जरूरी माना जाता है।क्या घरेलू उपाय मदद कर सकते हैं?कुछ लोग घरेलू उपाय भी अपनाते हैं, लेकिन किसी भी उपाय को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर माना जाता है।इन चीजों से बचेंबाहर का खुला खाना कम खाएंसाफ पानी पिएंशौचालय इस्तेमाल के बाद हाथ धोएंबच्चों को साफ-सफाई की आदत सिखाएंकब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए?पेट में कीड़े होने की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर तेज पेट दर्द हो, उल्टी हो रही हो, मल में कीड़े दिखाई दें या फिर बहुत ज्यादा कमजोरी हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी माना जाता है।
- दालचीनी का इस्तेमाल भारतीय रसोई का एक अहम हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल खाने का स्वाद बढ़ाने, अचार, चाय, काढ़ा, मिठाइयां आदि तरीकों में इस्तेमाल किया जाता है। दालचीनी में मौजूद सिनामाल्डिहाइड, पॉलीफेनॉल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे गुण पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। दालचीनी का सेवन सीमित मात्रा में करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। हालांकि, ज्यादा मात्रा में इसका सेवन आपकी सेहत के लिए हानिकारक भी हो सकता है।ज्यादा दालचीनी खाने से क्या नुकसान हो सकते हैं?दालचीनी का ज्यादा सेवन सेहत के लिए कई तरह से नुकसानदायक साबित हो सकता है। कैसिया दालचीनी में मौजूद कूमारिन नामक का कंपाउंड लिवर पर बुरा असर डाल सकता है, जिसके कारण सीलोन दालचीनी के सेवन की सलाह दी जाती है। साल 2019 में Euroasian Journal Of Hepato-Gastroenterology में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, दालचीनी का ज्यादा मात्रा में सेवन लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि इसमें कूमरिन नाम का टॉक्सिक तत्व होता है, जो लिवर के लिए हानिकारक माना गया है। इसके ज्यादा सेवन से लिवर का अनियमित रूप से सिकुड़ना और फिर से बढ़ना शामिल है। इसके लक्षणों की बात करें तो पीलिया, गहरे रंग का पेशाब, भूख में कमी और पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं।ज्यादा मात्रा में दालचीनी का सेवन ब्लड शुगर लेवल पर भी असर डाल सकता है। इसलिए, डायबिटीज के मरीजों को दवा के साथ इसका सेवन करने से बचना चाहिए। इसमें मौजूद सिनामाल्डिहाइड के कारण सेंसिटिव लोगों को मुंह में छाले, जीभ और गले में जलन या एलर्जी की समस्या हो सकती है। इतना ही नहीं, ज्यादा मात्रा में दालचीनी का सेवन ब्लड थिनर, डायबिटीज और लिवर की दवाओं के असर को भी प्रभावित कर सकता है।आयुर्वेद के अनुसार ज्यादा दालचीनी के नुकसानज्यादा दालचीनी का सेवन सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। दालचीनी वैसे तो खून को पतला करती है और आयुर्वेद में इसे ठंडी तासीर का माना जाता है, लेकिन अगर आप इसे बहुत ज्यादा मात्रा में खाएंगे तो यह पेट में गर्मी को बढ़ा देगी। फिर यह शरीर को गर्म करने लगती है। लोग अक्सर इसे पानी में मिलाकर पीना पसंद करते हैं, लेकिन फिर भी बहुत ज्यादा लेने से शरीर में पित्त बढ़ सकता है, जिससे पेट की गर्मी और एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए इसके इस्तेमाल के दौरान मात्रा का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।