- Home
- ज्ञान विज्ञान
-
प्राचीन लक्ष्मणपुर या लखनपुर, लखन अहीर, स्वर्ण नगर (गोल्डन सिटी), शिराज- ए-हिंद, नवाबों का शहर और आज का जीवंत शहर लखनऊ की अपनी एक खास पहचान है।
लखनऊ भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है। लखनऊ, लखनऊ जिला और लखनऊ डिवीजन का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। यह शहर अपनी बहुसांस्कृतिक खूबी, बाग़ों तथा कढ़ाई के काम से लिये जाना जाता है।
यह उस क्षेत्र में स्थित है जिसे ऐतिहासिक रूप से अवध क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। लखनऊ हमेशा से एक बहुसांस्कृतिक शहर रहा है। यहां के शिया नवाबों द्वारा शिष्टाचार, खूबसूरत उद्यानों, कविता, संगीत, और बढिय़ा व्यंजनों को हमेशा संरक्षण दिया गया। लखनऊ को नवाबों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। इसे पूर्व की स्वर्ण नगर (गोल्डन सिटी), शिराज-ए-हिंद के रूप में जाना जाता है। आज, लखनऊ एक जीवंत शहर है जिसमे एक आर्थिक उछाल दिख रहा है और यह भारत के तेजी से बढ़ रहे प्रमुख-महानगरों के शीर्ष दस में से एक है। यह हिंदी और उर्दू साहित्य का एक केंद्र है।
लखनऊ प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा था। मान्यताओं के अनुसार यह श्रीराम की विरासत थी जिसे उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण को समर्पित कर दिया था। इसलिए इसे लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जाना गया। अन्य कथाओं के अनुसार इस शहर का नाम, लखन अहीर था जो कि लखन किले के मुख्य कलाकार थे, के नाम पर रखा गया था।
1775 में अवध के चौथे नवाब असिफुद्दोला या अशफ - उद - दुलाह ने अवध की राजधानी को फ़ैज़ाबाद से लखनऊ स्थानांतरित किया था। वास्तुकला की दृष्टि से अवध के नवाबों का इस शहर में काफी योगदान है, इसके अलावा उस समय के लखनऊ की मुग़ल चित्रकारी भी आज बहुत से संग्रहालय में सुरक्षित हैं। भवनों के स्तर पर बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, तथा रूमी दरवाज़ा मुग़ल वास्तुकला का जीता जागता उदाहरण है। हालांकि आधुनिक प्रशासन की उपेक्षा से इन महत्वपूर्ण विरासतों का खंडहरों में तब्दील होने का खतरा उपस्थित हो गया है।
प्राचीन अवध राज्य का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में 1857 के सिपाही विद्रोह के फलस्वरुप हुआ था। यह शहर भारत के इस पहले व्यवस्थित स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सबसे पहले जीते गये कुछ शहरों में से था। ब्रिटिश शासकों को यह शहर अपने कब्ज़े में लेने के लिये काफी मशक्कत करनी पड़ी। लखनऊ का शहीद स्मारक आज भी हमें उन क्रांतिकारियों की याद ताज़ा कराता है।
लखनऊ के आधुनिक वास्तुकारी में लखनऊ विधानसभा और चारबाग़ स्थित लखनऊ रेलवे स्टेशन का नाम लिया जा सकता है। विश्व के सबसे पुराने आधुनिक स्कूलों में से एक ला मार्टीनियर कॉलेज भी इस शहर में मौजूद है जिसकी स्थापना ब्रिटिश शासक क्लाउड मार्टिन की याद में की गयी थी। अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के बाद शायर मीर तकी मीर अवध के चौथे नवाब अशफ - उद - दुलाह या असफ़ुद्दौला के दरबार मे लखनऊ चले आये थे और अपनी जिन्दगी के बाकी दिन उन्होंनेे यहीं गुजारे थे और 20 सितम्बर 1810 को यहीं उनका निधन हुआ। सन 1902 में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूपी कहा गया। सन 1920 में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से लखनऊ कर दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक न्यायपीठ स्थापित की गयी।
- दुनिया भर में महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावितों की संख्या करोड़ों में है। इनमें प्रमुख हस्तियां हैं-बराक ओबामा - वर्ष 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा (अब तत्कालीन राष्ट्रपति ) वर्जीनिया प्रांत के एक हाईस्कूल में गए। तभी एक छात्र ने सवाल किया कि आप जीवित या गुजर चुकी किस हस्ती के साथ डिनर करना चाहेंगे। ओबामा ने जवाब दिया, महात्मा गांधी। अमेरिकी संसद में ओबामा के दफ्तर में महात्मा गांधी की तस्वीर भी लगाई गई थी।मार्टिन लूथर किंग- अमेरिका के मशहूर क्रांतिकारी मार्टिन लूथर किंग ने नागरिक अधिकारों के लिए अहिंसक तरीके से लड़ाई लड़ी और कामयाबी पाई। मार्टिन लूथर किंग गांधी की सोच और उनके विचारों से बहुत ही ज्यादा प्रभावित थे। एक बार मार्टिन लूथ किंग ने कहा, ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिये हैं और महात्मा गांधी ने उन लक्ष्यों तक पहुंचने की रणनीति।स्टीव जॉब्स- जवानी में भारत भ्रमण पर आए स्टीव जॉब्स गांधी की जिंदगी और आध्यात्म से प्रभावित थे। स्टीव जॉब्स ने 1980 के दशक में जब अपनी कंपनी बनाई और एप्पल कंप्यूटर बेचना शुरू किया तो उन्होंने विज्ञापनों में चरखे के साथ बापू की तस्वीर लगाई। विज्ञापन का नारा था, अलग सोचो।अल्बर्ट आइनस्टाइन- 20वीं सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइनस्टाइन भी महात्मा गांधी के कायल थे। दोनों एक दूसरे को खत भी लिखा करते थे। गांधी जी के हत्या की खबर पाते ही आइनस्टाइन की आंखें भर आईं, उन्होंने कहा, एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि आने वाली पीढ़ी को यकीन ही नहीं होगा कि मांस और खून का बना ऐसा आदमी कभी पृथ्वी पर चला होगा।नेल्सन मंडेला- दक्षिण अफ्रीका का आधुनिक इतिहास नेल्सन मंडेला से जुड़ा है और नेल्सन मंडेला गांधी से जुड़े हैं। नेल्सन मंडेला ने गांधी के पदचिह्नों पर चलते हुए दक्षिण अफ्रीका को रंग भेद और नस्लवाद से आजादी दिलाई। भारत में तैनात दक्षिण अफ्रीका के राजदूत हैरिस माजेके ने कहा, नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पिता हैं और महात्मा गांधी हमारे दादा।जॉन लेनन- संगीत की दुनिया के सबसे बड़े नामों में शुमार बीटल्स बैंड के ब्रिटिश संगीतकार जॉन लेनन भी गांधी से प्रभावित थे। बापू के जैसा गोल चश्मा लेनन भी पहना करते थे। लेनन कहते थे कि गांधी ने कहा है वो बदलाव खुद बनो, जो तुम दुनिया में देखना चाहते हो।दलाई लामा- तिब्बत में चीन के दमन के बाद दलाई लामा भागकर भारत आए। 1956 में 20 साल की उम्र में दलाई लामा राजघाट में बापू की समाधि पर गए। दलाई लामा ने समाधि को छुआ और जीवन में कभी हिंसा का रास्ता न अपनाने का प्रण किया। 1989 में दलाई लामा ने अपना शांति पुरस्कार महात्मा गांधी को समर्पित किया।आंग सांग सू ची- नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची अपने जीवन को महात्मा गांधी से प्रभावित बताती है। सू ची दुनिया भर में जगह जगह बच्चों को गांधी के बारे में पढऩे को कहती हैं। म्यांमार में सेना के सत्ता हथियाने के लिए खिलाफ सू ची ने लंबा अहिंसक विरोध किया। वे 15 साल नजरबंद रहीं।---
