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- जब भी कोई व्यक्ति किसी वायरस का शिकार होता है तो उसके शरीर में उस वायरस से लडऩे के लिए एंटीबॉडीज बनती हैं। रैपिड टेस्ट में उन्हीं एंटीबॉडीज का पता लगाया जाता है। इसे रैपिड टेस्ट इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके नतीजे बहुत ही जल्दी आ जाते हैं। महज 15-20 मिनट में ही इसका रिजल्ट सामने होता है।कैसे टेस्ट होता है एंटीबॉडी टेस्ट?इसमें व्यक्ति का ब्लड सैंपल लेकर एंटीबॉडी टेस्ट या सीरोलॉजिकल यानी सीरम से जुड़े टेस्ट किए जाते हैं। इसके लिए व्यक्ति की उंगली से महज एक-दो बूंद खून की जरूरत होती है। इससे ये पता चल जाता है कि हमारे इम्यून सिस्टम ने वायरस को बेअसर करने के लिए एंटीबॉडीज बनाए हैं या नहीं। ऐसे में जिन लोगों में कोरोना के संक्रमण के लक्षण कभी नहीं दिखते, उनमें भी ये आसानी से समझा जा सकता है कि वह संक्रमित है या नहीं, या पहले संक्रमित था या नहीं।एंटीबॉडी टेस्ट आखिर रियल टाइम पीसीआर टेस्ट से अलग कैसे?मौजूदा समय में कोरोना वायरस का संक्रमण पता लगाने के लिए रियल टाइम पीसीआर टेस्ट किया जाता है। इसमें लोगों का स्वैब सैंपल लिया जाता है, जो आरएनए पर आधारित होता है। यानी इस टेस्ट में मरीज के शरीर में वायरस के आरएनए जीनोम के सबूत खोजे जाते हैं।रैपिड टेस्ट पॉजिटिव-निगेटिव आने पर क्या होता है?अगर रैपिड टेस्ट पॉजिटिव आता है तो हो सकता है कि वह व्यक्ति कोविड-19 का मरीज हो, ऐसे में उसे घर में ही आइसोलेशन में रहने या फिर अस्पताल में रखने की सलाह दी जाती है। वहीं अगर ये टेस्ट निगेटिव आता है तो फिर उसका रियल टाइम पीसीआर टेस्ट किया जाता है। रियल टाइम पीसीआर टेस्ट में पॉजिटिव आने पर अस्पताल या घर में आइसोलेशन में रखा जाता है। वहीं रियल टाइम पीसीआर टेस्ट निगेटिव आने पर माना जाता है कि उसमें कोरोना वायरस का संक्रमण नहीं हैं।अगर किसी शख्स का पीसीआर टेस्ट नहीं हो पाता है तो उसे होम क्वारंटीन में रखा जाता है और 10 दिन बाद दोबारा से एंटीबॉडी टेस्ट किया जाता है। यानी दोनों ही मामलों में ये पूरी तरह से कनफर्म नहीं होता कि मरीज कोरोना पॉजिटिव है या नहीं, कनफर्म रिपोर्ट के लिए रियल टाइम पीसीआर टेस्ट ही करना होता है। हालांकि, ये पता चल जाता है कि व्यक्ति का शरीर कोविड-19 से लडऩे के लिए एंटीबॉडी बना रहा है या नहीं।क्यों जरूरत है रैपिड टेस्ट की?रियल टाइम पीसीआर में मरीज के सही होने के बाद आरएनए जीनोम का पता नहीं चलता, जिससे ये पता नहीं चल सकता है कि वह पहले संक्रमित था या नहीं। वहीं रैपिड टेस्ट में मरीज के सही होने के कुछ दिनों बाद तक ये पता चल सकता है कि वह संक्रमित था या नहीं। इस टेस्ट की जरूरत इसलिए भी पड़ी है क्योंकि इससे नतीजे बहुत जल्दी आ जाते हैं।---
- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की पहचान है लाल किला। 29 अप्रैल वर्ष 1639 को लाल किले की नींव रखी गई थी। लाल किला जिसे रेड फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। लाल किले का निर्माण सबसे प्रसिद्ध मुगल बादशाहों में से एक शाहजहां ने किया था। यमुना नदी के तट पर निर्मित किले-महल को वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी द्वारा डिजाइन किया गया था।शानदार किले को बनाने में करीब 10 साल का समय लगा। किले ने 1648 से 1857 तक मुगल सम्राटों के शाही निवास के रूप में कार्य किया। इसने प्रसिद्ध आगरा किले से शाही निवास का स्थान लिया जब शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला किया। लाल किले का नाम लाल-बलुआ पत्थर की दीवारों से लिया गया है, जो किले को लगभग अभेद्य बना देता है। यह किला पुरानी दिल्ली में स्थित है, भारत की विशाल और प्रमुख संरचनाओं में से एक है और मुगल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। इसे अक्सर मुगल रचनात्मकता का शिखर माना जाता है। आधुनिक समय में किला भारत के लोगों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री हर साल 15 अगस्त को किले से अपना स्वतंत्रता दिवस भाषण देते हैं। वर्ष 2007 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।लाल किले में पर्यटकों को एक और मुगलकालीन संरचना देखने को मिलेगी। यह है किले का दूसरा हमाम। मुमताज महल के पास बना यह हमाम अब तक झाडिय़ों में छिपा हुआ था। इसकी साफ-सफाई और संरक्षण के बाद लोग इसे देख सकेंगे। हालांकि, अब इसके अवशेष ही बचे हैं। करीब 160 साल बाद पर्यटक इसे देख पाएंगे। 1857 में अंग्रेजों ने जब लाल किले पर कब्जा किया तो बड़े पैमाने पर तोडफ़ोड़ की। किले के दक्षिणी हिस्से में मुमताज महल है। यह शाही हरम का हिस्सा था। इसके बाद कोई भी इमारत सुरक्षित नहीं बची। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिहाज से जो निर्माण किए वे आज भी मौजूद हैं। मुमताज महल के पास अब तक यहां केवल झाडिय़ां ही थीं। अब साफ-सफाई कर दी गई है। कन्जर्वेशन के बाद लोगों को यह ऐतिहासिक धरोहर देखने को मिलेगी। यह हमाम करीब 40 फीट लंबा और 15 फीट चौड़ा है। अब तक इस हिस्से की ओर लोगों को जाने की इजाजत नहीं थी।आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की योजना है कि हमाम के संरक्षण के बाद में इसे लोगों को देखने की इजाजत दी जाएगी। लाल किले में मोती मस्जिद और दीवान-ए-खास के पास एक और हमाम है। ऐसा माना जाता है कि यह शाही बच्चों के नहाने के लिए था। यह हमाम किले के उत्तरी हिस्से की ओर है। मुमताज महल के पास वाले हमाम और दीवान-ए-खास के पास मौजूद हमाम में काफी दूरी है।शाहजहां ने आगरा से हटाकर अपनी राजधानी दिल्ली लाने के बाद शाहजहांनाबाद शहर बसाया और लाल किले की नींव सन् 1639 में रखी। 9 साल बाद यानी सन् 1648 में लाल किला बनकर तैयार हो गया। तब से अब तक इस ऐतिहासिक धरोहर ने कई राज देखे और देश के बदलाव का गवाह बना रहा। यह अपने आपमें बेशुमार ऐतिहासिक धरोहर समेटे हुए है।लाल किले में बड़े पैमाने पर संरक्षण का काम चल रहा है। इनमें छत्ता बाजार की छतों की मुगलकालीन नक्काशी और दुकानों के गेट मेहराब की तरह करना शामिल है। इसके अलावा, खास महल और दीवान-ए-खास में भी संरक्षण का काम चल रहा है।
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वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि एक उल्कापिंड इस 29 अप्रैल को पृथ्वी के बेहद करीब से होकर गुजरेगा, जिसकी गति 19 हजार किलोमीटर प्रति घंटा है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने उम्मीद जतायी है कि यह धरती से टकरायेगा नहीं इसलिए लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है।