-दालचीनी की चाय: दिन में 1 से 2 कप दालचीनी की चाय ज्यादातर हेल्दी लोगों के लिए ठीक मानी जाती है, लेकिन इसमें ज्यादा दालचीनी की मात्रा बढ़ाने से यह सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।-पाउडर: ज्यादा मात्रा में रोजाना दालचीनी का पाउडर खाने से सेहत के लिए इसका जोखिम बढ़ सकता है।-मसाले के रूप में: भोजन में सीमित मात्रा में दालचीनी का इस्तेमाल सेहत के लिए फायदेमंद और सुरक्षित माना जाता है।दालचीनी की कितनी मात्रा सुरक्षित मानी जाती है?दालचीनी का सेवन करने की कोई तय सीमा नहीं है क्योंकि यह उसकी किस्म और आपके खाने के कारण पर निर्भर करती है। हालांकि, अगर आप इसे अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं तो कोशिश करें कि पूरे दिन में 3 से 4 ग्राम से ज्यादा दालचीनी अपनी डाइट में बिल्कुल शामिल न करें, क्योंकि इससे ज्यादा मात्रा शरीर में बहुत तेज गर्मी पैदा हो सकती है। इसलिए, आप ध्यान रखें कि रोजाना बड़ी मात्रा में दालचीनी पाउडर लंबे समय तक न लें। अगर स्वास्थ्य फायदों के लिए आप इसका नियमित सेवन कर रहे हैं तो सेवन के तरीके और मात्रा के लिए आयुर्वेदिक डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह जरूर लें।निष्कर्षदालचीनी एक फायदेमंद मसाला है, लेकिन इसका ज्यादा सेवन सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। चाहे आप इसे काढ़े, चाय, पाउडर या मसाले के रूप में लें, ध्यान रखें कि आपको इसे संतुलित और सीमित मात्रा में ही लेना है। सही मात्रा और इसके सेवन का तरीका आपके सेहत पर इसके प्रभाव निर्भर करता है।
- हम में से बहुत से लोग अपनी स्किन और बालों को हेल्दी रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि जितना हानिकारक केमिकल्स का इस्तेमाल होगा, उतना ही त्वचा और बालों को नुकसान होगा। ऐसे में हम सभी के मन में एक ही ख्याल आता है कि “आखिर इन्हें हेल्दी रखें तो कैसे रखें?”- रोजाना सुबह खाली पेट करी पत्तियां चबाएं ।करी पत्ता हेल्दी बालों और पाचन को बेहतर बनाने के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें नेचुरल आयरन, एंटीऑक्सीडेंट और प्लांट कंपाउंड होते हैं जो बॉडी को अंदर से पोषण देते हैं।करी पत्ता स्किन और हेयर के लिए कैसे फायदेमंद है?-यह बालों के नेचुरल रंग यानी कि पिगमेंटेशन को बनाए रखने में मदद कर सकता है।एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है, जिससे स्किन सेल्स को प्रोटेक्शन मिलती है।-पाचन में मदद कर सकता है, जिसे आयुर्वेद साफ स्किन से जोड़ता है।-नोट- 5–7 ताजी करी पत्तियों को अच्छी तरह धो लें और एक गिलास पानी के साथ चबाएं। अगर ताजी पत्तियां न मिलें, तो उन्हें अपने नाश्ते में शामिल करें।चेहरे पर खस वाले पानी का इस्तेमालसादे पानी से चेहरा धोने के बजाय, रात भर खस की जड़ों को पीनी में भिगोकर रखें और फिर उस पानी का इस्तेमाल करें। आयुर्वेद में, खस अपनी नेचुरल ठंडक देने और आराम पहुंचाने वाली खूबियों के लिए जाना जाता है। इसे इस्तेमाल करने के कई फायदे हैं। जैसे--डल स्किन को फ्रेश और ग्लोइंग बना सकता है।-गर्मी से होने वाली स्किन की जलन को शांत करने में मदद कर सकता है।-चेहरे को नेचुरली हाइड्रेटेड रखने में मददगार हो सकता है।