- भारत में आजादी के पहले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ और आजादी की मांग करने वालों को अंग्रेज सरकार काला पानी की सजा देती थी। इन्हें अंडमान निकोबार द्वीप की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी सेल्युलर जेल में रखा जाता था। मूलरूप यह जेल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को कैद रखने के लिए बनाई गई थी, जो कि मुख्य भारत भूमि से हजारों किलोमीटर दूर स्थित थी और सागर से भी हजार किलोमीटर दुर्गम मार्ग पड़ता था। इसलिए यह काला पानी के नाम से कुख्यात थी।अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी। इस जेल के अंदर 694 कोठरियां हैं। इन कोठरियों को बनाने का उद्देश्य बंदियों के आपसी मेल जोल को रोकना था। आक्टोपस की तरह सात शाखाओं में फैली इस विशाल कारागार के अब केवल तीन अंश बचे हैं। कारागार की दीवारों पर आज भी वीर शहीदों के नाम लिखे हैं। यहां अब एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है जिनसे स्वतंत्रता सैनानियों पर अत्याचार किए जाते थे। चूंकि इस जेल की अन्दरूनी बनावट सेल (कोटरी) जैसी है, इसीलिए इसे सेल्यूलर जेल कहा गया है।भारत की आजादी के लिए लड़ी गई 1857 की पहली रक्तरंजित क्रान्ति और सशस्त्र संघर्ष के बाद भारतीयों पर अंग्रेजी सरकार का दमनचक्र और तेज हो गया था। देश की जनता पर बर्बरता से जुल्म ढाए जाने लगे। इससे क्रान्तिकारियों में आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी। सम्पूर्ण भारत में जबर्दस्त जन-आन्दोलन शुरू हो गया। वीर सावरकर के नेतृत्व में एक सशक्त क्रांतिकारी दल का गठन किया गया। इस दल द्वारा अनेक अंग्रेज और उनके देशी पिट्ठुओं की हत्याएं की गई। गोरी सरकार इससे बौखला उठी और तुरन्त हरकत में आई और इनके दमन के लिए पूरे देश में पुलिस द्वारा मुखबिर छोड़े गए। उन्हीं की सहायता से अनेक क्रांतिकारी पकड़े गए और उन पर मुकदमे चले। सैकड़ों क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दी गई और हजारों को आजीवन कारावास। आजीवन कारावाज की सजा पाए क्रांतिकारियों को बंगाल की खाड़ी का अथाह समुद्र, जो यहां बिल्कुल काला नजर आता है, के बीच में बने टापुओं में छोड़ा जाता था। यहीं बनी थीं वो कालकोठरियां जिनमें क्रांतिकारियों को दिल दहला देने वाली अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। यही थी कालापानी की सजा।विनायक दामोदर सावरकर, उनके भाई गणेश दामोदर सावरकर, ननी गोपाल मुखर्जी, नन्द कुमार, पुनीत दास, त्रिलोक्य महाराज, अनातासिंह, भाई महावीरसिंह, बाबा पृथ्वीसिंह आजाद, भाई परमानन्द आदि जैसे करिश्माई व्यक्तित्व और काकोरी कांड के अभियुक्त योगेशचन्द्र चटर्जी, गोविन्द चरणकर, मुकुन्द लाल, विष्णु सरण दुबलिश, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य तथा उनके जैसे कई अनाम क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा पड़ा है यहां का इतिहास। ये भारत मां के वीर सपूत 1910 से लेकर 1945 के बीच यहां कैद थे।11 जनवरी, 1979 का दिन स्वाधीनता सेनानियों के लिए यादगार दिन था, क्योंकि इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री, मोरारजी देसाई ने अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर की उस कुख्यात सेल्यूलर जेल को राष्टï्रीय स्मारक घोषित किया। तब से यह स्वतंत्रता सैनानियों का पवित्र तीर्थ स्थल कहलाता है।
- चर्मनवती या चर्मण्वती नदी को वर्तमान समय में चम्बल नदी के नाम से जाना जाता है। यह नदी मध्य प्रदेश में बहती हुई इटावा, उत्तर प्रदेश के निकट यमुना नदी में मिलती है। पुराणों और महाभारत में इस नदी के किनारे पर राजा रतिदेव द्वारा अतिथि यज्ञ करने का उल्लेख मिलता है। यह माना जाता है कि बलि पशुओं के चमड़ों के पुंज से यह नदी बह निकली, इसीलिए इसका नाम चर्मण्वती पड़ा। किन्तु यह पुराणों की गुप्त या सांकेतिक भाषा-शैली की उक्ति है, जिससे बड़े-बड़े लोग भ्रमित हो गए हैं। राजा रन्तिदेव की पशुबलि और चर्मराशि का अर्थ केला (कदली) स्तम्भों को काटकर उनके फलों से होम एवं अतिथि सत्कार करना है। केलों के पत्तों और छिलकों को भी चर्म कहा जाता था। ऐसे कदलीवन से ही चर्मण्वती नदी निर्गत हुई थी।महाभारत, वनपर्व में अश्वनदी का चर्मण्वती में, चर्मण्वती का यमुना में और यमुना का गंगा में मिलने का उल्लेख मिलता है। चर्मावती का अर्थ है चमड़ा, यह कहा जाता है कि इस नदी के तट पर प्राचीन काल में चमड़ा सुखाया जाता था। पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में राजा रतिदेव द्वारा स्वर्ग की कामना के लिए इस नदी के तट पर पशुओं की बलि दी जाती थी, जिसके परिणामस्वरूप इस नदी का रंग लाल हो गया था। पशुओं की त्वचा को इस नदी के तट पर सुखाने के कारण यह नदी चमड़े वाली नदी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई एवं इसका नाम चरमावती पड़ा। महाभारत के अनुसार राजा रन्तिदेव के यज्ञों में जो आर्द्र चर्मराशि इक_ी हो गई थी, उससे यह नदी का जन्म हुआ है।कुछ इतिहासकारों के अनुसार सरस्वती नदी क्षेत्र से विस्थापित लोग इस नदी के तट पर बस गए थे। तेलगू जैसी कुछ द्रविण भाषाओं के साथ साथ संस्कृत भाषा में चम्बल शब्द का शाब्दिक अर्थ मतस्य है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इस नदी के तट पर कुछ मत्स्य शासकों ने अपने शासन का उद्गम इस नदी तट पर किया। चर्मनवती या चरमावती नदी की दक्षिणी सीमा महाभारत काल के पांचाल राज्य से मिलती थी। महाभारत के अनुसार राजा द्रुपद ने दक्षिणी पांचाल राज्य पर चर्मनवती या चरमावती नदी के तट तक शासन किया। इस नदी के बारे में यह कथा प्रचलित है कि कुंती ने अपने नवजात पुत्र कर्ण को एक टोकरी में रखकर इस नदी में प्रवाहित कर दिया था। नवजात पुत्र सहित वह टोकरी प्रवाहित होते-होते गंगा तट पर स्थित अंग राज्य की राजधानी चम्पापुरी पहुंची जहां कर्ण का बचपन व्यतीत हुआ।महाकवि कालिदास ने भी अपनी रचना मेघदूत में चर्मण्वती को रन्तिदेव की कीर्ति का मूर्तस्वरूप कहा है। इससे यह जान पड़ता है कि रन्तिदेव ने चर्मण्वती के तट पर अनेक यज्ञ किए थे। चर्मण्वती नदी को वनपर्व के तीर्थ यात्रा अनुपर्व में पुण्य नदी माना गया है।इस नदी का उद्गम जनपव की पहाडिय़ों से हुआ है। यहीं से गंभीरा नदी भी निकलती है। यह यमुना की सहायक नदी है।
- नर्मदा नदी भारत की एक प्रमुख नदी है। नर्मदा सर्वत्र पुण्यमयी नदी बताई गई है तथा इसके उद्भव से लेकर संगम तक करोड़ों तीर्थ हैं। मान्यता है कि एक बार क्रोध में आकर नर्मदा नदी ने अपनी दिशा परिवर्तित कर ली और चिरकाल तक अकेले ही बहने का निर्णय लिया। आज भी ये अन्य नदियों की तुलना में विपरीत दिशा में बहती हैं। इनके इस अखंड निर्णय की वजह से ही इन्हें चिरकुंआरी कहा जाता है। चिरकुंआरी मां नर्मदा के बारे में कहा जाता है कि चिरकाल तक मां नर्मदा को संसार में रहने का वरदान है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने मां रेवा को वरदान दिया था कि प्रलयकाल में भी तुम्हारा अंत नहीं होगा। अपने निर्मल जल से तुम युगों-युगों तक इस समस्त संसार का कल्याण करोगी।वेदों में इस नदी का उल्लेख नहीं है, लेकिन पुराणों में रेवा नाम की नदी का उल्लेख है, जिसे नर्मदा का प्राचीन नाम माना गया है। गंगा के उपरान्त भारत की अत्यन्त पुनीत नदियों में नर्मदा एवं गोदावरी के नाम आते हैं। रेवा नर्मदा का दूसरा नाम है और यह सम्भव है कि रेवा से ही रेवोत्तरस नाम पड़ा हो। वैदिक साहित्य में नर्मदा के विषय में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। इस नदी का उद्गम विंध्याचल की मैकाल पहाड़ी श्रृंखला में अमरकंटक नामक स्थान में है । मैकाल से निकलने के कारण नर्मदा को मैकाल कन्या भी कहते हैं । स्कंद पुराण में इस नदी का वर्णन रेवा खंड के अंतर्गत किया गया है । कालिदास के 'मेघदूतमÓ में नर्मदा को रेवा का संबोधन मिला है , जिसका अर्थ है—पहाड़ी चट्टानों से कूदने वाली। वास्तव में नर्मदा की तेजधारा पहाड़ी चट्टानों पर और भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों के ऊपर से उछलती हुई बहती है । अमरकंटक में सुंदर सरोवर में स्थित शिवलिंग से निकलने वाली इस पावन धारा को रुद्र कन्या भी कहते हैं, जो आगे चलकर नर्मदा नदी का विशाल रूप धारण कर लेती हैं । पवित्र नदी नर्मदा के तट पर अनेक तीर्थ हैं , जहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है । इनमें कपिलधारा, शुक्लतीर्थ, मांधाता , भेड़ाघाट, शूलपाणि, भड़ौंच उल्लेखनीय हैं । अमरकंटक की पहाडिय़ों से निकल कर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर नर्मदा क़्ररीब 1310 किमी का प्रवाह पथ तय कर भरौंच के आगे खंभात की खाड़ी में विलीन हो जाती है । पुराणों में बताया गया है कि नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से समस्त पापों का नाश होता है ।रामायण तथा महाभारत और परवर्ती ग्रंथों में इस नदी के विषय में अनेक उल्लेख हैं। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा ने निकाली थी जिससे उसका नाम सोमोद्भवा भी पड़ गया था।- गुप्तकालीन अमरकोश में भी नर्मदा को सोमोद्भवा कहा है।- कालिदास ने भी नर्मदा को सोमप्रभवा कहा है।- रघुवंश में नर्मदा का उल्लेख है।-मेघदूत में रेवा या नर्मदा का सुन्दर वर्णन है।- वाल्मीकि रामायण में भी नर्मदा का उल्लेख है। इसके पश्चात के श्लोकों में नर्मदा का एक युवती नारी के रूप में सुंदर वर्णन है।-महाभारत में नर्मदा को ॠक्षपर्वत से उद्भूत माना गया है।- भीष्मपर्व में नर्मदा का गोदावरी के साथ उल्लेख है।- श्रीमद्भागवत में रेवा और नर्मदा दोनों का ही एक स्थान पर उल्लेख है।- शतपथ ब्राह्मण ने रेवोत्तरस की चर्चा की है, जो पाटव चाक्र एवं स्थपति (मुख्य) था, जिसे सृञ्जयों ने निकाल बाहर किया था।- पाणिनि के एक वार्तिक ने -महिष्मत की व्युत्पत्ति महिष से की है, इसे सामान्यत: नर्मदा पर स्थित माहिष्मती का ही रूपान्तर माना गया है। इससे प्रकट होता है कि सम्भवत: वार्तिककार को (लगभग ई.पू. चौथी शताब्दी में ) नर्मदा का परिचय था। रघुवंश में रेवा (अर्थात् नर्मदा) के तट पर स्थित माहिष्मती को अनूप की राजधानी कहा गया है।जान पड़ता है कि कहीं-कहीं साहित्य में इस नदी के पूर्वी या पहाड़ी भाग को रेवा (शाब्दिक अर्थ—उछलने-कूदने वाली) और पश्चिमी या मैदानी भाग को नर्मदा (शाब्दिक अर्थ—नर्म या सुख देने वाली) कहा गया है। (किन्तु महाभारत के उपर्युक्त उद्धरण में उदगम के निकट ही नदी को नर्मदा नाम से अभिहित किया गया है)। नर्मदा के तटवर्ती प्रदेश को भी कभी-कभी नर्मदा नाम से ही निर्दिष्ट किया जाता था। विष्णुपुराण के अनुसार इस प्रदेश पर शायद गुप्तकाल से पूर्व आभीर आदि शूद्रजातियों का अधिकार था। वैसे नर्मदा का नदी के रुप में उल्लेख है।महाभारत एवं कतिपय पुराणों में नर्मदा की चर्चा बहुधा हुई है। मत्स्य पुराण, पद्म पुराण कूर्म पुराण ने नर्मदा की महत्ता एवं उसके तीर्थों का वर्णन किया है। मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण आदि में ऐसा आया है कि उस स्थान से जहां नर्मदा सागर में मिलती है, अमरकण्टक पर्वत तक, जहां से वह निकलती है, 10 करोड़ तीर्थ हैं। अग्नि पुराण एवं कूर्म पुराण के मत से क्रम से 60 करोड़ एवं 60 सहस्र तीर्थ हैं। नारदीय पुराण का कथन है कि नर्मदा के दोनों तटों पर 400 मुख्य तीर्थ हैं, किन्तु अमरकण्टक से लेकर साढ़े तीन करोड़ हैं। वन पर्व ने नर्मदा का उल्लेख गोदावरी एवं दक्षिण की अन्य नदियों के साथ किया है। उसी पर्व में यह भी आया हैं कि नर्मदा आनर्त देश में है, यह प्रियंगु एवं आम्र-कुञ्जों से परिपूर्ण है, इसमें वेत्र लता के वितान पाये जाते हैं, यह पश्चिम की ओर बहती है और तीनों लोकों के सभी तीर्थ यहाँ (नर्मदा में) स्नान करने को आते हैं। मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण ने उद्घोष किया है कि गंगा कनखल में एवं सरस्वती कुरुक्षेत्र में पवित्र है, किन्तु नर्मदा सभी स्थानों में, चाहे ग्राम हो या वन। नर्मदा केवल दर्शन-मात्र से पापी को पवित्र कर देती है; सरस्वती (तीन दिनों में) तीन स्नानों से, यमुना सात दिनों के स्नानों से और गंगा केवल एक स्नान से। विष्णुधर्मसूत्र ने श्राद्ध के योग्य तीर्थों की सूची दी हैं, जिसमें नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के योग्य ठहराया है। नर्मदा को रुद्र के शरीर से निकली हुई कहा गया है, जो इस बात का कवित्वमय प्रकटीकरण मात्र है कि यह अमरकण्टक से निकली है जो महेश्वर एवं उनकी पत्नी का निवास-स्थल कहा जाता है। वायु पुराण में ऐसा उद्घोषित है कि नदियों में श्रेष्ठ पुनीत नर्मदा पितरों की पुत्री है और इस पर किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि यह 100 योजन लम्बी एवं दो योजन चौड़ी है। मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि नर्मदा अमरकण्टक से निकली हैं, जो कलिंग देश का पश्चिमी भाग है।विष्णुपुराण ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई रात एवं दिन में और जब अन्धकारपूर्ण स्थान में उसे जाना हो तब प्रात: काल नर्मदा को नमस्कार, रात्रि में नर्मदा को नमस्कार! हे नर्मदा, तुम्हें नमस्कार; मुझे विषधर सांपों से बचाओं इस मन्त्र का जप करके चलता है तो उसे सांपों का भय नहीं होता। कूर्म पुराण एवं मत्स्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जो अग्नि या जल में प्रवेश करके या उपवास करके (नर्मदा के किसी तीर्थ पर या अमरकण्टक पर) प्राण त्यागता है वह पुन: (इस संसार में) नहीं आता।
- विश्व पर्यटन दिवस हर साल 27 सितंबर को मनाया जाता है। विश्व में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 1980 से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व पर्यटन दिवस आयोजित करने की शुरुआत 27 सितंबर को की थी, तब से आज तक निरंतर विश्व पर्यटन दिवस सभी विश्व के संगठन के देश मनाते चले आ रहे हैं।विश्व पर्यटन दिवस के लिए 27 सितंबर का दिन चुना गया क्योंकि इसी दिन 1970 में विश्व पर्यटन संगठन का संविधान स्वीकार किया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा हर साल विश्व पर्यटन दिवस की विषय-वस्तु तय करती है। विश्व पर्यटन दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यटन और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मूल्यों के प्रति विश्व समुदाय को जागरूक करना है। विश्व पर्यटन दिवस का मुख्य उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देना और पर्यटन के द्वारा अपने देश की आय को बढ़ाना है। विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर एक राष्ट्र को मेज़बान राष्ट्र्र घोषित किया जाता है जो कि जीवोग्राफिकल आर्डर पर होता है।विश्व पर्यटन दिवस की थीमहर साल विश्व पर्यटन दिवस अलग अलग थीम के आधार पर मनाया जाता है। साल 2020 में विश्व पर्यटन दिवस की थीम है -पर्यटन और ग्रामीण विकास। इससे बड़े शहरों के बाहर पर्यटन को बढ़ावा देना और दुनिया भर में सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने में पर्यटन की अनूठी भूमिका बनाना है।
- सरस्वती नदी पौराणिक हिन्दू ग्रन्थों तथा ऋग्वेद में वर्णित मुख्य नदियों में से एक है। ऋग्वेद में सरस्वती का अन्नवती तथा उदकवती के रूप में वर्णन आया है। ऋग्वेद के अनुसार सरस्वती नदी को अम्बितम (माताओं में श्रेष्ठ), नदितम (नदियों में श्रेष्ठ) एवं देवितम (देवियों में श्रेष्ठ) नामों से वर्णित किया गया है। सरस्वती नदी को मानवीकृत रूप में देवी सरस्वती का स्वरुप माना जाता था। हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सरस्वती नदी को भगवान् नारायण की पत्नी माना गया है, जो श्राप के कारण पृथ्वी पर अवतरित हुई। यह कहा जाता है कि सरस्वती नदी स्वर्ग में बहने वाली दूधिया नदी है, जिसके पृथ्वी पर अवतरित होने के पश्चात यह नदी मानव मात्र के लिए मृत्यु के पश्चात मोक्ष पाने का एक द्वार है।ऋग्वेद के नदी सूत्र के एक मंत्र में सरस्वती नदी को श्यमुना के पूर्वश् और श्सतलुज के पश्चिमश् में बहती हुई बताया गया है, उत्तर वैदिक ग्रंथों, जैसे ताण्डय और जैमिनीय ब्राह्मण में सरस्वती नदी को मरुस्थल में सूखा हुआ वर्णित किया गया है, महाभारत में भी सरस्वती नदी के मरुस्थल में श्विनाशनश् नामक जगह पर विलुप्त होने का वर्णन मिलता है। महाभारत में सरस्वती नदी के प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति, वेदवती आदि कई नाम हैं। महाभारत, वायु पुराण आदि में सरस्वती के विभिन्न पुत्रों के नाम और उनसे जुड़े मिथक प्राप्त होते हैं। महाभारत के शल्य-पर्व, शांति-पर्व, या वायुपुराण में सरस्वती नदी और दधीचि ऋषि के पुत्र सम्बन्धी मिथक थोड़े थोड़े अंतरों से मिलते हैं।