इस उल्कापिंड का नाम 1998 ओ आर 2 है। बताया जा रहा है कि बुधवार यानि कल यह घरती के बेहद करीब से गुजरेगा। भारत समेत दुनियाभर के वैज्ञानिक इस उल्कापिंड की दिशा पर गहरी नजर बनाए हुए हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के सेंटर फॉर नियर-अर्थ स्टडीज की मानें तो अनुसार, इसी बुधवार यानि 29 अप्रैल को सुबह 5:56 बजे उल्कापिंड के पृथ्वी के पास से होकर गुजरेगा। वैज्ञानिकों को डर बस इस बात का सता रहा है कि इसकी राह में हल्का सा भी परिवर्तन आया तो इसका प्रभाव पूरे विश्व को भुगतना पड़ सकता है।हर सौ साल में उल्कापिंड के धरती से टकराने की 50 हजार संभावनाएं होती हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार उल्कापिंड जैसे ही पृथ्वी के पास आता है तो जल जाता है। आज तक के इतिहास में बहुत कम मामला ऐसा है जब इतना बड़ा उल्कापिंड धरती से टकराया हो। धरती पर ये उल्कापिंड कई छोटे-छोटे टुकड़े में गिरते हैं। जिनसे किसी प्रकार का कोई नुकसान आज तक नहीं हुआ है। जैसा कि ज्ञात हो इसके बारे में वैज्ञानिकों ने करीब एक महीने पहले ही बताया था कि यह पृथ्वी के बेहद करीब से होकर गुजरेगा.क्या होता है उल्कापिंडआकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में टूटते हुए तारे अथवा लूका कहते हैं। उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुंचता है उसे उल्कापिंड कहते हैं। प्राय: प्रत्येक रात्रि को उल्काएं अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरने वाले पिंडों की संख्या अत्यंत अल्प होती है। - आज 28 अप्रैल वर्ष 2008 को भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन, इसरो ने नया इतिहास रचा। भारत ने दस उपग्रह एक साथ प्रक्षेपित किए। भारत का उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी9 , 28 अप्रैल को 10 उपग्रहों के साथ सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया गया। श्रीहरिकोटा से छोड़ा गया यह प्रक्षेपण यान अपने साथ जो 10 उपग्रह लेकर गया है उसमें से आठ अन्य देशों के और दो भारत के थे। इस तरह 10 उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोडऩे का काम करते हुए इस प्रक्षेपण ने एक नया इतिहास रच दिया। लॉन्च किए जाने वाले दस उपग्रहों में भारत का आधुनिक रिमोट सेसिंग उपग्रह शामिल था, इसका अलावा आठ विदेशी नैनो उपग्रहों को भी छोड़ा गया।अपने तय समयानुसार यानी भारत में सुबह के नौ बजकर 23 मिनट पर इस यान को प्रक्षेपित किया। कुछ ही मिनटों में यान ने अपनी सही ऊंचाई हासिल कर ली और उपग्रह लेकर जाने वाले रॉकेट इससे अलग होकर सफलतापूर्वक स्थापित होने लगे। इससे पहले वर्ष 2007 अप्रैल में एक रूसी उपग्रह प्रक्षेपण यान से 13 उपग्रहों को छोड़ा गया था लेकिन ये यान अपने अभियान में सफल नहीं हो सके थे। भारत का 230 टन वजऩ वाला पोलर सेटेलाइट लॉन्च वीहकल (पीएसएलवी-सी9) कुल 824 किलो भार लेकर गया। कऱीब 70 करोड़ की लागत वाले पीएसएलवी-सी9 की ये 13वीं उड़ान रही। रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट कार्टोसेट-2ए का वजऩ 690 किलोग्राम और इसमें आधुनिक पैनक्रोमैटिक कैमरा लगे हुए थे जो उच्च गुणवत्ता की तस्वीरें खींचने में सक्षम थे। इस प्रक्षेपण यान में सबसे बड़ा कार्टोसैट 2्र नाम का एक उपग्रह है जो एक मैपिंग उपग्रह है। ये उपग्रह एक मीटर से छोटी वस्तु को भी 600 किलोमीटर से नाप सकता है इसकी क्षमता किसी भेदी उपग्रह की तरह ही होगी, लेकिन इसका उपयोग असैनिक कामों के लिए किया जाएगा।
- इतिहास में 27 अप्रैल का दिन कई मायनों में अहमियत रखता है। यह दिन कई छोटी बड़ी घटनाओं का गवाह रहा है। इनमें कुछ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गईं तो कुछ भुला दी गईं।एक तो भारत की मुगल सल्तनत के इतिहास में 27 अप्रैल का खास महत्व है। 1526 में 27 अप्रैल के दिन ही बाबर ने दिल्ली का तख्त-ओ-ताज संभाला था।दूसरा 27 अप्रैल 1940 में नाजियों ने पोलैंड के ओस्वीसिम में यातना शिविर का निर्माण शुरू किया। इसे आउश्वित्स के नाम से जाना जाने लगा और इसे बनाने के आदेश वरिष्ठ नाजी अफसर हाइनरिष हिमलर ने दिए। आउश्वित्स के दरवाजे पर आरबाइट माख्ट फ्राई लिखा गया था, जिसका अर्थ है मेहनत आजाद करती ह।आउश्वित्स में तीन बड़े कैंप थे जिनमें पांच शवदाह केंद्र थे। इस यातना शिविर में करीब 11 लाख बंदियों को मारा गया लेकिन कुछ अनुमानों के मुताबिक मारे गए लोगों की संख्या 20 लाख तक हो सकती है। इनमें से ज्यादातर बंदी यहूदी थे। ज्यादातर कैदियों को सिक्लोन बी नाम की जहरीली गैस से खास कमरों में मारा गया लेकिन कई कैदी भूख और कड़ी मजदूरी की वजह से अपनी जान खो बैठे। इस शिविर में नाजियों ने कई बर्बर प्रयोग भी किए। पहले तो आउश्वित्स में जर्मनी का विरोध कर रहे पोलैंड के निवासियों को कैद करने की बात थी, लेकिन 1941 में हिमलर ने तय किया कि यह यातना शिविर यूरोप में रह रहे सारे यहूदियों को खत्म करने का काम करेगा। इस सिद्धांत को अंतिम निपटारा का नाम दिया गया और इसके तहत यूरोप भर से यहूदियों को जमा कर उन्हें मारने की योजना बनाई गई और इसे अमल में भी लाया गया। पश्चिमी मित्र देशों के जर्मनी पर हमले के बाद आउश्वित्स को यहूदियों को दी गई यातना की याद में स्मारक घोषित किया गया।
- कोरोना वायरस के साथ जुड़े होने के कारण हाल में चमगादड़ों का खूब नाम खराब हुआ। बीमारियां फैलाने के अलावा यह निशाचर जीव बहुत से दूसरे काम भी करते हैं।बीमारियों के लिए जिम्मेदारकुदरती तौर पर चमगादड़ कई तरह के वायरसों के होस्ट होते हैं। सार्स, मर्स, कोविड-19, मारबुर्ग, निपा, हेन्ड्रा और शायद इबोला का वायरस भी इनमें रहता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इनका अनोखा इम्यूम सिस्टम इसके लिए जिम्मेदार है जिससे ये दूसरे जीवों के लिए खतरनाक बीमारियों के कैरियर बनते हैं। इनके शरीर का तापमान काफी ऊंचा रहता है और इनमें इंटरफेरॉन नामका एक खास एंटीवायरल पदार्थ होता है।ना कैंसर और ना बुढ़ापा छू सकेसाल में केवल एक ही संतान पैदा कर सकने वाले चमगादड़ ज्यादा से ज्यादा 30 से 40 साल ही जीते हैं, लेकिन ये कभी बूढ़े नहीं होते यानि पुरानी पड़ती कोशिकाओं की लगातार मरम्मत करते रहते हैं। इसी खूबी के कारण इन्हें कभी कैंसर जैसी बीमारी भी नहीं होती।