-बता दें कि इसे इस्तेमाल करने के लिए आप साफ खस की जड़ों को पीने के पानी में रात भर भिगो दें। सुबह चेहरा धोने के लिए उस छने हुए पानी का इस्तेमाल करें।फिंगर टिप से स्कैल्प की मासज करेंबहुत से लोग सोचते हैं कि स्कैल्प की मालिश सिर्फ तेल से ही होती है। लेकिन आयुर्वेद में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाने के लिए उंगलियों की टिप से बिना तेल के मसाज करने की सलाह दी जाती है। ऐसा करने से हेयर फॉलिकल्स तक ब्लड फ्लो बढ़ता है, स्कैल्प के कड़ेपन को कम करने में मदद मिलती है और बालों की जड़ों तक पोषक तत्वों को पहुंचाने में सुधार होता है।एक चम्मच भुने हुए तिल खाएंतिल को आयुर्वेद में हड्डियों, बालों और स्किन के लिए सबसे ज़्यादा पोषण देने वाले खाद्य पदार्थों में से एक माना जाता है। इसमें कैल्शियम, जिंक, हेल्दी फैट्स और विटामिन E भरपूर मात्रा में होते हैं। यह रूखी त्वचा को पोषण देने में मदद कर सकता है। साथ ही बालों को अंदर से मजबूत बनाता है। आप सुबह एक चम्मच भुने हुए काले या सफेद तिल खाएं या उन्हें अपने नाश्ते पर छिड़कें। ये दोनों ही तरीके आपके बालों और स्किन के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।गुलाब जल का इस्तेमाल करेंसिर्फ गुलाब जल स्प्रे करने के बजाय, ठंडे प्योर गुलाब जल में कॉटन पैड भिगोकर अपनी बंद आंखों और गालों के ऊपरी हिस्से पर रखें। ऐसा करने से सूजी हुई आंखों को ताजगी मिलती है, चेहरे को आराम मिलता है, गर्मी में स्किन को ठंडक पहुंचाता है और ऑयल सीक्रेशन कम होता है, जिससे थकी हुई त्वचा को आराम मिलता है और वह फ्रेश नजर आती है। आप सबसे अच्छे नतीजों के लिए बिना खुशबू या अल्कोहल वाला शुद्ध गुलाबजल चुनें।
- बस अपनाएं डॉक्टर का बताया रूलऑफिस के काम के लिए लोगों को घंटों तक एक ही जगह पर बैठना पड़ता है। हालांकि, लगातार बैठे रहना हमारे शरीर के लिए एक ‘साइलेंट किलर’ की तरह काम करता है। जब हम लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठे रहते हैं, तो शरीर के कई हिस्सों पर असर होता है। खासतौर से पैरों को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में वैस्कुलर सर्जन डॉ. सुमित कपाड़िया (वैरिकोज वेन स्पेशलिस्ट) ने 30-60-5 रूल शेयर किया है। जिसे अपनाकर पैरों की समस्या से बचा जा सकता है। जानिए क्या है ये रूल।ज्यादा देर बैठने पर जम जाता है खून30 मिनट तक बैठने पर खून जमा होने लगता है। आपकी पिंडली की पंपिंग बंद हो जाती है। नस के वॉल्व खुल जाते हैं। खून का बहाव धीमा हो जाता है। नुकसान चुपचाप शुरू हो जाता है।क्या है 5 मिनट के लिए पिंडली व्यायाम?घंटों तक एक जगह पर बैठने से जब पैर जाम हो जाते हैं तो 5 मिनट की एक्सरसाइज आराम दे सकती है। इस एक्सरसाइज में अपनी पिंडलियों को स्क्वीज करें। ऐसा करने से खून 30 से 40 एमएल ऊपर की तरफ जाता है। 5 बार स्क्वीज करने पर आपके पैरों से 150-200 ml डीऑक्सीजनेटेड ब्लड (ऑक्सीजन-रहित रक्त) पैरों से हटाया जा सकता है।क्या है रूल?हर 30 मिनट के बाद कम से कम 60 सेकेंड के लिए खड़े रहें। 5 काफ रेजेज करें। 60 सेकेंड के लिए खड़े रहना और 5 मिनट की मूवमेंट से ब्लड फ्लो फिर से रिस्टार्ट हो सकता है।क्या होता है जब आप ऐसा नहीं करते?