संस्कृत महाकवि बाण भट्ट के ग्रन्थ श्हर्षचरितश् में दिए गए वर्णन के अनुसार एक बार बारह वर्ष तक वर्षा न होने के कारण ऋषिगण सरस्वती का क्षेत्र त्याग कर इधर-उधर हो गए, परन्तु माता के आदेश पर सरस्वती-पुत्र, सारस्वतेय वहां से कहीं नहीं गया। फिर सुकाल होने पर जब तक वे ऋषि वापस लौटे तो वे सब वेद आदि भूल चुके थे। उनके आग्रह का मान रखते हुए सारस्वतेय ने उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार किया और पुन: श्रुतियों का पाठ करवाया। अश्वघोष ने अपने बुद्धचरितश्काव्य में भी इसी कथा का वर्णन किया है।यह कहा जाता है कि सरस्वती नदी प्राचीन काल में सर्वदा जल से भरी रहती थी और इसके किनारे अन्न की प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होता थो। यह नदी पंजाब में सिरमूर राज्य के पर्वतीय भाग से निकलकर अंबाला तथा कुरुक्षेत्र होती हुई कर्नाल जिला और पटियाला राज्य में प्रविष्ट होकर सिरसा जिले की दृशद्वती (कांगार) नदी में मिल गई थी। यह कहा जाता है कि प्रयाग के निकट तक आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर त्रिवेणी बन गई थी। कालांतर में यह इन सब स्थानों से तिरोहित हो गई, फिर भी लोगों की धारणा है कि प्रयाग में वह अब भी अंतरूसलिला होकर बहती है। मनुसंहिता से स्पष्ट है कि सरस्वती और दृषद्वती के बीच का भू-भाग ही ब्रह्मावर्त कहलाता था। इस नदी को घघ्घर, रक्षी, चित्तग नामों से भी जाना जाता है।---
- गुजरात की गढ़वाली पूर्व राजधानी, पाटन एक ऐसा शहर है जिसकी स्थापना 745 ईस्वी में की गई थी। तत्कालीन राजा वनराज चावड़ा द्वारा निर्मित यह पुरातन ऐतिहासिक शहर अपनी उत्कृष्ट ऐतिहासिक सम्पदाओं और प्राकृतिक भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। अपनी उत्कृष्ट प्राचीन वास्तुकला और प्राचीन सौंदर्य के लिए मशहूर पाटन में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल मौजूद हैं। ये स्थल इतिहास और एडवेंचर प्रेमी दोनों के लिए ही महत्वपूर्ण हैं।यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में हैं सहस्त्रलिंग तलाब, जो शहर के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित है। यह सरस्वती नदी के तट पर कृत्रिम रूप से निर्मित एक टैंक है। गुजरात के महान शासक सिद्धराज जयसिंह द्वारा निर्मित यह पानी की टंकी अब सूखी है और इसके बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। बताया जाता है कि तलाव जैस्मीन ओडेन नामक एक महिला द्वारा शापित है जिसने सिद्धराज जयसिंह से शादी करने से इनकार कर दिया था। इस पंचकोणीय पानी की टंकी में लगभग 42 लाख 6 हजार 500 क्यूबिक मीटर पानी रखने की क्षमता है और इससे लगभग 17 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए सिंचाई हो सकती है। ये टैंक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है एवं इस स्थल पर भगवान शिव को समर्पित असंख्य मंदिरों के खंडहर मौजूद हैं।इसी तरह पाटन में रानी के वाव को देश की सबसे सुंदर और जटिल नक्काशीदार बावड़ी में से एक माना जाता है। ये बावड़ी शिल्प कौशल की प्रतिभा का एक अद्भुत नमूना है एवं इसे भूमिगत वास्तुकला के एक महान उदाहरण के रूप में जाना जाता है। सोलंकी राजवंश की रानी उदयमती द्वारा निर्मित इस बावड़ी की दीवारें भगवान गणेश और अन्य हिंदू देवताओं की जटिल विस्तृत मूर्तियों से सजी हुई हैं। ये बावड़ी वास्तुकला से सजी की एक उत्कृष्ट कृति है और इसकी दीवारों पर शानदार नक्काशी की गई है।पाटन शहर में सौ से अधिक जैन मंदिर हैं। सोलंकी युग के इन मंदिरों में से एक सबसे महत्वपूर्ण पंचसारा पाश्र्वनाथ जैन दरेसर है, जो भव्यता और बेहतरीन शिल्प कौशल का प्रतीक है। इस पूरे मंदिर को पत्थर से बनाया गया है और इसका प्राचीन सफेद संगमरमर का फर्श इसकी भव्यता को और अधिक बढ़ा देता है।1886 से 1890 के आसपास निर्मित खान सरोवर को गुजरात के तत्कालीन गवर्नर खान मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका द्वारा कृत्रिम रूप से बनवाया गया था। कई इमारतों और संरचनाओं के खंडहरों के पत्थरों से निर्मित यह पानी की टंकी एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई है और इसकी ऊंचाई 1273 फीट से लेकर 1228 फीट तक है। टैंक के चारों तरफ पत्थर की सीढिय़ां हैं और असाधारण चिनाई से खान सरोवर को अलग किया गया है।----
- पांचाल पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली, बदायूं और फर्रूख़ाबाद जि़लों से परिवृत प्रदेश का प्राचीन नाम ही पांचाल है। यह कानपुर से वाराणसी के बीच के गंगा के मैदान में फैला हुआ था। इसकी भी दो शाखाएं थीं- पहली शाखा उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र थी तथा, दूसरी शाखा दक्षिण पांचाल की राजधानी कांपिल्य थी।पांडवों की पत्नी, द्रौपदी को पांचाल की राजकुमारी होने के कारण पांचाली भी कहा गया। सर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम के अनुसार वर्तमान रुहेलखंड उत्तर पंचाल और दोआबा दक्षिण पंचाल था। कनिंघम ब्रिटिश सेना के बंगाल इंजीनियर ग्रुप में इंजीनियर थे जो बाद में भारतीय पुरातत्व, ऐतिहासिक भूगोल तथा इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान् के रूप में प्रसिद्ध हुए। बात करें पांचाल की तो, संहितोपनिषद ब्राह्मण में पंचाल के प्राच्य पंचाल भाग (पूर्वी भाग) का भी उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण में पंचाल की परिवका या परिचका नामक नगरी का उल्लेेख है जो वेबर के अनुसार महाभारत की एकचका है।कुछ विद्वानों के अनुसार पंाचाल पंच प्राचीन कुलों का सामूहिक नाम था। वे ये थे— किवि, केशी, सृंजय, तुर्वसस,सोमक।ब्रह्मपुराण तथा मत्स्य पुराण में इन्हें मुदगल सृंजय, बृहदिषु, यवीनर और कृमीलाश्व कहा गया है। पंाचालों और कुरु जनपदों में परस्पर लड़ाई-झगड़े चलते रहते थे। महाभारत के आदिपर्व से ज्ञात होता है कि पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन की सहायता से पंाचालराज द्रुपद को हराकर उसके पास केवल दक्षिण पंचाल (जिसकी राजधानी कांपिल्य थी) रहने दिया और उत्तर पंाचाल को हस्तगत कर लिया था। द्रोणाचार्य ने परास्त होने पर कैद में डाले हुए पंाचाल राज द्रुपद से कहा—'मैंने राज्य प्राप्ति के लिए तुम्हारे साथ युद्ध किया है। अब गंगा के उत्तरतटवर्ती प्रदेश का मैं, और दक्षिण तट के तुम राजा होंगेÓ। इस प्रकार महाभारत-काल में पंाचाल, गंगा के उत्तरी और दक्षिण दोनों तटों पर बसा हुआ था। द्रुपद पहले अहिच्छत्र या छत्रवती नगरी में रहते थे। इन्हें जीतने के लिए द्रोण ने कौरवों और पांडवों को पंचाल भेजा थ।महाभारत आदिपर्व के अनुसार द्रौपदी का स्वयंवर कांपिल्य में हुआ था। दक्षिण पंाचाल की सीमा गंगा के दक्षिणी तट से लेकर चंबल या चर्मणवती तक थी। विष्णु पुराण में कुरु-पांचालों को मध्यदेशीय कहा गया है। पंाचाल निवासियों को भीमसेन ने अपनी पूर्व देश की दिग्विजय-यात्रा में अनेक प्रकार से समझा-बुझाकर वश में कर लिया था।----