हर कहीं मौजूद लेकिन फिर भी दुर्लभऑस्ट्रेलिया की झाडिय़ों से लेकर मेक्सिको के तट तक - कहीं पेड़ों में लटके, तो कहीं पहाड़ की चोटी पर, कहीं गुफाओं में छुपे तो कहीं चट्टान की दरारों में - यह अंटार्कटिक को छोड़कर धरती के लगभग हर हिस्से में पाए जाते हैं। स्तनधारियों में चूहों के परिवार के बाद संख्या के मामले में चमगादड़ ही आते हैं।काले ही नहीं सफेद भी होते हैं चमगादड़-यह है होंडुरान व्हाइट बैट, जो यहां हेलिकोनिया पौधे की पत्ती में अपना टेंट सा बना कर चिपका हुआ है। दुनिया में पाई जाने वाली चमगादड़ों की 1,400 से भी अधिक किस्मों में से केवल पांच किस्में सफेद होती हैं और यह होंडुरान व्हाइट बैट तो केवल अंजीर खाते हैं।यूं ही कहलाते हैं खून के प्यासेचमगादड़ों को आम तौर पर दुष्ट खून चूसने वाले जीव समझा जाता है लेकिन असल में इनकी केवल तीन किस्में ही सचमुच खून पीती हैं। जो पीते हैं वे अपने दांतों को शिकार की त्वचा में गड़ा कर छेद करते हैं और फिर खून पीते हैं। यह किस्म अकसर सोते हुए गाय-भैंसों, घोड़ों को ही निशाना बनाते हैं लेकिन जब कभी ये इंसानों में दांत गड़ाते हैं तो उनमें कई तरह के संक्रमण और बीमारियां पहुंचा सकते हैं।क्या सारे चमगादड़ अंधे होते हैंइनकी आंखें छोटी होने और कान बड़े होने की बहुत जरूरी वजहें हैं। यह सच है कि ज्यादातर की नजर बहुत कमजोर होती है और अंधेरे में अपने लिए रास्ता तलाशने के लिए वे सोनार तरंगों का सहारा लेते हैं। अपने गले से ये बेहद हाई पिच वाली आवाज निकालते हैं और जब वह आगे किसी चीज से टकरा कर वापस आती है तो इससे उन्हें अपने आसपास के माहौल का अंदाजा होता है।ये ना होते तो ना आम होते और ना केलेजी हां, आम, केले और आवोकाडो जैसे फलों के लिए जरूरी परागण का काम चमगादड़ ही करते हैं। ऐसी 500 से भी अधिक किस्में हैं जिनके फूलों में परागण की जिम्मेदारी इन पर ही है। मेक्सिको के लंबी नाक वाले चमगादड़ और इक्वाडोर के ट्यूब जैसे होंठों वाले चमगादड़ अपनी लंबी जीभ से इस काम को अंजाम देते हैं।--
- इतिहास में आज के दिन एक ऐसा हादसा हुआ जिसने हजारों लोगों की जिंदगी बदल दी। बहुत लोग अब भी इस हादसे से प्रभावित हैं। 26 अप्रैल 1986 को चेरनोबिल में परमाणु हादसा हुआ। उस वक्त चेरनोबिल, जो अब यूक्रेन में है, सोवियत रूस का हिस्सा हुआ करता था। 26 अप्रैल 1986 को परमाणु रिएक्टर में एक बड़ा धमाका हुआ जिससे पूरे वातावरण में रेडियोधर्मी कण फैल गए। उस वक्त हवा और बादलों की वजह से रेडियोधर्मी कण सोवियत रूस के पश्चिमी हिस्से और यूरोप तक में फैल गए।चेरनोबिल दुनिया के सबसे खतरनाक परमाणु हादसों में गिना जाता है। हादसे के तुरंत बाद करीब 30 लोगों की मौत हुई लेकिन आसपास के रूसी, बेलारूसी और यूक्रेनी इलाकों से तीन लाख 50 हजार से ज्यादा लोगों को रेडियोधर्मी किरणों से बचाने के लिए दूर ले जाया गया। माना जाता है कि हादसे का सबसे ज्यादा नुकसान बेलारूस में हुआ। अब भी हजारों लोग रेडियोधर्मी किरणों से प्रभावित हैं।माना जाता है कि चेरनोबिल की वजह से मरने वाले लोगों की संख्या 4 हजार तक जा सकती है। पीडि़तों को अकसर थाइरॉयड कैंसर या ल्यूकेमिया होता है। रूस, बेलारूस और यूक्रेन अब भी चेरनोबिल रिएक्टर की रेडियोधर्मी किरणों से लोगों के बचाने के लिए बहुत निवेश कर रहे हैं। चेरनोबिल के बाद फुकुशिमा परमाणु रिएक्टर की दुर्घटना सबसे खतरनाक परमाणु हादसा माना जाता है।----
- - वर्ष 1955- लड़कियों के लिए पहला स्कूल- सऊदी अरब में लड़कियों के लिए पहला स्कूल दार-अल-हनन 1955 में खोला गया, उस साल तक कुछ ही लड़कियों को किसी भी तरह की शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिलता था। इसी तरह लड़कियों के लिए पहला सरकारी स्कूल 1961 में खोला गया था।- वर्ष 1970- लड़कियों के लिए पहली यूनिवर्सिटी- लड़कियों के लिए पहली यूनिवर्सिटी रियाद कॉलेज ऑफ एजुकेशन थी जो साल 1970 में खोली गयी थी। यह देश में महिलाओं की उच्ची शिक्षा के लिए पहली यूनिवर्सिटी थी।- वर्ष 2001- महिलाओं का पहचान पत्र- 21वीं सदी के साथ सऊदी अरब में एक और नई शुरूआत हुई और यह शुरुआत थी महिलाओं के पहचान पत्र की। हालांकि यह पहचान पत्र महिला के अभिभावक की स्वीकृति से जारी किये जाते थे, लेकिन वर्ष 2006 से बिना किसी इजाजत के महिलाओं को पहचान पत्र जारी किये जा रहे हैं।- वर्ष 2005- जबरन शादी का अंत- सऊदी अरब ने जबरन शादी पर 2005 में रोक लगाया। हालांकि, विवाह प्रस्ताव लड़के और लड़की के पिता के बीच तय होना जारी रहा।- वर्ष 2009- पहली महिला मंत्री- 2009 में राजा अब्दुल्ला ने सऊदी अरब की सरकार में पहली महिला मंत्री नियुक्त किया और इस तरह नूरा अल-फैज महिला मामलों के लिए उप शिक्षा मंत्री बनीं।- वर्ष 2012- पहली महिला ओलंपिक एथलीट्स- सऊदी अरब ने पहली बार महिला एथलीट्स को ओलंपिक की राष्ट्रीय टीम में हिस्सा लेने की अनुमति दी। इन खिलाडिय़ों में सारा अत्तार थीं, जो 2012 के ओलंपिक खेलों में लंदन में स्कार्फ पहन कर 800 मीटर की रेस दौड़ीं।- वर्ष 2013- महिलाओं को साइकिल/मोटरसाइकिलों की सवारी करने की अनुमति- सऊदी नेताओं ने महिलाओं को 2013 में पहली बार साइकिल और मोटरबाइक की सवारी करने की अनुमति दी। हालांकि, इस पर भी शर्ते थीं महिलाएं केवल मनोरंजक क्षेत्रों में, पूरे शरीर को ढंक कर और एक पुरुष रिश्तेदार की उपस्थित में सवारी कर सकती थीं।- वर्ष 2013- शूरा में पहली महिला- फरवरी 2013 में, राजा अब्दुल्ला ने सऊदी अरब की सलाहकार परिषद शूरा में 30 महिलाओं को शपथ दिलवायी। इसके बाद इस समिति में महिलाओं को नियुक्त किया जाने लगा जल्द ही वे सरकारी दफ्तर भी संभालेंगी।- वर्ष 2015- वोट देने का अधिकार- 2015 में सऊदी अरब के नगरपालिका चुनाव में, पहली बार महिलाओं ने वोट डाला साथ ही उन्हें इन चुनावों में उम्मीदवार बनने का भी मौका मिला। इसके विपरीत, 1893 में, महिलाओं को वोट का अधिकार देने वाला पहला देश न्यूजीलैंड था। जर्मनी ने 1919 में ऐसा किया था।- वर्ष 2017- सऊदी स्टॉक एक्सचेंज की पहली महिला प्रमुख- फरवरी 2017 में, सऊदी अरब स्टॉक एक्सचेंज ने सारा अल सुहैमी के रूप में अपनी पहली महिला अध्यक्ष को नियुक्त किया था। इससे पहले 2014 में वह नेशनल कामर्शियल बैंक (एनसीबी) की पहली महिला सीईओ भी बनाई जा चुकी थीं।- वर्ष 2018- महिलाओं को ड्राइव करने की अनुमति दी जाएगी- 26 सितंबर, 2017 को, सऊदी अरब ने घोषणा की कि महिलाओं को जल्द ही ड्राइव करने की अनुमति दी जाएगी। जून 2018 से उन्हें गाड़ी के लाइसेंस के लिए अपने पुरुष अभिभावक से अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी साथ ही गाड़ी चलाने के लिए अपने संरक्षक की भी जरूरत नहीं होगी।