ऑफिस के काम के लिए जब आप लगातार 8 घंटे के लिए बैठते हैं या फिर 6 से ज्यादा घंटे के लिए बैठते हैं तो खून जमना शुरू हो जाता है। ऐसा ना करने पर एक महीने में नसे थकना शुरू हो जाती हैं। 6 महीने में वेरिकोज वेंस दिखने लगती हैं। 2 साल में स्किन डैमेज होने लगती है और रंगत खराब होने लगती है। 5 साल बाद अल्सर और डीवीटी रिस्क की समस्या हो सकती है।ये ट्रिक आएगी कामकाम में व्यस्त हो जाने के बाद हो सकता है कि आप खड़े होना और एक्सरसाइज करना भूल जाएं। इसलिए सबसे अच्छा है कि आप अलार्म सेट करें। हर 30 मिनट बाद का एक अलार्म लगाएं। ये भले ही एक छोटी आदत है लेकिन इसका असर बड़ा दिखाई देगा।ऐसा करने पर-ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होगासूजन और थकान कम होगीदिल और नसों को सपोर्ट मिलता हैएनर्जी और फोकस बढ़ता है।
- शरीर में विटामिन्स, प्रोटीन की कमी होने पर कई गंभीर बीमारियां घेर सकती हैं, जिसमें ज्यादातर लोगों में Vitamin B12 की कमी पाई जाती है। विटामिन B12 खासतौर पर लीवर, खून, हड्डियों के भीतर बोन मैरो और शरीर की कोशिकाओं में पाया जाता है। शरीर में विटामिन B12 की कमी होने पर गुड ब्लड सेल्स कम बनने लगती हैं, जिससे कमजोरी, थकान और सांस फूलने जैसी दिक्कत हो सकती है। इससे हाथ-पैर में झनझनाहट, सुन्नपन, जलन या संतुलन बिगड़ना। वैसे तो विटामिन B12 की कमी को पूरा करने के लिए सप्लीमेंट्स आते हैं लेकिन डाइट में कुछ चीजों को शामिल करने से भी बी12 की कमी को पूरा करने में सपोर्ट मिल सकता है। कुछ ऐसी हरी सब्जियां हैं, जिन्हें हर किसी को अपनी प्लेट में शामिल करना चाहिए।कौन सी हैं 5 सब्जियां-1- पालकपालक में फोलेट, आयरन और क्लोरोफिल होते हैं, जो रेड ब्लड सेल्स को बनाने में मददगार होते हैं। इसे खाने से शरीर में एनर्जी बनी रहती है, थकान कम लगती है और विटामिन B12 की कमी को पूरा करने में सपोर्ट भी मिलता है। पालक की सब्जी या फिर दाल आप डाइट में शामिल कर सकते हैं।2- सहजन के पत्तेसहजन की फली के साथ उसके पत्ते भी पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। सहजन की पत्तियों में विटामिन, कैल्शियम, आयरन, फोलेट जैसे तत्व होते हैं। इसे खाने से शरीर में एनर्जी आती है और कमजोरी दूर होती है। साथ ही विटामिन B12 की कमी पूरी करने में भी ये मददगार होते हैं। इसमें मौजूद फोलेट रेड ब्लड सेल्स को बनाने में हेल्प करता है।3- चुकंदरचुकंदर अगर आप सलाद में खाते हैं, तो समझ लीजिए आपके शरीर में खून की कमी नहीं होगी। चुकंदर में फोलेट, मैंगनीज, नैचुरल नाइट्रेट्स होते हैं, जो शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। साथ ही स्टैमिना भी बढ़ाते हैं। Vitamin B12 की कमी पूरा करने में भी चुकंदर सपोर्ट करता है।4- मेथी के पत्तेमेथी के पत्तेमेथी के पत्ते की भी सब्जी बनाकर लोग खूब खाते हैं और ये सेहत के लिए फायदेमंद भी होती है। इसे खाने से पाचन तंत्र अच्छा रहेगा, मेटाबॉलिज्म बढ़ेगा, विटामिन B12 की कमी पूरा करने में मदद मिलेगी। इसमें आयरन, फोलेट, मैग्नीशियम जैसे जरूर पोषक तत्व होते हैं।5- ग्वार फलीग्वार फलीग्वार फली थोड़ी सेम की तरह दिखती है और ये सब्जी भी लोग सूखी बनाकर खाना पसंद करते हैं। ग्वार फली में फोलेट, फाइबर, मिनरल्स, विटामिन्स का अच्छा स्रोत होता है। ग्वार फली खाने से पाचन बेहतर रहेगा, ब्लड शुगर कंट्रोल रहता है, इम्यूनिटी मजबूत होगी और B12 की कमी को भी सपोर्ट मिलेगा।