- पाशुपत, संभवत: शिव को सर्वोच्च शक्ति मानकर उपासना करने वाला सबसे पहला हिंदू संप्रदाय। माना जाता है कि बाद में इस सम्प्रदाय ने असंख्य उपसंप्रदायों को जन्म दिया, जो गुजरात और महाराष्टï्र में कम से कम 12 वीं शताब्दी तक फले-फूले तथा जावा और कंबोडिया भी पहुंचे। इस संप्रदाय ने यह नाम शिव की एक उपाधि पशुपति से लिया है, जिसका अर्थ है पशुओं के देवता, इसका अर्थ बाद में विस्तृत होकर प्राणियों के देवता हो गया।महाभारत में पाशुपत संप्रदाय का उल्लेख है। शिव को ही इस व्यवस्था का प्रथम गुरु माना गया है। बाद के साहित्य, जैसे वायु-पुराण में वर्णित जनश्रुतियों के अनुसार शिव ने स्वयं यह रहस्योद्घाटन किया था कि विष्णु के वासुदेव कृष्ण के रूप में अवतरण के दौरान वह भी प्रकट होंगे। शिव ने संकेत दिया कि वह एक मृत शरीर में प्रविष्टï होंगे और लकुलिन (या नकुलिन अथवा लकुलिश, लकुल का अर्थ है गदा) के रूप में अवतार लेंगे।10 वीं तथा 13 वीं शताब्दी के अभिलेख इस जनश्रुति का समर्थन करते प्रतीत होते हैं, चूंकि उनमें लकुलिन नामक एक उपदेशक का उल्लेख मिलता है, जिनके अनुयायी उन्हें शिव का एक अवतार मानते थे। वासुदेव संप्रदाय की तरह कुछ इतिहासकार पाशुपत के उद्भव को दूसरी शताब्दी ई.पू. का मानते हैं, जबकि अन्य इसके उद्भव की तिथि दूसरी शताब्दी ई. मानते हैं।पाशुपत द्वारा अंगीकृत की गई योग प्रथाओं में दिन में तीन बार शरीर पर राख मलना, ध्यान लगाना और शक्तिशाली शब्द ओम का जाप करना शामिल है। इस विचारधारा की ख्याति को तब धक्का लगा, जब कुछ रहस्यवादी प्रथाओं में अति की जाने लगी।पाशुपत सिद्घांत से दो अतिवादी विचारधाराएं, कालमुख और कापालिक के साथ-साथ एक मध्यम संप्रदाय, शैव (जो सिद्घांत विचारधारा भी कहलाता है) का विकास हुआ। अधिक तार्किक तथा स्वीकार्य शैव से, जिसके विकास से आधुनिक शैववाद का उदय हुआ। भिन्न विशिष्टïता बनाए रखने के लिए पाशुपत तथा अतिवादी संप्रदाय अतिमार्गिक (मार्ग से भटकी हुई विचारधारा) कहलाए।----
- अलकनन्दा नदी को ही पौराणिक विष्णुगंगा नदी कहा जाता है। यह गंगा की सहयोगी नदी हैं। यह गंगा के चार नामों में से एक है। चार धामों में गंगा के कई रूप और नाम हैं। गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है, केदारनाथ में मंदाकिनी और बद्रीनाथ में अलकनन्दा। यह उत्तराखंड में शतपथ और भगीरथ खड़क नामक हिमनदों से निकलती है। यह स्थान गंगोत्री कहलाता है।अलकनंदा नदी घाटी में लगभग 229 किमी तक बहती है। देव प्रयाग या विष्णु प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और इसके बाद अलकनंदा नाम समाप्त होकर केवल गंगा नाम रह जाता है। अलकनंदा चमोली टेहरी और पौड़ी जिलों से होकर गुजऱती है। गंगा के पानी में इसका योगदान भागीरथी से अधिक है। हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ अलकनंदा के तट पर ही बसा हुआ है। राफ्टिंग इत्यादि साहसिक नौका खेलों के लिए यह नदी बहुत लोकप्रिय है। तिब्बत की सीमा के पास केशवप्रयाग स्थान पर यह आधुनिक सरस्वती नदी से मिलती है। केशवप्रयाग बद्रीनाथ से कुछ ऊंचाई पर स्थित है।उत्तराखंड के चार धामों में गंगा की कई धाराएं उद्गमित होती हैं। गंगोत्री से उद्गमित होने वाली गंगा की धारा को भागीरथी, केदारनाथ से उद्गमित होने वाली धारा को मंदाकिनी और बद्रीनाथ से उद्गमित होने वाली धारा को अलकनंदा के नाम से जाना जाता है। अलकनंदा नदी का पौराणिक नाम विष्णुगंगा है। वास्तव में अलकनंदा नदी देवप्रयाग में भागीरथी से संगम के पश्चात ये दोनों नदियां गंगा में परिवर्तित होती हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में भागीरथी एवं अलकनंदा नदियों को क्रमश: सास-बहू के रूप में जाना जाता है। अपने कोलाहल भरे प्रवाह के कारण भागीरथी नदी सास एवं अलकनंदा नदी को बहू के रूप में प्रसिद्ध हैं। अपने उदगम से भागीरथी में संगम तक अलकनंदा नदी में पांच विभिन्न नदियां मिलती हैं जिसके कारण उत्तराखंड में इस क्षेत्र को पंच प्रयाग कहा जाता है। प्रयाग उस स्थल को कहते है जहां दो नदियों का संगम होता है। उत्तराखंड के पंच प्रयाग क्षेत्र में अलकनंदा नदी में विभिन्न स्थलों पर क्रमश: विष्णुगंगा, नंदाकिनी, पिंडर, मंदाकिनी, एवं भागीरथी नदियों का संगम होता है। इन स्थलों को क्रमश: विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग एवं देवप्रयाग के नाम से जाना जाता है। अलकनंदा नदी का उद्गम सतोपंथ हिमनद है।अलकनंदा की पांच सहायक नदियां हैं जो गढ़वाल क्षेत्र में 5 अलग-अलग स्थानों पर अलकनंदा से मिलकर पंच प्रयाग बनाती हैं, जो हैं-1. विष्णु प्रयाग जहां धौली गंगा अलकनंदा से मिलती है।2. नंद प्रयाग जहां नंदाकिनी अलकनंदा से मिलती है।3. कर्ण प्रयाग जहां पिंडारी अलकनंदा से मिलती है।4. रूद्र प्रयाग जहां मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती है।5. देव प्रयाग जहां भागीरथी अलकनंदा से मिलती है।---
- चक्रवर्ती एक संस्कृत शब्द है। विश्व शासक की प्राचीन भारतीय अवधारणा है, जो संस्कृत के चक्र, यानी पहिया और वर्ती यानी घूमता हुआ, से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार, चक्रवर्ती को ऐसा शासक माना जा सकता है, जिसके रथ का पहिया हर समय घूमता हो या जिसकी गति को कोई रोक नहीं सके। पहिए के घूमने को धार्मिकता और नैतिक सत्ता के चक्र धर्म से भी जोड़ा जा सकता है, जैसा बौद्ध धर्म में होता है। बुद्ध का सारनाथ का उपदेश विधि का घूमता हुआ चक्र है और एक चक्रवर्ती से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राज्य में सदाचारिता या धार्मिकता के चक्र का घूर्णन सुनिश्चित करेगा।बौद्ध और जैन स्रोतों में तीन प्रकार के धर्मनिरपेक्ष चक्रवर्तियों का उल्लेख मिलता है-1. चक्रवाल चक्रवर्ती-प्राचीन भारतीय सृष्टिशास्त्र में वर्णित सभी चार महाद्वीपों पर राज करने वाला राजा।2. दीप चक्रवर्ती- सिर्फ एक महाद्वीप पर राज करने वाला राजा, जो पहले वाले से कम शक्तिशाली होता है।3. प्रदेश चक्रवर्ती- एक महाद्वीप के किसी हिस्से के लोगों पर शासन करने वाला राजा, जो स्थानीय राजा के समकक्ष होता है।चक्रवाल चक्रवर्ती, की उपाधि ग्रहण करने वाले सबसे पहले सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) थे। अशोक ने अपने अभिलेखों में चक्रवर्ती उपाधि का उल्लेख नहीं किया है। बाद के साहित्य में उनका इस रूप में वर्णन जरूर मिलता है। उस काल के बौद्ध और जैन दार्शनिकों ने चक्रवाल चक्रवर्ती की अवधारणा को सदाचारी और नैतिक कानूनों को बनाए रखने वाले राजा के साथ जोड़ा दिया। धर्मनिपेक्षता मेें चक्रवर्ती को बुद्ध के समकक्ष माना जाता है। उन्हें बुद्ध के समान ही कई गुणों से जोड़ा जाता है।भारत में चक्रवर्ती एक सरनेम भी है।---
- बन उड़द को हिन्दी में जंगली उड़द, मषवन, माषोनी, संस्कृत में माषपर्णी, सूर्यपर्णी, कांबोजी, हय पुच्छिका, मराठी में रान उड़द, गुजराती में जंगली उड़द, बंगाली में भाषानी बनकलई, लैटिन में टिरेनन्स लेबिएलिस कहा जाता है।बन उड़द एक प्रकार का औषधीय पौधा है। गुण में यह चिकना, तीखा, मधुर, शीतल वात-पित्तशामक, कफवद्र्धक, उत्तेजक, स्नेहन, अनुलोमन, ग्राही, रक्तवद्र्धक और शोधक, रक्तपित्तनाशक, सूजन को दूर करने वाला, चेहरे की चमक बढ़ाने वाले, धातुवद्र्धक, जलन को नष्ट करने वाला और जीवनीय होता है। यह अर्दित, लकवा, आमवात, जोड़ों का दर्द आदि वात रोगों में तथा पैत्तिक विकार, पेट दर्द, पेशाब के साथ धातु का जाना और टीबी आदि रोगों में प्रयोग किया जाता है।
- कालमेघ एक बहुवर्षीय शाक जातीय औषधीय पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम एंडोग्रेफिस पैनिकुलाटा है। कालमेघ की पत्तियों में कालमेघीन नामक उपक्षार पाया जाता है, जिसका औषधीय महत्व है। यह पौधा भारत एवं श्रीलंका का मूल निवासी है तथा दक्षिण एशिया में व्यापक रूप से इसकी खेती की जाती है। इसका तना सीधा होता है जिसमें चार शाखाएं निकलती हैं और प्रत्येक शाखा फिर चार शाखाओं में फूटती हैं। इस पौधे की पत्तियाँ हरी एवं साधारण होती हैं। इसके फूल का रंग गुलाबी होता है। इसके पौधे को बीज द्वारा तैयार किया जाता है जिसको मई-जून में नर्सरी डालकर या खेत में छिड़ककर तैयार करते हैं। यह पौधा छोटे कद वाला शाकीय छायायुक्त स्थानों पर अधिक होता है। पौधे की छंटाई फूल आने की अवस्था अगस्त-नवम्बर में की जाती है। बीज के लिये फरवरी-मार्च में पौधों की कटाई करते है। पौधों को काटकर तथा सुखाकर बिक्री की जाती है7 औसतन 300-400 कि शाकीय हरा भाग (60-80 किग्रा सूखा शाकीय भाग) प्रति हेक्टेयर मिल जाती है।