- 25 अप्रैल 1983 को जर्मनी के उत्तरी शहर हैम्बर्ग में हलचल थी। स्टैर्न पत्रिका के संपादक ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में शताब्दी की सनसनी पेश की, हिटलर की गोपनीय डायरी, जिसका पता किया था स्टैर्न के रिपोर्टर गैर्ड हाइडेमन ने। यह खबर पाने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में 250 पत्रकार मौजूद थे। पत्रिका के संपादकीय में लिखा गया था कि तृतीय राइष का इतिहास फिर से लिखना होगा।ऐसा नहीं है कि हिटलर की डायरी के अस्तित्व पर किसी को शक नहीं हुआ हो, लेकिन स्टैर्न के मुख्य संपादक पेटर कॉख ने डायरी की सच्चाई पर संदेह को रिमोट डायगोनोस्टिक बताया। दो हफ्ते में ही सारा हंगामा थम गया, सनसनी खत्म हो गई। हिटलर की गोपनीय डायरी धोखाधड़ी साबित हुई। जर्मनी के संघीय अपराध कार्यालय बीकेए और संघीय अभिलेखागार ने उन्हें जालसाजी बताया और वह भी मामूली स्तर की। जिस कागज पर कथित डायरी लिखी गई थी, उस पर एक रसायन था जो युद्ध के बाद बाजार में आया था।स्टैर्न की पूरी दुनिया में बड़ी किरकिरी हुई। मुख्य संपादकों की नौकरी गई। यह मामला पत्रकारीय विफलता की मिसाल बन गया। प्रकाशक हेनरी नानेन को कहना पड़ा कि स्टैर्न शर्मसार है। इस मामले से स्टैर्न की छवि को तो नुकसान पहुंचा ही, उसकी बिक्री पर भी भारी असर हुआ। बहुत से लोगों ने उस समय सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिका को खरीदना भी बंद कर दिया। छवि और बिक्री के संकट से उबरने में स्टैर्न को सालों लग गए।
- किसी भी वाहन में लगने वाले टायरों का रंग हमेशा काला ही होता है। दरअसल कच्चा रबर हल्के पीले रंग का होता है, लेकिन टायर बनाने के लिए उसमें काला कार्बन मिलाया जाता है जिससे रबर जल्दी न घिसे।अगर सादा रबर का टायर 8 हज़ार किलोमीटर चल सकता है तो कार्बन युक्त टायर एक लाख किलोमीटर चल सकता है। इसीलिए वाहनों में काले रंग के टायरों का ही इस्तेमाल किया जाता है। काले कार्बन की भी कई श्रेणियां होती हैं और रबर मुलायम होगी या सख्त यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन सी श्रेणी का कार्बन उसमें मिलाया गया है। मुलायम रबर के टायरों की पकड़ मज़बूत होती है लेकिन वो जल्दी घिस जाते हैं जबकि सख्त टायर आसानी से नहीं घिसते।
- भारत में हर साल 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। ये दिन भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के पारित होने का प्रतीक है, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था। इस दिन को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत साल 2010 से हुई थी।पूरे देश को चलाने में सिर्फ केंद्र सरकार या सिर्फ राज्य सरकार सक्षम नहीं हो सकती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर भी प्रशासनिक व्यवस्था जरूरी है। इस काम के लिए बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में 1957 में एक समिति का गठन किया गया था। समिति ने अपनी सिफारिश में जनतांत्रिक विकेंद्रीकरण की सिफारिश की जिसे पंचायती राज कहा गया है।1992 को संविधान में 73वां संशोधन कर पहली बार पंचायती राज संस्थान की पेशकश की गई। इसके तहत स्थानीय निकायों को शक्तियां दी गईं। पंचायती राज के तहत गांव, इंटरमीडिएट और जिलास्तर पर पंचायतें संस्थागत बनाई गई हैं। राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस जमीनी स्तर से राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण के इतिहास को बताता है। उनकी आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की शक्ति को दर्शाता है। राजस्थान देश का पहला राज्य बना जहां पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। इस योजना का शुभारम्भ तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नागौर जिले में 2 अक्टूबर 1959 को किया था।भारत में पंचायती राज व्यवस्था की देखरेख के लिए 27 मई 2004 को पंचायती राज मंत्रालय को एक अलग मंत्रालय बनाया गया। भारत में हर साल 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का कारण 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 है जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था।पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम, तहसील, तालुका और जिला आते हैं। भारत में प्राचीन काल से ही पंचायती राजव्यवस्था अस्तित्व में रही है, भले ही इसे विभिन्न नाम से विभिन्न काल में जाना जाता रहा हो। पंचायती राज व्यवस्था को कमोबेश मुग़ल काल तथा ब्रिटिश काल में भी जारी रखा गया। ब्रिटिश शासन काल में 1882 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वायत्त शासन की स्थापना का प्रयास किया था, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। ब्रिटिश शासकों ने स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं की स्थिति पर जाँच करने तथा उसके सम्बन्ध में सिफ़ारिश करने के लिए 1882 तथा 1907 में शाही आयोग का गठन किया। इस आयोग ने स्वायत्त संस्थाओं के विकास पर बल दिया, जिसके कारण 1920 में संयुक्त प्रान्त, असम, बंगाल, बिहार, मद्रास और पंजाब में पंचायतों की स्थापना के लिए क़ानून बनाये गये। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी संघर्षरत लोगों के नेताओं द्वारा सदैव पंचायती राज की स्थापना की मांग की जाती रही।---
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आज का दिन कवि और नाटककार विलियम शेक्सपीयर के नाम है। दुनिया के महानतम कवियों और नाटककारों में एक शेक्सपीयर का जन्म और निधन दोनों इसी तारीख से जुड़ा हुआ है। वैसे तो शेक्सपीयर के जन्म के बारे में जो वर्णन मौजूद है उसके मुताबिक उनका 26 अप्रैल 1564 के दिन बप्तिस्मा किया गया था, लेकिन ऐसी संभावना जताई जाती है कि उनका जन्म 23 अप्रैल 1564 को हुआ था और उनका निधन भी इसी तारीख को 1616 में हुआ। उन्हें अक्सर इंग्लैंड का राष्ट्रीय कवि भी कहा जाता है। उनके नाम पर 38 नाटक, 154 सॉनेट, दो लंबी कविताएं हैं। हालांकि कुछ ऐसा भी है जो है तो शेक्सपीयर के नाम लेकिन उन्होंने ही लिखा होगा इस बारे में संदेह है। उनके नाटकों का अनुवाद कई भाषाओं में होता है। माना जाता है कि 1949 में 49 साल की उम्र में वह नाटकों से रिटायर हो गए। शेक्सपीयर के निजी जीवन के बारे में हालांकि जानकारी कम ही है कि वे कैसे दिखाई देते थे, कौन से धर्म के थे या जो नाटक उनके नाम पर लिखे गए हैं, वो उन्होंने लिखे भी हैं या नहीं।