- सुबह वाली नींद हर किसी को प्यारी होती है और यही कारण है कि हम अलार्म को बार-बार बंद करते रहते हैं। सुबह कहीं जाना हो तब भले ही हम जल्दी उठ जाए लेकिन वैसे अलार्म को 5 मिनट बढ़ाते हुए करीब 1-2 घंटे और सो लेते हैं। आजकल की लाइफस्टाइल में सुबह देर से उठना काफी नॉर्मल हो चुका है लेकिन पहले लोग सुबह 4-5 बजे उठना सही मानते थे। सुबह जल्दी उठने पर दिमाग फ्रेश रहता है और शरीर में एनर्जी बनी रहती है। साथ ही कई प्रोडक्टिव काम भी कर सकते हैं। अगर आप किसी सफल व्यक्ति के बारे में जानें तो पाएंगे कि वह सभी लोग सुबह जल्दी उठते हैं। आप भी जल्दी उठने की कोशिश रोजाना करते हैं लेकिन उठ नहीं पाते तो आज हम आपको जल्दी उठने के 3 सरल तरीके बताने जा रहे हैं। सात्विक मूवमेंट यूट्यूब चैनल पर वीडियो में इसके बारे में जानकारी दी गई है। उन्होंने सुबह जल्दी उठने और मॉर्निंग रूटीन के बारे में सलाह दी है।क्यों नहीं खुलती नींदआजकल लोग देर से खाना खाते हैं और फिर बिस्तर पर लेटने के बाद मोबाइल चलाने लगते हैं। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी नींद के हार्मोन मेलाटोनिन के निर्माण को रोकती है और यही कारण है कि नींद देर से आती है। फिर सुबह कई अलार्म बजने के बाद भी आंख नहीं खुलती। रील्स, फिल्म या किसी से देर रात तक बातें करने से दिमाग सक्रिय रहता है, जिससे नींद पूरी नहीं होती और सुबह उठने पर भारीपन लगता है।जल्दी उठने के 3 तरीके क्या है1- रात से ही कर लो तैयारसात्विक मूवमेंट के अनुसार, अगर आपको सुबह जल्दी उठना है तो रात से ही तैयारी करनी होगी। सुबह के 10 अलार्म लगाने के बजाय रात के 9-10 बजे का अलार्म सेट करें। जैसे ही रात में ये अलार्म बजे, आप अपने बिस्तर पर सोने के लिए चले जाए। अगर आप देर रात तक जगेंगे तो सुबह नींद खुलना नामुमकिन है। ऐसे में जरूरी है कि आप रात को जल्दी सोएं, जिससे दिमाग शांत रहे और नींद पूरी हो जाए। अगर आप 9 बजे नहीं सो सकते तो 10 बजे तक जरूर सोने की कोशिश करें।रात की अच्छी नींद2- सुबह का प्लान बनाएंअगली सुबह अगर आपको कहीं बाहर जाने के लिए ट्रेन-फ्लाइट पकड़ना हो, ऑफिस की जरूरी मीटिंग अटेंड करनी हो तो आपकी नींद खुद ही खुल जाती है। अलार्म बाद में बजता है लेकिन रोजाना ऐसा नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है कि जब आपके दिमाग में पहले से कोई प्लान होता है, तो सब-कॉन्शियस माइंड में वह चलता रहता है और इसी वजह से सुबह नींद जल्दी खुल जाती है। इसिलए सुबह के लिए प्रोडक्टिव प्लान बनाकर सोएं- जैसे सुबह एक्सरसाइज करनी है, बुक पढ़नी है, टहलने जाना है या जो भी आपके लिस्ट में हो।3- डिनर को बनाइये हल्काअगर आपका डिनर हैवी रहेगा, तो पेट को उसे पचाने के लिए करीब 5-6 घंटे की मेहनत लगेगी। ऐसे में नींद भी भरपूर आएगी और आप सुबह नहीं उठ पाएंगे। साइंस भी कहता है कि दिन में हैवी लंच करो लेकिन डिनर हमेशा लाइट ही रखो। डिनर में अनाज कम खाएं और सलाद-सब्जियां ज्यादा खाएं। अगर आप डिनर में राजमा-चावल, दाल-चावल जैसी चीजें खाते हैं, तो सुबह नींद खुलना मुश्किल है। ध्यान रखें कि अगर 10 बजे सो रहे हैं, तो डिनर सोने से करीब 2 घंटे पहले यानी 8 बजे कर लें।