भारतीय चिकित्सा पद्वति में कालमेघ एक दिव्य गुणकारी औषधीय पौधा है जिसको हरा चिरायता, बेलवेन, किरयित् के नामों से भी जाना जाता है। भारत में यह पौधा पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश में अधिक पाया जाता है। इसका स्वाद कड़वा होता है, जिसमें एक प्रकार क्षारीय तत्व-एन्ड्रोग्राफोलाइडस, कालमेघिन पायी जाती है जिसके पत्तियों का उपयोग ज्वर नाशक, जांडिस, पेचिस, सिरदर्द कृमिनाशक, रक्तशोधक, विषनाशक तथा अन्य पेट की बीमारियों में बहुत ही लाभकारी पाया गया है। कालमेघ का उपयोग मलेरिया, ब्रोंकाइटिस रोगो में किया जाता है। इसका उपयोग यकृत सम्बन्धी रोगों को दूर करने में होता है। इसकी जड़ का उपयोग भूख लगने वाली औषधि के रूप में भी होता है। कालमेघ का उपयोग पेट में गैस, अपच, पेट में कृमि आदि को दूर करता है। इसका रस पित्तनाशक है। यह रक्तविकार सम्बन्धी रोगों के उपचार में भी लाभदायक है। सरसों के तेल में मिलाकार एक प्रकार का मलहम तैयार किया जाता है जो चर्म रोग जैसे दाद, खुजली इत्यादि दूर करने में बहुत उपयोगी होता है। चिली में किए गए एक प्रयोग में यह पाया गया कि सर्दी के कारण बहती नाक वाले रोगियों को कालमेघ का रस दिये जाने पर उसकी सर्दी ठीक हो गई। इंडियन ड्रग इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है कि कालमेघ में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता पाई जाती है और यह मलेरिया और अन्य प्रकार के बुखार के लिए रामबाण दवा है। इसके नियमित सेवन से रक्त शुद्ध होता है तथा पेट की बीमारियां नहीं होतीं। यह लीवर यानी यकृत के लिए एक तरह से शक्तिवर्धक का कार्य करता है। इसका सेवन करने से एसिडिटी, वात रोग और चर्मरोग नहीं होते।
- राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने वरिष्ठ अभिनेता परेश रावल को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया है। वर्ष 1959 में स्थापित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित एक पूरी तरह से स्वायत्त संगठन है। एनएसडी दुनिया में चार सबसे अग्रणी थिएटर प्रशिक्षण संस्थानों में से एक है, संगीत नाटक अकादमी के तत्वाधान में इसकी स्थापना हुई थी और यह 1975 में एक स्वतंत्र संस्था बनी। यह थिएटर के विभिन्न स्वरूपों में 3 वर्षीय पूर्णकालिक, आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की पेशकश करता है।संस्थान के पूर्व छात्रों और संकाय सदस्यों की उल्लेखनीय सूची यह सुनिश्चित करती है कि संस्था प्रदर्शन कला के क्षेत्र में शीर्ष पर बनी हुई है। इस प्रतिष्ठित संस्थान से उत्तीर्ण अनेक थियेटर कार्मिकों जैसे नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, मंच और लाईट डिजाइनर और संगीत निर्देशकों ने भारतीय थियेटर को समृद्ध किया है और यह कार्य अभी भी जारी है। रंगमंच के अलावा, एनएसडी के पूर्व छात्रों की कलात्मक अभिव्यक्तियों ने हमेशा अन्य मीडिया में भी अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। एनएसडी के दो परफॉर्मिग विभाग हैं- रेपर्टोरी कंपनी और थियेटर इन एजुकेशन कंपनी (टीआईई) जो क्रमश: 1964 और 1989 में प्रारंभ हुए थे। ऑउटरीच कार्यक्रम के तहत एनएसडी नई दिल्ली के साथ चार केंद्र वाराणसी, गंगटोक, अगरतला और बेंगलूरु में भी स्थापित किए गए हैं।
- गुप्त रूप से राजनीतिक या अन्य प्रकार की सूचना देने वाले व्यक्ति को गुप्तचर या जासूस कहते हैं। गुप्तचर अति प्राचीन काल से ही शासन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता माना जाता रहा है। भारतवर्ष में गुप्तचरों का उल्लेख मनुस्मृति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में गुप्तचरों के उपयोग और उनकी श्रेणियों का विशद वर्णन किया है। राज्याधिपति को राज्य के अधिकारियों और जनता की गतिविधियों एवं समीपवर्ती शासकों की नीतियों के संबंध में सूचनाएं देने का महत्वपूर्ण कार्य उनके गुप्तचरों द्वारा संपन्न होता था। रामायण में वर्णित दुर्मुख ऐसा ही एक गुप्तचर था जिसने लंका प्रवास के बाद श्री रामचंद्र को सीता के विषय में जानकारी दी थी।अर्थशास्त्र में उल्लेख है कि राजा के पास विश्वासपात्र गुप्तचरों का समुदाय होना चाहिए और इन गुप्तचरों को योग्य एवं विश्वस्त मंत्रियों के निर्देशन में काम करना चाहिए। अर्थशास्त्र में समष्ट एवं संचार नामक दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है। समष्ट कोटि के गुप्तचर स्थानीय सूचनाएं देते थे और संचार कोटि के गुपतचर विभिन्न स्थानों का परिभ्रमण करके सूचनाएं एकत्र करते थे। समष्ट कोटि के गुप्तचरों के अनेक प्रकार होते थे, यथा कापातिक, उष्ठित, गृहपतिक, वैदाहक तथा तापस। संचार नामक गुप्तचर में सत्रितिक्ष्ण, राशद एवं स्त्री गुप्तचर जैसे भिक्षुकी, परिव्राजिका, मुंड, विशाली भी होती थीं। चंद्रगुप्त मौर्य के युग में सुदूर स्थित अधिकारियों पर नियंत्रण करने के लिए गुप्त संवाददाता एवं भ्रमणशील निर्णायकों का उपयोग किया जाता था। ये संवाददाता अथवा निर्णायक उन अधिकारियों के कार्यकलापों का निरीक्षण एवं मूल्यांकन करते थे और राजा को इस संबंध में गुप्त रूप से सूचनाएं भेजते थे। हिंदूकाल में इस प्रकार के गुप्तचरों का वर्ग अशोक के काल तक सुचारु रूप से कार्य करता रहा। उसके बाद भी शासन में गुप्तचरों का महत्व बना रहा। इन गुप्तचरों का पद राज्य के अत्यंत विश्वासपात्र व्यक्तियों को ही दिया जाता था। गुप्तचरों का उपयोग संगठित रूप से और विस्तृत पैमाने पर मुस्लिम और मुगलकाल में नहीं हुआ। वर्तमान समय में राजनीतिक प्रयोजनों के निमित्त देश के भीतर और बाहर गुप्तचरों का प्रयोग एक सर्वमान्य राजनीतिक धारणा है।-----
- हींग (Asafoetida) का उपयोग आमतौर पर दाल-सब्जी में डालने के लिए किया जाता है। इसलिए इसे बघारनी के नाम से भी जाना जाता है। हींग फेरूला फोइटिस नामक पौधे का चिकना रस है। इसका पौधा 60 से 90 सेमी तक ऊंचा होता है। ये पौधे -ईरान, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, ब्लूचिस्तान , काबुल और खुरासन के पहाड़ी इलाकों में अधिक होते हैं। हींग के पत्तों और छाल में हलकी चोट देने से दूध निकलता है। यहीं दूध सूखकर गोंद बनता है उसे निकालकर पत्तों या खाल में भरकर सुखाया लिया जाता है। सूखने के बाद इसे हींग के नाम से जाना जाता है। वैद्य जो हींग उपयोग में लाते हैं, वह हीरा हींग होती है और यही सबसे अच्छी होती है।हमारे देश में हींग की बड़ी खपत होती है। हींग बहुत से रोगों को खत्म करती है। वैद्यों का कहना है कि हींग का उपयोग लाने से पहले उसे सेंक लना चाहिए। चार प्रकार की हींग बाजारों में पाई जाती है जैसे कन्धारी, हींग, यूरोपीय वाणिज्य हींग, भारतवर्षीय हींग और वापिंड हींग।हींग का रंग सफेद , हल्का और पीला, और सुरखी मायल जैसा होता है। इसका स्वाद खाने में कडुवा और गंध से भरा होता है। हींग गर्म और खुश्क होती है। यह गर्म दिमाग और गर्म मिजाज वालों को नुकसान पहुंचा सकती है। कतीरा और बनफ्सा हींग में दोषों को दूर करते हैं। हींग की तुलना सिकंजीव से की जा सकती है।हींग पुट्ठे और दिमाग की बीमारियों को खत्म करती है जैसे मिर्गी, फालिज और लकवा आदि। वैद्यों के अनुसार हींग आंखों की बीमारियों में फायदा पहुंचाती है। खाने को हजम करती है और भूख को बढ़ा देती है। यह शरीर में गरर्मी पैदा करती है और आवाज को साफ करती है। हींग का लेप घी या तेल के साथ चोट पर करने से लाभ होता है। हींग को कान में डालने से कान में आवाज का गूंजना और बहरापन दूर होता है। हींग जहर को भी खत्म करती है। हवा से लगने वाली बीमारी को भी यह मिटाती है। हींग गर्म, हलकी और पाचक है। यह कफ और वात को खत्म करती है। हींग श्वास की बीमारी और खांसी का नाश करती है। इसलिए हींग को वैद्य एक गुणकारी औषधि भी मानते हैं।