बहरहाल इन विवादों से परे हैमलेट, किंग लेयर, ओथेलो, मैकबेथ जैसे नाटक अंग्रेजी साहित्य के नायाब नाटक हैं, जो आज इतने साल बाद भी पसंद किए जाते हैं और उनका अलग अलग दृष्टिकोणों के साथ मंचन होता रहता है। 23 अप्रैल को 1616 में शेक्सपीयर का 52 साल की उम्र में निधन हो गया। - वह जिसने रूसी क्रांति का नेतृत्व किया, जिसके नाम पर एक विचारधारा कायम है, आज ही के दिन 1870 में हुआ था उसका जन्म। रूस के माक्र्सवादी विचारक व्लादिमीर लेनिन का जन्म 22 अप्रैल 1870 को सिमबिस्र्क में हुआ था। लेनिन माक्र्सवाद से प्रेरित थे और इसी के आधार पर उन्होंने रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की 1917 में उनके नेतृत्व में रूसी क्रांति ने सिर उठाया। इसके कारण 1922 में सोवियत संघ की स्थापना हुई।समाज और दर्शनशास्त्र को लेकर लेनिन के माक्र्सवादी विचारों ने रूस ही नहीं दुनिया भर को प्रभावित किया। उनकी इस विचारधारा को लेनिनवाद के नाम से जाना जाता है। लंबी बीमारी के बाद 21 जनवरी 1924 को दिल का दौरा पडऩे से लेनिन की मौत हो गई। उनकी मृत्यु पर उनके सम्मान में रूस के पश्चिमी तटवर्ती इलाके सेंट पीटर्सबर्ग का नाम बदल कर लेनिनग्राद कर दिया गया, हालांकि रूस में कई लोग शहर के कम्युनिस्ट नाम से सहमत नहीं थे। इसलिए 1991 में इसे दोबारा बदल कर सेंट पीटर्सबर्ग कर दिया गया।---
- इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि आज ही के दिन अमेरिका में विकसित पहले फिल्म प्रोजेक्टर का प्रदर्शन किया गया था। यह साल था 1895।वुडविल लैथम और उनके बेटे ओटवे और ग्रे ने अमेरिका में विकसित पैनटॉप्टिकॉन को पहली बार प्रदर्शित किया था। हालांकि अमेरिका में थॉमस एडिसन के काइनेटोस्कोप के इस्तेमाल से चलचित्र का प्रदर्शन सालों से हो रहा था, लेकिन इसके जरिए एक साथ कई लोग फिल्म नहीं देख सकते थे। फिल्म को देखने के लिए बाइस्कोप जैसी चीज का इस्तेमाल होता था।लैथम भाइयों ने अपने पिता वुडविल और एडिसन के प्रयोगशाला में सहायक रहे डब्ल्यू के एल डिक्सन की मदद लेकर ऐसी मशीन बनाई जो आदमकद तस्वीरों को पर्दे पर पेश कर सके ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक एक साथ उसे देख सकें। वुडविल, डिक्सन और एडिसन के एक पूर्व कर्मचारी की मदद से लैथम लूप तैयार किया था। लूप की मदद से तस्वीर पर्दे पर आसानी से प्रदर्शित होती और फिल्म को खींचने की भी जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि दूसरी ओर फ्रांस के लुमियेर बंधु भी मोशन पिक्चर को प्रदर्शित करने वाले प्रोजेक्टर पर काम कर रहे थे। उसी साल उन्होंने पेरिस में आयोजित एक औद्योगिक सम्मेलन में पहली बार सार्वजनिक रूप से एक फिल्म दिखाई। लुमियेर बंधु में से एक, लुई लुमियेर अपने आसपास की चीजों के वीडियो उतारते थे। यह वीडियो आसपास के जीवन को सच्चे रूप में पेश करता था। इसी तरह उन्होंने लुमियेर फैक्ट्री से बाहर निकलते कामगारों का भी एक वीडियो रिकार्ड किया, जिसे पहली स्क्रीनिंग में दिखाया गया था। फिल्म दिखाने की इस तकनीक को लुमियेर भाइयों ने तुरंत अपने नाम पर पेटेंट करा लिया।-----
- 20 अप्रैल की तारीख कई ऐतिहासिक घटनाओं के चलते इतिहास में दर्ज है। उसमें से एक है एडोल्फ हिटलर का जन्मदिन। दुनिया को आतंकित करने वाले हिटलर का जन्म 20 अप्रैल, 1889 को हुआ था। उसके 50वें जन्मदिन को 1939 में जर्मनी के राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया गया था।हिटलर राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पाटी के नेता थे। इस पार्टी को प्राय: नाजी पार्टी के नाम से जाना जाता है। सन् 1933 से सन् 1945 तक वह जर्मनी के शासक रहे। हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार माना जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध तब हुआ, जब उनके आदेश पर नात्सी सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया। फ्रांस और ब्रिटेन ने पोलैंड को सुरक्षा देने का वादा किया था और वादे के अनुसार उन दोनों ने नाज़ी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।हिटलर का उत्थान प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात जहां एक ओर तानाशाही प्रवृति का उदय हुआ। वहीं दूसरी और जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजी दल की स्थापना हुई। जर्मनी के इतिहास में हिटलर का वही स्थान है जो फ्रांस में नेपोलियन बोनाबार्ट का, इटली में मुसोलनी का और तुर्की में मुस्तफा कमालपाशा का। हिटलर के पदार्पण के फलस्वरुप जर्मनी का कार्यकलाप हो सका। उन्होंने असाधारण योग्यता, विलक्षण प्रतिभा और राजनीतिक कटुता के कारण जर्मनी गणतंत्र पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया । जर्मनी में हिटलर का अभ्युदय और शक्ति की प्राप्ति एकाएक नहीं हुई। उनकी शक्ति का विकास धीरे-धीरे हुआ। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसकी शिक्षा अधूरी रह गई। वे वियेना में भवन निर्माण कला की शिक्षा लेना चाहते थे। लेकिन उसके भाग्य में तो जर्मनी का पुर्णनिर्माण लिखा था। प्रथम विश्व युद्ध से ही उनका भाग्योदय होने लगा। वे जर्मन सेना में भर्ती हो गए। उन्हें बहादुरी के लिए आयरन क्रास की उपाधि मिली। युद्ध समाप्ति के पश्चात् उन्होंने सक्रिय राजनीति में रुचि लेना शुरू किया।
- स्लोवाकिया यूरोप महाद्वीप में स्थित एक ऐसा देश है, जो चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ है यानी इसकी किसी सीमा पर समुद्र या महासागर नहीं है। उत्तर में पोलैंड, दक्षिण में हंगरी, पूर्व में यूक्रेन और पश्चिम में चेक गणराज्य और ऑस्ट्रिया से घिरा यह देश 1993 में चेकोस्लोवाकिया से अलग होने के बाद बना था। इस देश से जुड़ी ऐसी कई रोचक बातें हैं, जिसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते होंगे, जैसे कि ....1. यूरोपीय महाद्वीप की दूसरी सबसे लंबी नदी डेन्यूब स्लोवाकिया के बीच से होकर गुजरती है। 2850 किलोमीटर लंबी यह नदी 10 देशों में बहती है। नील नदी के अलावा दुनिया में शायद ही ऐसी कोई नदी हो, जो इतने सारे देशों से होकर बहती हो।2. वैसे आमतौर पर कोई भी देश अपनी राजधानी देश के बीच में रखना चाहता है, क्योंकि यह सुरक्षा की दृष्टि से अच्छा होता है, लेकिन स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा दुनिया की एकमात्र ऐसी राजधानी है, जो दो देशों की सीमाओं से सटी हुई है। ब्रातिस्लावा, ऑस्ट्रिया और हंगरी की सीमा को छूती है।3. स्लोवाकिया एक संसदीय गणतंत्र है, जिसकी राष्ट्रीय परिषद में 150 सदस्य होते हैं। इन सदस्यों को हर चार साल में आम चुनाव द्वारा चुना जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 2002 तक इस देश में सांसद राष्ट्रपति का चुनाव किया करते थे, लेकिन बाद में यहां के संविधान में संशोधन कर दिया गया। अब यहां राष्ट्रपति आम चुनावों द्वारा चुने जाते हैं।