हेल्दी सैलेड कैसे बनाएं3 M को करें फॉलोसुबह जल्दी उठना है तो आपको 3 M वाले नियम को जरूर फॉलो करना चाहिए। यही आपका मॉर्निंग रूटीन भी होना चाहिए, इसमें पहले M का मतलब है मेडिटेशन करना। सुबह उठने पर सबसे पहले योगा, एक्सरसाइज या फिर मेडिटेशन करें। दूसरे M का मतलब है कि मूवमेंट। उठने के बाद अपने शरीर को चलाएं, आप टहल सकते हैं या फिर कोई फिजिकल एक्टिविटी कर सकते हैं। तीसरे M का मतलब है मास्टरी। मतलब ऐसा काम करें, जो आपके दिमाग को तेज करने में मददगार हो। जैसे कोई किताब पढ़ें, नई स्किल्स सीखें या फिर कोई क्रिएटिव काम करें।
- किशमिश एक ऐसा ड्राई फ्रूट है, जो ज्यादातर भारतीय घरों में आसानी से मिल जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग होते हैं, जो इन्हें रेगुलर बेसिस पर खाते हैं। ऐसा इसलिए क्यों छोटे से दिखने वाले इस ड्राई फ्रूट के फायदे ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं हैं। आमतौर पर हम बादाम-अखरोट को तो फायदेमंद समझते हैं, लेकिन किशमिश ज्यादातर लोग सिर्फ मिठाई या खीर-हलवे में डालने को ही यूज करते हैं।. ज्यादातर भारतीय किशमिश के फायदे जानते नहीं हैं। अगर वो इसे रोजाना अपनी डाइट में शामिल कर लें तो बहुत से लोगों की कब्ज की समस्या दूर हो जाए। आइए जानते हैं किशमिश के फायदों के बारे में डॉक्टर का और क्या कहना है।कब्ज की समस्या में बहुत फायदेमंद है किशमिशभारत में बहुत से लोगों को कब्ज की समस्या बनी रहती है। इसपर डॉक्टर कहते हैं कि अगर लोग नियमित रूप से किशमिश खाना शुरू कर दे, तो आधे लोगों की ये समस्या ठीक हो सकती है। दरअसल किशमिश नेचुरली आपके गट के वाटर बैलेंस को इंप्रूव करने का काम करते हैं। इसमें 'सोर्बिटोल' नामक तत्व मौजूद होता है, जो मल में नमी बनाए रखने का काम करता है। किशमिश में मौजूद फाइबर मल को सॉफ्ट और आसानी से निकलने वाला बनाता है। डॉक्टर बताते हैं कि कब्ज में हमेशा किसी दवा की जरूरत नहीं होती है, कई मामलों में खानपान में छोटे-छोटे बदलाव भी काफी फायदेमंद हो सकते हैं।एसिडिटी और भारीपन को कम करने में सहायकडॉ शुभम कहते हैं कि किशमिश गट में मौजूद गुड बैक्टीरिया को पोषण देने का काम करती है। इससे एसिडिटी और पेट फूलना या भारीपन जैसी समस्याओं में भी मदद मिलती है। कब्ज की वजह से मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाने की समस्या कम होने पर पाइल्स (बवासीर) और एनल फिशर का रिस्क भी कम हो जाता है।हार्ट हेल्थ के लिए भी फायदेमंद है किशमिशकिशमिश सिर्फ आपके गट के लिए ही नहीं, बल्कि हार्ट हेल्थ के लिए भी काफी फायदेमंद है। डॉक्टर कहते हैं कि किशमिश में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स और पोटैशियम मौजूद होता है, जो हार्ट हेल्थ के लिए काफी फायदेमंद है। नियमित रूप से इनका सेवन आपकी ओवरऑल हार्ट हेल्थ और पाचन के लिए काफी अच्छा साबित हो सकता है।कब और कितनी मात्रा में किशमिश का सेवन करेंडॉक्टर कहते हैं कि आप रोजाना 8-10 किशमिश खा सकते हैं। इन्हें रातभर के लिए पानी में भिगोकर रख दें, फिर सुबह चबा चबाकर अच्छी तरह खा लें। अगर आप इन्हें लगातार एक हफ्ते तक कंज्यूम करें तो फर्क साफ महसूस किया जा सकता है।--











.jpg)
.jpg)

.jpg)






.jpg)





.jpg)