- सिद्ध चिकित्सा के वैज्ञानिक आधार का लम्बा और विविध इतिहास है। परम्परा के अनुसार यह द्रविड़ संस्कृति द्वारा विकसित सबसे पुरानी परम्परागत उपचार विधि है। ताड़ के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियों में बताया गया है कि भगवान शिव ने सबसे पहले अपनी पत्नी पार्वती को इसके बारे में बताया था। पार्वती ने यह ज्ञान अपने पुत्र मुरुग को दिया। उसने यह सारा ज्ञान अपने प्रमुख शिष्य अगस्त्य को दिया। अगस्त्य ऋषि ने 18 सिद्धों को इसके बारे में बताया और उन्होंने इस ज्ञान का लोगों में प्रचार किया।सिद्ध शब्द हिन्दी के शब्द सिद्धि से बना है, जिसका मोटे तौर पर अर्थ है- विशेष योग्यता की प्राप्ति। सिद्धि को उन 8 अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति के साथ भी जोड़ा जाता है, जो मानवीय प्रयासों के अंतिम लक्ष्य का एक हिस्सा हैं। जिन लोगों ने उपरोक्त शक्तियों को प्राप्त किया, उन्हें सिद्ध कहा जाता है। प्राचीन काल में 18 महत्वपूर्ण सिद्ध थे, जिन्होंने सिद्ध चिकित्सा पद्धति को विकसित किया। ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि प्रमुख सिद्ध 18 थे। अगस्त्य ऋषि को सिद्ध चिकित्सा का जनक माना जाता है। सिद्धों का सिद्धांत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का विकास हो सकता है। इसलिए उन्होंने ऐसी विधियां और औषधियां विकसित कीं, जिनसे शरीर पुष्ट होता है और आत्मा को पुष्टि मिलती है।सिद्ध पद्धति की पांडुलिपियों से पता चलता है कि 18 सिद्धों की शिक्षाओं से एक संयुक्त चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ। आज सरकारी विश्वविद्यालयों के अंतर्गत मान्यता प्राप्त सिद्ध मेडिकल कॉलेज हैं, जहां सिद्ध चिकित्सा के बारे में पढ़ाया जाता है। सिद्ध चिकित्सा की औषधि का मतलब है परिपूर्ण औषधि। सिद्ध चिकित्सा शरीर के रोगी अवयवों को फिर से जीवंत और सक्रिय करने में कुशलता का दावा करती है। यह चिकित्सा मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक तीन महत्वपूर्ण अंशों- वात, पित्त और कफ़ के अनुपात में भी उचित संतुलन बनाने का दावा करती है।आमतौर पर सिद्ध चिकित्सा के मूल सिद्धांत अन्य भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान - आयुर्वेद जैसे हैं। केवल मात्र अंतर यही है कि सिद्ध चिकित्सा, बाल अवस्था, प्रौढ़ अवस्था और वृद्ध अवस्था में क्रमश: वात, पित्त और कफ़ की प्रमुखता को मान्यता देती है, जबकि आयुर्वेद में यह इसके पूरी तरह उलट है, यानी आयुर्वेद में बाल अवस्था में कफ़, वृद्ध अवस्था में वात और प्रौढ़ अवस्था में पित्त की प्रमुखता को माना जाता है।
- युद्ध में टैंकों का इस्तेमाल आज आम बात है। अपने निर्माण के 105 साल के सफर में टैंक की तकनीक में समय के साथ काफी सुधार आया है। दुनिया का सबसे पहला युद्धक टैंक 1915 में बना था। यह टैंक ब्रिटेन ने बनाया था। लिटिल विलि नाम का यह टैंक सिर्फ नाम का ही छोटा नहीं था। इस टैंक का वजन 14 टन के आसपास था और अपने टेस्ट रन के दौरान यह कई बार गड्ढों में फंसा, उबड़ खाबड़ सतह पर बमुश्किल ही चल पाया। मगर आगे चलकर इसी प्रोटोटाइप में काफी सुधार किए गए और फिर इन्हें युद्ध के मैदान में उतारने लायक बनाया गया। 1918 में सामने आए सुधरे हुए मॉडल को बिग विलि कहा गया। मार्क वन नाम के टैंक का पहला इस्तेमाल फ्रांस में किया गया। दूसरे विश्व युद्ध में टैंकों का खूब इस्तेमाल हुआ।ब्रिटेन को टैंक बनाने की प्रेरणा पहले विश्व युद्ध के ट्रेंच वॉर से मिली। 1914 में ब्रिटिश आर्मी के कर्नल अर्नेस्ट स्विंटन और विलियम हैंके ने सबसे पहले एक ऐसे युद्धक वाहन की परिकल्पना पेश की जिसके पहियों पर कन्वेयर बेल्ट जैसी संरचना हो। शुरुआत में इसे लैंड बोट मॉडल कहा गया। दुश्मनों से इस तरह के वाहन के विकास की प्रक्रिया को गुप्त रखने के लिए यह बताया गया कि युद्ध के मैदान में पानी पहुंचाने के लिए एक टंकी वाला वाहन बनाया जा रहा है। इसी कारण नया वाहन टैंक के नाम से जाना गया।-----
- हिन्दू ग्रंथों में युद्ध के लिए विभिन्न प्रकार की व्यूह रचना रची जाती थी, ताकि शत्रुओं को चारों ओर से घेर कर परास्त किया जा सके और शत्रु उनकी व्यूह को समझ भी न पाए। इस प्रकार के व्यूह रचना का उल्लेख मुख्य रूप से महाभारत के युद्ध में मिलता है। इसमें प्रमुख व्यूह रचना है-अर्धचन्द्र व्यूह- कौरवों के गरुड़ व्यूह का मुकाबला करने के लिए महाभारत युद्ध के तीसरे दिन पांडु पुत्र अर्जुन ने अर्धचन्द्र व्यूह की रचना की थी। इसमें आधे चंद्रमा के आकार में सेना सज्जित होकर युद्ध किया करती थीं।चक्र व्यूह- यह व्यूह सबसे विख्यात है। गुरु द्रोण ने युद्ध के तेरहवें दिन इस व्यूह की रचना की थी। इस व्यूह को अर्जुन ही भेदना जानते थे। अर्जुन पुत्र अभिमन्यु इसे भेद तो सकते थे, लेकिन वहां से बाहर निकलने का रास्ता उन्हें पता नहीं था। कौरवों ने इसी बात का फायदा उठाया और अभिमन्यु को इसी चक्रव्यूह में फंसा कर उसकी हत्या कर दी।क्रौंच व्यूह- महाभारत युद्ध के दूसरे दिन युधिष्ठिर ने दृष्टद्युम्न को इस व्यूह के अनुसार सेना को सजाने का सुझाव दिया था। उड़ते हुए क्रौंच पक्षी की तरह ही इसमें सेनाओं को सुसज्जित किया गया था।मंडल व्यूह- भीष्म पितामह ने युद्ध के सातवें दिन कौरव सेना को इस व्यूह के अनुसार सजाया था। इस व्यूह के बीच में भीष्म खुद खड़े हुए थे।चक्रशकट व्यूह- युद्ध के चौदहवें दिन द्रोण ने जयद्रथ को अर्जुन के हाथों मारे जाने से बचाने के लिए इस व्यूह की रचना की थी, लेकिन वे जयद्रथ को बचा नहीं पाए। इसमें एक चक्र होता था जिसकी शुरुआत हाथी सवारों से होती थी।वज्र व्यूह- महाभारत युद्ध के पहले दिन अर्जुन ने पांडव सेना को इस व्यूह के अनुसार सजाया था। इसमें सेनाएं आयताकार में फैली होती थीं और उसके बीच में मुख्य योद्धा युद्ध लड़ता था।
- शल्लकी एक प्रकार की औषधि है। सदियों से आयुर्वेद के चिकित्सक जोड़ों के दर्द की चिकित्सा में इसका प्रयोग कराते आ रहे हैं । बोस्वेलीया सीराटा के नाम से प्रचलित यह वनस्पति अंग्रेजी दवाओं मैं पेन-किलर्स का एक बेहतर विकल्प है। इस वनस्पति के अच्छे प्रभाव संधिवात (ओस्टीयोआर्थ्रराईटीस) एवं रयूमेटाइडआर्थराईटीस जैसे घुटनों के सूजन की अनेक अवस्थाओं में कारगर साबित हुए हैं। राजस्थान,मध्यप्रदेश एवं आंध्रप्रदेश में शलाई के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा अपने सक्रिय तत्व बोस्वेलिक एसिड के कारण वैज्ञानिकों की नजऱों में आया है ।यह प्राथमिक एवं सेकेंडरी स्तर के ब्रेन ट्यूमर में भी प्रभावी पाई गई है। शल्लकी में पाया जानेवाला सक्रिय तत्व जिसे ए.के.बी.ए.नाम दिया गया ,आस्टीयोआर्थ्रायटीस से जूझ रहे रोगियों के लिए एक अच्छा विकल्प है । ब्रिटिश विशेषज्ञ भी इस बात को मानते हंै कि आस्टीयोआर्थ्रायटीस के रोगियों के लिए एक सुरक्षित दर्द निवारक औषधि की जरूरत है ,क्योंकि वर्तमान में उपलब्ध दर्द एवं सूजन सहित मांसपेशियों को रिलेक्स करने वाली औषधियां दुष्प्रभाव के कारण भी जानी जा रही हैं। अभी इस वनस्पति पर और भी अधिक शोध किये जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इसे कोलाईटीस, ब्रोंकाईटीस सहित अनेक सूजन प्रधान व्याधियों में प्रभावी पाया है ।