- लहसुन का प्रयोग, सूप, सब्जी, दाल, रोटी, नान आदि भोजन की लगभग सभी चीजों में होता है। इसके गुणों को देखते हुए ही इसके सम्मान में हर साल 19 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय लहसुन दिवस मनाया जाता है। अनेक देशों में इसे मिठाइयों और पेय में भी डाला जाता है। अनेक प्रकार की वाइन में इसका प्रयोग होता है। महान यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स ने भी लहसुन को कई रोगों की अचूक दवा बताते हुए लहसुन के गुणों के बारे में विस्तार से लिखा है। कई औषधियों में इसका उपयोग किया जाता है।ईसाई देवी देवता शास्त्र के अनुसार जब शैतान ने ईडेन गार्डेन का त्याग किया तब उसके बांएं पदचिह्न से लहसुन की उत्पत्ति हुई। अनेक जनजातियों में इसका प्रयोग भूत और चुड़ैलों को भगाने में किया जाता है। मच्छरों, दीमकों और कीटों को भगाने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।लहसुन की तीन सौ से भी अधिक किस्में विश्व में पाई जाती हैं और इसके प्रयोग के प्रमाण ईसापूर्व 4 हजार वर्ष से भी पहले के मिलते हैं। मिस्र में पिरामिड बनाने वाले मजदूरों को भोजन में लहसुन, नमक और रोटी दी जाती थी। मिशिगन झील के किनारे उगने वाली लहसुन की एक प्रजाति शिकागुआ, के नाम पर शिकागो शहर का नामकरण किया गया था। कहा जाता है कि लहसुन को सब से पहले चीन में उगाया गया और चीन से यह दुनिया में फैल गया।100 ग्राम लहसुन का रासायनिक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसमें करीब 6.3 ग्राम प्रोटीन, 0.1 ग्राम वसा, 29.8 ग्राम कार्बोज, 62 ग्राम नमी, 0.8 ग्राम रेशा, 30 मि.ग्रा. कैल्शियम, 301 मि.ग्रा. फॉस्फोरस, 1.2 मि.ग्रा. लौहतत्व, 0.06 मि.ग्रा. थायेमीन, 0.23 मि.ग्रा रिबोफ्लेविन, 0.4 मि.ग्रा. नियासिन, 13 मि.ग्रा. विटामिन सी, 145 कि. कैलोरी ऊर्जा होती है। लहसुन में 17 अमीनो ऐसिड पाए जाते हैं, साथ ही प्रोबायोटिक इन्युलिन भी पाया जाता है जो पाचक बैक्टीरिया को बढ़ाता है, इसी के कारण पाचन तंत्र को लाभ मिलता है।
- आज के दिन दुनिया ने खोया उसे जिसने विज्ञान को नई गति दी। भौतिकशास्त्र के मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन का 18 अप्रैल 1955 को निधन हो गया।भौतिक शास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आइंस्टाइन ने दुनिया को सापेक्षता का सिद्धांत दिया। द्रव्यमान और ऊर्जा के बीच संबंध बताने वाला भौतिक शास्त्र का अहम समीकरण E=mc2 देने के लिए उन्हें याद किया जाता है। इसे विज्ञान जगत के सबसे अहम समीकरणों में से एक माना जाता है। 1921 में उन्हें भौतिक शास्त्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में 300 से अधिक रिसर्च पेपर प्रकाशित किए।14 मार्च 1879 को जर्मन शहर उल्म में एक यहूदी परिवार में पैदा हुए आइंस्टाइन बचपन से ही बहुत जहीन और शरारती थे। उनकी शरारतों के कारण उन्हें स्कूल से निकाल भी दिया गया था। क्लर्क के तौर पर नौकरी करते हुए उन्होंने गणित के समीकरणों पर काम जारी रखा। 1933 में वह जर्मनी से अमेरिका पहुंचे और वहीं बस गए। 1940 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता स्वीकार ली। जीवन के आखरी दिनों में वह इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस स्टडीज से जुड़े हुए थे। उनकी मृत्यु प्रिंस्टन के एक अस्पताल में तीन दिन भर्ती रहने के बाद 76 साल की उम्र में हुई। जीवन के अंतिम दिनों में वह अकेले रहा करते थे।
- पन्ना । कभी बाघ शून्य हो चुका मध्यप्रदेश का पन्ना टाईगर रिजर्व इस वर्ष अपनी विश्व में मिसाल बन चुकी सफलता का दशक वर्ष मना रहा है। लॉकडाउन के चलते पन्ना टाईगर रिजर्व में इस साल 16 अप्रैल को होने वाला मुख्य समारोह स्थगित कर दिया गया। समारोह में देश और विदेश के वन्यप्राणी विशेषज्ञ बाघ पुन: स्थापना में सहयोग देने वाले स्थानी नागरिक और जनप्रतिनिधि भाग लेने वाले थे ।पन्ना टाईगर रिजर्व के लिये 16 अप्रैल 2010 ऐतिहासिक दिन है जब कान्हा टाईगर रिजर्व से लाई गई बाघिन टी-2 ने पहली बार शावकों को जन्म देकर रिजर्व में पुन: बाघों की आबादी का सुखद आगाज किया था। यह बहुत बड़ी सफलता थी, जिसकी दुनियाभर के वन्यप्राणी विशेषज्ञों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। तभी से पन्ना को बाघ पुन: स्थापना में विश्वगुरू का दर्जा मिला आज रिजर्व में छोटे-बड़े 50 से अधिक बाघ-बाघिन है।पन्ना भारत का बाइसवां बाघ अभयारण्य है और मध्यप्रदेश का पांचवां। रिजर्व विंध्यन रेंज में स्थित है और यह राज्य के उत्तर में पन्ना और छतरपुर जिलों में फैला हुआ है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान 1981 में बनाया गया था। इसे 1994 में भारत सरकार द्वारा एक परियोजना टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। राष्ट्रीय उद्यान में 1975 में बनाए गए पूर्व गंगऊ वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र शामिल हैं। इस अभयारण्य में वर्तमान उत्तर और दक्षिण के क्षेत्रीय वन शामिल हैं। पन्ना वन प्रभाग, जिसके निकटवर्ती छतरपुर वन प्रभाग का एक भाग बाद में जोड़ा गया था। पन्ना जिले में पार्क के आरक्षित वन और छतरपुर की ओर कुछ संरक्षित जंगल अतीत में पन्ना, छतरपुर और बिजावर रियासतों के तत्कालीन शासकों के शिकारगाह थे।--