- सदाबहार पुष्प एक औषधीय पौधा भी है, जिसे सदाफूली, नयनतारा नामों से भी जाना जाता है। सदाबहार की कुल आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती हैं। सदाबहार का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है। भारत में पाई जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है। यह फूल न केवल सुन्दर और आकर्षक है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर माना गया है। इसे कई देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।सदाबहार बारहों महीने खिलने वाला फूल है। तेज ठंड के कुछ दिनों को छोड़कर यह पूरे वर्ष खूब खिलता है। सदाबहार को भारत की किसी भी उष्ण जगह की शोभा बढ़ाते हुए सालों साल बारह महीने देखे जा सकते हैं। फूल तोड़कर रख देने पर भी पूरा दिन ताजा रहता है। मंदिरों में पूजा पर चढ़ाए जाने में इसका उपयोग खूब होता है। यह फूल सुंदर तो है ही आसानी से हर मौसम में उगता है, हर रंग में खिलता है और इसके गुणों का भी कोई जवाब नहीं, शायद यही सब देखकर नेशनल गार्डेन ब्यूरो ने सन् 2002 को इयर आफ़ विंका के लिए चुना। विंका या विंकारोज़ा सदाबहार का अंग्रेज़ी नाम है।पांच पंखुडिय़ों वाला सदाबहार पुष्प श्वेत, गुलाबी, फालसाई, जामुनी आदि रंगों में खिलता है। अब यूरोप, भारत, चीन और अमेरिका के अनेक देशों में इस पौधे की खेती होने लगी है। पूरे भारत और संभवत: एशिया के पाँचों महाद्वीपों में पाया जाने वाला यह अत्यंत दृढ़ प्रकृति व क्षमता वाला पौधा है, जो खूब मजे से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में खिलता व लोकप्रिय है।अनेक देशों में इसे खांसी, गले की खऱाश और फेफड़ों के संक्रमण की चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाता है। सबसे रोचक बात यह है कि इसे मधुमेह के उपचार में भी उपयोगी पाया गया है। आयुर्वेद में स्कर्वी, अतिसार, गले में दर्द, टांसिल्स में सूजन, रक्तस्नव आदि रोगों में इसके प्रयोग के विषय में लिखा गया है। भारत में प्राकृतिक चिकित्सक मधुमेह रोगियों को इसके श्वेत फूल का प्रयोग सुबह ख़ाली पेट करने की सलाह देते हैं। इसमें दो सक्रिय यौगिक होते हैं एल्कलॉइड और टैनिन। कहा जाता है इस पौधे में करीब 100 से ज्यादा अल्कलॉइड पाया जाता है जो काफी फायदेमंद होता है।
- 1. वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्य थे। आर्यों का आरंभिक जीवन मुख्यत: पशुचारण था। वैदिक सभ्यता मूलत: ग्रामीण थी।2. वैदिक सभ्यता की जानकारी के स्रोत वेद हैं। इसलिए इसे वैदिक सभ्यता के नाम से जाना जाता है।3. आर्यों ने ऋग्वेद की रचना की, जिसे मानव जाति का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है। ऋग्वेद द्वारा जिस काल का विवरण प्राप्त होता है उसे ऋग्वेद वैदिक काल कहा जाता है।4. ऋग्वेद भारत-यूरोपीय भाषाओं का सबसे पुराना निदर्श है। इसमें अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण, आदि देवताओं की स्तुतियां संगृहित हैं।5. वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्यों का भारत आगमन लगभग 1500 ई.पू. के आस-पास हुआ। हालाँकि उनके आगमन का कोई ठोस और स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।6. आर्यों के मूल निवास के सन्दर्भ में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किये हैं।7. अस्तों मा सद्गमय वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।8. अधिकांश विद्वान् प्रो. मैक्समूलर के विचारों से सहमत हैं कि आर्य मूल रूप से मध्य एशिया के निवासी थे।9. ऋग्वेद में नदियों का उल्लेख मिलता है। नदियों से आर्यों के भौगोलिक विस्तार का पता चलता है।10. भारत में आर्य सर्वप्रथम सप्तसैंधव प्रदेश में आकर बसे इस प्रदेश में प्रवाहित होने वाली सैट नदियों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।11. ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्वपूर्ण नदी सिन्धु का वर्णन कई बार आया है। ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का तीन बार उल्लेख मिलता है।12. ऋग्वेद की सबसे पवित्र नदी सरस्वती थी। इसे नदीतमा (नदियों की प्रमुख) कहा गया है।13. सप्तसैंधव प्रदेश के बाद आर्यों ने कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेशों पर भी कब्ज़ा कर लिया, उस क्षेत्र को 'ब्रह्मवर्तÓ कहा जाने लगा। यह क्षेत्र सरस्वती व दृशद्वती नदियों के बीच पड़ता है।14. गंगा एवं यमुना के दोआब क्षेत्र एवं उसके सीमावर्ती क्षेत्रो पर भी आर्यों ने कब्ज़ा कर लिया, जिसे 'ब्रह्मर्षि देशÓ कहा गया।15. आर्यों ने हिमालय और विन्ध्याचल पर्वतों के बीच के क्षेत्र पर कब्ज़ा करके उस क्षेत्र का नाम 'मध्य देशÓ रखा।16. कालांतर में आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तर भारत में अपने विस्तार कर लिया, जिसे 'आर्यावर्तÓ कहा जाता था।17. भौगोलिक विस्तार के दौरान आर्यों को भारत के मूल निवासियों, जिन्हें अनार्य कहा गया है से संघर्ष करना पड़ा।18. दशराज्ञ युद्ध में प्रत्येक पक्ष में आर्य एवं अनार्य थे। इसका उल्लेख ऋग्वेद के 10वें मंडल में मिलता है। यह युद्ध रावी (पुरुष्णी) नदी के किनारे लड़ा गया, जिसमे भारत के प्रमुख काबिले के राजा सुदास ने अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित कर भारत कुल की श्रेष्ठता स्थापित की।19. ऋग्वेद में आर्यों के पांच कबीलों का उल्लेख मिलता है- पुरु, युद्ध, तुर्वसु, अजु, प्रह्यु। इन्हें 'पंचजनÓ कहा जाता था।20. ऋग्वैदिक कालीन राजनीतिक व्यवस्था, कबीलाई प्रकार की थी। ऋग्वैदिक लोग जनों या कबीलों में विभाजित थे। प्रत्येक कबीले का एक राजा होता था, जिसे 'गोपÓ कहा जाता था।---
- पवाड़ को पवांर, जकवड़ आदि नामों से पुकारा जाता है। वर्षा ऋतु की पहली फुहार पड़ते ही इसके पौधे खुद उग आते हैं और गर्मी के दिनों में जो-जो जगह सूखकर खाली हो जाती है, वह घास और पवाड़ के पौधे से भरकर हरी-भरी हो जाती है। इसके पत्ते अठन्नी के आकार के और तीन जोड़े वाले होते हैं।विभिन्न भाषाओं में नाम -संस्कृत- चक्रमर्द। हिन्दी-पवाड़, पवांर, चकवड़। मराठी- टाकला। गुजराती- कुवाडिय़ों। बंगला- चाकुन्दा। तेलुगू- तागरिस। तामिल- तगरे। मलयालम- तगर। फरसी- संग सबोया। इंगलिश- ओवल लीव्ड केशिया। लैटिन- केशिया टोरा।यह हलकी, रूखी, मधुर, शीतल, हृदय को हितकारी, तीनों दोषों का शमन करने वाली, श्वास, खांसी, कृमि, खुजली, दाद तथा चर्मरोगनाशक होती है। इसका फल (बीज) कड़वा एवं गरम प्रकृति वाला होता है और कोढ़, विष, वात, गुल्म, कृमि, श्वास इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है।वर्षाकाल में पवाड़ का पौधा अपने आप सब तरफ पैदा हो जाता है। यह दो प्रकार का होता है- चक्र मर्द और कासमर्द। त्वचा पर दाद गोलाकार में होती है अत: दाद को अंग्रेजी में रिंग वार्म कहते हैं। चक्र मर्द नाम का पौधा दाद के गोल-गोल घेरे (चक्र) को नष्ट करता है, इसीलिए इसे संस्कृत में चक्र मर्द यानी चक्र नष्ट करने वाला कहा गया है।चक्रमर्द शब्द का अपभ्रंश नाम ही चकवड़ हो गया। इसके पत्ते मैथी के पत्तों जैसे होते हैं। इसी से मिलता-जुलता एक पौधा और होता है, जिसे कासमर्द या कसौंदी कहते हैं। यह पौधा चक्र मर्द से थोड़ा छोटा होता है और इसकी फलियां पतली व गोल होती हैं। यह खांसी के लिए बहुत गुणकारी होता है, इसलिए इसे कासमर्द यानी कास (खांसी) का शत्रु कहा गया है।ग्रामीणजन तो इसकी कोमल पत्तियों की सब्जी बनाकर खाते हैं और इसे बहुत गुणकारी मानते हैं। इसके बीजों को पीसकर करंजी के तेल में मिलाकर मल्हम बनाकर दाद पर लगाने से दाद ठीक हो जाते हैं। इसकी पतियों को पीसकर लुग्दी बनाकर और पुल्टिस तैयार कर फोड़े पर बांधने से फोड़ा पककर फूट जाता है, चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके पत्तों से बने काढ़े को पीने से पेट साफ होता है, कब्ज दूर होती है और पेट के कीड़े नष्ट होते हैं।
- दुनिया में हर साल 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। नारियल की उपज को बढ़ाने के लिए जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से एशिया-प्रशांत नारियल समुदाय द्वारा वर्ष 2009 से इसका आयोजन किया जा रहा है।भारत में, केरल में नारियल का सबसे अधिक उत्पादन होता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में भी अब इसकी उपज को बढ़ाया गया है। तमिलनाडु में सालाना लगभग 2 करोड़ 17 लाख नारियल पैदा होते हैं और इसे आगे बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए समन्वित नारियल उत्पादन योजना शुरू की गई है। राष्ट्रीय नारियल बोर्ड भी नारियल के उत्पादन और विकास के साथ ही इससे जुड़े अन्य उत्पादों जैसे सॉफ्ट ड्रिंक, चिप्स और जैम पर भी काम कर रहा है। नारियल के खोल और उसके अन्य अवययों से बनाये जाने वाले हस्तशिल्प उत्पादों के विकास पर भी काम किया जा रहा है।

.jpg)




.jpg)
.jpg)
.jpg)


.jpg)










.jpg)


.jpg)