- 1. मारबुर्ग वायरस- इसे दुनिया का सबसे खतरनाक वायरस कहा जाता है। वायरस का नाम जर्मनी के मारबुर्ग शहर पर पड़ा जहां 1967 में इसके सबसे ज्यादा मामले देखे गए थे। 90 फीसदी मामलों में मारबुर्ग के शिकार मरीजों की मौत हो जाती है।2. इबोला वायरस- वर्ष 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में इबोला संक्रमण के फैलने से ग्यारह हजार से ज्यादा लोगों की जान गई। इबोला की कई किस्में होती हैं। सबसे घातक किस्म के संक्रमण से 90 फीसदी मामलों में मरीजों की मौत हो जाती है।3. हंटा वायरस- कोरोना के बाद इन दिनों चीन में हंटा वायरस के कारण एक व्यक्ति की जान जाने की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। यह कोई नया वायरस नहीं है। इस वायरस के लक्षणों में फेफड़ों के रोग, बुखार और गुर्दा खराब होना शामिल हैं।4. रेबीज- कुत्तों, लोमडिय़ों या चमगादड़ों के काटने से रेबीज का वायरस फैलता है। हालांकि पालतू कुत्तों को हमेशा रेबीज का टीका लगाया जाता है , लेकिन भारत में यह वायरस आज भी समस्या बना हुआ है। एक बार वायरस शरीर में पहुंच जाए और समय पर इलाज न हो, तो मौत पक्की है।5. एचआईवी-अस्सी के दशक में एचआईवी की पहचान हुई। एचआईवी के कारण एड्स होता है जिसका आज भी पूरा इलाज संभव नहीं है।6. चेचक- इंसानों ने हजारों सालों तक इस वायरस से जंग लड़ी। मई 1980 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने घोषणा की कि अब दुनिया पूरी तरह से चेचक मुक्त हो चुकी है। उससे पहले तक चेचक के शिकार हर तीन में से एक व्यक्ति की जान जाती रही।7. इन्फ्लुएंजा- दुनिया भर में सालाना हजारों लोग इन्फ्लुएंजा का शिकार होते हैं। इसे फ्लू भी कहते हैं। वर्ष 1918 में जब इसकी महामारी फैली तो दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी संक्रमित हुई और पांच करोड़ लोगों की जान गई। इसे स्पेनिश फ्लू का नाम दिया गया।8. डेंगू- मच्छर के काटने से डेंगू फैलता है। अन्य वायरस के मुकाबले इसका मृत्यु दर काफी कम है, लेकिन इसमें इबोला जैसे लक्षण हो सकते हैं। 2019 में अमेरिका ने डेंगू के टीके को अनुमति दी।9. रोटा- यह वायरस नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। वर्ष 2008 में रोटा वायरस के कारण दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के लगभग पांच लाख बच्चों की जान गई।10.कोरोना वायरस- इस वायरस की कई किस्में हैं। वर्ष 2012 में सऊदी अरब में मर्स फैला जो कि कोरोना वायरस की ही किस्म है। यह पहले ऊंटों में फैला, फिर इंसानों में। इससे पहले 2002 में सार्स फैला था जिसका पूरा नाम सार्स-कोव यानी सार्स कोरोना वायरस था। यह वायरस 26 देशों तक पहुंचा।वर्ष 2020 में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में फैले कोरोना वायरस के कारण होने वाली बीमारी का नाम कोविड-19 दिया गया है।-----
- खगोल विज्ञानियों ने अब तक के सबसे बड़े सुपरनोवा यानि तारों के विस्फोट का पता लगाया है। यह किसी आम सुपरनोवा से 10 गुना अधिक शक्तिशाली बताया जा रहा है।यह ना केवल सामान्य सुपरनोवा से 10 गुना अधिक शक्तिशाली है बल्कि उससे करीब 500 गुना ज्यादा चमकदार भी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सुपरनोवा दो विशाल तारों के आपस में टकरा कर एक हो जाने के दौरान बना है। ब्रिटेन और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने नेचर एस्ट्रोनॉमी नाम के पीयर रिव्यू जर्नल में प्रकाशित अपने रिसर्च पेपर में इसका खुलासा किया है। ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी और अमेरिका के हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स ने अपनी इस खोज को SN2016aps नाम दिया है। स्टडी के सहलेखक इडो बर्गर ने इसे इसके आकार और चमक के अलावा भी कई दूसरे मायनों में भी बेहद खास बताया।असल में आमतौर पर ऐसे सुपरनोवा अपनी कुल ऊर्जा का केवल एक फीसदी दिखने वाले प्रकाश की रेंज में उत्सर्जित करते हैं, लेकिन SN2016aps इससे कहीं बड़ा हिस्सा इस दृश्य प्रकाश के रूप में निकालता है। वैज्ञानिकों ने इस सुपरनोवा में इतनी ऊर्जा होने का अनुमान लगाया है जो 200 ट्रिलियन ट्रिलियन गीगाटन टीएनटी के विस्फोट के बराबर होगी। इस तरह की असामान्य ऊर्जा वाले सुपरनोवा के आसपास के बादल में हाइड्रोजन की बहुत अधिक मात्रा होने का पता चला है. रिसर्चरों ने इसका अर्थ यह निकाला है कि यह सुपरनोवा जरूर हमारे सूर्य जैसे दो तारों के आपस में मिल जाने के कारण बना होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी घटना का जिक्र अब तक केवल सैद्धांतिक तौर पर होता आया था लेकिन पहली बार ऐसा कुछ होने का प्रमाण मिला है। उन्हें उम्मीद है कि आगे इससे मिलते जुलते और सुपरनोवा का भी पता चलेगा जिनसे यह जानने में मदद मिलेगी कि बहुत पहले हमारा ब्रह्मांड और उसका माहौल कैसा हुआ करता था।क्या होता है सुपरनोवाकिसी बुजुर्ग तारे के टूटने से वहां जो ऊर्जा पैदा होती है, उसे ही सुपरनोवा कहते हैं। कई बार एक तारे से जितनी ऊर्जा निकलती है, वह हमारे सौरमंडल के सबसे मजबूत सदस्य सूर्य के पूरे जीवनकाल में निकलने वाली ऊर्जा से भी ज्यादा होती है। सुपरनोवा की ऊर्जा इतनी शक्तिशाली होती है कि उसके आगे हमारी धरती की आकाशगंगा कई हफ्तों तक फीकी पड़ सकती है।आमतौर पर सुपरनोवा के निर्माण में व्हाइट ड्वार्फ की अहम भूमिका होती है जिसके एक चम्मच द्रव्य का वजन भी करीब 10 टन तक हो सकता है। ज्यादातर व्हाइट ड्वार्फ गर्म होते होते अचानक गायब हो जाते हैं, लेकिन कुछ गिने चुने व्हाइट ड्वार्फ दूसरे तारों से मिल कर सुपरनोवा का निर्माण करते हैं। इस बार दिखे सुपरनोवा में व्हाइट ड्वार्फ तारे से नहीं टकराया बल्कि दो तारे ही आपस में टकराए हैं और अंतरिक्ष विज्ञान के आज तक के इतिहास का सबसे बड़ा सुपरनोवा पैदा कर गए हैं। आरपी/एमजे (डीपीए)।----
- 17 अप्रैल 1815 का दिन इंडोनेशिया के लिए आफत लेकर आया। कई दिनों से थर्रा रहा तमबोरा ज्वालामुखी इस दिन उग्र होकर फट पड़ा। करीब एक लाख लोग मारे गए। तमबोरा के धमाके को अब तक सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट कहा जाता है। यह इंडोनेशिया के सुमबवा द्वीप पर है। सैकड़ों साल से शांत पड़ा यह ज्वालामुखी पांच अप्रैल 1815 को कंपन पैदा करने लगा। पांच दिन बाद उससे राख उठने लगी।17 अप्रैल को बड़ा विस्फोट हुआ लावा और धुआं आस पास के इलाके में फैल गया। गुबार इतना गहरा था कि कई दिनों तक सूरज नहीं दिखाई पड़ा। धमाके की वजह से सुमबवा द्वीप पर डेढ़ मीटर मोटी राख की परत बिछ गई। सूनामी भी आई। ज्वालामुखी की गडग़ड़ाहट डेढ़ सौ किलोमीटर दूर तक सुनाई पड़ रही थी। ज्वालामुखी जब तक पूरी तरह शांत हुआ तब तक द्वीप के दस हजार बाशिंदे मारे जा चुके थे। बाकी मौतें आस पास के इलाकों में हुईं। विस्फोट के बाद तमबोरा का चेहरा बदल गया। ज्वालामुखी की ऊंचाई 14 हजार फुट से घटकर 9 हजार फुट रह गई।---
- कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच पूरी दुनिया में पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट या पीपीई की मांग आपूर्ति बढ़ गई है। यह कोरोना वायरस से जारी जंग में ढाल बनकर सामने आया है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को कोरोना वायरस से सुरक्षित रखने के लिए पीपीई किट एक आवश्यक उपकरण है।पीपीई किट का प्रयोग न सिर्फ कोविड-19 के लिए किया जा रहा है बल्कि पहले भी इसका प्रयोग इबोला जैसे गंभीर संक्रामक रोगों में किया जाता रहा है। आइये जाने कि पीपीई किट क्या है, पीपीई किट कैसे काम करती है, पीपीई किट को लेकर भारत सरकार की गाइडलाइन क्या है।पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट एक मेडिकल डिवाइस या उपकरण है जो स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा संक्रामक रोगों (बैक्टीरिया, वायरस आदि से फैले संक्रमण) से खुद को सुरक्षित रखने के लिए पहना जाता है। पीपीई, स्वास्थ्य कर्मी के शरीर को संक्रामक विषाणुओं या संक्रमित व्यक्ति के शरीर के साथ संपर्क को रोकता है, जिसमें एक संक्रामक एजेंट हो सकता है। पीपीई एक संभावित संक्रामक एजेंट और स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ता के बीच एक दीवार का काम करता है।पीपीई में ग्लव्स, गाउन, शू कवर, हेड कवर, मास्क, रेस्पिरेटर (श्वासयंत्र), आंखों की सुरक्षा, फेस शील्ड और गॉगल्स शामिल हैं। इसमें दस्ताने, संभावित संक्रामक पदार्थों या दूषित सतहों को सीधे छूने पर दस्ताने आपकी रक्षा करने में मदद करते हैं। गाउन, जूते और हेड कवर, एक दूषित वातावरण के अंदर संभावित जोखिम से बचाते हैं। सर्जिकल मास्क नाक और मुंह को शरीर के तरल पदार्थ के छींटों से बचाने में मदद करते हैं, इससे पहले कि आप सांस लें, श्वासयंत्र हवा को फि़ल्टर कर देती है। इसी प्रकार के गॉगल्स आंखों की सुरक्षा करता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के मुताबिक, पीपीई को बहुत ही सावधानी के साथ पहना और निकाला जाता है। इसे पहनने के दौरान, सबसे पहले गाउन पहना जाता है, उसके बाद फेस शील्ड और फिर बाकी चीजें। और जब इसे उतारते हैं तो सबसे पहले गाउन उतारना चाहिए इसके बाद ग्लब्स उतारकर अच्छे से हाथ धोएं। इसके बाद बाकी उपकरण को उतारें और दोबारा हाथ धोएं।कोरोना वायरस संक्रमण के चलते पीपीई की डिमांड अचानक से बढ़ी है। पूरे विश्व में चीन इसका सर्वाधिक उत्पादन करता है। हालांकि, भारत में भी पीपीई किट का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। भारत सरकार ने अनुमान लगाया है कि 25 अप्रैल तक पीपीई का उत्पादन एक दिन में लगभग 30 हजार यूनिट होगा। भारत में रेलवे समेत कई सरकारी और गैर सरकारी कंपनियां पीपीई के निर्माण में दिन-रात लगी हैं।--
- इंडोनेशिया का क्राकाटोआ ज्वालामुखी दुनिया के सबसे खतरनाक ज्वालामुखियों में से एक है। इसने 1883 में जब यह फूटा था, तब काफी तबाही मची थी। करीब 357 मीटर ऊंचाई वाला इस ज्वालामुखी ने उस वक्त 36 हजार से ज्यादा लोगों की जान ली थी। 1883 में क्राकाटोआ में हुआ विस्फोट दुनिया का सबसे भयावह ज्वालामुखी विस्फोट है। इसके कारण आने वाले कुछ सालों में ग्लोबल लेवल पर तापमान में बढ़त देखी गई।यह विस्फोट इतना भयानक था कि आधुनिक इतिहास में इतनी तबाही किसी और ज्वालामुखी ने नहीं मचाई। क्राकाटोआ के उस विस्फोट में पहले एटम बम से 13 हजार गुना ज्यादा शक्ति थी। वही बम जो अमेरिका ने 1945 में जापान के हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराया था। 1883 के विस्फोट को लगभग आधी दुनिया ने सुना। उस विस्फोट को दुनिया का सबसे भयानक विस्फोट कहा जाता है। 1883 के विस्फोट की गूंज वहां से करीब 4,800 किलोमीटर दूर मॉरीशस तक सुनाई दी। उस वक्त के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि लावा और विस्फोट से आई सुनामी ने 165 गांव और कस्बे पूरी तरह तबाह कर दिए। इसके अलावा 132 गांव-कस्बों को बुरी तरह नुकसान पहुंचा था।क्राकाटोआ ज्वालामुखी अप्रैल 2020 को फिर फूट पड़ा है। राजधानी जकार्ता जो कि इस ज्वालामुखी से करीब 150 किलोमीटर दूर है, वहां तक इसके धमाके की आवाज सुनी गई। सैटेलाइट तस्वीरों से हवा में 15 किलोमीटर ऊपर तक ज्वालामुखी का धुआं रिकॉर्ड किया गया है। बताया जा रहा है कि दिसंबर 2018 के बाद से सबसे मजबूत विस्फोट है।----
- पाबूजी की फड़ एक प्रकार का गीत नाट्य है, जिसे अभिनय के साथ गाया जाता है। यह राजस्थान में विख्यात है। फड़ लम्बे कपड़े पर बनाई गई एक कलाकृति होती है, जिसमें किसी लोक देवता (विशेष रूप से पाबूजी या देवनारायण) की कथा का चित्रण किया जाता है। फड़ को लकड़ी पर लपेट कर रखा जाता है। इसे धीरे-धीरे खोल कर भोपा तथा भोपी द्वारा लोक देवता की कथा को गीत व संगीत के साथ सुनाया जाता है। पाबूजी के अलावा अन्य लोकप्रिय फड़ देवनारायण जी की फड़ होती है।राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता पाबूज के यशगान में पावड (गीत) गाये जाते हैं और मनौती पूर्ण होने पर फड़ भी बांची जाती है। पाबूजी की फड़ पूरे राजस्थान में विख्यात है, जिसे भोपे बांचते हैं। ये भोपे विशेषकर थोरी जाति के होते हैं। फड़ कपड़े पर पाबूजी के जीवन प्रसंगों के चित्रों से युक्त एक पेंटिंग होती है। भोपे पाबूजी के जीवन कथा को इन चित्रों के माध्यम से कहते हैं और गीत भी गाते हैं। इन भोपों के साथ एक स्त्री भी होती है, जो भोपे के गीतोच्चारण के बाद सुर में सुर मिलाकर पाबूजी की जीवन लीलाओं के गीत गाती है। फड़ के सामने ये नृत्य भी करते हैं। ये गीत रावण हत्था पर गाये जाते हैं, जो सारंगी के जैसा वाद्य यंत्र होता है। पाबूजी की फड़ लगभग 30 फीट लम्बी तथा 5 फीट चौड़ी होती है। इस फड़ को एक बांस में लपेट कर रखा जाता है।राजस्थान में कुछ जगहों पर जाति विशेष के भोपे पेशेवर पुरोहित होते हैं। उनका मुख्य कार्य किसी मन्दिर में देवता की पूजा करना तथा देवता के आगे नाचना, गाना तथा कीर्तन आदि करना होता है। पाबूजी तथा देवनारायण के भोपे अपने संरक्षकों (धाताओं) के घर पर जाकर अपना पेशेवर गाना व नृत्य के साथ फड़ के आधार पर लोक देवता की कथा कहते हैं। राजस्थान में पाबूजी तथा देवनारायण के भक्त लाखों की संख्या में हैं। इन लोक देवताओं को कुटुम्ब के देवता के रूप में पूजा जाता है और उनकी वीरता के गीत चारण और भाटों द्वारा गाए जाते हैं। भोपों ने पाबूजी और देवनारायण जी की वीरता के सम्बन्ध में सैंकड़ों लोक गीत रचें हैं और इनकी गीतात्मक शौर्यगाथा को इनके द्वारा फड़ का प्रदर्शन करके आकर्षक और रोचक ढंग से किया जाता है। पाबूजी के भोपों ने पाबूजी की फड़ के गीत को अभिनय के साथ गाने की एक विशेष शैली विकसित कर ली है।



























